खाद्य सुरक्षा के लिए जल संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता

Submitted by admin on Wed, 06/25/2014 - 10:46
Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान की पत्रिका 'जल चेतना', जुलाई 2013

भूजल अति दोहन प्रक्रिया के कारण भारत के विभिन्न क्षेत्रों जैसे पंजाब व हरियाणा के कुछ भाग, दक्षिणी राजस्थान, उत्तरी गुजरात व तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र में भूजल के स्तर में काफी गिरावट दर्ज की गई है। भूजल का स्तर 1 मीटर ऊपर उठता है तो प्रति घंटा 0.4 किलो वाट ऊर्जा की बचत हो जाती है। इसी प्रकार यदि भूजल के स्तर में 1 मीटर की गिरावट होती है तो उतनी ही अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के अधिकतर क्षेत्रों में भूजल के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। अर्थात् सिंचाई के लिए अधिक ऊर्जा का व्यय होता है जो कि मूलरूप से अधिक धन व्यय का सूचक है। हाल ही में भारत सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘खाद्य सुरक्षा विधेयक’ को कैबिनेट से पारित कराया। इस विधेयक के अंतर्गत सरकार द्वारा देश के लगभग 63 प्रतिशत लोगों को सस्ती दरों पर अनाज देने का प्रस्ताव है। इस प्रकार की परियोजना को सफल बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्नों की उपलब्धता अति आवश्यक है।

1960 के दशक के बाद प्रथम हरित क्रांति, अधिक उपज वाली किस्में, पर्याप्त मात्रा में रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता तथा उपयोगिता व कृषि में वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग कर खाद्यान्नों की उत्पादकता में आत्म निर्भर होने की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था। परंतु लगातार बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन, सीमित भूमि संसाधन तथा अधिक से अधिक जल की आवश्यकता इस वृद्धि में अवरोध पैदा करते जा रहे हैं।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों से भारत खाद्यान्नों के उत्पाद में निरंतर वृद्धि दर्ज कर रहा है। परंतु भारत जैसे विकासशील देश के लिए खाद्यान्नों के उत्पादन में निरंतर वृद्धि बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस संदर्भ में उपलब्ध आंकड़ों व जानकारी के आधार पर एक विश्लेषण किया गया है जो यह दर्शाता है कि खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिए जल संसाधनों का प्रबंधन अति आवश्यक है।

भारत विश्व में दूसरा सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है जिसकी अधिकतर आबादी की जीविका कृषि या कृषि से संबंधित संसाधनों पर निर्भर है। हालांकि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान बहुत कम है। परंतु इतनी बड़ी जनसंख्या के पोषण के लिए कृषि पर ही निर्भर होना पड़ता है।

लगातार जनसंख्या वृद्धि के मद्देनजर, खाद्यान्नों का अधिक से अधिक उत्पादन एक जटिल कार्य है जो कि उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बनाता है। प्राप्त आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कृषि योग्य भूमि संसाधनों का विस्तार बहुत ही सीमित है। अतः जल संसाधन ही एक मात्र विकल्प बचता है जिस पर विशेष ध्यान केंद्रित कर इस कार्य में सफलता अर्जित की जा सकती है।

जनसमुदाय में यह धारणा रहती है कि जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिसके फलस्वरूप इस संसाधन का बहुत दुरुपयोग हुआ है। भूजल के अति दोहन से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि जल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। वह समय दूर नहीं जब जल के अभाव में खाद्यान्नों के उत्पादन को लेकर एक विकट समस्या पैदा हो जाएगी। ऐसी विकट स्थिति से बचने के लिए उपलब्ध जल संसाधनों का प्रबंधन अति आवश्यक है। इस विषय में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी प्रस्तुत किए गए हैं जिनको अपनाकर खाद्यान्नों के उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

