प्रदूषण और प्राणी हिंसा

Submitted by admin on Fri, 06/27/2014 - 10:27
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पर्यावरण विमर्श

वनों के विनाश की वजह से जैव-विविधता नष्ट हो रही हैं, अनेक वनस्पतियों के साथ पशु-पक्षियों की कीट-पतंगों की प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं। हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि सुबह-सुबह कौओं की कांव-कांव और चिड़ियों की चहचहाहट गांवों में भी कम ही सुनाई पड़ती है, शहरों में तो सफाया हो चुका है। वसंत ऋतु कोयल की कूक से पहचानी जाती थी, परंतु अब इस ऋतु के स्वागत को कोयल नहीं है। इसी तरह भारत में साल-दर-साल बाजों, चीलों, गिद्धों, गौरेयों इत्यादि प्रकृति के दोस्त पक्षी दिखाई देना बंद होते जा रहे हैं।

आज दुनिया में युद्ध की भयावहता से भी अधिक खतरा पर्यावरण-प्रदूषण का है। जिस धरती ने मनुष्य को जन्म दिया, वहीं मनुष्य इस धरती को खा जाना चाह रहा है। यानी जिस डाल पर वह बैठा है, उसे ही काट रहा है। धन्य है ऐस बौद्धिकता, धन्य है ऐसा ज्ञान, ऐसा विज्ञान। दरअसल प्रकृति जो हमारी मित्र होनी चाहिए थी, उसे दुश्मन मानकर उसके विरुद्ध जाकर विकास का दंभ भरा जा रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग, हिमयुग, जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, मिट्टी-प्रदूषण इत्यादि यानी प्रदूषण से ग्रस्त हो चुकी पृथ्वी हमारे विचार-प्रदूषण का ही नतीजा है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान हमारी शिक्षा-पद्धति के प्रदूषित होने के कारण है। अपरिग्रह, संयम, प्रेम, दया, करुणा, अनुशासन की जगह भोग-विलास, उपभोक्तावादी संस्कृति और अहंकारी प्रवृत्ति का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

भगवान् महावीर (जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर) ने दुनिया को ‘जियो और जीने दो’ का संदेश देकर प्राणिमात्र के प्रति दया और करुणा का सार हमें दिया था। उनके पांच व्रतों में अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य हमें सुखी, स्वस्थ और शांतिमय जीवन जीने की कला सिखाते हैं। इसके उलट हम देखते हैं कि मनुष्य का इतर प्राणियों से, वनस्पतियों से, सहयोग और समन्वय खत्म होकर उपभोक्तावादी दृष्टिकोण हो गया है। वह अपने भोगों को तृप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार से प्राणियों का वध कर रहा है।

वन्य जीवों का शिकार


मनुष्य अपनी वीरता और मनोरंजन के लिए शिकार करता है, इनमें आते हैं – शेर, चीता, तेंदुआ, रीछ, भेड़िया जैसे हिंसक जानवर, जिनको मारकर स्वयं एवं अपने परिवार की वीरता का दंभ भरता है। इन प्राणियों की खाल एवं शारीरिक अंगों को अपने ड्राइंगरूम में, भवन में सजाकर रखने में शान समझता है।

आज हालात यह हो गए हैं कि पूरी दुनिया में मात्र 3200 शेर बचे हैं, भारत में यह संख्या केवल 1400 शेष है। अब सराकरें एक अभियान चलाकर इस संख्या की कमी को रोकना चाह रही हैं। विभिन्न अभ्यारण्य एवं नेशनल पार्कों के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं। परंतु इसे रोक पाना असंभव हो गया है। यह संदेहास्पद है, क्योंकि जब तक विचारों में परिवर्तन नहीं आएगा, ऐसा होना असंभव है। दुनिया के शक्तिशाली और हिंसक प्राणी का क्या हाल मनुष्य ने कर डाला है सोचिए हम क्या हैं? कैसे हैं?

