बढ़ती दिल्ली की बड़ी प्यास

Submitted by Hindi on Thu, 06/05/2014 - 17:02
Source
जनसत्ता, 4 जून, 2014
जल संकट पर जल बोर्ड की जंग
केजरीवाल सरकार के हर मीटर लगे घर को करीब 700 लीटर हर रोज पानी मुफ्त देने की घोषणा तो अप्रैल के बाद खटाई में पड़ गई। मूल समस्या तो यह है कि पानी की उपलब्धता बढ़े बिना हर घर को मुफ्त तो दूर की बात है पैसा लेकर मुहैया कराना कठिन है। आप सरकार ने टैंकर माफिया पर अंकुश लगाने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाया था जिससे टैंकर माफिया की नींद उड़ी थी। लेकिन वे माफिया तो खत्म नहीं हुए छापों के बहाने उन्होंने अपने दाम बढ़ा दिए।
पिछले शुक्रवार की शाम आए तूफान से तहस-नहस हुई दिल्ली की बिजली-पानी की व्यवस्था अब पटरी पर आने लगी है। लेकिन पानी का संकट अपनी जगह बना हुआ है। बिजली की कमी नहीं है, उसके केवल दाम बढ़ने का खतरा है। पानी पर तो चाहे जो सफाई दिल्ली जल बोर्ड दे लेकिन वास्तव में दिल्ली के सभी घरों में कौन कहे, कनेक्शन वाले करीब बीस लाख घरों में भी हर रोज कम से कम दो घंटे सही दबाव पर पानी मुहैया कराना संभव नहीं हो पा रहा है। बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) विजय कुमार ने एक मुलाकात में बोर्ड की ओर से किए जा रहे उपायों-समर एक्शन प्लान, फोकस ग्रुप के बारे में विस्तार से बताया।

विजय कुमार के मुताबिक, बोर्ड यह तय करने में लगा हुआ है कि जल शोधन संयंत्रों से जितना पानी निकल रहा है वह ज्यादा से ज्यादा मात्रा में वितरण के आखिरी बिंदु यूजीआर तक पहुंचे। इसके लिए 44 फ्लोर-मीटर लगाए गए हैं जिनकी लगातार निगरानी की जा रही है। विजय कुमार बताते हैं कि जितना पानी संयंत्रों में आ रहा है उसे मानक के हिसाब से साफ करने के बाद घरों तक पहुंचाने के लिए उनकी अगुआई में बने फोकस ग्रुप के सदस्यों को अलग-अलग संयंत्रों की जिम्मेदारी दी गई है। इसके बेहतर नतीजे आ रहे हैं। उनके मुताबिक, बिजली की तरह पानी कहीं से खरीदने से नहीं मिल रहा है। मुनक नहर का मामला सालों से लंबित है। ऐसे में उपलब्ध पानी का बेहतर इस्तेमाल करवाने की कोशिश की जा रही है। उनके मुताबिक बोर्ड की आर्थिक हालत पहले से बेहतर हुई है। लेकिन नए कामों के लिए तो सरकार को ही पैसा देना पड़ेगा। गर्मी बढ़ने के साथ पानी की मांग बढ़ने लगी है और दिल्ली का कोई इलाका नहीं है जहां पानी का संकट नहीं है। इस बारे में उनका कहना था कि पहले तो आबादी यमुना के किनारे थी और सारे प्लांट भी उसी के आस-पास बने। दिल्ली का विकास बेतरतीब ढंग से हुआ। एक कोने से दूसरे कोने तक पानी पहुंचाने में रास्ते में काफी पाना बर्बाद हो जाता है। बोर्ड अपने लक्ष्य के हिसाब से हर रोज औसत 835 एमजीडी (मिलियन गैलन रोज) पानी मुहैया करवा ही रहा है। वे मान रहे हैं कि यह कम है। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में अधिकतम है।

प्यासे पड़ोसी से मिली मायूसी
हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी पानी के लिए हाहाकार मच रहा है। तय समझौते के बावजूद हरियाणा ने डेढ़ दशक में मुनक नहर का काम पूरा नहीं किया। दिल्ली को ताजेवाला बांध से मुनक नहर के माध्यम से 85 एमजीडी पानी आना है। पक्का नहर न बनने के कारण काफी पानी रास्ते में बर्बाद हो जाता है। हरियाणा को दिल्ली से पैसे लेकर इसे बनाना था। शुरुआत 160 करोड़ से हुई और अब तक 404 करोड़ देने के बावजूद महज 400 मीटर नहर बनी, बाकी रख कर 150 करोड़ की और मांग की जा रही है। इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दो-दो जीओएम (मंत्रिओं का समूह) बने। लेकिन अभी तक मुद्दा नहीं सुलझा। मुनक नहर से पानी आने की उम्मीद में दिल्ली में तीन जलशोधन संयंत्र -ओखला, बवाना और नांगलोई बना दिए गए। ये कई साल से पानी के इंतजार में है। दिल्ली की एक बड़ी चुनौती दूसरे राज्यों पर पानी की निर्भरता कम करने की है। मुश्किल से सवा सौ एमजीडी पानी ही दिल्ली में अपने माध्यम से जुट पाता है।
एक तो पूरी दिल्ली में पानी की पाइपलाइन डली ही नहीं है। कांग्रेस सरकार ने जिन 1639 कालोनियों को नियमित करने के प्रयास शुरू किए थे और 895 को नियमित करने की घोषणा कर दी थी उनमें से काफी कालोनियों में बगैर मकान तोड़े पानी की लाइन डाला ही नहीं जा सकता है। सीईओ कहते हैं कि जहां पाइप डलना संभव है वहां डाले गए हैं। लेकिन संगम विहार की कालोनी वन विभाग की जमीन है वहां इसकी इजाजत ही नहीं है। उसी तरह अनेक कालोनियां ऐसी हैं जहां मकान तोड़े बिना लाइन डल ही नहीं सकती है। वहां टैंकरों से पानी भेजा जा रहा है। इस गर्मी में पिछले साल के 4100 ट्रीप के मुकाबले 5500 ट्रीप 1100 से ज्यादा टैंकर से पानी पहुंचाया जा रहा है। टैंकरों को उन सभी इलाकों में भेजा जा रहा है जहां पानी की कमी है।