जनसंख्या वृद्धि


सन् 2011 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार, भारत की जनसंख्या 1.21 अरब हो गई है, जो विश्व की जनसंख्या का 17.31 प्रतिशत है। भूमि क्षेत्रफल में भारत विश्व क्षेत्रफल का केवल 2.4 प्रतिशत है। हालांकि पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी दर्ज की गई है फिर भी सन् 2030 में भारत विश्व स्तर पर जनसंख्या के क्षेत्र में प्रथम स्थान प्राप्त कर लेगा। भारत में तीव्र जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न कारण हैं जिसमें गरीबी, निरक्षरता व उच्च प्रजनन दर आदि मुख्य हैं।

सन् 1956-57 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल बुआई क्षेत्रफल 130.85 मिलियन हेक्टेयर था जो कि सन् 2007-08 में 140.86 मिलियन हेक्टेयर हो गया था। इस प्रकार 50 वर्षों में, बुआई क्षेत्रफल में, लगभग 7.65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जबकि 1951 से 2011 के दौरान जनसंख्या में यह वृद्धि 235 प्रतिशत आंकी गई हैं। अतः बुआई क्षेत्रफल वृद्धि दर व जनसंख्या वृद्धि दर में बहुत अधिक अंतर है जिसके फलस्वरूप उपलब्ध संसाधनों की क्षमता का अधिक से अधिक उपयोग करके ही खाद्यान्नों की आपूर्ति की जा सकती है।

खाद्यान्नों के उत्पादन में जल संसाधनों की भूमिका


सन् 2011-12 में भारत ने 252.56 मिलियन टन खाद्यान्नों का उत्पादन कर एक नई उपलब्धि हासिल की है जो कि सन् 1950-51 के आंकड़ों के आधार से 396 प्रतिशत अधिक है। भारत में खाद्यान्नों की सूची में गेंहूं, चावल, दालें व पोरस अनाज अर्थात ज्वार, मक्का, व बाजरा आदि मुख्य हैं।

1980 के दशक से खाद्यान्नों के उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है जिसके लिए अधिक उपजाऊ बीज, प्रभावी उर्वरकों द्वारा फसलों का पोषण व उपयुक्त मात्रा में सिंचाई जल की उपलब्धता मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। भारत में जैसे-जैसे सिंचाई क्षेत्रफल में वृद्धि हुई है वैसे-वैसे ही खाद्यान्नों के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। अतः खाद्यान्नों के उत्पादन व सिंचाई क्षेत्रफल में समानांतर वृद्धि से यह सिद्ध होता है कि खाद्यान्नों के उत्पादन में जल संसाधनों का महत्वपूर्ण योगदान है।

खाद्यान्नों के उत्पादन में जल संसाधनों की भूमिका को इस प्रकार भी दर्शाया जा सकता है कि सिंचाई क्षेत्रफल में निरंतर वृद्धि के कारण खाद्यान्नों की उत्पादन दर में भी निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार, 1950-51 से 2007-08 तक खाद्यान्नों की उत्पादन दर में 522 से 1860 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक का सुधार दर्ज किया गया है अतः खाद्यान्नों के उत्पादन में जल संसाधनों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।

खाद्यान्नों की मांग व आपूर्ति


यह सर्वविदित है कि जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती है उसी अनुपात में खाद्यान्नों की मांग में भी बढ़ोतरी होती है। ऐसा भी समय था जब भारत को खाद्यान आपूर्ति के लिए विदेशों से आयात करना पड़ता था। परंतु सन् 1980 के पश्चात् से, चाहे विपरीत जलवायु परिस्थिति हो, चाहे बढ़ती आबादी का बोझ हो, भारत खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा हासिल करने में उन्नत किस्म के बीज, उत्तम उर्वरकों व भूमि सिंचाई क्षेत्र में विस्तार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। परंतु निरंतर जनसंख्या वृद्धि के कारण खाद्यान्नों की मांग व आपूर्ति में विस्तृत अंतर आने की पूर्ण संभावनाएं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सन् 2021 तक भारत की जनसंख्या 1.34 अरब होगी जिसके पोषण के लिए लगभग 281.5 मिलियन टन खाद्यान्नों की आवश्यकता होगी।