जंगलों का सफाया होने से वन के अहिंसक प्राणियों में हिरण, सांभर, हाथी, खरगोश, बंदर, इत्यादि के रहने और जीवनयापन का जरिया खत्म हो गया है। हाथी और बंदर तो आजकल अपने दाना-पानी के लिए शहरों में भी उत्पात मचा रहे हैं, जिसके कारण रोज घटनाएं घटती रहती हैं। वहीं स्वाद के लोभियों ने इन प्राणियों को अपना शिकार बना डाला है।

अब यह मात्र अभ्यारण्यों की शोभा की वस्तु बनकर रह गए हैं, जो सुरक्षा कर्मियों की दया पर जीवनयापन करते हैं, जीवित रहते हैं। वनों के विनाश की वजह से जैव-विविधता नष्ट हो रही हैं, अनेक वनस्पतियों के साथ पशु-पक्षियों की कीट-पतंगों की प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं। हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि सुबह-सुबह कौओं की कांव-कांव और चिड़ियों की चहचहाहट गांवों में भी कम ही सुनाई पड़ती है, शहरों में तो सफाया हो चुका है।

वसंत ऋतु कोयल की कूक से पहचानी जाती थी, परंतु अब इस ऋतु के स्वागत को कोयल नहीं है। इसी तरह भारत में साल-दर-साल बाजों, चीलों, गिद्धों, गौरेयों इत्यादि प्रकृति के दोस्त पक्षी दिखाई देना बंद होते जा रहे हैं। यह सब प्रकृति के सफाई परिंदे कहलाते हैं। निरंतर बढ़ते जा रहे औद्योगिक कल-कारखानों ने वनों को लीलकर वनस्पति एवं प्राणी-जगत् को हिंसा को दावानल में ढकेल दिया है एवं पर्यावरण को चौतरफा प्रदूषित करने का बीड़ा उठा रखा है। अंततः यह प्रदूषित वातावरण मानव को भी उसी तरह मौत के मुंह में ले जाएगा।

फैशन एवं सौंदर्य हेतु प्राणी हिंसा


मनुष्य अपने को खूबसूरत दिखाने के लिए जाने-अनजाने अनेक सौंदर्य प्रसाधनों और फैशन की वस्तुओं के बनाने में भी अनेक जीवों की हत्या कर रहा है – जैसे फर की टोपी पहनते हुए मनुष्य शायद यह नहीं जानता कि यह कराकुल मेमने को भेड़ के गर्भ से ज़बरदस्ती निकालकर उसकी खाल से बनी है। उसी भांति, वह यह भी नहीं जानता कि कई शैंपू, आफ्टर शेव लोशन आदि सौंदर्य-प्रसाधनों की जांच के लिए खरगोशों पर क्या-क्या निर्दय प्रयोग होते हैं।

अहिंसा भारत लगभग पर्याय शब्द रहे हैं, आज की बात अलग है। प्रदूषण प्रच्छन्न हिंसा है, इसमें जो लोग भागीदार हैं, वे जाने-अनजाने हिंसक हैं। हम जो वस्त्र पहनते हैं, उनमें कहां, कौन-से निरीह प्राणी ने अपनी सांस तोड़ी, इसका एहसास हम नहीं कर पाते। रेशम के एक मीटर कपड़े में कितने रेशम-कीटों का मरघट है, इसे शायद हम नहीं जानते। हम ऐलोपैथिक दवाई लेते हैं, किंतु नहीं जानते कि कितने निरीह जीवों की जान लेकर वह अस्तित्व में आई है। यह कौन-सा न्याय है कि कईयों के प्राण लेकर हम अपने शौक पूरे करें, अपने प्राणों की रक्षा करें।

मांसाहार के लिए प्राणी हिंसा

दुनिया में सबसे अधिक प्राणि हिंसा होती है, मनुष्य के स्वाद के लिए। हम भारतीय इस बात को जानते हैं कि जीवन एक निरंतर प्रक्रिया है, हमारा चोला बदलता रहता है, परंतु आत्मतत्व वही रहता है। ‘जैसी करनी, वैसी भरनी’। निश्चित ही मांसाहार ऐसा पाप है, जिसे व्यक्ति जानबूझकर करता है। वैज्ञानिक तथ्य भी है कि क्रिया की प्रतिक्रिया बराबर परिमाण में होगी ही। यदि हम आज किसी प्राणी का मांस-भक्षण करते हैं तो निश्चित मानिए इन्हीं परिस्थितियों से हमें भी गुजरना पड़ेगा और ये परिस्थितियां कितनी भयावह और दुःखदायी होंगी? यह समझा जा सकता है कि यदि आपके शरीर में एक खरोंच भी आ जाती है, तो कितनी पीड़ा का अनुभव होता है।