जल संरक्षण पर हो सख्ती
आज के दौर में बड़ी चुनौती पानी के पुराने स्रोतों को पुनर्जीवित करने की है। बरसाती पानी का संरक्षण बड़े संस्थानों, होटलों व स्कूल-कॉलेजों में सख्ती से करवाया जाए। दिल्ली में नीचे जा रहे जलस्तर को रोकने के लिए केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने पुराने नौ जिलों में से सात में भूजल के दोहन पर रोकने के आदेश जारी कर दिए। प्राधिकरण ने 2000 में दिल्ली के दक्षिणी और पश्चिमी जिलों को गंभीर क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया। मार्च 2006 में अधिसूचना के माध्यम से पूर्वी जिला, नई दिल्ली जिला, पूर्वी जिला और पश्चिम जिला को अत्यधिक दोहन वाला क्षेत्र घोषित करके दोहन पर रोक लगा दी। इस पर कानून बनाने के लिए दिल्ली विधानसभा में दिल्ली जल बोर्ड (संशोधन) विधेयक, 2005 लाया गया। इसे भारी विरोध के कारण प्रवर समिति को भेजा गया। फिर समिति ने दो फरवरी 2006 को उसे रद्द ही कर दिया।
पिछले 15 सालों में पानी की उपलब्धता 545 एमजीडी के मुकाबले 835 एमजीडी हो गई है। जिन 75 फीसद इलाकों में दिल्ली जल बोर्ड के कनेक्शन हैं उनकी मांग एक हजार एमजीडी से ज्यादा है। अगर पूरी दिल्ली में बोर्ड की पाइपलाइन डाल कर पानी दिया जाए तो मांग इससे काफी ज्यादा हो जाएगी। सीईओ फीसद बताने को तैयार न थे। लेकिन बोर्ड के कई अधिकारी स्वीकारते हैं कि पानी लीकेज करीब 35 फीसद है। यह अंतरराष्ट्रीय मानक 15 फीसद से करीब दो गुणा है। पानी चोरी रोकने और अवैध पंप लगाकर पानी खींचने वालों के खिलाफ अदालत ही सख्त हुई और पहली बार दो साल पहले दिल्ली में चार पानी अदालतों का गठन हुआ। इनमें लाखों रुपए के जुर्माने लगाए गए। यह सिलसिला अभी भी चल रहा है।

यमुना नदी को साफ करके उसे बड़ा जलाशय बनाने की योजना के नाम पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। यमुना में गंदगी न जाए इसके लिए जापान सरकार की मदद से करीब दो हजार करोड़ की लागत से इंटरसेप्टर लगाया जा रहा है। विजय कुमार का कहना है कि इसका साठ फीसद काम पूरा हो चुका है। साल के आखिर में इसके नतीजे भी दिखने लगे हैं। इसका उद्देश्य है कि गंदे नाले का पानी, सीवर, कचरा पहले संयंत्र में आएंगे। संयंत्र से साफ होकर पानी यमुना में गिरेगा और कचरे का दूसरा इस्तेमाल होगा। लेकिन इसके साथ ही यह तय करना होगा कि यमुना में पानी एक निश्चित मात्रा में रहे। यह लक्ष्य आसान नहीं है। दिल्ली को दूसरे राज्यों की तरह यमुना के पानी में हिस्सा दिल्ली विधानसभा बनने के बाद 1994 में मिला। दिल्ली को 808 क्यूसेक पानी दिया जाना तय किया गया जो आज तक नहीं मिला। पहले पानी की उपलब्धता बढ़े तब तो मुफ्त या पैसे से पानी मिल पाए। इस गर्मी तो दिल्ली में कोई सरकार नहीं है। इसलिए कहीं लोगों की सारी नाराजगी का नजला राष्ट्रपति शासन यानी केंद्र की भाजपा सरकार पर न गिरे। दिल्ली के कई इलाकों में तो पानी के लिए आंदोलन हो ही रहे हैं।

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