बेहाल भूजल

Submitted by admin on Tue, 06/03/2014 - 10:35
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पानी, समाज और सरकार (किताब)

जल संकट पर जल संसाधन विभाग के कामों की दिशा, प्राथमिकता और बजट आवंटन को देखने से लगता है कि उसकी नजर में भूजल संकट की तुलना में सतही जल संकट अधिक गंभीर है। जल संसाधन विभागों की समझ, सोच और कामों की दिशा से कुछ लोग असहमत हो सकते हैं पर यह भी गौर करने लायक है कि बरसात के बाद के दिनों में जलसंकट पर मीडिया में छपी या दिखाई खबरों और भुक्तभोगी समाज के नजरिए से देखें तो लगता है कि भूजल संकट देशव्यापी है और वह यदि बड़ा नहीं तो छोटा भी नहीं है।

सतही जल संकट और भूजल संकट में कौन-सा संकट बड़ा है और कौन छोटा या कौन अधिक खतरनाक है, कौन कम, किसकी बेरुखी से अधिक लोगों को तकलीफ उठानी पड़ती है और कौन-सा संकट समाज और सरकार की चिंता का सबसे बड़ा मुद्दा है या होना चाहिए? कुछ लोगों को संभवतः यह सवाल किसी हद तक गैरजरूरी लग सकता है पर इसका उत्तर बहुत आसान नहीं हैः क्योंकि उत्तर देने वाले लोगों की पृष्ठभूमियां भिन्न-भिन्न और हित अलग-अलग है। इसलिए जाहिर है कि उनके उत्तर अलग-अलग होंगे।

भूजल की बेहाली पर अलग-अलग राय मिलेंगी। पर यह निश्चित है कि भोगने वाले वर्ग, देखने वाले वर्ग और फायदा लेने वाले तथा सेवा देने वाले वर्ग की राय में बहुत अंतर होगा। यदि इस सवाल का उत्तर पाने के लिए सांख्यिकी की मदद ली जाती है तथा सर्वेक्षण कराकर अभिमत एकत्रित किए जाते हैं तो भी अलग-अलग उत्तर ही मिलेंगे। इसलिए यही अच्छा होगा कि इस कम जरूरी एवं आसान से दिखने वाले विवादास्पद सवाल को सांख्यिकी के शोधकर्ताओं की अकादमिक बहस के लिए छोड़ दें। उनके लिए यह आकर्षक मुद्दा है।

अधिकांश ग्रामों और शहरी इलाकों में आंशिक रूप से पीने के पानी का जरिया भूमिगत जल है इसलिए जब इन बसाहटों में पानी की आपूर्ति में कमी होती है तो समाज को लगता है कि जल संकट का नाता भूजल से है।

इसी तरह जब नदी नालों, कुओं और नलकूपों के सूखने की रिपोर्ट को मीडिया उछालता है या भूजल स्तर की औसत क्षेत्रीय गिरावट पर सरकारी आंकड़े अखबारों की सुर्खियां बनते हैं तो लगता है कि सरकार सहित अधिकांश लोग भूजल संकट को अनुभव कर रहे हैं। शायद इसीलिए अधिकांश ग्रामीण इलाकों में भूजल संकट बड़ा है। पर निश्चय ही यह वक्तव्य किसी प्रमाणपत्र पर आधारित नहीं है, इसलिए विभागीय नजरिया देखें।

जल संकट पर जल संसाधन विभाग के कामों की दिशा, प्राथमिकता और बजट आवंटन को देखने से लगता है कि उसकी नजर में भूजल संकट की तुलना में सतही जल संकट अधिक गंभीर है। जल संसाधन विभागों की उपर्युक्त समझ, सोच और कामों की दिशा से कुछ लोग असहमत हो सकते हैं पर यह भी गौर करने लायक है कि बरसात के बाद के दिनों में जलसंकट पर मीडिया में छपी या दिखाई खबरों और भुक्तभोगी समाज के नजरिए से देखें तो लगता है कि भूजल संकट देशव्यापी है और वह यदि बड़ा नहीं तो छोटा भी नहीं है।

