सहभागी लोकतंत्र की चुनौतियां

Submitted by Hindi on Mon, 06/09/2014 - 16:17
Source
सिद्ध, 2001
उत्तराखंड एक मिनी भारत है। जो कि हर नदी-घाटी में एक दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाता। अगर आप गोरी नदी से टौंस की तुलना करोगे तो, दोनों जगह जनजातियां हैं मगर दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। विवाह संस्थान अलग हैं, परिवार संस्थान अलग हैं। 94 आदमियों का एक परिवार है टौंस में। गोरी में नहीं है ये। एक आदर्श लोकतांत्रिक स्थिति उसी को कहेंगे जहां जनता और सरकार के बीच कोई दूरी न हो। सरकार को जनता की दहलीज पर जाकर उनकी मांगों को सुनना तथा उन्हें सुलझाना चाहिए। अगर ऐसा हो पाता है तो वो स्थिति लोकतंत्र है अन्यथा राजशाही है। हमारे देश में लोकतंत्र की स्थिति सही नहीं हो पा रही है क्योंकि हमने 1947 को जो व्यवस्था चल रही थी उसमें बिना कोई बदलाव किए उसे वैसे के वैसे ही अपना लिया था। वो व्यवस्था केंद्र को मिली, केंद्र ने राज्य को दी। तो इस प्रकार हमारे पास व्यवस्था तो वही अंग्रेजों वाली है लेकिन हम उसे वर्तमान लोकतंत्र की कल्पना कर रहे हैं तो वो कैसे संभव हो पाएगा उससे तो दुख ही मिलेगा।

एक उपाय के रूप में डॉक्टर भट्ट ने 73-74 वें संविधान संसोधन की बात कही। पहली बात तो मैं अपनी तरफ से कहता हूं कि आज गांधी के नाम पर पंचायत राज की बात की जा रही है लेकिन इसमें गांधी का अंश मात्र भी नहीं है। हम मानते हैं कि ये पंचायत संवैधानिक है। आपको एक संवैधानिक छाता दिया जाता है जिसके अनुसार आप कुछ बदलाव ला सकते हैं। पर गांधी ने पंचायत राज लाने की बात नहीं की थी। गांधी ने 1909 में कह दिया था कि आपने देश के लिए श्रेष्ठ मंत्री माॅडल तय किया है और अगर आप इसको तोड़ना चाहते हैं तो इस पंचायती राज को लाइए, जो मैं कर रहा हूं। आप उनकी 1909 में छपी हिन्दू-स्वराज पढ़िए, उसमें उन्होंने साफ कहा है कि आज से 50-60 बाद समाज में कई बुराइयां आएंगी जैसे व्यभिचार, भ्रष्टाचार बढ़ेगा, लोग एक-दूसरे को लूटेंगे, व्यवस्था और कानून की समस्या आएगी तथा हो सकता है कि प्रायः लोकतंत्र भी नष्ट हो जाए। इसलिए उसे बचाने के लिए एक ऐसे पंचायत राज की जरूरत पड़ेगी, जिसके भिन्न आधार होंगे और इन संशोधनों से बिल्कुल अलग होंगे।

जिसे आप विकेंद्रीकरण कह रहे हैं वो तो केंद्रीकरण के फैलाव की बात है उस केंद्रीकरण को आप धीरे-धीरे गांव तक ले जाना चाहते हैं। नहीं तो बताइए क्या वजह है कि इन संसोधनों से बहुत कम चीजें ही प्रदेशात्मक हैं और ज्यादातर चीजें विधानसभा के हाथ में छोड़ दी गई हैं। ये कौन सा संविधान संशोधन अधिनियम है जिसमें कहा गया है कि चुनाव तो ठीक तिथि को हो जाने चाहिए। हमारी पी.यू.सी.एल. की रिट है। उत्तर प्रदेश की और हमारी संयुक्त रिट है जिसमें जिस दिन चुनाव नहीं हुए, ठीक उसी दिन सरकार को निरस्त कर देना चाहिए। 15 महीने हो गए हैं लेकिन ये रिट अभी तक दर्ज ही हो रही है अर्थात चल ही रही है। दो सरकारें बदल गई, दूसरी सरकार भी आ गई। लेकिन संसोधन वाला भाग भी उतना प्रभावी नहीं है। आप बताइए कि अगर आपने ईमानदारी से पंचायत राज पद्धति शुरू करनी थी तो इन अधिनियमों में, जो कार्य-विभाजन था, पंचायतों के पास गांव को देने के लिए 29 अधिकार हैं। 29 हैड्स है और साठ काम है, हरेक हैड्स में तीन-चार काम है। माध्यमिक शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा और उसमें फिर कृषि है। व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा गांव को दी गई है। विधान सभा और ग्राम पंचायतों को ग्यारहवीं सूची में अधिकार दिए गए हैं। नगर निकायों को 12वीं सूची में अधिकार दिए गए हैं। अब ये विधान सभा वाले कहते हैं कि अगर ग्यारहवीं सूची के अधिकार हम ग्राम सभाओं को दे देंगे तो ग्राम सभा वाले तो निपट गंवार है, वो इनको अमल ही नहीं कर पाएंगे। उनका कार्यान्वयन कैसे होगा।

