प्यास है बड़ी

Submitted by admin on Sun, 06/08/2014 - 13:27
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 08 जून 2014

जेठ की तपती दोपहरी में दो-चार मटके जगह-जगह रख दिए जाते है, जिन पर टाट या लाल रंग का कपड़ा बंधा होता है। इन्हें हमेशा गीला करके रखा जाता है, ताकि मटकों के अंदर रखा पानी बाहर से भी ठंडक ग्रहण कर सके। पास ही एक लंबी डंडीनुमा कटोरी या जलौटी लिए कोई महिला या पुरुष बैठा रहता है। वहां जाकर जैसे हाथों की मुद्रा खुद-ब-खुद बदल जाती है, और दोनों हथेलियां चुल्लू बन जाती है। बिना कुछ कहे-सुने प्याऊ पर बैठी महिला या पुरुष उस चुल्लू में तब तक पानी डालते रहते है, जब तक पीने वाले का सिर संतुष्टि का भाव लिए न हिल जाए।

गर्मी आरंभ होती थी कि शहर में सड़क के किनारे प्याऊ नजर आने लगती थीं। वे अब भी लगती हैं लेकिन पहले की अपेक्षा कम। बहुत सी समाज सेवी संस्थाओं ने उन के स्थान पर बिजली से चलने वाले वाटर कूलर फिट कर दिए हैं। कूलर के ऊपर पांच सौ, हजार लीटर की पानी की टंकी है जिस में पानी नलों से पहुंच जाता है। फिर वही पानी कूलर में आता रहता है। महीनों शायद ही उस टंकी और कूलर की स्टोरेज की सफाई होती हो।

गर्मी धीरे-धीरे परवान चढ़ रही है। मनुष्य व पशु-पक्षी प्यास से व्याकुल हो रहे हैं। इनकी प्यास बुझ भी जाए, लेकिन पानी के संसाधन खुद ही पानी मांग रहे हैं। कहीं हैंडपंप काम नहीं कर रहे हैं तो कहीं कुएं सूखे हैं। कहीं उनमें पानी है भी तो उसका पानी लाल दवा को तरस रहा है, जिसके चलते उसे पीया नहीं जा सकता। शहर की बात करें तो यहां भी संकट कमोबेश उतना ही है, लेकिन इतना जरूर है कि लोग पानी खरीदकर अपनी प्यास बुझा लेते हैं। वास्तव में उनकी प्यास बड़ी है, क्योंकि उसे बुझाने के संसाधन बहुत छोटे हैं।

आज पाऊच और बोतल संस्कृति के बीच प्याऊ की परंपरा दम तोड़ती दिख रही है। पहले गांव, कस्बों और शहरों में कई प्याऊ देखने को मिल जाते थे। जहां टाट से घिरे एक कमरे में रेत के ऊपर रखे पानी से भरे लाल रंग के घड़े होते थे। बाहर एक टीन की चादर को मोड़कर पाइपनुमा बना लिया जाता था।

पानी कहते ही भीतर कुछ हलचल होती और उस पाइपनुमा यंत्र से ठंडा पानी आना शुरू हो जाता था। प्यास खत्म होने पर केवल अपना सर हिलाने की जरूरत पड़ती और पानी आना बंद। जरा अपने बचपन को टटोलें, इस तरह के अनुभवों का पिटारा ही खुल जाएगा। अब यदि आपको उस पानी पिलाने वाले का चेहरा याद आ रहा हो, तो यह भी याद कर लें कि कितना सुकून हुआ करता था, उसके चेहरे पर। एक अजीब सी शांति होती थी, उसके चेहरे पर। इसी शांति और सुकून को कई बार मैंने उन माताओं के चेहरे पर देखा हैं, जब वे अपने मासूम को दूध पिलाती होती हैं।

