कुछ विचार, कुछ सुझाव

Submitted by admin on Tue, 06/10/2014 - 13:13
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पानी, समाज और सरकार (किताब)

देश में उपलब्ध कुल पानी में से सरकार द्वारा उपयोग में लाए जा सकने वाले पानी की अधिकतम मात्रा 1086 लाख हेक्टेयर मीटर है। इसके बाद लगभग 1273 लाख हेक्टेयर मीटर पानी शेष बचता है जिसके बारे में सरकारी आंकड़ें या जलनीति कुछ नहीं कहती। इस पानी को समाज को सौंप देना चाहिए। चूंकि यह पानी समुद्र में जा रहा है इसलिए पानी की इस मात्रा (1273 लाख हेक्टेयर मीटर) को समाज के अधिकार में लाया जाए तथा उसे संविधान और जलनीति में दर्ज किया जाए। सब जानते है कि मानसून के बाद या अवर्षा के लम्बे अंतराल के कारण फसल की जड़ों के आसपास की जमीन में धीरे-धीरे नमी की मात्रा कम होने लगती है। मिट्टी में नमी की कमी का असर पौधों पर पड़ता है, उनकी प्रगति मारी जाती है, पैदावार घटती है और नमी की कमी द्वारा लक्ष्मण रेखा पार करने की हालत में पौधा सूख जाता है। इस कारण खरीफ में अवर्षा के कारण, रबी और गर्मी की खेती के लिए पानी की जरूरत होती है।

जल नीति, नोडल विभाग और समाज को मिलकर इस पानी को असिंचित क्षेत्रों में उपयोग में लाने के लिए धन और कार्यक्रम जुटाने होंगे। इस व्यवस्था से हालात बदलेंगे, जलस्रोतों के पानीदार बनने के कारण सूखी खेती करने वाले किसानों की आजीविका को बेहतर आधार मिलेगा। अप्रयुक्त 1263 लाख हे.मी. पानी के उपयोग के दृष्टिबोध को भारत की जलनीति में शामिल करने की आवश्यकता है।

इस अध्याय में पानी, समाज तथा सरकार के रिश्ते को समझने के बारे में अब तक कही बातों को समेटने का यथासंभव प्रयास किया जाएगा। साथ-ही-साथ इस बात को समझने का भी प्रयास किया जाएगा कि क्या पिछले अनुभवों की रोशनी में इन संबंधों में किसी तरह के बदलाव की आवश्यकता है? क्या बदलाव बेहतर परिणाम दे सकेंगे या मौजूदा व्यवस्था ही सही है? क्या मध्यमार्ग को अपनाना बेहतर होगा?

चर्चा के इस मुकाम पर समाज को कतिपय अधिकार देने के सरकारी प्रयास की भी चर्चा की जाएगी। पर सबसे पहले हर अध्याय में कही प्रमुख बिंदुओं की जल्दी से चर्चा कर ली जाए ताकि अब तक कही मुख्य-मुख्य बातें जहन में ताजा हो जाएं।

पहले अध्याय में आंकड़ों की सहायता से हमने जाना कि देश में उपलब्ध कुल पानी में से सरकार द्वारा उपयोग में लाए जा सकने वाले पानी की अधिकतम मात्रा 1086 लाख हेक्टेयर मीटर है। इसके बाद लगभग 1273 लाख हेक्टेयर मीटर पानी शेष बचता है जिसके बारे में सरकारी आंकड़ें या जलनीति कुछ नहीं कहती। लेखक को लगता है कि इस पानी को समाज को सौंप देना चाहिए। चूंकि यह पानी समुद्र में जा रहा है इसलिए लेखक का प्रस्ताव है कि पानी की इस मात्रा (1273 लाख हेक्टेयर मीटर) को समाज के अधिकार में लाया जाए तथा उसे संविधान और जलनीति में दर्ज किया जाए।

इस व्यवस्था से जमीन पर बहने वाले बरसाती पानी का 54 प्रतिशत समाज को मिलेगा और 46 प्रतिशत पानी (690+396=1086 लाख हे.मी.) सरकार के नियंत्रण में रहेगा। दोनों को अवसर मिलेगा और वे (सरकार और समाज) अपनी-अपनी जरूरतों और जलनीति में तय किए दिशा निर्देशों या दृष्टिबोध के अनुरूप संरचनाओं का निर्माण कर सकेंगे।

कुछ बुनियादी बातों वाले दूसरे अध्याय में लिखी बातों से पता चलता है कि धरती पर पानी की मात्रा निश्चित है और प्रतीत होता है कि वह हमारी आवश्यकता से किसी तरह भी कम नहीं है। इसी अध्याय में संविधान में पानी के मामले में केन्द्र और राज्य सरकार के दायित्वों को रेखांकित किया है तथा अंतरराज्यीय नदियों के संचालन और विकास की चर्चा की गई है। पर इस पूरी इबारत में समाज का उल्लेख कहीं नहीं है।

