भारत में सांस्कृतिक मनोरंजन की परिदशा

Submitted by admin on Mon, 06/02/2014 - 10:34
Printer Friendly, PDF & Email
Source
पर्यावरण विमर्श

समाज में वैचारिक प्रदूषण इस कदर बढ़ता जा रहा है जिसकी परिकल्पना कर पाना मुश्किल हो गया है। शिक्षा देने का संस्थान हो या कार्य करने का, हर कहीं अपराध का साया पनपता हुआ देखा जा सकता है। वर्तमान में लोग केवल और केवल कंचन और कामिनी के पीछे दौड़ने लगे हैं और इस तरह समाज में शुद्ध वैचारिक पक्ष का ह्रास होने लगा है। लोगों में धार्मिक भावनाएं आज टूटने लगी हैं।

भारतीय सभ्यता सनातन सभ्यता है। यहां की संस्कृति अतिप्राचीन संस्कृति रही है। युगों-युगों से पाश्चात्य देश जिसके आदि-अंत का पता लगाने की कोशिश करते रहे हैं। इस बात का सबूत हमें ह्वेनसांग, फाह्यान, ह्वांगहू की भारत यात्राओं एवं सिकंदर महान के विश्वविजय अभियान में पढ़ने को मिलते हैं। इतिहास साक्षी रहा है कि भारतीय संस्कृति दुनिया में एक ऐसी संस्कृति रही है, जिसका विखंडन नहीं किया जा सकता। वैदिक संस्कारों ने यहां के लोगों को आपस में जोड़े रखा है, यहां ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की परंपरा सदैव से अद्वितीय रही है, यहां धर्म के प्रति आस्था और विश्वास सदैव से ही अद्भुत रहा है। प्राचीनकाल से ही ऋषि परंपराओं में ही धर्म के साथ-साथ ज्ञान और विज्ञान का विकास मानवीय समाज की भलाई के लिए एवं सामाजिक उत्थान के लिए किया जाता रहा है।

वैदिक ऋचाओं में असत्य से सत्य की ओर, पाप से पुण्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा सदैव मिलती रही है, यहां का वैदिक साहित्य समाज को सन्मार्ग की ओर जाने की शिक्षा सदैव से देता रहा है। जब-जब यहां पाप का पलड़ा भारी हुआ, तब-तब पुण्य को स्थापित करने के लिए एक नए अवतार का अवतरण हुआ है, वह चाहे कृष्ण हों या राम, बुद्ध हों या परशुराम। प्रत्येक बार समाज के सही मार्गदर्शन के लिए यहां पर शांति के संवाहकों का प्रादुर्भाव हुआ है।

जब-जब संक्रमणकाल का दौर आया है, तब-तब इस दौर से निपटने के लिए कबीर, मीरा, तुलसी, नानक, रैदास, तुकाराम जैसे संतों का इस धरती पर आगमन हुआ और समाज में पुनःव्यवस्था स्थापित हुई। इनके द्वारा समाज में उभर आई वैचारिक खरपतवारों को उखाड़कर साफ-सुथरा किया गया और मानवीय-मूल्यों के होते अवमूल्यन को पुनः व्यवस्थित किया गया।

भारतीय समाज सदैव से ही धर्म की आस्थाओं पर टिका रहा है, इसीलिए यहां कर्मकांड को प्रबल माना जाता रहा है। यहां का साधारण-से-साधारण व्यक्ति भी एक कर्मकांडी होता है, जो अपने नियत समय में नियत कर्मकांड जरूर पूरा करता है। इसका उदाहरण हमें अनामिल की कथा से मिल जाता है। ऐसी जटिल एवं समृद्ध तथा सुदृढ़ परंपराओं के देश विरोधी तत्वों द्वारा में वैचारिक मत भिन्नता पैदा करने की कोशिश सदैव से की जाती रही है। आज का दौर भारतीय समाज के लिए पुनः एक संक्रमणकाल का दौर है, जहां विभिन्न प्रकार से वैचारिक प्रदूषण की उत्पत्ति होती जा रही है। रोज नए-नए विचारों के लोग, समाज पर हावी होते देखे जा सकते हैं।