खैर, इस बात को बेहतर तरीके से समझने के लिए पानी के सिक्के के इन दोनों पहलुओं को भारत के संविधान और नेशनल वाटर पालिसी के प्रावधानों के प्रकाश में खोजा जाए। हो सकता है उसमें ऐसा कुछ दिख जाए जिसे देखकर विभाग की समझ पर आधारित प्राथमिकता तथा विकल्प चयन का आधार कहा जा सके।

लेखक की मान्यता है कि संविधान अगर देश की आत्मा है तो नेशनल वाटर पालिसी नीति निर्माताओं का पानी संबंधी दृष्टिबोध, कल्याणकारी राज्य से समाज की अपेक्षाओं का पारदर्शी आईना, संभावित कार्यक्रमों की डायरेक्टरी, नोडल विभाग की रणनीति है, जिसमें बहुसंख्य समाज के भविष्य की झलक दिखाई देती हो। इसी तरह संविधान के बदलाव, देश की नब्ज पकड़कर बीमारियों का इलाज करने वाले संवेदनशील वैद्यों के नाड़ी ज्ञान का द्योतक है।

नाड़ी वैद्यों को व्यवस्था की बहुत अच्छी समझ होती है इसलिए वे “किया जाएगा और किया जाना चाहिए या नहीं किया जा सकता” का अंतर बखूबी समझते हैं और इसी समझ का उपयोग, संविधान में वांछित बदलावों या संशोधनों के मार्फत देश को आगे ले जाने में करते हैं। इसलिए, इस अध्याय में, सबसे पहले संविधान में भूजल और उससे जुड़े प्रावधानों से बात शुरू करेंगे और उसके बाद देश की जल नीति 2002 की भूजल संबंधी प्राथमिकताओं को देखेंगे।

पानी से जुड़ी कुछ बुनियादी बातों वाले अध्याय में पाठकों ने देखा है कि भारत के संविधान सूची-1 केन्द्र सूची 56 में पानी के संबंध में केन्द्र और राज्यों के दायित्वों का और सूची-2 राज्य सूची 17, में जल, अर्थात जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, निकास और बांध, जलाशय और जल विद्युत, सूची-1 के प्रवेश 56 के अधीन राज्य की जिम्मेदारी का उल्लेख है। संविधान में जल का अर्थ - जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, निकास (ड्रेनेज) और बांध, जलाशय और जल विद्युत ही है।

उपर्युक्त विवरण से जाहिर है कि संविधान के मूल दस्तावेज में भूजल या उससे जुड़ें किसी भी मुद्दे का जिक्र नहीं है। पाठक सहमत होंगे कि जिक्र का उपर्युक्त अभाव, भूजल संसाधन के साथ नाइंसाफी नहीं है। जिक्र के उपर्युक्त अभाव के लिए सन् 1947 के समय के हालात जिम्मेदार हैं। उस कालखंड में भूजल से जुड़ा कोई भी मुद्दा काबिलेगौर नहीं था इसलिए संविधान निर्माताओं ने संविधान लिखते समय भूजल का जिक्र नहीं कर, कुछ भी गलत नहीं किया।

आजादी के बाद, सन 1953-54 से देश के प्रमुख कछारी इलाकों में अमेरिका की सहायता से भूजल की खोज का काम शुरू हुआ और 1960 के बाद भूजल दोहन को गति मिली। कुओं में सेन्ट्रीफ्यूगल और नलकूपों में सबमर्सिबल पम्पों, सरकारी विभागों और जल विशेषज्ञों ने एक ओर हरित क्रांति को आगे बढ़ाया तो दूसरी ओर, बढ़ती मांग ने भूजल दोहन को, लक्ष्मण रेखा लांघने की ओर अग्रसर किया। लगता है, उस दौर में किसी को भी भूजल संकट की गंभीरता का संज्ञान नहीं था।

जल्दी ही, अर्थात 1980 के बाद से विभिन्न इलाकों में भूजल स्तर की गिरावट की आहट स्पष्ट तौर पर सुनाई देने लगी, सरकारी दस्तावेजों में उसकी रिपोर्टिंग होने लगी और कुछ कुछ ही समय के बाद कार्यशालाओं और सेमीनारों में भूजल की बिगड़ती गुणवत्ता की चर्चा होने लगी। यही वह समय था जब संविधान में भूजल की चिंता और उसका हल दर्ज होना था। सभी जिम्मेदार पक्षों की अनदेखी या बेरुखी के कारण, भूजल की चिंता को भारत के संविधान में स्थान नहीं मिला या नहीं दिलाया जा सका। नोडल विभाग की इसी चूक या अनदेखी के कारण भूजल संकट ने समाज का सबसे अधिक नुकसान किया।