इसी तरह जलनीति में पानी के उपयोग की प्लानिंग और क्रियान्वयन की प्राथमिकताओं का तो जिक्र है पर इस जिक्र में से समाज गायब है। जलनीति के अनुसार सरकार द्वारा ही पानी की उपलब्धता के अनुसार पानी की प्लानिंग की जाएगी। लेखक को लगता है कि पानी की प्लानिंग का आधार, समाज के हर सदस्य की पानी की मूलभूत जरूरत होना चाहिए। इसलिए संविधान और देश की जलनीति में समाज की भूमिका और उसके सदस्यों की मूलभूत जरूरतों की पूर्ति को समुचित स्थान देने की पुरजोर वकालत की जा सकती है।

तीसरे अध्याय में परंपरागत जल प्रणालियों में पानी, समाज और सरकार के रिश्तों की झलक मिलती है। इसी झलक में तत्कालीन राजा महाराजाओं (प्रकारांतर से सरकार) और समाज के बीच पानी के इंतजाम और बंटवारे से जुड़े कायदे कानून भी दिखाई देते हैं।

निर्माण और प्रबंध के अलावा, पुरानी जल प्रणालियों में स्थानीय जलवायु और जरूरतों के हिसाब से जल संचय के काम का विकेन्द्रीकृत तौर तरीका भी अक्सर दिखता है। पाठक सहमत होंगे वे विकेंद्रीकृत तौर तरीके का अर्थ है ‘सबको, सब जगह पानी’। मौजूदा जल संकट की पृष्ठभूमि में प्रचानी प्रणलियों की अच्छाइयों को अपनाने का अनुरोध किसी भी कसौटी पर बेमानी नहीं कहा जा सकता।

पांचवें अध्याय में भूजल संकट से जुड़ी समस्याओं खासकर गिरते भूजल स्तर की चर्चा की गई है और कुछ सुझाव भी दिए गए हैं।

गौरतलब है कि गिरता भूजल स्तर ही बरसात बाद कुओं, नलकूपों और नदी नालों के सूखने का कारण हैं जलस्तर गिरने के कारण, भूजल पर आधारित खेती, पेयजल और अन्य सेक्टर्स की समस्याएं लगातार गंभीर हो रही हैं। भारत के बहुत बड़े भूभाग को प्रभावित करने वाले भूजल सेक्टर की समस्याओं के निपटारे के लिए वैधानिक कदमों के साथ-साथ सरकार को अपनी और समाज की जिम्मेदारियों को बढ़ना चाहिए।

भूजल संरचनाएं मुख्यतः एक आदमी की मिल्कियत होती हैं और उनका प्रभाव क्षेत्र बहुत छोटा होता है, अतः उनके लिए क्षेत्रीय विकास के स्थान पर स्थानीय विकास के मॉडल की उपयोगिता तकनीकी रूप से अधिक प्रासंगिक है। अतः लेखक को लगता है कि जल स्वावलंबन की उपरोक्त प्रस्तावित विकेन्द्रीकृत व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए। इसके लिए पृथक विभाग का गठन किया जाना चाहिए।

छठवें अध्याय में हमने ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन से जुड़ी मोटी-मोटी बातों को समझा है। जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि प्रभावित होने वाले इलाकों के लिए नए सिरे से पानी की प्लानिंग करनी होगी। नगरीय इलाकों और खेती में बरसात के चरित्र के साथ तालमेल बनाने वाली एवं कम पानी को उपयोग में लाने वाली तकनीकों और फसलों की किस्मों को अपनाना होगा। एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंचों से संपर्क रखना होगा तो दूसरी ओर देश के भीतर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में समाज को विश्वास में लेकर चलना होगा। बदलते रन आफ के उपयोग को जरूरत के स्तर पर लाना होगा और पानी की हर बूंद को संचित कर काम में लेने की जुगत करनी ही होगी।

आठवें अध्याय में नदी जोड़ योजना का संक्षिप्त विवरण दिया है। इसी अध्याय में बताया गया है कि विकसित देशों में नदी जोड़ योजनाओं और बड़े बांधों से मोह भंग हो रहा हैं उन्हें खत्म किया जा रहा है ऐसी हालत में भारत का नदी जोड़ योजनाओं से मोह और जनमत की अनदेखी सही प्रतीत नहीं होती। ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात के चरित्र में जो बदलाव आएगा उसके कारण अवर्षा और बाढ़ की विभीषिका बढ़ेगी। संरचनाओं के टूटने की घटनाएं बढ़ेंगी और जनधन की हानि का ग्राफ नई ऊंचाइयां छुएगा।

यही संभावनाएं नदी जोड़ योजना के औचित्य पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है। लेखक का मानना है कि यह योजना पानी के असमान वितरण को बढ़ाएगी और गंभीर पर्यावरणीय तथा व्यवस्थागत समस्याएं पैदा करेगी।

दसवें अध्याय में हमने नोडल विभाग के सोच की दिशाओं का जायजा लिया है। इस विवरण से जाहिर है कि नोडल विभाग केवल बांधों के निर्माण को ही महत्व देता है और उसके अनुसार केवल बांध ही हर समस्या का हल है। इस अध्याय में नोडल विभाग से अपेक्षा की गई है कि वह पानी के सभी पक्षों पर काम करेगा और समाज से बेहतर तालमेल बनाएगा।

देश के प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने वाली तकनीक और समाज विरोधी विदेशी मदद से यथासंभव गुरेज करेगा।