उपलब्ध संसाधनों की संकीर्णता को ध्यान में रखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भविष्य में अनाजों व दालों की आपूर्ति में कमी होना स्वाभाविक है। इस मांग व आपूर्ति के अंतर को भरने के लिए विभिन्न स्तरों पर अथक प्रयास करने की आवश्यकता है। इस दिशा में यदि बुआई क्षेत्रफल में वृद्धि की बात की जाए तो वहां पर बढ़ोतरी की संभावना बहुत कम है। साथ ही यदि अच्छे बीज व अच्छे उर्वरकों का प्रयोग कर खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि का प्रयास किया जाए तो उसके लिए उचित मात्रा में सिंचाई जल की उपलब्धता अति आवश्यक है। अतः खाद्यान्नों की आपूर्ति में आत्मनिर्भर होने के लिए सिंचाई जल की उपलब्धता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

जल संसाधनों का उचित उपयोग


खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार विश्व में कुल जल प्रयोग का 70 प्रतिशत कृषि के लिए 11 प्रतिशत नगरपालिका अर्थात् पीने व अन्य मानवीय क्रियाओं के लिए तथा 19 प्रतिशत औद्योगिक विकास के लिए उपयोग में लाया जाता है। परंतु भारत इस अंतरराष्ट्रीय चलन का पालन न कर कृषि क्षेत्र में बहुत अधिक जल का प्रयोग कर रहा है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, भारत ने सन् 1990 में कृषि के लिए कुल जल प्रयोग का 87 प्रतिशत (437 बिलियन क्यूबिक मीटर), व सन् 2000 व 2010 में 85 प्रतिशत प्रयोग किया है। एक विदेशी संस्था के आंकलन के अनुसार भारत में सन् 2030 तक कृषि के लिए 1198 बिलियन क्यूबिक मीटर जल की आवश्यकता होगी जो कि कुल जल प्रयोग इस प्रकार का 80 प्रतिशत अंश है।

सिंचाई के लिए जल की यह पूर्वानुमानित मात्रा उस समय उपलब्ध जल की मात्रा से कम होगी। अतः यह एक चिंता का विषय है। अधिक जल प्रयोग का एक विशेष कारण यह भी है कि किसान समुदाय प्रायः अधिक जल से सिंचाई (फ्लड इरिगेशन) विधि का विस्तार रूप में प्रयोग करते हैं जिसके कारण अधिक जल का प्रयोग होता है साथ ही उस का बहुत बड़ा हिस्सा बिना उपयोग के नष्ट हो जाता है और भूमि व जल प्रदूषण का कारण बनता है।

भारत में सिंचाई के दो प्रमुख स्रोत है: सतही जल व भूजल। चूंकि सतही जल के विस्तार की संभावनाएं लगभग नगण्य हैं, अतः भूमि सिंचाई क्षेत्रफल में वृद्धि का प्रमुख स्रोत केवल भूजल है। अर्थात विशाल क्षेत्रफल को सिंचित करने के लिए लाखों नलकूपों का निर्माण किया गया है जो मूलरूप से भूजल दोहन का कारण है तथा जिसके फलस्वरूप भूजल स्तर में निरंतर गिरावट दर्ज की गई है। उत्तरी भारत में खाद्यान्नों की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार कुछ राज्य जैसे, पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भूजल की निकासी काफी अधिक है। यही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों में भी भूजल संभरण व निकासी में काफी अंतर है।

एक आकलन के अनुसार यदि भूजल संरक्षण के उचित कदम नहीं उठाए गए तो, सन् 2030 में कुछ बड़ी नदियों के बेसिन, जैसे गंगा, कृष्णा व सिंधु नदी का कुछ हिस्सा, के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जल संकट उत्पन्न होने की पूरी संभावनाएं हैं। एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार भारत का 29 प्रतिशत भूजल अल्प दोहन या अति दोहन क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। बाकी क्षेत्रों की स्थिति भी इस प्रकार के संकट का आभास कराती है। कुछ क्षेत्रों में भूजल के स्तर में भारी गिरावट के कारण खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी की आशंका जताई गई हैं।