ये कौन सा अधिनियम है जिसने ये अधिकार विधान सभा के हाथ में रखा। अगर आपको एक अधिनियम ही बनाना था तो आपने विधान सभा को ये अधिकार क्यों दिए कि वो अपनी मर्जी से जितने अधिकार देना चाहे दे दे। हम ये पूछना चाहते हैं कि जब पहली विधान सभा बनी थी तो क्या उनकी क्षमता का संवर्द्धन हो चुका था। क्या पहली विधानसभा वाले इतने क्षमतावान थे कि उनको सारे अधिकार एकमुश्त दे दिए गए और गांव वालों को नहीं दिए जाएंगे। क्या जिस दिन पहली संसद आई थी उनके बारे में सोचा गया था कि उनको अधिकार एकमुश्त न दिए जाकर एक-एक कर दिए जाएं। मतलब सभी लोग जनता से आ रहे हैं विधानसभा में जा रहे हैं, लोकसभा में जा रहे हैं। सब चुन के जाएंगे, ये एक नंबर है।

नंबर दो, लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए जो सबसे अहम मुद्दा है ‘जनता की भागीदारी‘। जनता की भागीदारी दो तरह से हो सकती है। जनता की भागीदारी आजादी के लगभग 10-12 साल बाद लगभग हर जगह से गायब हो चुकी है। और जो वनों में हस्तक्षेप हुआ है इसमें भी जनता की भागीदारी खत्म ही होगी। ये जो सारे फरेब रचे जा रहे हैं, जे.एफ.एम. हो, कोई भी चीज केंद्रीकरण को ध्यान में रखकर अमल में लाई जा रही है। आप ये कह रहे हैं कि ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में अंतर ही नहीं होगा। यानी प्रधान, पंच, सरपंच एक ही जैसे होंगे। आपने किस तरह का स्वरूप बनाया है कि ग्राम सभा से जो आदमी चुना जाता है, वो पंच और वार्ड के मेम्बर्स होते हैं उनको भी वही अधिकार है और जो गांव से चुनकर जिले में जाते हैं उनके भी वही अधिकार हैं। वो लोग भी योजना बनाते हैं और गांव वाले भी योजना बनाते हैं और वो आपस में टकरा जाते हैं। अब वो कहता है कि मैं बड़ा हूं, मैं जिले में हूं तुम गांव में हो, ये बड़े-छोटे का झगड़ा कुछ नहीं होता है। एम.एल.ए. आता है दोनों के प्लान रद्द करके अपना प्लान रख देता है। जो विधायक निधि तथा सांसद निधि है, उन दोनों को जो वार्षिक खर्चा मिलता है उससे बड़ी है। और ये उन्हीं आधारों पर दी जाती है जिन पर ग्राम पंचायत को दिया जाना है, जिन पर विधान सभा को पैसा दिया जाता है इस प्रकार से आधार वहीं के वहीं है।

अगर आप ग्राम सभा को भी पंचायत बना देंगे तो फिर जनता अर्थात जनरल बाॅडी की भागीदारी कहां पर है? तो जनता कहां भागीदारी करेगी वो तो सरकार बन गई आपके आंगन तक, आपके किचन तक तो सरकार बन गई है। अब आपके दिल्ली से, विधान सभा से लेकर गांवों तक एक सरकार का स्वरूप आ गया और उस स्वरूप में आप ये सोचें कि ये लोकतंत्र बड़ा भारी फल देगा तो वो जनता कहां पर है। वो जनता तीनों को चुनती है वो जनता आपने अलग से कहां पर रखी है। आपने उसमें सारे को ही समेट लिया। तो ग्राम सभा के पंचायत राज की जो मुख्य इकाई थी उसको अलग रखना चाहिए था।