ग्यारहवें अध्याय में हमने ‘मेरा पानी तेरा पानी’ का अंतहीन विवाद देखा। इस विवादित खेल में संबंधित राज्यों के लाखों किसानों की जरूरतों पर उनके स्थान पर दूसरे लोग बहस कर रहे हैं। सर्वमान्य हल निकालने में उनकी आवाज, उनकी सहमति, उनकी इच्छा, उनकी समझ इत्यादि में किसी की रुचि नहीं दिखाई देती। वे परिदृश्य से गायब हैं। इसलिए प्रस्ताव किया जा सकता है कि अंतरराज्यीय नदियों के पानी को संबंधित राज्यों के हितग्राहियों के बीच बंटवारे के सवाल को समाज के अधिकार में लाया जाए और उसे संविधान और जलनीति में दर्ज किया जाए।

कुछ साल पहले मध्य प्रदेश सरकार ने जल संरक्षण में पंचायतों की भागीदारी बढ़ाने के लिए “एक पंच एक तालाब” एवं समाज को जल संकट से राहत दिलाने के लिए मध्य प्रदेश के सारे जिलों में “पानी रोको अभियान” चलाया था। इन दोनों अभियानों का मूल उद्देश्य हर जगह पानी की कमी दूर करना, खेती को अधिक पानी उपलब्ध कराना और सूख रहे नदी नालों को जिंदा करना था। ये सभी अभिनव प्रयोग यथासंभव समाज की ऊर्जा और सहयोग से संचालित किए गए थे।बारहवें अध्याय में “संभावनाओं के क्षितिज और क्षितिज पर कानून के बादल” देखे। संभावनाओं ने यदि राह दिखाई है तो कानून के बादल हमारी राह रोकते हैं। लेखक को लगता है कि चर्चा के इस मुकाम पर सन् 1994 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जारी वाटरशेड गाइड लाइन्स की बात की जाए। इस गाइड लाइन में समस्या से सीधे-सीधे जुड़े समाज की भूमिका और उसके अधिकारों को मान्यता दी गई थी। इस गाइड लाइन के सूत्रधार प्रोफेसर हनुमन्तराव ने एक और अभिनव पहल कराई थी। उन्होंने इस योजना के क्रियान्वयन में सरकारी अमले या पंचायत के स्थान पर गांव के लोगों के प्रजातांत्रिक ढांचे (वाटरशेड कमेटी, उपयोग कर्ता और स्वावलम्बी दलों) को मान्यता दिलाई थी। गौरतलब है कि संविधान की कोख से उपजे ढांचे की तुलना में इस नवजात ढांचे ने कई जगह बेहतर परिणाम दिए, अनुकरणीय एवं उल्लेखनीय सामाजिक मान्यता पाई और बेहतर प्रदर्शन नहीं करने वाली संस्थाओं के लिए प्रेरक का काम किया। तेरहवें अध्याय में अरवरी जल संसद - ग्रामीण समाज के अभिनव प्रयोग को समझा है। चौदहवें अध्याय में निजी क्षेत्रों के योगदान की झलक ली है। पंद्रहवें अध्याय में जल प्रदूषण की चर्चा है।

लेखक को लगता है कि सन 1994 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जारी वाटरशेड गाइड लाइन्स ने समाज की पहल का जो मॉडल प्रस्तुत किया था, उसी मॉडल को जल स्वराज के मॉडल के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता है। जहां तक इस प्रोग्राम की सहायता से जल स्वराज या हर जगह जीवन रक्षा के लिए न्यूनतम पानी की उपलब्धता का प्रश्न है, तो संबंधित लक्ष्यों को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है। यह पहल देश की लगभग 65 प्रतिशत जमीन का कायाकल्प कर सकती है। ग्रामीण इलाकों में जल स्वराज का लक्ष्य पाने के लिए वाटरशेड कार्यक्रम को अधिक धन दिलाने के अलावा सभी विभागों के वाटरशेड कार्यक्रमों को ग्रामीण विकास विभाग के अधीन लाए जाने की जरूरत है। इसके अलावा पानी की इष्टतम उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सांसदों और विधायकों को हर साल मिलने वाली विकास राशि का कम-से-कम 50 प्रतिशत पानी पर खर्च करने की जुगत करनी होगी।

गौरतलब है, कुछ साल पहले मध्य प्रदेश सरकार ने जल संरक्षण में पंचायतों की भागीदारी बढ़ाने के लिए “एक पंच एक तालाब” एवं समाज को जल संकट से राहत दिलाने के लिए मध्य प्रदेश के सारे जिलों में “पानी रोको अभियान” चलाया था। इन दोनों अभियानों का मूल उद्देश्य हर जगह पानी की कमी दूर करना, खेती को अधिक पानी उपलब्ध कराना और सूख रहे नदी नालों को जिंदा करना था। ये सभी अभिनव प्रयोग यथासंभव समाज की ऊर्जा और सहयोग से संचालित किए गए थे। इन्हें पूरे देश में लागू करने की आवश्यकता है। इन अभियानों की मानीटरिंग में गांव को इकाई बनाना होगा और गांव में पानी की कितनी कमी बची है, को शेष बचे काम का आधार बनाना होगा। आंकड़े बताते है कि पानी सीमित संसाधन नहीं है। भारत के अधिकतर इलाकों में इन सब कामों के लिए जरूरत से ज्यादा पानी मौजूद है।