संविधान के बाद, अब राष्ट्रीय जल नीति की बात करें। पहली राष्ट्रीय जल नीति आजादी के चालीस साल बाद, सन 1987 में बनी। राष्ट्रीय जल नीति का दूसरा दस्तावेज सन 2002 में जारी हुआ। सन 2002 के दस्तावेज के पैरा 3.2 और पैरा 7.1 से लेकर 7.4 में भूजल के बारे में उल्लेख है, जिसका आशय इस प्रकार है-

3.2 जल उपलब्धता बढ़ाने के लिए गैर-परंपरागत विधियों जैसे भूजल के कृत्रिम रीचार्ज और रूफ टाप रेन वाटर हारवेस्टिंग को प्रयोग में लाने की आवश्यकता है। इस विधा की तकनीकों पर केन्द्रित अनुसंधान और उसका विकास आवश्यक है।

7.1 वैज्ञानिक आधार पर भूजल भंडारों की संभावित क्षमता का समयबद्ध आकलन किया जाना चाहिए। इस आकलन में आर्थिक दृष्टि से (भूजल) दोहन की संभाव्यता और गुणवत्ता को ध्यान में रखना चाहिए।

7.2 भूजल के दोहन को संभावित प्राकृतिक रीचार्ज की सीमा के अंदर नियंत्रित करना चाहिए। ऐसा करते समय सामाजिक समानता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा भूजल के अतिदोहन के पर्यावरणीय परिणामों को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना चाहिए। भूजल की गुणवत्ता और उपलब्धता बढ़ाने के लिए रीचार्ज प्रोजेक्ट विकसित और क्रियान्वित करना चाहिए।

7.3 परियोजनाओं की प्लानिंग के समय से ही सतही जल और भूमिगत जल के समन्वित विकास और मिले-जुले उपयोग पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसे, किसी भी परियोजना के क्रियान्वयन का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।

7.4 भूजल के अतिदोहन से बचना चाहिए। खासकर, समुद्र के किनारे के इलाकों में जहां अतिदोहन के कारण मीठे पानी के एक्वीफरों में, समुद्र के पानी के प्रवेश से, मीठे पानी के एक्वीफरों के खारे होने का खतरा होता है।

उपर्युक्त विवरणों से स्थिति स्पष्ट है। लगता है नोडल विभाग अपनी जिम्मेदारी को निभाने के स्थान पर समाज और अन्य असंबंधित लोगों को प्रवचन दे रहा है। संविधान में भूजल का यदि उल्लेख नहीं है तो आजादी के 40 साल बाद बनी पहली जल नीति के प्रावधानों में भूजल की स्थिति अत्यंत कमजोर है।

संकट की दस्तक देते हालात की पृष्ठभूमि में बनी जलनीति-2002 भी स्थिति को सुधारती नजर नहीं आती। दोनों जलनीतियों की सुझावात्मक टिप्पणियों के कारण भूजल की समस्याओं के निराकरण की कोशिश और गिरते भूजल स्तर को थामने की रणनीति, बजट और प्राथमिकता मुख्यधारा में नहीं हैं। सब कुछ सुझाव के रूप में है और हाशिए पर है या समाज की जागरूकता बढ़ाने के स्तर पर है, इसीलिए घटता जल स्तर थम नहीं रहा है।

सभी मंत्रालयों द्वारा किए प्रयासों के बावजूद अतिदोहित विकासखंडों (भूजल विकास का स्तर 100 प्रतिशत से अधिक), और क्रिटिकल विकास खंडों (भूजल विकास का स्तर 90 से 100 प्रतिशत के बीच) की संख्या बढ़ रही है। इन श्रेणियों के विकास खंडों की संख्या क्रमशः 837 और 226 है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है, फिर भी भूजल स्तर को कम करने वाले कार्यक्रमों के परिणाम लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत के सामने पेश नही हो पा रहे हैं।