गांधी ने जो पंचायत राज रखा था वो बहुत ही अलग था। मैं बात कर रहा था कि जब तक जनता किसी भी परियोजना में भागीदारी के बगैर काम करती है या वो किसी भी नीति में भागीदारी न करती हो तो वो स्थिति बहुत खराब होगी पंचायती राज को सफल बनाने के लिए जमीन से जुड़ी सोच को ऊपर उठाया जाए। अपने लिए खुद ही योजना बनाए और उच्च स्तर पर जाकर उसके बारे में विचार-विमर्श हो। जब आप व्यवहारिक रूप से देखें तो हमारी सरकार ने पंचायती राज एक्ट में छोटे-छोटे से तीन संसोधन किए हैं जबकि वहीं अन्य लोग उनको नहीं चाहते हैं।

यदि आप यू.पी. और बिहार से हमारे प्रदेश में पंचायत राज एक्ट लाना चाहते हैं तो उन्हें कौन सा पंचायत राज लाना चाहिए। वो तो अपनी मर्जी का ही पंचायती राज ला रहे हैं अर्थात आपका जो दिल करे उसे दे दो और बाकी को छोड़ दो। ऐसा वर्षों तक होता रहेेगा व्यवहारिक रूप से ये जरूरी नहीं कि ये सब होता ही रहेगा लेकिन जनता को समझाकर, उन्हें एकजुट कर तथा आंदोलनों के जरिए इस सब को दूर किया जा सकता है।

और दूसरी बात ये कि अन्य प्रदेशों में जो खूबियां हैं उनमें से कुछ हमारे यहां नहीं हैं। हमारे यहां जो जिले बने हैं बड़ी अंधी दौड़ में बने हैं। अगर किसी जिले में ज्यादा जनजाति के लोग होते हों तो वहां 96 संसोधन एक्ट के नाम से एक एक्ट है। जो अनुसूचित क्षेत्र कानून है उसके लाभ प्रत्यक्ष रूप से मिल सकते थे तब हमारे यहां कोई ऐसा जिला बना ही नहीं। अब जब बनाने की बात आई तो उन्होंने कहा यदि आप ऐसे जिले बनाओगे तो यह हमारे दूसरे अधिकार ले लेंगे। तो इन सब बातों को जनता तक पहुंचाना है। हम उनको कब तक सचेत कर सकतें हैं और उन्हें ये सब बातें कब तक समझा सकते हैं ये सोचने की बात है।

इसके अलावा जो लोग जनतंत्र की बात करते हैं उन्हें टिहरी डैम का उदाहरण देखना चाहिए। वहां बांध बनाने के लिए 3 हजार करोड़ रुपये बजट वाली एक परियोजना बनी। उसी बजट में पुनर्वास पर भी 582 करोड़ रुपए खर्च करने का बजट तय हुआ। इससे स्पष्ट है कि ईंट, गारे, सीमेंट, निमार्ण कार्य, मशीनों आदि की तुलना में आदमी की कीमत कम है। आदमी अपनी जमीन-जायदाद, अपनी संस्कृति सारा कारोबार छोड़कर कहीं दो कमरों के मकान में घुसा दिया जाएगा तो क्या ये पुनर्वास हो जाएगा? वो बजट बढ़ते-बढ़ते कई गुना बढ़ गया है अर्थात जो बजट तीन हजार करोड़ में बन रहा था वो पैसे तो कभी के खर्च हो गए। अब जो बजट बढ़ा है वो पुनर्वास की अपेक्षा निमार्ण कार्य का बढ़ा है। उन्होंने निमार्ण के बजट को कई गुना बढ़ा दिया है और पुनर्वास पर खर्च करने के लिए जो 582 करोड़ रुपये रखे गए थे उसमें से मात्र 94 करोड़ रुपये ही पुर्नवास पर खर्च किए गए। बाकी का सारा सरकार ने अपने भवनों पर, अपने कर्मचारियों और संस्थानों आदि पर खर्च कर दिया गया। तो 94 करोड़ रुपए के बाद भूमि अधिग्रहण नहीं हुई है। उनको यही कहा जाएगा कि आपकी जमीन हमने अधिग्रहित कर दी है, और इसमें आपको क्या आपत्ति? जब वे जमीन और मकान आदि सभी डूब जाएंगे तब वे (सरकार या अन्य संगठन) कुछ करेंगे भी तो उसका कुछ अर्थ ही नहीं रह जाएगा। तो इस प्रकार आज हमारे लोकतंत्र की यही स्थिति है।

