पर्यावरण संरक्षण और पूंजीवाद का विलोम

Submitted by admin on Thu, 06/05/2014 - 16:35
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 31 मई 2014

आज जरूरत है ठोस समाधान की, इसके लिए एक निश्चित समय सीमा में लक्ष्य तय होने चाहिए। वर्तमान परिवेश में आज जरूरत इस बात की है कि हम भविष्य के लिए ऐसा नया रास्ता चुनें जो संपन्नता के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं तथा मानव मात्र के कल्याण के बीच संतुलन रख सकें। हमें यह बात हमेशा याद रखना होगा कि पृथ्वी हर आदमी की जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी एक आदमी के लालच को नहीं।

पर्यावरण के मुद्दे पर दुनिया भर में सरकारें कितनी संजीदा है और इसको लेकर उन्होंने अब तक क्या किया है, इसको समझने के लिए थोड़ा सा फ्लैश बैक में चलते हैं। आज से ठीक 22 साल पहले वर्ष 1992 में पृथ्वी के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट और जीवों के सतत् विकास की चिंताओं से निपटने के लिए साझी रणनीति बनाने के उद्देश्य से दुनियाभर के नेता ब्राजील के शहर रियो डि जेनेरियो में अर्थ समिट यानी पृथ्वी सम्मेलन में एकत्र हुए थे।

दुनिया के 172 देशों के प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्यावरण और विकास के मुद्दों पर आयोजित इस वैश्विक सम्मेलन में शिरकत की थी। इस सम्मलेन में जमा हुए पूरी दुनिया के नेता पृथ्वी के अधिक सुरक्षित भविष्य के लिए जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण योजना पर सहमत हुए थे।

इस सम्मेलन में यूएनएफसीसीसी- यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेटिक चेंज पर सहमति बनी। पर्यावरण को बचाने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल भी इसी सम्मेलन का परिणाम था। इसमें वे जबरदस्त आर्थिक विकास और बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं के साथ हमारी धरती के सबसे मूल्यवान संसाधनों जमीन, हवा और पानी के संरक्षण का संतुलन बनाना चाहते थे।

इस बात को लेकर सभी सहमत थे कि इसका एक ही रास्ता है- पुराना आर्थिक मॉडल तोड़कर नया मॉडल खोजा जाए। उन्होंने इसे टिकाऊ विकास का नाम दिया। दो दशक बाद हम फिर भविष्य के मोड़ पर खड़े हैं। मानवता के सामने आज भी वही चुनौतियां हैं, अब उनका आकार और भी बड़ा हो गया है।

22 साल बाद यह संकल्प पूरा होता नहीं दिखाई देता। जिसकी वजह से दुनिया के शीर्ष नेताओं ने रियो डि जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन में भागीदारी की थी। पिछले साल फिर रियो में ऐसा ही सम्मेलन रियो 20 (रियो से रियो तक) हुआ, ड्रॉफ्ट बने, घोषणाएं हुई, लेकिन वास्तविक धरातल पर कुछ नहीं हुआ।

पर्यावरण के मुद्दे पर विश्व में हर साल बड़े सम्मेलन होते रहते हैं लेकिन इनका कोई सार्थक नतीजा आज तक नहीं निकल पाया है। पर्यावरण और कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मुद्दे पर विकसित और विकासशील देशों के बीच आज तक कोई आम सहमति नहीं बन पाई।

असली बात यह है कि अमेरिका सहित कई विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश अपने उद्योग-धंधों की रफ्तार कम करें और कार्बन उत्सर्जन के स्तर को तेजी से नीचे लेकर आएं। जबकि विकसित देश कार्बन उत्सर्जन कटौती के मामले में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं।

वर्तमान आर्थिक नीतियों ने विश्व की जनसंख्या के साथ मिलकर पृथ्वी की नाजुक परिस्थिति पर अभूतपूर्व दबाव डाला है। जिसकी वजह से अब हमें यह मानना ही होगा कि सब कुछ जलाकर और खपाकर हम संपन्नता के रास्ते पर नहीं बढ़ते रह सकते। इसके बावजूद हमने उस सहज समाधान को अपनाया नहीं है। टिकाऊ विकास का यह अकेला रास्ता आज भी उतना ही अपरिहार्य है, जितना 21 वर्ष पहले था। ग्लोबल वार्मिंग और तापमान में वृद्धि लगातार जारी है।