सिंचाई जल पर बढ़ता खर्च


भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि या कृषि से संबंधित व्यवसाय से जुड़ी हुई है। कृषि में सिंचाई जल का बड़ा महत्व है अतः प्रलोभन के रूप में कृषि के लिए निःशुल्क बिजली का एलान कर दिया जाता है और किसानों को ऐसा महसूस होता है कि सिंचाई जल मुफ्त में मिल रहा है जिसके फलस्वरूप अधिक-से-अधिक भूजल का दोहन होना स्वाभाविक है।

भूजल अति दोहन प्रक्रिया के कारण भारत के विभिन्न क्षेत्रों जैसे पंजाब व हरियाणा के कुछ भाग, दक्षिणी राजस्थान, उत्तरी गुजरात व तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र में भूजल के स्तर में काफी गिरावट दर्ज की गई है। अतः इन क्षेत्रों में मात्र नलकूप लगवाना ही काफी खर्चे का सौदा बन गया है।

पिछले कुछ दशकों की तुलना में भारत में छोटे किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है। अतः लगभग हर क्षेत्र में कुछ ऐसे किसान भी होते हैं जिनके खेतों में बिजली की सुविधा नहीं होती। ऐसी स्थिति में किसानों को डीजल द्वारा चालित उपकरणों का इस्तेमाल करना पड़ता है। चूंकि डीजल के दामों में लगातार वृद्धि होती जा रही है व भूजल स्तर में भी निरंतर गिरावट दर्ज हो रही है, अतः ऐसी स्थिति में फसलों की सिंचाई पर काफी खर्च हो जाता है।

जल संसाधन मंत्रालय के एक आंकलन के अनुसार यदि भूजल का स्तर 1 मीटर ऊपर उठता है तो प्रति घंटा 0.4 किलो वाट ऊर्जा की बचत हो जाती है। इसी प्रकार यदि भूजल के स्तर में 1 मीटर की गिरावट होती है तो उतनी ही अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के अधिकतर क्षेत्रों में भूजल के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। अर्थात् सिंचाई के लिए अधिक ऊर्जा का व्यय होता है जोकि मूलरूप से अधिक धन व्यय का सूचक है।

कृषि में जल उपयोग दक्षता की अत्यावश्यकता


कृषि क्षेत्र में जल संसाधन प्रबंधन को कार्यान्वित करने के लिए जल उपयोग दक्षता का अमल में लाना अति आवश्यक है। इस प्रक्रिया का प्रभावी रूप से उपयोग कर बहुत से देशों ने अधिक उपज लेने के साथ-साथ अपने जल संसाधनों का भी संरक्षण कर लिया है।

यदि चीन का ही उदाहरण लें, जो कि संसार में सबसे अधिक खाद्यान्नों का उत्पादन करता है, तो यह विदित होता है कि चीन ने अपने जल संसाधनों का उपयोग अधिक दक्षता से किया है। जैसा कि तालिका 1 में दर्शाया गया है कि भारत की तुलना में चीन ने सन् 2005 में कृषि के लिए कुल जल प्रयोग का केवल 64 प्रतिशत (358 बिलियन क्यूबिक मीटर) ही उपयोग किया है। एक पूर्वानुमान के अनुसार, चीन को सन् 2030 तक कृषि के लिए 417 बिलियन क्यूबिक मीटर जल की आवश्यकता होगी जो कि कुल जल प्रयोग का केवल 51 प्रतिशत है। यही नहीं, कम जल प्रयोग के साथ-साथ चीन खाद्यान्नों की उत्पादकता में भी काफी आगे है।