टनल 3 और 4 बंद कर दिया गया। क्यों बंद कर दिया? उसमें क्या बिजली बननी है? क्या टरबाइन लग चुके हैं? क्या पावर हाउस बन चुका है? दूसरा टरबाइन लग रहा है। टरबाइन हांग-कांग से आ रहे हैं। दूसरा टरबाइन अभी लगाया जा रहा है और 8 टरबाइन लगने हैं। और दूसरा टरबाइन अभी लगने ही जा रहा था कि वो बंद कर दिया गया। 2 टनल तो बंद कर दिए, दो बाकी रह गए हैं एक और दो। दो टनल बंद कर उसका स्तर बढ़ गया, तो लोगों को बताइए कि क्या है ये? इसकी क्या वजह थी? वजह यह थी कि उनपर ध्यान दिया गया कि जून 15 तक सारा शहर खाली कर दीजिए, क्योंकि पानी बढ़ जाएगा। वजह ये थी कि अगर 18 जुलाई तक शहर खाली हो जाए तो उनको मुआवजा नहीं देना पड़ता, उन लोगों को जो 76 के बाद बालिग हो गए, ये हनुमंत राव कमेटी की रिपोर्ट है।

हनुमंत राव कमेटी की एक भी सिफारिश को ये लोकतंत्र की सरकार नहीं मानी। ये परियोजना आपके केंद्र की है और उसमें हमारी सरकार को बंदोबस्त करना है तो दोनों सरकारें लोकतंत्र की है और दोनो इसमें शामिल हैं। इसलिए भाग लोग भाग जाएंगे, इधर-उधर चले जाएंगे तो उनको पुनर्वास में दिखा दिया जाएगा। जो लोग दिल्ली में आज से 20 साल पहले आए थे वे इधर-उधर चले गए। सारे पैसे को उनके पुर्नवास में भी लिख दिया गया है। एक गांव जिसकी सारी जमीन डूब जाएगी, सिर्फ मकान बच जाएगा उसको पुनर्वास में शामिल नहीं किया गया है। असैना गांव के एक अनुसूचित जाति को कहा कि तुम ऊपर के गांव में चले जाओ वहां टिनशेड बना रखे हैं। टिनशेड में जाते ही उनको कहा गया कि अब तुम्हारा असैना गांव में कोई अधिकार नहीं रहा अब तुम पुनर्वासित हो चुके हो।

नई और पुरानी टिहरी के बीच जो टिनशेड बनाए गए थे उसमें ठेकेदार के आदमी रहते हैं। बकायदा उनको एलाॅट हो चुके हैं। टिहरी आधे से ज्यादा कोई पुनर्वासित लोगों के लिए नहीं है। अभी तक उसमें बहुत कम लोग हैं। उसमें ज्यादातर सरकारी कर्मचारी रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कह दिया है कि सबसे अच्छा पुनर्वास तो टिहरी में हुआ है। इसलिए कि हनुमंत राव कमेटी की रिपोर्ट ने लिखा है 18 साल का जो वयस्क होगा उसको अलग परिवार माना जाएगा। वो नहीं माना गया। उन्होंने सरदार सरोवर में मान लिया। और टिहरी वालों के लिए ये प्रचारित कर दिया गया। पहली बात तो उन्होंने 18 साल की उम्र ही नहीं मानी। उन्होंने कहा कि वोट तो आप 21 साल में देते हो, वयस्क कैसे मान लें आपको। 21 साल में भी उनको अलग से परिवार नहीं माना गया, बल्कि अगर किसी के तीन लड़के हैं और तीन के भी माना तीन लड़के हों, तो जितने भी हों उनको एक ही मकान मिलेगा।

दूसरी बात ये है कि सरकार के आदेश आ गए हैं। जंगलों से सारा अतिक्रमण हटा दिया जाएगा। जो लोग जंगलों में रहते हैं वो लोग जंगलों में नहीं रहेंगे। इस तरह से तो हमारे 35 हजार लोग तो वो हैं जो जंगलों के ऊपर निर्भर करते थे। वन और जन की एक दूसरे के ऊपर आश्रित रहने की जो जीवन शैली थी वो तो कब की खत्म कर दी। थोड़ी बहुत भी जो शेष रह गई थी वो हमारी सरकार ने आजादी के बाद, जो लोकतंत्र आया उसकी भी हत्या कर दी गई। इसके अलावा अभी एक नोटिस आया है जिसमें सबको खाली करने का नोटिस भी दे दिया गया है।