जनसंख्या बढ़ने से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है और प्राकृतिक संसाधनों के स्रोत सीमित होने के कारण भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। इसके बावजूद हमने कथित विकास की जगह वैकल्पिक समाधान को नहीं अपनाया है। टिकाऊ विकास की चुनौती आज भी हमारे सामने बनी हुई है। इस चुनौती से निपटने के लिए पिछले साल रियो में जीरो ड्रॉफ्ट की घोषणा की गई थी।

रियो 20 और यूएनसीएसडी (यूनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस ऑन सस्टेनेबल डेवलपमेंट) सम्मेलन का वार्ता मसौदा जीरो ड्राफ्ट यानी भविष्य जो हम चाहते हैं, के नाम से जाना गया था। नवंबर 2011 में सदस्य देशों, संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय एनजीओ और पर्यवेक्षक संगठनों की मदद से इस मसौदे को तैयार किया गया था। इसे 11 जनवरी 2012 को सार्वजनिक किया गया।

इस ड्रॉफ्ट को पांच वर्गों में बांटा गया है- प्रस्तावनाएं, सत्त विकास के संदर्भ में हरित अर्थव्यवस्था और गरीबी उन्मूलन, राजनीतिक प्रतिबद्धता का नवीकरण, सतत विकास के लिए संस्थागत ढांचा और पालन और कार्यवाही के लिए रूपरेखा। इस मसौदे को ही रियो 20 में सर्वसम्मति से अपनाया गया, लेकिन जीरो ड्रॉफ्ट के सार को देखने से लगता है कि प्रकृति और विकास के बीच सामंजस्य को केंद्र में रखते हुए यह दस्तावेज तैयार नहीं किया गया है, बल्कि आर्थिक विकास ही हमारी प्राथमिकता बनी हुई है।

इस मसौदे में कार्बन उत्सर्जन और जंगलों के विनाश पर स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा गया है, जिससे कुछ देशों ने इसकी आलोचना भी की है। सम्मलेन में पर्यावरण को बचाने और इससे पैदा हुई चुनौतियों से निपटने के लिए आम सहमति बनाने की कोशिश हुई। लेकिन आर्थिक विकास के उच्च स्तर पर पहुंचे देश पर्यावरण के मुद्दे पर बराबरी का हक चाहते हैं जो विकासशील देशों को मंजूर नहीं है। जी-77 समूह देशों का मानना है कि विकसित देशों द्वारा पहले किए गए वादों और प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए, जबकि विकसित देश इसके प्रति उदासीन नजर आते हैं।

भारत सीबीडीआर यानी कॉमन, बट डिफरेंशिएटेड रेसपांसिबिलिटी का भी समर्थन करता है। यह स्थायी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून के तौर पर सामने आया था, लेकिन उस सम्मेलन के लक्ष्य अभी भी अधूरे हैं। क्योटो प्रोटोकॉल अपना लक्ष्य पूरा करने में नाकाम रहा है और क्योटो से आगे का रास्ता धुंधला बना हुआ है। कोपेनहेगेन और डरबन सम्मेलनों में भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका, आगे की राह चुनौती भरी है।

विकसित देश पर्यावरण संरक्षण पर व्यापक स्तर पर नए सिरे से इस बदलाव के पक्ष में नहीं हैं। सवाल यह है कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण बचाने के लिए और क्या-क्या किया जा सकता है? असलियत यह है कि वैश्विक पर्यावरण से जुड़ी तमाम समस्याओं, जिनमें जलवायु परिवर्तन से लेकर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कचरे का निपटारा तक शामिल है, को लेकर अलग-अलग संधियां लागू हैं।

सहभागिता और सहयोग के अंतरराष्ट्रीय नियमों पर समानान्तर प्रक्रियाओं और संस्थानों के स्तर पर गंभीर मंथन किया जाए। 1992 से लेकर रियो 20 तक के शिखर सम्मेलनों के लक्ष्य अभी भी अधूरे हैं। आज आपसी विवादों के समाधान की जरूरत है। कटु सच्चाई यह है कि जब तक विश्व अपने गहरे मतभेदों को नहीं सुलझा लेता तक तक वैश्विक कार्रवाई कमजोर और बेमानी सिद्ध होगी।

आज दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है, परंतु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणित होती दिखाई नहीं दे रही है।

आज जरूरत है ठोस समाधान की, इसके लिए एक निश्चित समय सीमा में लक्ष्य तय होने चाहिए। वर्तमान परिवेश में आज जरूरत इस बात की है कि हम भविष्य के लिए ऐसा नया रास्ता चुनें जो संपन्नता के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं तथा मानव मात्र के कल्याण के बीच संतुलन रख सकें। हमें यह बात हमेशा याद रखना होगा कि पृथ्वी हर आदमी की जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी एक आदमी के लालच को नहीं।
 

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