मांसाहारी बंधुओं, आप एक बार बूचड़खाने में जाकर पशुओं को अवश्य देखें, कैसे-कैसे त्रास और यंत्रणापूर्वक इन्हें कत्ल किया जाता है। देखें उन मूक प्राणियों के चेहरे के भावों को स्वयं की आंखों से। जो देश, पेड़-पौधों को प्रणाम करता रहा हो, अतीत में समृद्ध रहा हो, उसमें कभी दूध की नदियां बहीं हों, वही आज अनेक प्रकार की आपदाओं, व्याधियों एवं अभाव की स्थिति से त्रस्त है। अहिंसा हमारे विकास का अपरिहार्य सुफल रही है। पर्यावरण-प्रदूषण हिंसा की देन है, अहिंसा प्रदूषण मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय है।

भारत में सबसे पहला कत्लखाना कलकत्ता में अंग्रेजों ने शुरू किया था। आज भारत के लगभग 2 नगरों में आधुनिक स्तर पर पशुबंध-स्थल बनाए गए है, जहां प्रतिदिन लाखों पशुओं का वध किया जाता है। इससे उन नगर की नगरपालिकाओं को लाखों रूपए कर के रूप में प्राप्त होते हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में 10 करोड़ पालतू पशु प्रति वर्ष काटे जा रहे हैं।

एक अनुमान के प्राप्ति अनुसार स्वतंत्रता के समय भारत का पशु-धन 80 लाख से 9 करोड़ के लगभग था। आज यह घटकर 15 लाख के आस-पास रह गया है। यह हमारे धर्म-प्रधान देश की सरकारों और नागरिकों का प्राणी हिंसा का विकास है। इसके अलावा मुर्गे-मुर्गियों, बत्तख, खरगोश, हिरण, भेड़, ऊंट, सूअर इत्यादि तथा पक्षियों की असंख्य प्रजातियों एवं मछलियों की तो गिनती करना ही संभव नहीं, असंख्यात ही कही जा सकती है।

मजे की बात तो यह कि इन शासकीय कत्लखानों को सरकार की ओर से एक लाख करोड़ की सब्सिडी देकर देश का आर्थिक नुकसान भी किया जा रहा है। आप जानते होंगे कि सन् 1857 की क्रांति का प्रारंभ का प्रारंभ कारतूसों की कैप को गाय के चमड़े से बनाए जाने को लकेर ही मगल पांडे के आह्वान पर हुआ था, आज वही भारत असंख्य प्राणियों के मांस का स्वाद लेने और अपने पेट को कब्रगाह बनाने को आतुर है, अत्यंत शर्मिंगदी का विषय है।

इन निरीह प्राणियों की दर्दनाक चीख-पुकार, उनकी कोई मायने नहीं रखती? ऐसा नहीं कि उनकी संपूर्ण वातावरण प्रभावित होता है। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के भौतिक शास्त्री प्रो. मदनमोहन ने अपने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है कि जितने अधिक प्राणियों का कत्ल किया जाएगा, उतने अधिक भूकंप व सुनामी आएंगे। अतः जलवायु परिवर्तन में प्राणी हिंसा एक बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता है। प्राणियों के वध व मांसाहार के कारण अनेक तरह के रोग जैसे- दिल का दौरा, कैंसर, ब्लडप्रेशर, मोटापा, गठिया, गुर्दे के रोग एवं जिगर की बीमारी जैसे असाध्य रोगों की अधिकता होती है, यहां तक कि जीव-हत्या के प्रभाव से मनुष्यों में ‘विकलांगता’ बढ़ी है।

दुनिया में ऐसे भी लोग हुए हैं, जो जानवरों की जगह नर-मांस पसंद करते थे। युगांडा का राष्ट्रपति इदी अमीन तो नरभक्षी के रूप में विख्यात था। चीन में तो अब मानव-भ्रूण को भूनकर खाने का रिवाज बनता जा रहा है। चीन में कौवों की प्रजाति ही समाप्त कर दी गई है। प्राणी वध का कचरा मसलन-खून, हड्डियां, चमड़ी इत्यादि को नदी नालों में प्रवाहित कर दिया जाता है, जिससे जल प्रदूषित हो रहा है। यदि जमीन पर कचरे के रूप में फेंक दिया जाता है तो अनेक कीटाणुओं की उत्पत्ति होकर वायु एवं भूमि प्रदूषण में बढ़ोतरी सीधे तौर पर प्राणी हिंसा से जुड़ी है।