लेखक की मान्यता है कि सारा मामला इतना सरल नहीं है। चूंकि पानी की मांग का मामला अनेक सेक्टर्स से जुड़ा मामला भी है, इसलिए भारत के प्रजातांत्रिक परिवेश में पानी की मांग की समझ और उसके भविष्य के बारे में सोचने तथा समझने का अधिकार सभी संबंधितों को है। अतः पाठक यदि इस बुनियादी बात से सहमत हों तो कहा जा सकता है कि पानी से जुड़े सारे छोटे-बड़े मामलों को केवल विशषज्ञों या मैनेजरों के हाथ में नहीं छोड़ना चाहिए।

अंतिम अध्याय के इस मुकाम पर, जैसा ऊपर लिखा जा चुका है, अनुभवों की रोशनी में बदलाव के बारे में कुछ बुनियादी बातों पर गौर करना और उन कामों की जिम्मेदारी को उचित हाथों में सौंपने के बारे बात करना अच्छा होगा। इस चर्चा को पानी की मांग के विस्तृत केनवास, उसके औचित्य, उसकी पूर्ति की जदोजहद और साइड इफेक्ट समाप्त करने वाली तकनीकों के गुण दोषों को ध्यान में रखकर करना भी उचित होगा। जहां पुराने अनुभवों में अपेक्षाओं और अपेक्षाओं की पूर्ति में बुनियादी अंतर है, वहां उस अंतर को रेखांकित करना और उसे मुख्यधारा में लाकर, सही हाथों में सौंपकर वांछित सुधार लागू करना बेहतर होगा।

एक ओर यदि समाज को सौंपी जाने वाले मामलों में अधिकारों और रिश्तों को मजबूती देनी होगी तो दूसरी ओर उसकी सीमा को भी परिभाषित करना होगा। लक्ष्मण रेखा भी खींचनी होगी। इसीलिए अगले पृष्ठों में सरकार और समाज के बीच पानी संबंधी अनुभवों अर्थात पानी की मांग से जुड़े प्रमुख क्षेत्रों की चर्चा की जाएगी और फिर संक्षेप में भविष्य के बदलावों के बारे में सोचेंगे।

पानी की मांग से जुड़े प्रमुख क्षेत्र और उनसे जुड़े अनुभव


(अ) कृषि क्षेत्र में पानी की मांग से जुड़े अनुभव


पानी की सबसे अधिक मांग, अन्न उत्पादन या खेती के क्षेत्र में है। इसी कारण अधिकांश लोग, सिंचित खेती से मिलने वाली पैदावार को संपन्नता का बैरोमीटर मानते हैं और उसी आधार पर पानी की संरचनाओं के अधिकाधिक निर्माण की वकालत करते हैं। लेखक को लगता है कि पानी की संरचनाओं के स्थान पर हमारी मांग पानी की वांछित मात्रा होना चाहिए। मामला असिंचित इलाकों में पानी की सतत बढ़ती मांग का ही है। अतः भविष्य में असिंचित इलाकों में पानी की बढ़ती मांग की पूर्ति करनी होगी। पर पानी की पूर्ति की बात करने के पहले पुराने अनुभवों पर भी नजर डालनी होगी।

खेती के क्षेत्र में पानी की मांग मुख्यतः बांध, तालाब, कुओं और नलकूपों से पूरी की जाती है। सामान्यतः बड़े, मझोले और छोटे बांधों का निर्माण सरकार द्वारा और नलकूपों और कूओं के निर्माण जरूरतमंद व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। बांधों के सर्वेक्षण, बनाने, चलाने और अमले का खर्च सरकार उठाती है तो नलकूपों और कुओं को बनाने और उनको चलाने तथा सुधरवाने इत्यादि का सारा खर्च संरचना का मालिक उठाता है। बांधों की समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार को अतिरिक्त धन खर्च करना पड़ता है पर कुओं तथा नलकूपों की समस्याओं को दूर करने की जिम्मेदारी संरचना के मालिक की होती है। कहा जा सकता है कि दोनों तरह की संरचनाओं के उद्देश्य समान है पर समान उद्देश्य होने के बाद भी उनके निर्माण, रखरखाव और संचालन पर होने वाले व्यय की भरपाई की नीति में बुनियादी फर्क है। यह फर्क भूजल आधारित अधिकांश संरचनाओं में अधिक स्पष्ट रूप से नजर आता है।

यह पहला अनुभव है। लेखक को लगता है कि इस अनुभव के कुछ सबक समाज हितैषी हो सकते हैं। उन समाज हितैषी कामों से समाज और सरकार का हित ही होगा।

सब जानते है कि मानसून के बाद या अवर्षा के लम्बे अंतराल के कारण फसल की जड़ों के आसपास की जमीन में धीरे-धीरे नमी की मात्रा कम होने लगती है। मिट्टी में नमी की कमी का असर पौधों पर पड़ता है, उनकी प्रगति मारी जाती है, पैदावार घटती है और नमी की कमी द्वारा लक्ष्मण रेखा पार करने की हालत में पौधा सूख जाता है। इस कारण खरीफ में अवर्षा के कारण, रबी और गर्मी की खेती के लिए पानी की जरूरत होती है।

पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होने के बाद अधिकतम उत्पादन लेने के लिए कृषि वैज्ञानिक (केमिकल) फर्टीलाइजरों, उन्नत बीजों, पेस्टीसाइडों और इन्सेक्टीसाइडों जैसे ‘इन-पुट’ के प्रयोग की सलाह देते हैं। अनुभव बताता है कि प्रारंभिक वर्षों में इनके प्रयोग से उत्पादन बढ़ता है। वैज्ञानिक खोजों से पता चला है कि कई जगह इनके लगातार बढ़ते उपयोग ने जमीन की प्राकृतिक उत्पादन क्षमता को कम किया है और उन पर निर्भरता बढ़ा दी है।

दूसरे, इनके बढ़ते उपयोग के कारण जमीन के नीचे के पानी और खद्यानों में पेस्टीसाइडों और इन्सेक्टीसाइडों के अंश मिलने लगे हैं। यह दूसरा अनुभव है।

बांधों से दिया पानी गुरूत्व बल की सहायता से नहरों द्वारा खेतों में पहुंचता है। इस व्यवस्था को अपनाने के कारण नहरों के पानी का वाष्पीकरण, जमीन में रिसाव और खेतों को पौधों की जरूरत से अधिक पानी दिया जाता है। कई लोग, सिंचाई की इस व्यवस्था को पानी का अपव्यय करने वाली व्यवस्था मानते हैं। इसी तरह, नहरी पानी और भूजल के मिलेजुले उपयोग की अनदेखी कई लोगों को सालती है। उनके अनुसार पानी का अपव्यय एवं नहरी पानी और भूजल का मिलाजुला उपयोग नहीं होना तीसरा अनुभव है।

कई लोगों का सुझाव है कि पानी के अपव्यय को रोकने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने तथा कम पानी चाहने वाली फसलों को लगाने की जरूरत है। अनुभव बताता है कि अनेक इलाकों में इसकी अनदेखी होती है जिसके कारण पानी के स्रोतों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। और वे समय पूर्व सूखने लगते हैं। इस हकीकत की सरकार एवं समाज द्वारा अनदेखी चौथी समस्या है।

बांधों की मदद से अधिकतम 35 प्रतिशत इलाके में ही सिंचाई की व्यवस्था जुटाई जा सकती है, वही देश में सूखी खेती पर निर्भर इलाका लगभग 65 प्रतिशत है। इस वर्षा आधारित इलाके की जमीनें हल्की और कम उपजाऊ है। इस इलाके में रहने वाले किसानों और उन पर निर्भर लोगों की आर्थिक स्थिति कमजोर है। उनकी स्थिति में सुधार के लिए पानी, सहित, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता है। इस संरक्षण से 300 लाख लोगों की आजीविका को सम्बल मिल सकता है।

बरसात पर निर्भर इन इलाकों में पानी की मांग (सुरक्षात्मक से लेकर उत्पादक सिंचाई) की पूर्ति से लगभग 12 करोड़ लाख रुपयों का अतिरिक्त अन्न उत्पादन संभावित है। भारत की बढ़ती आबादी की खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करने के लिए इस इलाके की सुध लेने और पानी की इष्टतम मांग की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों के समग्र संरक्षण पर और अधिक धन खर्च करने की आवश्यकता है।

इन क्षेत्रों में “स्व-स्थाने जल संरक्षण” के सिद्धांत पर आधारित जल स्वराज की अवधारणा पर बहुत अधिक काम करने की आवश्यकता है। गौरतलब है कि इन प्रयासों के लिए भारत में अप्रयुक्त रन आफ के रूप में लगभग 1263 लाख हेक्टेयर मीटर पानी के उपलब्ध होने के बाद भी इसके नोडल विभाग के एजेंडे पर नहीं होना पांचवी समस्या है। लेखक को लगता है कि उपरोक्त अनुभवों के कुछ सबक समाज हितैषी हो सकते हैं जिन पर अमल करने से समाज और सरकार का हित होगा।

लेखक को लगता है कि ऊपर उल्लेखित पांच प्रमुख समस्याओं के अलावा भी अनेक समस्याएं हैं। इन सभी समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान देने एवं सोच में बदलाव की आवश्यकता है। खेती में पानी की मांग का भविष्य तय करने में किसान की आजीविका आधारित संतुष्टि को आधार बनाना चाहिए। यदि इस प्रस्तावित संकेतक को स्वीकार किया जाता है तो किसान की आजीविका आधारित फसल की पानी के प्रति हेक्टेयर मांग को पूरा करना होगा।

गौरतलब है कि खेती में पानी की बढ़ी हुई मांग की पूरा करने के लिए देश में लगभग 1263 लाख हे. मी. पानी उपलब्ध है। इस विशाल मात्रा के उपयोग की संभावना ही जरूरतों को पूरा करने का सबसे अधिक मजबूत आधार है। जल नीति, नोडल विभाग और समाज को मिलकर इस पानी को असिंचित क्षेत्रों में उपयोग में लाने के लिए धन और कार्यक्रम जुटाने होंगे। इस व्यवस्था से हालात बदलेंगे, जलस्रोतों के पानीदार बनने के कारण सूखी खेती करने वाले किसानों की आजीविका को बेहतर आधार मिलेगा। अप्रयुक्त 1263 लाख हे.मी. पानी के उपयोग के दृष्टिबोध को भारत की जलनीति में शामिल करने की आवश्यकता है।