भूजल अतिदोहन के संदर्भ में एक ही तर्क सामने है - तर्क है, भूजल का उपयोग कम करो, पानी बचाओ और भूजल दोहन को नियंत्रित करो। इन तर्कों की वकालत करते समय समुद्र में बहकर जाने वाले 1263 लाख हे.मी. पानी की अनदेखी होती हैं। इस अनदेखी के कारण नदी नालों के बरसात बाद सूखने का सिलसिला साल दर साल और बढ़ेगा।

भूजल रीचार्ज के जानकारों एवं तकनीकों की उपलब्धता और समाज की बढ़ती कठिनाइयों के बावजूद केवल भूजल पर नियंत्रण की वकालत करना, कुछ लोगों को सही तो कुछ लोगों को छलावा और नाइंसाफी लगती है। कार्यक्रमों की दिशा पर अंगुली उठाने वाली इस टिप्पणी पर मतभेद होना लाजिमी है, पर यह टिप्पणी अनदेखी और उपेक्षा के लिए है और हमारे संविधान और देश में असहमति को शब्द देने या दर्ज कराने की अनुमति है।

संविधान और जल नीति तो पुनीत दस्तावेज हैं। उनमें लिखे संदेशों को पढ़ना और बिगड़ते हालात पर नजर रखना दो अलग-अलग बातें हैं। संविधान में भूजल का उल्लेख नहीं होने के कारण नोडल विभाग, केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड या राज्यों के भूजल संगठन अपनी-अपनी व्याख्या और संभवतः सुविधा के अनुसार संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हैं, पर बिगड़ते हालात को समय पर ठीक करना सबसे बड़ी गैर जिम्मेदारी का काम है। पी. साईनाथ ने लिखा है, “हर व्यक्ति सूखे से प्रेम करता है।” हो सकता है भूजल संकट को बनाए रखने के पीछे भी शायद यही कारण हो।

भारत के मुख्य नदी कछारों में सन 1953 में भूमिगत जल के अनुसंधान का काम इंडो-अमेरिकन समझौते के अधीन शुरू हुआ। इस कार्यक्रम के अंतर्गत, भूजल संबंधी तकनीकी पैरामीटर और भूजल दोहन के लिए उपर्युक्त इलाके खोजे गए। इन उपर्युक्त इलाकों में सरकार की मदद से नलकूप खनन का प्रारंभ हुआ।

नाबार्ड सहित अनेक वित्तीय संस्थाओं ने नलकूप खनन और विद्युत मंडलों ने उनके विद्युतीकरण को भरपूर सहयोग दिया। पंप बनाने वाली कंपनियों ने हर क्षमता के पंप बनाए और बाजार में उतारे। इस सहयोग के कारण नलकूप खनन की बागडोर खनन एजेंसियों, सक्षम किसानों तथा आम शहरी के हाथ में चली गई और इस दौर में नलकूपों और कुओं के काम ने नई ऊंचाइयां हासिल कीं। तकनीकी लोगों ने भी इन कामों को आगे ले जाने में योगदान दिया।

इस दौर में, अकादमिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को अनुसंधान करने के लिए बहुत जानकारियां मिलीं। जानकारियों के आधार पर अनुसंधान हुए। खूब केस स्टडी प्रकाशित हुईं। कुछ संस्थाओं ने अपनी पृथक पहचान भी बनाई पर चूंकि अनुसंधान, कार्यक्रम नहीं होते, इसलिए वे अपनी सीमाओं के आगे नहीं जा पाए।

हर इलाके में नलकूपों और कुओं के बनने के कारण कई नई चुनौतियां सिर उठाने लगी हैं। इन चुनौतियों से लोहा लेने की जगह केन्द्र ओर राज्यों के भूजल संगठनों ने मुख्य रूप से भूजल स्तर की गिरावट की रिपोर्टिंग और भंडारों की स्थिति को ही जानने एवं बताने का काम किया। नोडल विभागों और सरकारों ने भी भूजल स्तर की गिरावट की रिपोर्टिंग को अपने दायित्वों की इतिश्री मान लिया।