कई बार रेलवे स्टेशनों पर गर्मियों में पानी पिलाने का पुण्य कार्य किया जाता। पानी पिलाने वालों की केवल यही प्रार्थना होती, जितना चाहे पानी पीए, चाहे तो सुराही में भर लें, पर पानी बर्बाद न करें। उनकी यह प्रार्थना उस समय लोगों को भले ही प्रभावित न करती हों, पर आज जब उन्हीं रेलवे स्टेशनों में एक रुपए में पानी का छोटा-सा पाऊच खरीदना पड़ता है, तब समझ में आता है कि सचमुच उनकी प्रार्थना का कोई अर्थ था।

मुहावरों में पानी पिलाने का अर्थ भले ही मजा चखाना होता हो, पर यह सनातन सच है कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है। अच्छी भावना के साथ किसी प्यासे को पानी पिलाना तो और भी पुण्य का काम है। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। कार्यालयों में उस चपरासी या पानी वाले को ही देख लें, जो बहुत ही इत्मीनान से लोगों को पानी पिलाने का पुण्य कार्य करते हैं। हालांकि वे इस कार्य को अपनी ड्यूटी समझते हैं। पर यह सच है कि जब वे हमें गिलास में पानी देते हैं, तब उनके चेहरे पर एक सुकून होता है। वह सुकून भरा चेहरा अब आपको और कहीं नहीं मिलेगा।

समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, पर अच्छी परंपराएं जब देखते ही देखते दम तोड़ने लगती है, तब दु:ख का होना स्वाभाविक है। पुरानी सभी परंपराएं अच्छी थीं, यह कहना मुश्किल है, पर कई परंपराएं जिसके पीछे किसी तरह का कोई स्वार्थ न हो, जिसमें केवल परोपकार की भावना हो, उसे तो अनुचित नहीं कहा जा सकता।

उस प्याऊ परंपरा में यह भावना कभी हावी नहीं रही कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है। मात्र कुछ लोग चंदा करते और एक प्याऊ शुरू हो जाता। अब तो कहीं-कहीं प्याऊ के उद्घाटन की खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं, पर कुछ दिनों बाद वह या तो पानी बेचने का व्यावसायिक केंद्र बनकर रहा जाता है या मवेशियों का आश्रय स्थल बन जाता है।

मटका प्याऊकल्पना करें, कोई राहगीर दूर से चलता हुआ किसी गांव या शहर में प्रवेश करता है, उसे प्यास लग रही है। वह पानी की तलाश में है, तब उसे कहीं प्याऊ दिखाई देता है। जहां वह छककर ठंडा पानी पीता है, उसकी आत्मा ही तृप्त हो जाती है। वह आगे बढ़ता है, बहुत सारी दुआएं देकर। यही दुआएं जो उसके दिल से निकली, कभी बेकार नहीं गई।

आज एक गिलास पानी भी बड़ी जद्दोजहद के बाद मिलता है। ऐसे में कहां की दुआ और कहां की प्रार्थना। देखते ही देखते पानी बेचना एक व्यवसाय बन गया। यह हमारे द्वारा किए गए पानी की बर्बादी का ही परिणाम है। आज भले ही हम पानी बर्बाद करना अपनी शान समझते हों, पर सच तो यह है कि यही पानी एक दिन हम सबको पानी-पानी कर देगा, तब भी हम शायद समझ नहीं पाएंगे, एक-एक बूंद पानी का महत्व। पानी पिलाने की संस्कृति के साथ ही संवेदना की एक काव्यात्मक अनुभूति भी शायद सदा के लिए मिट जाएगी।

बदलते वक्त के साथ ऐसी कई छवियां स्मृति-पटल से ओझल होती जा रही हैं, जो एक समय तक हमारे लिए बेहद सामान्य थीं। सड़कों के किनारे चंद मटकों से सुसज्जित प्याऊ भी उनमें से एक है। बोतलबंद और ढेरों खूबियों वाले मिनरल वॉटर के युग में मिट्टी के मटकों का सौंधी खुशबू वाला ठंडा और गला तर कर देने वाले पानी की उपलब्धता अब न्यून हो गई है। या यूं कह लें कि अब इनका चलन नहीं रहा। सदियों पुरानी प्याऊ परंपरा आधुनिकता की भेंट चढ़ चुकी है।

आज भी प्याऊ की वह प्यास बुझाती छवि आंखों के आगे तैर जाती है, तो मन जैसे तृप्त-सो हो जाता है। जेठ की तपती दोपहरी में दो-चार मटके जगह-जगह रख दिए जाते थे, जिन पर टाट या लाल रंग का कपड़ा बंधा होता था। इन्हें हमेशा गीला रखा जाता था, ताकि मटकों के अंदर रखा पानी बाहर से भी ठंडक ग्रहण कर सके। पास ही एक लंबी डंडीनुमा कटोरी-सी लिए या गांवों में आज भी यदा-कदा दिख जाने वाली जलौटी लिए कोई महिला या पुरुष बैठे रहते थे। वहां जाकर जैसे हाथों की मुद्रा खुद-ब-खुद बदल जाती थी और दोनों हथेलियां चुल्ली बन जाती थीं।

बिना कुछ कहे-सुने प्याऊ पर बैठी महिला या पुरुष उस चुल्ली में तब तक पानी डालता रहता था, जब तक पीने वाले का सिर संतुष्टि का भाव लिए न हिल जाए। फिर पानी पीने वाले चेहरे पर जितना सुकून और तृप्ति देखने को मिलती थी, वो सबसे अलग थी। संतुष्ट व्यक्ति हजारों दुआएं देता आगे बढ़ जाता था। इसी दौरान राहगीर से चंद बातें भी हो जातीं।

आधुनिकता के चलते बोतलबंद मिनरल वॉटर की उपलब्धता तो आज सब जगह है, लेकिन प्याऊ कहीं गुम हो गए हैं। पहले अपने बुजुर्गों और आत्मीयजनों की स्मृति में धर्मार्थ स्वरूप प्याऊ का निर्माण कराया जाता था। कई शहरों में तो प्याऊ को मील का पत्थर मान शहरवासी अपने परिचितों को रास्ता दिखाया करते थे। यह सब अब नहीं होता। इसके अलावा अस्पतालों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन आदि सार्वजनिक जगहों पर भी प्याऊ का निर्माण कराया जाता था।

हालांकि यह आज भी हैं, लेकिन सिर्फ पानी के। यदा-कदा सुनने मिल जाता है कि फलां जगह के स्थानीय जनप्रतिनिधि ने आम जनता की सुविधाओं के मद्देनजर प्याऊ का उद्घाटन किया, लेकिन प्यासों की कमी और मशीनी पानी पर हमारी आत्मनिर्भरता ने इन जैसे प्याऊ को भी बंद होने पर मजबूर कर दिया है। जन जगहों पर प्याऊ हैं भी, तो वहां पिलाने वालों के मुख-मंडल पर वह परोपकार का भाव नहीं दिखता।

यह विकास और विकासशील होने की निशानी जरूर हो सकती है, लेकिन सदियों से चली आ रही इस परंपरा को खोने के लिए मजबूर करना भी उचित नहीं होगी।

आने वाले समय में यदि यह परंपरा लुप्त हो गई, तो हम अपने बच्चों को निःस्वार्थ सेवा का महत्व क्या दिखाकर समझाएंगे इस ओर विचार कीजिए कि किस तरह प्याऊ परंपरा को जीवित रखा जा सकता है, वरना बच्चों की किताबों में लिखे प्याऊ शब्द की व्याख्या करना भी मुश्किल हो जाएगा।

आज भी गांवों में घरों के बाहर आम लोगों के लिए पानी के मटके और गिलास रखे जाते हैं। जो भी प्यासा राहगीर निकलता है, वह स्वेच्छा से मटके का पानी पीकर गला तर कर लेता है। आप चाहें, तो अपने स्तर पर इस परंपरा को बाकायदा जीवित रख सकते हैं, अपने घर के बाहर एक मटका रखकर, निःस्वार्थ सेवा का मन बनाएं। प्यास बुझाने वाला राहगीर आपको दुआएं ही देगा।

प्याऊ


ग्रीष्म ऋतु में और बसंत ऋतु में जो पानी पिलाने की व्यवस्था करता है, उसके पुण्य का हजारों किताबें भी वर्णन नहीं कर सकती हैं। गर्मी बढ़ने के साथ-साथ सभी को चाहे वह पशु-पक्षी अथवा वृक्ष ही क्यों न हो, उन्हें पानी की आवश्यकता भी बढ़ने लगती है।

अक्सर देखा जाता है कि जगह-जगह पर लोगों की प्यास बुझाने के लिए इस विषय पर भारतीय संस्कृति के आधार भूत शास्त्र क्या कहते हैं? यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्याऊ द्वारा प्यास बुझाने की प्रक्रिया को भारतीय संस्कृति प्रपा दान कहती है। अमरकोश में प्रपा का अर्थ पानी, यशाली का अर्थ पानी के घर से है। जहां पानी की अधिकारिक व्यवस्था हो, उसे प्रपा कहा जाता है।

गर्मी विकराल रूप ले चुकी है। हर वर्ष न जाने कितने ही बेजुबान पंछी इस भयानक गर्मी में पानी न मिलने से दम तोड़ देते हैं। अगर आप घर के किसी टूटे-फूटे बर्तन में इनके लिए कुछ पानी और बाजरा आदि अनाज के कुछ दाने घर की छत पर रख देंगे तो इन बेजुबान पंछियों को इस भयानक गर्मी में भोजन और पानी की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा.. भविष्योत्तर पुराण में लिखा गया है कि फाल्गुन मास के बीत जाने पर चैत्र महोत्सव से ग्राम या नगर के बीच में रास्ते में या वृक्ष के नीचे अर्थात छाया में पानी पिलाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। सामर्थ्यवान व्यक्ति को चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ इन चार महीनों में जल पिलाने की व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए। यदि कम धन वाला व्यक्ति है, तो उसे तीन पक्ष अर्थात बैशाख शुक्ल पक्ष, ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष व ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में अवश्य जल पिलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसा करने से प्यासा व्यक्ति संतुष्ट होता है और इस फल के लोगों के भागी प्याऊ कर्म में संलग्न लोग होते हैं। तीनों लोकों में जल को जीवन, पवित्र और अमृत माना गया है इसलिए पुण्य की कामना वाले लोगों को जल पिलाने की व्यवस्था करनी चाहिए।

शास्त्रों में प्रत्येक मौसम के अनुरूप दान का अत्यंत महत्व बतलाया गया है जिससे गरीब-से-गरीब व्यक्ति भी सुखपूर्वक रह सके तथा सामाजिक विकास में सभी की भागीदारी हो सके। सर्दी के मौसम में कंबल का दान, लकड़ी और अग्नि की व्यवस्था, वर्षा ऋतु में छतरी का दान, या किसी गरीब व्यक्ति के घर को आच्छादित कराना या घर बनवाकर देना तथा ग्रीष्म ऋतु में जल देना, गरीब व्यक्तियों को घड़े का दान करना, सत्तू का दान करना, अत्यंत श्रेयस्कर बताया गया है।

गरुण पुराण तो यहां तक कहता है कि किसी को जल पिलाने के लिए अगर जल खरीदना भी पड़े, तो भी उसको यथाशीघ्र जल पिलाना चाहिए। गर्मी के मौसम में पानी पिलाने की व्यवस्था केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं बल्कि पशु, पक्षियों इत्यादि सभी के लिए करने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्र तो कहते हैं कि पेड़ पौधों को भी समुचित पानी देना चाहिए।

गर्मी में पौधे सूखते हैं वहां संक्रामक रोगों की अभिवृद्धि होती है। वैसे लोगों को जो पानी में मिलावट करते हैं कुंए या तालाब पाटकर अपना घर या चौपाल बना लेते हैं, पानी की अनावश्यक बहते देख उसे सुरक्षित रखने का उचित प्रतिकार नहीं करते, नदी या तालाब में दूषित जल छोड़कर उसे गंदा करते हैं, किसी प्याऊ दान करने वाले मनुष्य को पानी पिलाने में बाधा उत्पन्न करते हैं।

ग्रीष्म में छाया में खड़े पशु, पक्षी एवं मानव को हटा देते हैं, पानी न देना पड़े इसके लिए असत्य बोलते हैं, इन सभी को शास्त्र पापी की उपमा देते हैं। तथा इनके कुल या खानदान में जल दोष से संबंधित रोगों की अभिवृद्धि होती है। बसंत और ग्रीष्म यानी गर्मी के चार महीनों में घड़े के दान, वस्त्र का दान तथा पीने योग्य जल का जो दान करता है, उनको सुवर्ण (सोना) दान का फल प्राप्त होता है।

प्यास से व्याकुल व्यक्ति जिस क्षेत्र से होकर गुजरता है। उस क्षेत्र का पुण्य क्षीण हो जाता है इसलिए पुण्य की रक्षा हेतु भी प्याऊ की व्यवस्था करनी चाहिए। बहुत से शास्त्रों में जल पिलाने वाले को गोदान का फल प्राप्त करने का अधिकारी माना गया है। गर्मी के दिनों में मंदिरों में भी लोग जल की व्यवस्था करते हैं।

मासूम परिंदों की प्यासी पुकार


प्याऊइन दिनों भयंकर गर्मी पड़ रही है और इस गर्मी में अगर सबसे ज्यादा शामत किसी की आ रही है तो वे है बेजुबान पक्षी। पेड़-पौधे, नदी-पर्वत की तरह पशु-पक्षी भी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। बेजुबान पक्षियों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, धर्म है। गर्मी विकराल रूप ले चुकी है। हर वर्ष न जाने कितने ही बेजुबान पंछी इस भयानक गर्मी में पानी न मिलने से दम तोड़ देते हैं। अत: अगर आप घर के किसी टूटे-फूटे बर्तन में इनके लिए कुछ पानी और बाजरा आदि अनाज के कुछ दाने घर की छत पर रख देंगे तो इन बेजुबान पंछियों को इस भयानक गर्मी में भोजन और पानी की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा। याद रखें कोई भी पुण्य कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता, क्या पता आपका ये पुण्य आपके किस काम आ जाए।

बदलते पर्यावरण के बीच पक्षियों के लिए यह दौर चिंताजनक हो गया है। सबसे बड़ी चुनौती पक्षियों को गर्मी के मौसम में पीने के पानी की होती है। गावों में तो हालत फिर भी ठीक है पर शहरों में तो इन मासूमों को पीने को पानी ही नसीब नहीं हो रहा है और इसकी जिम्मेदारी किसी सरकार की नहीं हमारी खुद की है।

पक्षियों का यूं प्यासा रहना हमारे लिए अशुभ है। संसार के लिए भी और समूचे पर्यावरण के लिए भी। इनकी पुकार को सुनें और इनके लिए जलपात्र घर की छतों पर रखें ताकि ये प्यासे न मरें। इन्हें जीवन मिले, संरक्षण मिले, मान मिले। यह सब हमारे ही हित में है। इन पक्षियों के सुरक्षित जीवन के लिए जल का प्रबंध जरूर करें।

किसी पात्र में जल भरकर घर की छत या बालकनी में रखें ताकि पक्षी अपनी प्यास बुझा सकें। गर्मी में प्यास से सैंकड़ों पक्षियों की मौत हो जाती है या उन्हें काफी भटकना पड़ता है। परिंदों की इस तड़प को रोका जा सकता है महज एक जलपात्र रखकर।

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