आज के दौर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रदूषण का बोलबाला भारतीय समाज में स्पष्ट रूप से देखने को मिल जाएगा। यहां सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करने के लिए मीडिया और मनोरंजन दोनों जवाबदेह हैं। आज समाज में मनोरंजन के नाम पर जो भौंडापन परोसा जा रहा है, वह भारतीय समाज के लिए सुपाच्य नहीं है, वरन् पथभ्रष्टता का संकेत देता है। आज समाज में विकास की जो धारा बह रही है, वह मांसलता को बेचकर प्राप्त की जा रही है।

नारी की छवि की दुर्गति जितनी ज्यादा आज हो रही है, इतनी पहले कभी नहीं हुई। आज दस में से नौ विज्ञापनों पर केवल नारी की ही शारीरिक मांसलता का उपयोग किया जा है, इससे उसके सम्मान में गिरावट का ही स्वरूप हमें देखने को मिल रहा है।

यह देश जहां सदैव से ही ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तंत्र देवताः’ कहा जाता रहा है, वहीं आज बाजारवाद की चकाचौंध में नारी को पूजने की बजाए बेचने का साधन बनाया गया है। इस तरह आज नारी यहां बाजारवाद की एक प्रमुख विक्रय-वस्तु बनकर रह गई है। मनोरंजन के रूप में आज समाज में जो परोसा जा रहा है, उससे यहां की सभ्यता और संस्कृति की रीढ़ पर ही वार किया जा रहा है। आज कोई भी सीरियल देखें, सभी में पारिवारिक झगड़े इतने उल-जलूल रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं कि जिसकी सीमा ही नहीं होती देश में जहां कभी संयुक्त परिवार का वर्चस्व होता था, आज लोगों को एकांगी परिवार में तब्दील होते देखा जा सकता है, जिसके कारण बाल-आश्रम और वृद्ध-आश्रमों की भरमार हो गई है। इसी का एक और विकृत रूप भी पनपा है, देश में अधिकाधिक भिक्षावृत्ति का होना।

समाज में आज हम आए दिन आयातित उत्सवों, पर्वों को मनाते देखे जा सकते हैं। हम अपनी सभ्यता को भूलकर ऋचाओं एवं वैदिक, संस्कारों, कर्मकांडों को भूलकर आज वेडिंग एनिवर्सरी, बर्थ-डे, किटी-पार्टी, टी पार्टी, रोज डे, वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे, न्यू ईयर पार्टी आदि मनाने लगे हैं, जबकि हमारी अपनी परंपराओं को आज वैश्विक रूप में-पाश्चात्य लोगों ने धारण करना प्रारंभ कर दिया है और हम उनकी उतरनों को स्वीकार करने में लगे हैं। इस प्रकार आज भारतीय समाज में एक नए तरह का संक्रमण देखने को मिल रहा है, जिसमें ज्यादा-से-ज्यादा युवाओं को इस ओर आकर्षित किया जा रहा है।