पिछले लगभग 20 सालों में जल स्तर की गिरावट को रोकने के लिए रीचार्ज परियोजनाओं को युद्ध स्तर पर लेने, पानी की खराब होती गुणवत्ता और नदी नालों के बरसात बाद सूखने जैसी समस्याओं की अनदेखी हुई। भूजल स्तर की मानीटरिंग होती रही पर समस्या हल करने के लिए प्रभावी रणनीति पर परिणाम मूलक व्यापक काम हुआ ही नहीं। लेखक को लगता है कि भूजल संकट हकीकत में समाज की गंभीर होती समस्या की अनदेखी और उपेक्षा का है। प्रजातंत्र में प्रजा की समस्या की उपेक्षा गंभीर चिंता का मामला है।

कुछ साल पहले तक सरकार से हर समस्या को हल करने की अपेक्षा की जाती थी। पर अब सरकार के द्वारा जल संकट हल करने में समाज को आगे लाने और जन सहयोग हासिल करने के काम को प्राथमिकता दी जाने लगी है। इस काम में स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी और समाज के बीच अलख जगाने में उनकी महारत को आगे लाने की चर्चा होने लगी है। कहीं-कहीं स्वयंसेवी संस्थाएं सहयोग देने के लिए आगे आने लगी हैं। जन सहभाग का लागू माडल कितना कारगर है? अभी उस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगा पर सब जानते हैं कि उसका रिमोट सरकार के पास है।

जल संकट को कम करने के काम में समाज की सहभागिता का दौरा सन 1990 के बाद आया। इस दौर में समाज को जल संकट के बारे में शिक्षित करने के लिए बहुत सारे प्रयास हुए, पर भूजल संकट के ग्राफ के सामने सहभागिता का ग्राफ अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया है। कहीं-कहीं परिणाम मिले हैं - वे परिणाम रालेगांव (महाराष्ट्र) में अन्ना हजारे के प्रयासों से तो अलवर (राजस्थान) में राजेन्द्र सिंह के जोहड़ निर्माण से मिले हैं।

दोनों जगह समाज की ऊर्जा और तकनीक की देशज समझ ही मुख्यधारा में रही है। इन स्थानों पर बाहरी दखलंदाजी के लिए दरवाजे पूरी तरह बंद थे। राजनीति, प्रशासन, नोडल विभाग और सरकारी कामकाज का तौर तरीका, ये सब के सब, इन कामों से कोसों दूर थे। इन स्थानों पर हुए कामों ने सरकार और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। कहीं-कहीं, जब उन्हीं कामों को सरकार ने समाज के साथ जुड़कर करने का प्रयास किया तो वे सब गैर जरूरी तत्व मुख्यधारा में आ गए जिन्हें अन्ना हजारे या राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे समाज ने पूरी तरह दूर रखा था।

संभव है, इस अंतर के कारण ही, सरकारों द्वारा संचालित जन भागीदारी के कामों में अपेक्षित धार और जुड़ाव पैदा नहीं हुआ। कई स्थानों पर इन कामों में अवांछित नुस्खा पद्धति हावी हो गई। धार तथा जुड़ाव की कमी और नुस्खा पद्धति को अपनाने के कारण प्रयास बौने रहे, नदियां जिंदा नहीं हुईं, कुओं तथा नलकूपों में लौटा पानी बहुत दिनों तक काम नहीं आया और भूजल संकट बरकरार रहा।

सतही जल और भूजल संरचनाओं के फायदे-नुकसान के बारे में बाद में बात करेंगे। अभी केवल भूजल रीचार्ज के लिए वांछित पानी की उपलब्धता पर बात कर लें। आंकड़ों के आईने में पानी वाले अध्याय में पाठकों ने भारत में उपलब्ध पानी के आंकड़ों की तालिका देखी हैं। इस तालिका के सातवें क्रम पर रन-आफ के पानी की उस मात्रा का जिक्र है जिसे बांध बनाने के काम में लाना संभव नहीं है। इस पानी की मात्रा लगभग 1263 लाख हे.मी. है।

यह मात्रा उपयोग में आ सकने वाले 690 लाख हेक्टेयर मीटर पानी से 573 लाख हेक्टेयर मीटर अधिक है। इन आंकड़ों से समझ में आता है कि भूजल संकट को दूर करने या खेती के लिए बरसात पर निर्भर इलाकों का भविष्य संवारने के लिए बहुत अधिक पानी मौजूद है। इस पानी के उपयोग के बारे में जल नीति मौन और समाज अनजान हैं। नोडल विभाग ने इस पानी को कोई नाम भी नहीं दिया है।