चीन को यह उपलब्धि सरकार की उचित नीतियों व फसलों के लिए उचित जल उपयोग दक्षता द्वारा जल संसाधन प्रबंधन को प्राथमिकता देकर ही हासिल हो सकी है। अतः कृषि क्षेत्र में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के विभिन्न प्रभावी उपायों को कार्यान्वित करने की आवश्यकता है। परंतु सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए जल व भूमि संसाधनों की संयुक्त प्रबंधन प्रणाली को अपनाकर ही यह उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है।

उपरोक्त विश्लेषण यह दर्शाता है कि खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि के लिए अधिक उपज वाली किस्में व बेहतर वैज्ञानिक पद्धतियों के अलावा जल संसाधनों के उचित प्रबंधन की अति आवश्यकता है। जल संसाधन प्रबंधन द्वारा उन क्षेत्रों में सिंचाई जल उपलब्ध कराने के प्रयास करने चाहिए जहां फसलों के लिए अधिक जल की आवश्यकता है।

देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में जल उपलब्धता के आधार पर ही फसलों की बुआई का समय व फसलों के प्रकार का चयन आवश्यकतानुसार करना चाहिए। इस प्रकार के सामंजस्य से जल अभाव की स्थिति के विपरीत प्रभाव को भी कम किया जा सकता है।

जैसा कि पहले भी वर्णन किया गया है कि सिंचाई जल की मांग व उपलब्धता में अंतर के कारण भूजल दोहन की प्रक्रिया में तेजी आ गई है जिसके फलस्वरूप भूजल स्तर में निरंतर गिरावट के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक विकास पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः जल संसाधन प्रंबधन के प्रभावी व दक्ष समाधान के लिए सामाजिक-आर्थिक विकास को ध्यान में रख कर प्रयास करने की आवश्यकता है। सभी विकास की योजनाएं जल संरक्षण, सिंचाई जल उपयोग दक्षता, जल का कम से कम अपव्यय व जल की गुणवत्ता के संरक्षण को ध्यान में रख कर सुयोजित व प्रभावी ढंग से कार्यान्वित की जाए।

भूजल संभरण प्रक्रिया को प्राथमिकता देकर अति भूजल दोहन वाले क्षेत्रों में उचित फसल चक्र द्वारा जल संरक्षण योजनाओं का विस्तार कर भूजल स्तर में निरंतर गिरावट को रोका जा सकता है। कुछ सरकारी योजनाएं, जिनमें किसानों को सिंचाई हेतु निःशुल्क विद्युत खर्च का प्रस्ताव होता है, पर अंकुश लगाकर अति भूजल दोहन को नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार की योजनाओं पर अंकुश लगाने से भूजल के अधिक अपव्यय व विवेकहीन प्रयोग को नियंत्रित करने में प्रोत्साहन मिलता है।

सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों के प्रबंधकों व योजनाकारों के लिए यह उचित समय है कि जल संरक्षण व प्रबंधन के लिए दक्ष, प्रभावी व अभिनव योजनाओं को जनता के समक्ष प्रस्तुत करें। साथ ही इस प्रकार की परियोजनाओं में जन समुदाय को प्रभावी रूप से सम्मिलित कर भारत को खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है।

तालिका – 1 : भारत व चीन का वार्षिक जल उपयोग व आवश्यकता (बीसीएम-बिलियन क्यूबिक मीटर)
 

भारत (वर्ष)

   

चीन (वर्ष)

    

जल उपयोग (बीसीएम)

1990

2000

2010

2030

1980

1993

1997

2005

2030

कुल

502

634

813

1498

444

519

557

563

818

कृषि में उपयोग

437

541

688

1198

370

383

392

358

417

उपयोग प्रतिशत

87

85

85

80

83

74

70

64

51

 



संपर्क
डॉ. सुनील कुमार त्यागी एवं रवींद्र सिंह, कृषि भौतिकी संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली 110012

ईमेल : sktygi@iari.res.in

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