भुखमरी के आलम में प्रेरणा का एक शिविर

Submitted by admin on Mon, 06/30/2014 - 15:19
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स्व. ओमप्रकाश रावल स्मृति निधि
खोरा, ठीकरिया, भंडारिया आदि गांवों की तथा पंप लगा देने पर भूरी घाटी के भी लोगों की कम से कम 500-600 एकड़ जमीन को बहुत आसानी से तथा कम खर्च में पानी मिल सकेगा। क्या शीघ्र ही ऐसी सरकार आ सकेगी जो खेत को पानी पिलाने को अपनी जवाबदारियों में सर्वप्रथम समझे? क्या लोग इस बात को गहराई से समझेंगे कि किसान सबके लिए अनाज पैदा करता है। किसी भी लोक कल्याणकारी सरकार का यह सर्वप्रथम कर्तव्य है कि वह गरीब किसानों के लिए मुफ्त पानी का प्रबंध करें। रात के दो बज चुके थे। आदिवासी लड़के और लड़कियां नाच रहे थे, छोटी-छोटी डंडियों पर, जो वे आस-पास से ही काट लाए थे और ढोलक की थाप पर उनकी धीमी लोकराग पर झूमते हुए गा रहे थे-बापी करे मूला तो मति जाओ हाहरे, (सासरे) हाहरे जाओगा थारो हाहरो देगा दखा (दुःख), घर में परणावे तो दौड़ी जाओ हाहारे, बापो करे मूला तो...।

दहेज की अन्यायी प्रथा के विरोध में खड़े होने की प्रेरणा देते हुए युवक जब युवतियों को आग्रह कर रहे थे तुम्हारा बाप यदि तुम्हारा (मूला) मोल करे तो तुम ससुराल मत जाना, लेकिन घर में शादी करे अर्थात मोल नहीं करें तो दौड़ी हुई चले जाना। तब मुझे भी स्फुरण होना स्वाभाविक था, लेकिन उस समय तक मुझे नहीं मालूम था कि यह गीत तथाकथित क्रांतिकारी शहरी गीतों जैसा नहीं था जो सभास्थल के बाद ही भूला दिया जाता है। उससे अधिक ही था।

वहां बैठे हुए बुजुर्गों ने सचमुच कोई संकल्प ले लिया था जिसका सबूत मुझे दूसरे दिन की सभा में मिला जब 38 मुख्य लोगों ने जिनमें पंच, तड़वी आदि थे यह संकल्प दोहराया कि वे अपनी लड़की की शादी में लड़के वाले से दहेज नहीं लेंगे और न दूसरों को लेने देंगे। हमारी परम्परा के ठीक विपरीत भीलों में यह परम्परा प्रचलित है कि लड़के वाला दहेज देता है।

इस प्रथा के रहते मजबूर होकर उन्हें बाजना तहसील में डेढ़ हजार से दो ढाई हजार तक के चांदी के गहने देने पड़ते हैं जो वे साहूकार से उधार लाते हैं। इस तहसील में अनके साहूकार 10 रु. सैकड़ा प्रतिमाह ब्याज ले रहे हैं। इसी के साथ इन लोगों ने यह भी संकल्प लिया कि वे शराब नहीं पिएंगे।

मध्य प्रदेश एवं राजस्थान की सीमा पर बसे ग्राम ठीकरिया में जहां सड़क नहीं है इसलिए कोई मोटर नहीं जाती। यहां करीब 300 लोगों का एक शिविर लगा जिसमें भारतीय लोकदल के कार्यकर्ताओं के अलावा पंच, सरपंच तथा अन्य ग्राम के मुखिया उपस्थित थे।

राजस्थान क्षेत्र के तथा मयोर नामक प्रत्येक क्षेत्र की सात पंचायतें तथा बाजना क्षेत्र की 14 पंचायतें इस तरह कुल 28 पंचायतों के लोग यहां जमा थे। जयप्रकाश के नेतृत्व में मध्य प्रदेश के गांव-गांव में जन आंदोलन को फैलाने की दृष्टि से प्रत्येक पंचायत से एक मुखिया को दो सप्ताह के अंदर-अंदर उसकी पंचायत में जनसंघर्ष समिति बना लेने का कार्य सौंपा गया।