आप सारे उत्तर भारत को जल देते हैं लेकिन आप 15 रुपये की बोतल खरीदते हैं बसों में जाकर वहां। अभी कुछ दिनों में देखिए इसके अलावा कुछ मिलेगा ही नहीं कहीं। उसका राजस्व हमारी सरकार को नहीं मिलता है, पता नहीं किसको जाता है।उत्तर प्रदेश सरकार ने एक कनाडा की फर्म ‘पीबल क्रीक’ से एक समझौता किया कि आपको अस्कोट में 4-5 धातुएं मिल रही हैं। उसका खादान आप ले लीजिए। और उस समझौते में ये भी कहा गया कि अगर वो हिस्सा कभी नया राज्य बनने के बाद उसमें चला गया तो उन पर समझ का ये ज्ञापन पत्र (मैमोरेंडम आॅफ अंडरस्टेंडिंग) लागू होगा। ये सब बातें राज्य बनने से पहले ही तय हो गई तो देखिए कि ये कैसा लोकतंत्र था ? हम अभी दूनागिरी में गए, दूनागिरी की ऊंचाई कितनी है? अगर इतने बड़े पहाड़ आप गिरा देंगे तो फिर आपके पास रहेगा क्या? आप लोकतंत्र की बात कर रहे हैं। सुबह सांस्कृतिक लोकतंत्र की बात भी की गई, अब आप पारिस्थितिकीय लोकतंत्र की बात भी करेंगे तो आप ही बताइए कि जब इस तरह के समझौते हो रहे हों तो ये बातें कहां पर टिकेंगी ?

विकास पुरुष एन.डी. तिवारी जो हमारे मुख्यमंत्री बने हैं, वो कहते हैं यहां का विकास बहुत ही जल्दी कर दिया जाएगा। रोजगार दे देंगे और कई चीजें दे देंगे। पर वे ये सब देंगे कहां से? अभी तक आप ये कह रहे थे विकास के लिए तकनीकी और संसाधनों का कुछ न कुछ महत्व होता है। दुनिया के वैज्ञानिकों ने 13 साल के शोध से 1996 में जो दृष्टिकोण 2020 दिया, उसमें उन्होंने कहा कि अगर एक प्राॅपर टेक्नोलाॅजी आपके हाथ में हो तो आपका विकास हो सकता है। आप ये देखिए जापान ने बिना रिसोर्सेज के तरक्की कर दी। मुरादाबाद ने भी बिना पीतल के, पीतल के कारखाने बना दिए। शहडोल में ऊन नहीं होती लेकिन ऊन का सबसे बड़ा केंद्र शहडोल मध्य प्रदेश में है। आई.टी. में कौन से रिसोर्सेज थे। उसकी तरफ भी बुटोला साहब का एक हिंट था। उन्होंने क्लियर नहीं किया कि बिना रिसोर्सेज के भी विकास हो सकता है। लेकिन यह आम बात नहीं है कि बिना रिसोर्सेज के आप तरक्की कर सकें।

किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं आप। 2000 का जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम है, जिससे राज्य बना हमारा, उसमें 26 विसंगतियां हैं। उसमें पानी के ऊपर आपका हक नहीं है। ये कहा गया है कि अब तक की आपकी जो योजनाएं हैं, बिजली की जो योजनाएं बनी हैं उनमें जितना भी उत्पादन होगा, उसमें 35 या 37 पैसे आपकी उत्पादन लागत है। इसमें सारी बिजली यू.पी खरीदेगा और आप उससे डेढ़ रुपये में खरीदेंगे। फिर आप उसे ढाई रुपये या साढ़े तीन रुपये में बेचेंगे। इसमें ये आपके समझौते हैं। और नई योजना पानी की आपको बनानी हो तो आपको उत्तर प्रदेश से पूछना पड़ेगा। अगर विवाद हो जाए तो केंद्र मध्यस्थता करेगा। तब आपकी कोई परियोजना आगे चलेगी। तो इन संसाधनों पर आपका हक ही नहीं है। आप पहले इन एनामलीज को दूर करिए।