लेखक को लगता है कि खेती में पानी की मांग की रणनीति एवं सोच में बदलाव करते समय पांच प्रमुख बातों पर ध्यान देना होगा-

1. सरकार द्वारा पानी की गुणवत्ता की लगातार मानीटरिंग और समाज को उसकी जानकारी देना।
2. मिट्टी की इष्टतम उत्पादकता को हासिल करने या बनाए रखने के लिए समाज को जागरूक बनाना और सुविधाएं मुहैया कराना।
3. खेती की प्रति हेक्टेयर लागत को यथासंभव कम करना या बनाना।
4. खेती की प्रति हेक्टेयर बचत को अधिकाधिक करने के लिए सतत प्रयास करना।
5. पानी की कमी वाले इलाकों में कम पानी चाहने वाली फसलें लेने के लिए नीति बनाना और उसे लागू करना।

पिछले अनुभवों की रोशनी में कहा जा सकता है कि उपरोक्त प्रमुख बातों की पूर्ति यथासंभव समाज और सरकार के ही हाथ में होना चाहिए। इनकी पूर्ति पर बाजार का अधिकार कालांतर में समाज का अहित ही करेगा। संभावनाओं के क्षितिज वाले अध्याय में हमने देखा है कि समाज अक्सर बेहतर परिणाम देता हे। अरवरी नदी जल संसद वाले अध्याय में हमने देखा है कि कम पढ़ा समाज, सरकार के सहयोग के बिना भी नदियों को जिंदा करने, जल संकट के निपटारे और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंध का काम बखूबी कर लेता है।

(ब) पेयजल आपूर्ति से जुड़े अनुभव


जलनीति ने पीने की मांग को सबके ऊपर रखा है। मांग में अंतर होने के कारण शहरों और ग्रामीण इलाकों में पानी की आपूर्ति के मानक (प्रति व्यक्ति प्रतिदिन) अलग हैं। जैसे-जैसे शहर महानगर बनने की ओर अग्रसर होता है वैसे-वैसे प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी की खपत बढ़ती जाती है। यह आधुनिक जीवनशैली की देन है जिसमें पीने के पानी पर न्यूनतम और व्यक्तिगत साफ-सफाई, कपड़े धोने और टायलेट इत्यादि साफ करने पर सबसे ज्यादा पानी खर्च करना आवश्यक होता जाता है।

इसी कारण बड़े नगरों में जलप्रदाय व्यवस्था के अच्छी तरह चलाने पर गंभीर दबाव हैं और वह दिन दूर नहीं जब इस मांग की पूर्ति के लिए महानगरों में आबादी के विस्तार को सीमित करने जैसे कदम उठाने की आवश्यकता अनुभव की जाएगी। ग्रामीण इलाकों की जीवनशैली में भी अंतर आने लगा है। जिसके कारण, भविष्य में उसके तेजी से बढ़ने की पूरी संभावना है। ग्रामीण इलाकों में पेयजल की आपूर्ति मुख्यतः भूजल से होती है पर भूजल स्तर के लगातार गिरने के कारण नलकूपों का खोदना और सूखना जारी है।

आबादी बढ़ने और जीवनशैली के बदलावों के कारण भविष्य में यह चुनौती बढ़ेगी। इस कारण मानव मल निपटान के लिए सूखी विधि और अन्य अपशिष्टों के निपटान के लिए परिष्कृत मॉडल एवं विधियों को विकसित करना होगा। इन अपशिष्टों के निपटान को आय मूलक गतिविधि बनाने के अलावा पानी की फिजूलखर्ची कम करने और पानी की आपूर्ति बढ़ाने पर ध्यान देने की आवश्यकता पड़ेगी। सीवर में बहने वाले मानवीय अपशिष्टों को उनके स्रोत पर निपटाना होगा ताकि वे प्राकृतिक जलचक्र के संपर्क में नहीं आ सकें।भूजल स्तर के साल-दर-साल गिरने के कारण लगता है कि भविष्य में कुओं और नलकूपों से पानी की मांग की पूर्ति, डूबते सूरज से रोशनी की उम्मीद जैसी हो सकती है। भूजल स्तर को साल-दर-साल और अधिक नीचे गिराने के काम को हवा देने का काम जारी है। अनेक जिम्मेदार लोगों के अनुसार भूजल संकट का सबसे पसंदीदा समाधान, भूजल रीचार्ज कार्यक्रमों के स्थान पर नए-नए नलकूपों को खोदने में खोजा जाता है। यही भूजल संकट को बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण है।

महानगरों में पानी की मांग की पूर्ति का संबंध आबादी और आधुनिक जीवनशैली है। आबादी और जीवनशैली की विविधता के कारण मांग में गणितीय एकरूपता नहीं हो सकती है। महानगरों में पानी की वर्तमान उपलब्धता और आधुनिक जीवनशैली के अनुरूप मांगों और मानकों की विविधता भी उत्तर को जटिल बनाती है। स्रोतों की क्षमता, उनका टिकाऊपन, उनकी गुणवत्ता, उनकी दूरी, परिवहन, लागत जैसे अनेक विचारणीय बिंदु हैं, जो किसी एक मॉडल या हल को सार्वभौमिक नहीं बनने देते।