युवा वर्ग आने वाले समय का प्रणेता, मार्गदर्शक होता है और किसी राष्ट्र का भावी निर्माता भी है, जो राष्ट्र की रीढ़ का काम करता है। उसकी इसी रीढ़ पर जब आघात किया जाता है, तब उसकी नींव कमजोर की जा सकती है और यहीं षडयंत्र भारतीय समाज के लिए लगभग वर्तमान में रचा गया है, जिसके तहत संपूर्ण युवा समाज को भिन्न प्रकार के मायाजाल में फंसाकर, इसके मोहपाश में बांधकर इस देश की सभ्यता और संस्कृति से दूर करने की कोशिश की जा रही है, जिससे आने वाले समय में यहां पुनः किसी और परिवेश का आधिपत्य हो जाए। इसीलिए यहां मनोरंजन, शिक्षा, उत्सवों-पर्वों के नाम पर एक नई संस्कृति को स्वीकार करने के लिए युवाओं को उत्प्रेरित किया जा रहा है। वर्तमान में इसी के चलते देश में सबसे ज्यादा अपराध युवाओं द्वारा ही किए जा रहे हैं। समाज आज नशे के चंगुल में फंसा हुआ है, जिसमें 90 प्रतिशत युवा शामिल हैं। आज युवाओं द्वारा इस तरह के कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है, जिनसे समाज में आए दिन अव्यवस्था फैलती जा रही है। इस सामाजिक प्रदूषण से युवा वर्ग दिग्भ्रमित हो रहा है। आज सबसे ज्यादा हत्या, आत्महत्या बलात्कार, अपहरण, लूट, डकैती आदि की घटना कोई करता है तो वह युवा वर्ग ही है, जो इन तमाम तरह के अपराध करके समाज-क्षय करने की कोशिश कर रहा है। इसका कारण वर्तमान में परोसा जा रहा मनोरंजन है, जो मीडिया द्वारा युवाओं तक पहुंच रहा है।

वर्तमान परिवेश को देखकर पुनः समाज को व्यवस्थित करने के लिए किसी कबीर, तुलसी की कल्पना की जा सकती है, जिसके द्वारा पथ-भ्रष्ट होते समाज को पुनः अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया जा सके। आज समाज में इतनी ज्यादा असभ्यता और असंगति भर गई है कि कहीं भी, किसी भी जगह पर बड़ों को छोटे से अपमानित होता हुआ देखा जा सकता है।

समाज में वैचारिक प्रदूषण इस कदर बढ़ता जा रहा है जिसकी परिकल्पना कर पाना मुश्किल हो गया है। शिक्षा देने का संस्थान हो या कार्य करने का, हर कहीं अपराध का साया पनपता हुआ देखा जा सकता है। वर्तमान में लोग केवल और केवल कंचन और कामिनी के पीछे दौड़ने लगे हैं और इस तरह समाज में शुद्ध वैचारिक पक्ष का ह्रास होने लगा है। लोगों में धार्मिक भावनाएं आज टूटने लगी हैं। लोग इसे आज व्यापार का साधन बनाए बैठे हैं। बड़े-बड़े मठों में संतों के द्वारा चंदा उगाही का कार्य धड़ल्ले से किया जा रहा है। लोगों की आस्थाओं को माध्यम बनाकर संतों ने अपने उदर-पोषण, सुखोपभोग का पूरा मायाजाल रचा हुआ है। आज भारतीय समाज में सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदूषण का अत्यधिक बढ़ता प्रभाव देखा जा सकता है। वर्तमान में समाज में लोगों को केवल और केवल स्वयं की वृद्धि ही दिखाई देती है, वह अपनी इस श्रीवृद्धि को प्राप्त करने के लिए कुछ भी कर सकता है, किसी भी हद को पार कर सकता है। इस प्रकार समाज में आज व्यक्तिवादिता का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।

सारे तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान भारतीय समाज में सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रदूषण व्यापक रूप में फैला हुआ है, जिसका मूल कारण है बढ़ता बाजारवाद, पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण, मीडिया और आज का अस्वस्थ मनोरंजन, जिसके प्रभाव से समाज में आज ऐसी स्थिति निर्मित हो रही है जिसका ज्यादा प्रभाव समाज के युवा वर्ग पर पड़ रहा है और वे इसके शिकार होते जा रहे हैं, जो आने वाले समय में भारतीय समाज के लिए एक घातक परिणाम देने वाला सिद्ध होगा, जिससे देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर एक प्रश्नचिह्न-सा लग जाएगा?

लक्ष्मी चौक, चिंगराजपारा, बिलासपुर (छ.ग.)

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा