प्याऊ से लंगर तक की प्रेरणादायक कहानी

Submitted by admin on Sun, 06/08/2014 - 15:06
लोहारी जाट्टू के फौजी कर्मवीर की फौज बुझाती है हर रोज हजारों की प्यास
प्यासों को पानी पिलाने के लिए फौज से हर साल आते थे दो माह की छुट्टी लेकर


तारीख 6 जून, 2013।
समय : दिन के 2 बजे।
तापमान: 46 डिग्री।
स्थान : हिसार से वाया हांसी, बवानी खेड़ा भिवानी तक जाने वाली हरियाणा रोडवेज की खटारा लोकल बस।


.कई दिन से एक मित्र के घर एसी का सुख भोगने के बाद बस में जब निकला तो लगा कि भयंकर लू के थपेड़े भिवानी तक बुखार से लाल कर देंगे। हांसी तक ही रोने जैसे स्थिति थी। हिसार बस अड्डे से भरी पानी की बोतल हांसी से पहले ही खत्म हो गई थी। हांसी में बस दो मिनट के लिए ही रुकी सो न पानी पी पाया और न ही बोतल भर पाया।

शीशा बंद करता तो भी कोई फायदा नहीं था। कारण कि आगे की सीट पर बैठे हल की मूठ पकड़कर धरती के सीने पर अपने भाग्य की लकीरें खींचने वाले फटेहाल से ठेठ हरियाणवी तीन किसान गरमी से बेपरवाह थे। शीशा बंद करने के लिए एक बार बोला भी तो बामला के 65 साल के धर्मवीर ग्रेवाल बोले, अरै भाई किसी गरमी, बावले तमन्है गरमी ए कोन्या देखी। ऊपर तै आग बरस्या करती, अर हम 50 डिग्री में हल चलाया करते। बीरबानी सिकर दोपाहरे म्ह ज्वारा ल्याया करती। (रे भाई कैसी गरमी, बावले आपने गरमी देखी ही नहीं, आसमान से आग बरसती थी और हम 50 डिग्री तापमान में ठेठ दोपहर में हल चलाते थे। पत्नी हमारा और पशुओ का खाना लेकर आती थी।)

बुजुर्गों ने अपने समय की गर्मी बताई तो मुझे भी गर्मी का अहसास थोड़ा कम हुआ। फिर उनकी लटके-झटकों से भरी रोचक बातचीत ने भी गर्मी से थोड़ी राहत दे दी थी। सिकंदरपुर, मिलकपुर, जीताखेड़ा, बवानीखेड़ा के रास्ते पर सड़क के दोनों ओर रेत के टिब्बों से उड़ती धूल ने हालत खराब कर दी थी। सोचा कि भिवानी जाकर जमकर बेल का शरबत या जौ का सत्तू पीऊंगा।

अभी बस बवानीखेड़ा से भिवानी की ओर तकरीबन 7-8 किलोमीटर ही चली थी कि ड्राइवर ने गाड़ी धीमी की और जोर से बोला, भाई लोहारी जाट्टू आ गया है, पाणी-पात्त पी लो। बस 10-15 मिनट रुकेगी। सुनकर ही राहत मिल गई। पानी पिलाने वालों की टीम ने बस को चारों ओर से घेर लिया। सारी सवारियां दो-तीन मिनट में ही उतर गई। इतनी गर्मी जिसमें लोग घरों से निकलते डरते हैं, गांव के सेवानिवृत्त फौजी कर्मवीर की टीम के नौजवान सौरभ तंवर, राजेश, सुरेंद्र आदि ने सबको पानी पिलाया। कइयों की बोतलें भर दी तो कइयों के गमछे और तौलिए भिगो दिए। झट से कई थालियों में रोटी-सब्जी और मीठा भी आ गया। कई राहगीरों ने रोटी भी खाई। इस पूरे काम में कुछ ही मिनट लगे। बस कंडक्टर और ड्राइवर दोनों ने आवाज लगाई, सवारियां बस में चढ़ी और बस चल दी। मैं वहीं ठहर गया। मुझे लगा कि बाजारवाद और नवउदारीकरण के इस दौर में भी महानगरीय संस्कृति से दूर कई गांवों में लोगों की आंखों का पानी अभी मरा नहीं है। और यही पानी है जो बाजार को, बाजार के पैरोकारों को चुनौती देगा, शिकस्त देगा।

लोहार जाट्टू में पानी पिलाने की कहानी बड़ी प्रेरणादायक और रोचक है। इस पूरी कहानी के हीरो हैं गांव के रिटायर्ड फौजी कर्मवीर सिंह, जो अपने योगदान की चर्चा ही नहीं करते। अपने पूरे काम का श्रेय पूरे गांव को देते हैं। बहुत सकुचाते हुए कोई-कोई बात बताते हैं। कहते हैं, पानी भरने वाली महिलाओं परसंदी, बेदो देवी, रोशनी, दयावती, लीला, अंगूरी, रामा देवी और पानी पिलाने वालों मानू, हनुमान शर्मा, योगेश तंवर, सौरभ तंवर, शिचकुमार शर्मा, धर्मपाल सिंह आदि सारा काम करते हैं। युवक राजेश के मुताबिक, राहगीरों को पानी पिलाने की शुरूआत फौजी कर्मवीर ने 1998 में की थी। कर्मवीर बाकायदा इसके लिए हर साल दो माह की छुट्टी लेकर गांव आते थे।

फरवरी 2013 में जब वह रिटायर होकर आए तो इस काम को पूरा समय देने लगे। बकौल कर्मवीर सिंह, छु्ट्टी लेने में उनके किसी ऑफिसर इन कमांडिंग ने मना नहीं किया, जब मैं उन्हें अपने प्याऊ के बारे में बताता था तो वे उन्हें खुश होकर छुट्टी भेजते थे। फिर हमारे गांव में आकर कोई मोल का पानी पीए, यह हमारी तौहीन है। केंद्रीय मंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह के साथ काम कर चुके कर्मवीर के मुताबिक, शुरू में गांव के कई लोग और यहां तक कि परिजन भी उनके काम का थोड़ा मजाक उड़ाते थे, लेकिन आज पूरा गांव साथ है।

सही बात तो यह है कि यह काम पूरा गांव मिलकर ही कर रहा है। पानी के तकरीबन तीन दर्जन घड़ें रात को ही बड़ वाले कुएं के पानी से भर दिए जाते हैं। इसमें गांव की महिलाएं आगे रहती हैं। कुंए का पानी इतना शीतल और मीठा है कि लोग जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा आपूर्ति किए जाने वाला पानी नहीं पीते। दिनभर में 100 से 125 घड़े पानी की खपत रोज होती है। घड़े एक सुंदर सी घास-फूंस की झोंपड़ी में रखे रहते हैं।

अब पानी पिलाने के साथ ग्रामीणों ने दिन के समय लंगर भी लगाना शुरू कर दिया है। ग्रामीण गजांनंद शर्मा बताते हैं, ‘पानी पिलाने से ही लंगर लगाने की प्रेरणा मिली। यह काम सुबह 9 बजे से शाम तक चलता है। कोई यात्री गांव में रुकता है तो उसके भोजन रहने की व्यवस्था भी है। प्रतिदिन गांव के हर घर से एक रुपया-एक रोटी आती है। कुछ लोग अधिक सहयोग भी कर देते हैं। एकत्रित राशि से सब्जी-दाल की व्यवस्था हो जाती है। मीठा भी गांव वाले पंहुचा देते हैं। गांव में छोटे-बड़े आठ तालाब हैं। इनमें से 7 पूर्णतया स्वस्थ हैं। हां, 14 कुएं में से सात-आठ ही बचे हैं। बुजर्ग मलखान सिंह कहते हैं, बंद हो चुके कुंए दोबारा चालू हों, इस पर समिति की बैइक में चर्चा करेंगे।

पानी पिलाते वक्त 70 साल के गजानंद शर्मा का भाव देखकर आंखों में पानी भर आया, मन किया कि इस गांव की माटी अपने माथे से लगा लूं या यहीं अपना डेरा बसा लूं।

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