इस पानी को जल संकट ग्रस्त इलाकों का भविष्य या अप्रयुक्त बैलेंस रन-आफ वाटर नाम दिया जा सकता है। लेखक को लगता है कि शेष बचा यह 1263 लाख हेक्टेयर मीटर बैलेंस रन-आफ वाटर जो सिंचाई परियोजनाओं के कैचमेंट, गैर कमांड क्षेत्र और वर्षा आश्रित इलाकों का भविष्य संवार सकता है। पानी की चिंता करने वाले लोगों और जल कष्ट भोगने वाले समाज के लिए यह आशा की किरण ही नहीं पुख्ता बीमा है। इस पानी के उपयोग में लेने से किसी भी सिंचाई परियोजना या समाज के किसी भी वर्ग के अधिकारों का हनन नहीं होगा इसलिए जल संकट के वर्तमान दौर में इस पानी के उपयोग के बारे में सोचा जाना चाहिए। इस बिसराये पानी के बारे में लेखक का सुझाव है कि-

1. केन्द्र ‘सरकार द्वारा इस पानी की उपलब्धता की मात्रा के बारे में क्षेत्र, कछार, कैचमेंट, सब-कैचमेंट एवं वाटरशेड वार (यूनिट्स और ऑल इंडिया सॉयल एंड लैंड यूज बोर्ड एटलस) आंकड़े प्रकाशित किए जाने चाहिए।
2. क्षेत्र, कछार, कैचमेंट, सब-कैचमेंट एवं वाटरशेड वार आंकड़ों के आधार पर इस पानी के उपयोग की प्राथमिकता क्रम से आवंटन की मात्रा का निर्धारण किया जाना चाहिए।
3. आवंटन का उद्देश्य मूल जरूरतों (पेयजल, आजीविका के लिए न्यूनतम जल और नदियों में न्यूनतम पर्यावरणीय जल प्रवाह) के लिए पानी की स्थानीय उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
4. हर वाटरशेड में पानी की मूल जरूरतों की पूर्ति के लिए, क्षेत्र की क्षमता के अनुसार स्व-स्थाने जल संरक्षण और भूजल रीचार्ज की योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाना चाहिए।
5. प्लानिंग में देशज ज्ञान, परंपरा और विधियों को वरीयता दी जानी चाहिए और समाज को क्रियान्वयन एवं प्रबंध के अधिकार सौंपे जाना चाहिए। सरकार को सहयोगी की भूमिका का निर्वाह करना चाहिए।
6. नगरीय इलाकों की हर कालोनी में जल संरक्षण और भूजल रीचार्ज के लिए पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए। नगरीय इलाकों में इस काम के लिए जमीन सुरक्षित की जानी चाहिए और कानून बनना चाहिए।

7. पुरानी बावड़ियों, तालाबों और बूढ़े होते, जलाशयों की साफ सफाई के लिए माकूल व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। गौरतलब है कि पुरानी जल संरचनाएं सतही और भूजल पर आधारित होती थीं।
8. ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले संभावित जलवायु बदलाव के परिप्रेक्ष्य में उपर्युक्त प्लानिंग को लचीला बनाया जाना चाहिए।

उपर्युक्त सुझावों पर काम करने से भारत के सूखे के लिए संवेदनशील इलाकों, बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के कैचमेंट, शहरों और वाटर लेवल के गिरने में कमी होगी। भूजल संकट कम होगा। भूजल प्रदूषण की समस्या घटेगी और नदियों के सूखने में कमी आएगी। नदियों के प्रवाह में सुधार होगा और सूखने वाली नदियों की संख्या घटेगी। भूजल स्तर की गिरावट कम होने से रबी की सिंचाई के लिए नदियों से अधिक पानी हासिल किया जा सकेगा।

शहरी क्षेत्रों के नदी नालों में अधिक दिनों तक पानी बहने से कम गंदगी जमा होगी। इसी तरह, ग्रामीण इलाकों में कीटनाशकों, पेस्टीसाइड और फर्टीलाइजरों के कारण होने वाले प्रदूषणों का असर घटेगा। पेयजल और खेती के पानी की गुणवत्ता में सुधार होगा। इसके लिए पानी, समाज और सरकार के रिश्ते को प्रभावी बनाना होगा।

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.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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