आप विकास पुरुष हैं, ठीक है। आपको अभी साढ़े चौदह सौ करोड़ रुपए का बजट मिला। जबकि आपने 1750 करोड़ मांगा था, लेकिन वो आपको नहीं मिला आखिर क्यों ? परिसंपतियों का वितरण नहीं हुआ है। यू.पी वाले ले गए सारा बजट। टिहरी का जो डैम है उसमें भी ये है कि आपको 12.50 प्रतिशत राॅयल्टी मिलेगी। राॅयल्टी कहां से मिलेगी जब मालिक वो (यू.पी.) है। जब सारी ही बिजली वो ले लेगा तो राॅयल्टी कहां से देगा। तो जब तक इन विसंगतियों को दूर नहीं करते, जब तक परिसंपतियों का पूरा बंटवारा नहीं करते, आप विकास का नारा नहीं दे सकते। आप वर्ल्ड बैंक से अरबों का कर्ज लेकर हमें बेच देंगे, हमारे वनों और जमीन को बेच देंगे, हमें घर से बाहर कर देंगे, पर हमारा विकास नहीं कर सकते। कोई अवधारणा बताइए विकास की, जो जमीन से जुड़ी हुई हो, जो बाॅटम-अप हो, जो नीति में लोगों को शामिल करती हो। सोचने से लेकर कार्यान्वयन तक, उसके प्रबंधन तथा बंटवारे तक अगर लोग उसमें शामिल हो तो कोई बता दीजिए। कोई योजना आपके पास नहीं है। अभी तक नीति ही नहीं बना पा रहे हैं।

आप सारे उत्तर भारत को जल देते हैं लेकिन आप 15 रुपये की बोतल खरीदते हैं बसों में जाकर वहां। अभी कुछ दिनों में देखिए इसके अलावा कुछ मिलेगा ही नहीं कहीं। उसका राजस्व हमारी सरकार को नहीं मिलता है, पता नहीं किसको जाता है। कावड़िए पता नहीं कितना टन पानी ले आते हैं उसका राजस्व नहीं लगता।

90 प्रतिशत संविधान ब्रिटिश का बनाया हुआ है। 1919 का एक्ट है, जो कि 1935 में रिवाइज हुआ था। उसके बाद 1945 में जो कमीशन आया और 46 में जो कैबिनेट मिशन आया, उन दोनों मिशनों ने कुछ नहीं किया। सेना आदि के बारे में ये तय नहीं हो पाया कि क्या करें, क्योंकि डोमेनियन स्टेट्स देना था, आजादी नहीं देनी थी ‘चर्चिल’ ने। ये आजादी तो आपको ‘एटली’ ने दी है जब चर्चिल आ गया तब। तो संविधान का जितना ढांचा बना वो सब अंग्रेजों ने बनाया था। पहले ही ये सब तय हो गया था कि पश्चिम के बगैर भारत का काम चलना ही नहीं चाहिए। जिस संविधान का आप नाम लेते हैं जिसके 1860 से लेकर जितने भी नियम है 1947 से पहले के हैं। अभी तक सन भी नहीं बदले हैं उनके। उन नियमों पर आप चल रहे हैं। आपकी संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन भी 1860 के एक्ट में ही होता है। गुलामी के जमाने का वो नियम जिसमें शब्द भी नहीं बदले।

अगर आप संविधान के भरोसे रहें तो आप केवल सिविल और पाॅलिटिकल राइट्स पर अपना जस्टिस ले सकते हैं, शेष किसी बात पर संविधान आपकी मदद करने को तैयार नहीं है। अगर आपके सिविल और पाॅलिटिकल राइट्स घपले में पड़ गए तो आप संविधान के भाग तीन में मौलिक अधिकार के अंदर कोर्ट में जा सकते है। पर जितने भी निर्देशित सिद्धांत हैं, डाॅ. भट्ट अभी कह रहे थे 44 के करीब है, जिसमें 44 विषय आते हैं। जो विस्तृत हैं। जो कि देश की तरक्की के लिए सबसे ज्यादा अहम है। जो तरक्की होनी थी इन्हीं प्रिंसीपल्स के तहत होनी थी, इन्हीं निर्देशक सिद्धांतों के अंदर होनी थी, इनमें आप कोर्ट भी नहीं जा सकते। ये कहा गया कि हम बहुत जल्दी ऐसे कानून बनाएंगे, जो कि इन सिद्धांतों को कानूनी जामा पहनाकर लोगों को ऐसे अधिकार देंगे कि वे अपने अधिकार प्राप्त कर सकें, नहीं किया।