प्राणियों में समन्वय


ईश्वर ने जगत् की रचना में प्रत्येक प्राणी की उपयोगिता एवं एक-दूसरे के प्रति समन्वय व सहयोग का जामा पहनाया है, तभी तो राजस्थान के गड़रियों के बारे में लोकोक्ति है कि ये भेड़े पालते हैं, परंतु भेड़ें ही इन्हें पालती हैं, क्योंकि उनसे प्राप्त दूध, घी, ऊन के व्यापार से इनकी जीविका चलती है। भेड़ का दूध तो फेफड़ों के वंशानुगत रोगियों के लिए लाभप्रद है।

एक गाय औसतन 10 किलो दूध रोजाना के हिसाब से वर्ष में 10 महीने दूध देती है, तो वह एक वर्ष में 3000 कि.ग्रा. दूध देकर करीब 6000 लोगों को एक बार तृप्त कर सकती है। यदि वह औसत 15 वर्ष तक दूध दे तो एक गाय अपनी कुल उम्र में 90,000 लोगों को एक बार तृप्त कर सकती है, जबकि उसकी हत्या कर उसके मांस से एक हजार लोग भी तृप्त नहीं हो सकते। इसी तरह एक बैल अपने जीवनकाल में 40,000 कि.ग्रा. अन्न उत्पन्न कर, 1,60,000 लोगों को एक बार तृप्त कर सकता है, इसके अलावा अन्य सेवा में गोबर व मूत्र से ईंधन, खाद व गैस ऊर्जा की अतिरिक्त प्राप्ति।

भारत में 48 करोड़ जानवर हैं, यदि जानवर कटना बंद हो जाएं तो सी.एन.जी. गैस (मीथेन गैस) जो ऊर्जा का स्रोत हैं और पेट्रोल डीजल का विकल्प यह हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। इसी तरह मछलियां जल को साफ करने में अहम् भूमिका निभाती हैं। घोड़े, हाथी, ऊंट इत्यादि मनुष्य के वफादार सवारी व परिवहन के साथी रहे हैं। उल्लू जैसा अनावश्यक समझा जाने वाला प्राणी प्रतिदिन दो चूहे ओर फसल नष्ट करने वाले अनेक कीड़े-मकोड़े को खा जाता है, यह कीटनाशकों की तुलना में मुफ्त और आसान उपाय है। इस तरह प्रत्येक पशु-पक्षी प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण हैं। इनकी अनुपस्थिति पर्यावरण प्रदूषण के रूप में हमें ही प्राप्त होगी।

इस तरह हम देखते हैं कि संपूर्ण प्राणी जगत् एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रत्येक के जीवन को एक-दूसरे की जरूरत है, तभी यह सृष्टि प्राकृतिक रूप से लंबे समय तक चल सकती है। अतः प्राणी हिंसा से बचाव ही हमारे पर्यावरण को प्रदूषण से बचा सकता है। महात्मा गांधी ने तो यहां तक कहा था कि “मेरे विचार के अनुसार गौ-रक्षा का सवाल स्वराज्य के प्रश्न से छोटा नहीं है। कई बातों में मैं इसे स्वराज्य के सवाल से भी बड़ा मानता हूं। मेरे नजदीक गौ-वध व मनुष्य-वध एक चीज हैं।”

प्रसिद्ध कवि कोलेरिज ने अपनी कविता ‘दी एनशिएंट मैरीनर’ में जो कहा वह सभी धर्मों का निचोड़ है-

उत्तम पूजा तो उसकी है, जो प्रेम सबी से करता है,
सब छोटे-बड़े जीव जग के, जो अपनी भांति समझता है।
क्योंकि वह परम पिता जिसने जग में सबको उपजाया है,
हर जीव से करता वही स्नेह जैसा वह हमसे करता है।


नूतन कॉलोनी, सरकंडा, बिलासपुर (छ.ग.)

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