आधुनिक जीवनशैली के कारण मानव मल बहाने और टायलट साफ रखने के लिए मानक पानी का लगभग 35 प्रतिशत खर्च करना पड़ता है। शहरी विकास मंत्रालय, भारत सरकार के सेंट्रल पब्लिक हेल्थ एवं पर्यावरणीय इंजिनियरिंग के जल प्रदाय एवं उपचार मेनुअल (मई, 1999) में जलप्रदाय के लिए तीन तरह की व्यवस्थाओं की सिफारिश की गई है, जो निम्नानुसार हैं-

1. जलमल निकास प्रणाली (सीवेज सिस्टम) विहीन शहरों में एक आदमी को एक दिन में अधिक-से-अधिक 70 लीटर पानी देने की सिफारिश की गई है।
2. जलमल निकास प्रणाली (सीवेज सिस्टम) वाले शहरों में एक आदमी को एक दिन में अधिक-से-अधिक 130 लीटर पानी देने की सिफारिश की गई है।
3. जलमल निकास प्रणाली (सीवेज सिस्टम) वाले महानगरों और मेगा टाउन्स में एक आदमी को एक दिन में अधिक-से-अधिक 150 लीटर पानी देने की सिफारिश की गई है।

इसी मेनुअल में संस्थाओं की जल प्रदाय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए निम्नानुसार व्यवस्थाओं की सिफारिश की गई है। ये सिफारिशें निम्नानुसार हैं-

1. सौ से अधिक बिस्तर वाले अस्पताल (वस्त्र धुलाई व्यवस्था सहित) के लिए प्रति बिस्तर 450 लीटर पानी प्रतिदिन।
2. सौ से कम बिस्तर वाले अस्पताल (वस्त्र धुलाई व्यवस्था सहित) के लिए प्रति बिस्तर 340 लीटर पानी प्रतिदिन।
3. होटल के लिए प्रति बिस्तर 180 लीटर पानी प्रतिदिन।
4. छात्रावास के लिए प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन।
5. नर्सों के निवास एवं अस्पतालीय आवास के लिए हर दिन प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी
6. जलपान गृह के लिए हर टेबिल के लिए 70 लीटर पानी प्रतिदिन।
7. हवाई अड्डे और बंदरगाह पर प्रति व्यक्ति 70 लीटर पानी प्रतिदिन।
8. मेल और एक्सप्रेस हाल्ट वाले रेलवे स्टेशन, जंक्शन एवं बस स्टाप के लिए प्रति व्यक्ति 70 लीटर पानी प्रतिदिन।
9. छोटे स्टेशनों और जहां रेलमार्ग खत्म होता है, प्रति व्यक्ति 45 लीटर पानी प्रतिदिन।
10. स्कूल एवं कॉलेज के लिए प्रति व्यक्ति 45 लीटर पानी प्रतिदिन।
11. कार्यालय के लिए प्रति व्यक्ति 45 लीटर पानी प्रतिदिन।
12. फैक्टरी के लिए प्रति व्यक्ति 45 लीटर पानी प्रतिदिन।
13. बिना बाथरूम वाली फैक्टरी के लिए हर दिन प्रति व्यक्ति 30 लीटर पानी।
14. सिनेमा, मनोरंजन एवं नाट्य गृहों में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 15 लीटर पानी।

इंडियन वाटर रिर्सोसेज सोसाइटी (आईडब्ल्यूआरएस) के थीम पेपर आन इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट (2002 पेज 32 एवं 33) के अनुसार अहमदाबाद नगर निगम 142 लीटर, बेंगलुरु नगर निगम 153 लीटर, दिल्ली महानगर पालिका 253 लीटर, मुंबई महानगर पालिका 272 लीटर, हैदराबाद महानगर पालिका 171 लीटर, कोलकाता महानगर पालिका 179 लीटर, चेन्नई महानगर पालिका 107 लीटर, भोपाल नगर निगम 188 लीटर, और पुणे महानगर पालिका अपने हर नागरिक को प्रतिदिन 297 लीटर पानी उपलब्ध कराती है।

आईडब्ल्यूआरएस के अनुसार बेल्जियम में 140 लीटर, आस्ट्रिया में 155 लीटर, डेनमार्क में 160, फ्रांस में 150, जर्मनी में 135, इरीलैंड में 170 और इंग्लैंड में हर नागरिक को प्रतिदिन 175 लीटर पानी उपलबध कराया जाता है।

उल्लेखनीय है कि भारत और इन देशों में मल साफ करने की आदत के फर्क के कारण पानी के खर्च में अंतर रहेगा। इन आंकड़ों की तुलना से जाहिर है कि भारत में प्रदाय किया जा रहा पानी विदेशी मानकों से मिलता-जुलता है। भारत के महानगरों, नगरों और कस्बों में स्वच्छता के बेहतर मानक अपनाने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, इसलिए आने वाले सालों में पानी की उपलब्धता को कई गुना बढ़ाना होगा। पर क्या इस मॉडल पर काम करने के लिए आवश्यक पानी जुटाया जा सकेगा?