जब से आप डब्ल्यू.टी.ओ. के सदस्य बने हैं, डब्ल्यू.टी.ओ. ने कहा है कि प्रत्येक देश, जो सदस्य बनेगा उन्हीं के अनुसार, चलेगा। चाहे कृषि हो, चाहे शिक्षा हो, कोई भी चीज हो हमारे अनुसार कानून बनाने पड़ेंगे। जब आप डब्ल्यू.टी.ओ. के मुताबिक कानून या नीति बनाएंगे तो आपके निर्देशित सिद्धांत गए भाड़ में। ये माना जा रहा है कि प्रत्येक देश अगर डब्ल्यू.टी.ओ. का सदस्य बन जाएगा तो आपकी ज्यादा तादाद होगी। क्योंकि डेवलपिंग नेशंस ज्यादा है। यू.एन.ओ. में क्या हुआ आपके, यू.एन.ओ. में भी आप ज्यादा थे। पांच आदमी आ गए वीटो लेकर डब्ल्यू.टी.ओ. में भी। 5-6 देश इकोनाॅमिक सिक्योरिटी काउंसिल बनाकर आने वाले हैं। वहां भी आपको कुछ नहीं मिलने वाला है। ये जो लोकतंत्र की बात कर रहे हैं इस लोकतंत्र को सिर्फ जनता बचा सकती है। हम लोग बचा सकते हैं, बशर्ते कि हम जनता को बताएं।

पंचायत राज के बारे में आज तक जितनी भी बहसें हुई है, वो सब शहरों में, कस्बों में हुई हैं, गांवों में एक नहीं हुई है। किसी बहस में कोई सरपंच-पंच नहीं आता। उनको अभी तक न अपने एक्ट पता है, न अधिकार पता है, न ये पता है कि क्यों होता है, क्या होता है? एम.एल.ए. को तनख्वाह मिलती है। सांसदों को तनख्वाह मिलती है। भत्ते मिलते हैं। गाड़ी में, हवाई जहाज में सफर कर सकते हैं। उसको दो पैसे नहीं मिलते हैं। एक सरपंच है उसके घर में अगर 20 मेहमान आ जाएं तो उसके लिए ये एलाउन्सेज नहीं है। तो उसको जो ऊपर से पैसा जाता है, तो 2 लाख में से 20 हजार उनके पल्ले पड़ते हैं, उसको खा जाते हैं वो लोग और क्या करें।

एक मंत्री जाएगा उसके लिए दही मंगानी है, हैलीकाॅप्टर जाएगा। दही में ही खर्च हो जाता है। वो कहां से करेगा इतनी ईमानदारी, न उसके पास पैसा है, न भत्ते है, न कार्य विभाजन है। न आपस में कोई को-आर्डिनेशन है। किसी भी तरह के अधिकार नहीं है। उसको यही समझा जाता है कि गंवार है, मूर्ख है, इसकी क्षमता नहीं है। इसकी क्षमता का संवर्द्धन नहीं हुआ, बाकी सब विधायकों का हो गया। जैसे इन विधायकों में पहले से क्षमता है। जन्मजात इनमें क्षमता है।

इनके न्यायालय हैं प्रशासनिक न्यायालय हैं। हाइकोर्ट का स्तर है इनका। इसमें एक भी आदमी कानूनी पृष्ठभूमि का जज नहीं बैठता। उसमें सब सेवानिवृति सचिव बैठते हैं। एक की भी कानूनी पृष्ठभूमि नहीं है। जो मजिस्ट्रेट आपके जिलों में हैं, जो सेशंस जज बनते है, कोई कानूनी इम्तिहान पास करके नहीं आता है। वो न्याय देते हैं और वो माना जाता है। ये तो जजमेंट सीट आॅफ विक्रमादित्य है। जो कहानी हमने बारहवीं क्लास में पढ़ी थी कभी, उस सीट पर जो बैठेगा न्याय ही करेगा।

सबसे बड़ा डर ये है कि ग्राम पंचायतें अपनी न्याय व्यवस्था बनाएंगी, अपनी प्रशासन व्यवस्था होगी इनकी तो जिलाधिकारी क्या करेगा, कलक्टर क्या करेगा! मध्य प्रदेश के उदाहरण इसीलिए असफल है कि ऊपर से नीचे की तरफ टपकाया गया है। मुख्यमंत्री की एक समिति बनी है, ऊपर से जिले स्तर पर जाकर अटक गए। और वो भी मकसद ये था कि कांग्रेस को मजबूत कैसे किया जाए। जिले स्तर से नीचे नहीं जा पायी पंचायत, ये करतूत है इनकी। पंचायतें हमेशा बाॅटम-अप होती है, नीचे से ऊपर आएंगी। ऊपर से नीचे नहीं जा सकती। केरला का भी उदाहरण है।

केरला को पांच साल लगे और चौथे साल उसने ऐलान किया कि मेरी 25 पंचायतों को दुनियां में कहीं भी खड़ा करके तुलना कर लो। पर ये तुलना की बात ही नहीं थी। पहली बात है कि लोकतंत्र में जो जनरल बाॅडी है वो जनता है। जनता को अगर आप नहीं बताएंगे, गांव वालों को तो आप बता नहीं रहे हैं, शहर में बता रहे हैं। आप मुझे बता रहे हैं, मैं आपको बता रहा हूं। तो इससे काम नहीं चलने वाला। जनता को तो इलेक्शन के दिनों में भी नहीं बताते कुछ, अब क्या करें बेचारे।

सुबह से कर्म संस्कृति की बात आई। संस्कृति तथा सभ्यता की बात आई। संस्कृति आंतरिक रूप होता है और सभ्यता उसका बाहरी रूप होता है। सभ्यता काम और अर्थ से जुड़ी होती है। काम का मतलब कि यौवन में जो भी प्रसाधन है, सौंदर्य अच्छा है, फैशन है अच्छे कपड़े पहनने हैं, कार लेनी है; भोग करना है ये सब। जो सभ्यता होती है उसका बाहरी आवरण है वो। जो धर्म और मोक्ष से जुड़ी है। ये पुरानी टर्मिनोलॉजी है इसलिए आपको पसंद नहीं आएगी। इसको इस तरह से समझिए जो लिबरेशन से जुड़ी है, जैसे शिक्षा है वो लिबरेट करती है आपको। जो धर्म की बजाय ड्यूटी से जुड़ी हुई हो। वो संस्कृति सारे देश की एक ही होती है। और जो सभ्यता होती है वो जगह-जगह अलग-अलग होती है। क्योंकि जीवन पद्धतियां अलग होती हैं। तो जब हम कहते हैं किसी क्षेत्र विशेष का विकास करना हो तो उसमें कल्चरल इनपुट होना चाहिए। वो इनपुट ये नहीं होता कि उसमें गाने कैसे गाते हैं, नाचते कैसे हैं। कविताएं कैसी हैं। ये कल्चर का स्वरूप नहीं है। कल्चरल इनपुट का मतलब होता है कि वो रोजमर्रा की ज़रूरतें कैसे पूरी करते हैं, क्या पहनते हैं। कैसे खाते हैं, कैसे हल चलाते हैं, हल कौन चलाता है, मेहनत कौन करता है, कैसे खाने को पैदा करते हैं, विवाह संस्थान कैसा है, परिवार में कितने लोग हैं, ज्वाइंट फैमिली है या नहीं है। ये हर एक नदी-घाटी में अलग-अलग है।

उत्तराखंड एक मिनी भारत है। जो कि हर नदी-घाटी में एक दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाता। अगर आप गोरी नदी से टौंस की तुलना करोगे तो, दोनों जगह जनजातियां हैं मगर दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। विवाह संस्थान अलग हैं, परिवार संस्थान अलग हैं। 94 आदमियों का एक परिवार है टौंस में। गोरी में नहीं है ये। इसलिए वहां की सारी योजनाएं गांव वाला कर सकता है। एक कमरे में बैठकर कोई प्रतिनिधि नहीं कर सकते। कोई डिप्टी चेयरमैन नहीं कर सकते।

ये जो योजना आयोग है, ये एक वितरण एजेंसी है। आप हर साल फंड बांट देते हैं। बाकी आप वहां बैठकर क्या करते हैं ? आप क्या देश का अध्ययन करते हैं? ऐसे हमारे उत्तराखंड का भला नहीं हो सकता। उत्तराखंड की अगर कभी भी योजना होगी तो गांव वाला करे। आप कौन होते हैं ऊपर बहस करने वाले। हम इस संविधान को बहुत बड़ा धर्मग्रंथ नहीं मानते, बार-बार बदलता है। अभी 6 बार और बदल जाएगा।

डाॅक्टर भट्ट ने प्रतिनिधिमूलक सरकार से कहा, सही बात है। जनता मूलक होना चाहिए सरकार को। प्रतिनिधिमूलक कैसे हो सकती है। प्रतिनिधि तो एक घर बनाना है, उसे मेंटेन करना है, इसलिए है। अगर सरकार जनता के बारे में कुछ नहीं सोचती तो फिर सरकार कैसे है। इसलिए अगर गांव में जाकर चेतना फैला सकें तो दो दिन में सरकार बदल जाती है।

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