आबादी बढ़ने और जीवनशैली के बदलावों के कारण भविष्य में यह चुनौती बढ़ेगी। इस कारण मानव मल निपटान के लिए सूखी विधि और अन्य अपशिष्टों के निपटान के लिए परिष्कृत मॉडल एवं विधियों को विकसित करना होगा। इन अपशिष्टों के निपटान को आय मूलक गतिविधि बनाने के अलावा पानी की फिजूलखर्ची कम करने और पानी की आपूर्ति बढ़ाने पर ध्यान देने की आवश्यकता पड़ेगी। सीवर में बहने वाले मानवीय अपशिष्टों को उनके स्रोत पर निपटाना होगा ताकि वे प्राकृतिक जलचक्र के संपर्क में नहीं आ सकें। समस्या का हल चाहे निजी क्षेत्र की भागीदारी से हो या सरकार की एजेंसी द्वारा, मुद्दे और समस्या अपरिवर्तित रहेंगे। इसलिए जमीनी हकीकत को ध्यान में रखकर जल्दी-से-जल्दी स्थानीय पारिस्थितिकी से मेल खाती टेक्नोलॉजी को विकसित कर अपनाना होगा। यही सोच औद्योगिक कचरे में पाए जाने वाले हानिकारक तत्वों को निपटाने के लिए करना होगा। निजी क्षेत्र की भागीदारी का विरोध होना चाहिए।

पिछले अनुभवों की रोशनी में कहा जा सकता है कि उपर्युक्त प्रमुख बातों की पूर्ति का रिकार्ड अच्छा नहीं है। अनेक बार पानी की पूर्ति अनियमित एवं अंतराल से की जा पाती है। अनुभव बताता है कि जलापूर्ति का अंतराल अनेक सालों में सप्ताह में एक बार तक हो जाता है। बाजार के हाथ में इस व्यवस्था को देने के देशज परिणामों के स्थान पर कतिपय विकासशील देशों के अनुभवों को ध्यान में रखकर ही आगे निर्णय लेना चाहिए।

लेखक का मानना है कि यह व्यवस्था यथासंभव समाज और सरकार के ही हाथ में होना चाहिए। इनकी पूर्ति पर बाजार का अधिकार कालांतर में समाज का अहित ही करेगा। हमने देखा है कि समाज अक्सर बेहतर परिणाम देता है। इसी तरह अरवरी नदी संसद वाले अध्याय में हमने देखा है कि कम पढ़ा समाज नदियों को जिंदा करने, जल संकट से निपटने और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंध का काम बखूबी कर लेता है। इसलिए उस पर विश्वास करने के परिणाम बेहतर होंगे।

मोटे तौर पर उपरोक्त सकल मांग को स्थानीय उपलब्धता के अनुसार विकेन्द्रीकृत कर उचित विकल्पों और संरचनाओं की आयोजना की जा सकती है। जाहिर है, इस पूरी जद्दोजहद में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बरसात के पानी का मांग आधारित विकेन्द्रीकृत संरक्षण प्लानिंग के केन्द्र में रखना होगा। प्रबंधकों की एक आंख जल की पूर्ति पर तो दूसरी आंख नए स्रोत विकसित करने पर होनी चाहिए। इसके साथ ही भूमि उपयोग नियमों में जल स्रोत विकसित करने के लिए भूमि आवंटन जोड़ना होगा। नगरीय जल स्रोत के कैचमेंट और भूजल रीचार्ज एरिया की पहचान करना होगा। इन चिन्हित क्षेत्रों को प्रदूषण से बचाना होगा।

पानी की गुणवत्ता के संदर्भ में समग्र जल प्रबंध की बिल्कुल नई सोच जिसका सीधा-सीधा संबंध, प्राकृतिक इको-सिस्टम और हमारी जीवनशैली से होगा, विकसित कर लागू करना होगा और साफ पानी की उपर्युक्त समझ को जीवनशैली, भविष्य की दिशा और जलनीति का दृष्टिबोध बनाना होगा। संक्षेप में, देश के कानून, जलनीति और संविधान के प्रावधानों में परिवर्तन के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है। सरकार द्वारा पानी को समाज की धरोहर मानने, समाज ही पानी का जिम्मेदार और अधिकृत संरक्षक है इसे स्वीकारने की जरूरत है। समाज को समानता के आधार पर पानी के न्यायोचित बंटवारे के अधिकार को सौंपने की आवश्यकता है।

वे लोग, जो इस बात से असहमत हैं उन्हें याद होगा कि हमारे संविधान ने समाज को देश और राज्यों की सरकार को बेदखल करने का अधिकार दिया है। प्रजातंत्र में प्रजा सर्वोपरि है, उसके अधिकारों को कम करना या उनकी अनदेखी करना दुर्भाग्यपूर्ण और गैरजरूरी है। इसलिए असली जरूरत असरकारी कदम उठाने, लोगों में विश्वास जताने और प्रत्यक्ष प्रजातांत्रिक ढांचों को अधिक संपन्न बनाने की है।

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About the author

.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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