इसी शिविर को संबोधित करते हुए मामा बालेश्वरदयाल ने देश की वर्तमान लड़ाई की महाभारत की लड़ाई से तुलना करते हुए बड़े सटीक ढंग से भीलों के गले उतारा कि एक ग्वाल के लड़के ने पांडवों को रणकौशल सिखाया जिसके बिना वे कौरवों को परास्त करने में असमर्थ रहते।

अश्वत्थामा नामक हाथी को मारकर द्रोणाचार्य को भ्रमित करना कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया है और इस तरह हथियार डलवाना, शाम हो जाने का भ्रम पैदा कर अर्जुन को जयद्रथ के वध में चालाकी से सहायता करना आदि उदाहरणों को बड़े मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बतलाया कि ग्वाल के लड़के ने किस तरह बड़े-बड़े शूरवीर और नीतिशास्त्रियों को लड़ाई का ढंग सिखाया।

इस तरह आदिवासियों ने हीनता के भाव को समाप्त करने का प्रयास करते-करते उनकी मुख मुद्रा बड़ी गंभीर हो गई, जब उन्होंने कहा कि दो तीन साल में इस देश में कोई बड़ा उथल-पुथल होने वाला है और शायद अपनी 70 वर्ष की उम्र का अहसास करते हुए नम्रतापूर्वक बोले कि मैं तो तुम्हारा चौकीदार हूं और इस नाते भविष्य की चेतावनी दे रहा हूं। इसके आगे कुछ नहीं कर सकता।

साथ ही लड़ाई के कौशल पर चर्चा करते-करते जैसे उन्हें यह भी आभास हो गया था कि मेरे जैसे लोग भी श्रोताओं में हैं तो युद्ध का दर्शन निरुपित करते हुए उन्होंने कहा कि यह लड़ाई अब केवल कुराज्य और सुराज्य की नहीं रही है। यह तो अब धर्मयुद्ध हो गई है। चूंकि अब लड़ाई स्वराज्य और परराज्य की हो गई है, राज्य की स्वतंत्रता पर ही अब प्रश्न-चिन्ह लग गया है। क्या हम फिर किसी के गुलाम तो नहीं हो जावेंगे?

चारों और विन्ध्यांचल की पहाड़ियों से घिरा बाजना का यह इलाका पहाड़ी है जिसमें गजब की दुरंगी जमीन मिलती है। एक टुकड़ा काली जमीन का तो दूसरा टुकड़ा लाल जमीन का है। काली जमीन पर कपास बहुत अच्छा हो जाता है। भोजपुर पंचायत के सरपंच श्री औंकार ने बतलाया कि अनेक लोग तो बेचारे मुफलिसी के कारण बीज ही प्राप्त नहीं कर सके, कपास कहां से होता जिन्होंने बोया वे भाग्यशाली रहे।

दस पांच फीसदी गेहूं अथवा चना थोड़ा-सा बो लेते हैं बाकी तो स्यालू फसल पर ही निर्भर करते हैं, जो इस सूखे के कारण नष्ट हो गई और पिछले वर्ष अतिवृष्टि के कारण नष्ट हो गई थी। यही दशा पिछले चार-छः वर्षों से चल रही है। नतीजा यह हुआ है कि लोगों की बकरियां ओर बैल तक बिक गए हैं।

इस इलाके में साधारणतया 15-20 से 30-35 तक बकरियां प्रत्येक घर में रहती थी आज मुश्किल से एक दो बकरी बची है।

इस इलाके के ये भील अपने को उजले मीणा भील कहते हैं। रतलाम तथा आस-पास बसे भीलों को ये काली मीणा कहते हैं तथा इनसे इनका रोटी तथा बेटी व्यवहार भी नहीं है। झाबुआ, अलीराजपुर, जोबट के भीलों से भी नहीं, जिन्हें यह लंगोटिया कहते हैं। होली पर भगोरिया नहीं होता, लेकिन लड़के-लड़कियों के सामूहिक नृत्य होते हैं। जहां तक सरकार के खिलाफ लड़ने का सवाल है सभी भीलों में एकरूपता तथा एक ही जाति दिखाई देती है।

यों यह शिविर कुछ लोगों तक ही सीमित था जो निमंत्रित थे, लेकिन सामान्य आदिवासी भी मामाजी के आगमन का सुनकर आ गए थे। विशेषतः महिलाएं। बिल्कुल नए कड़क पीले अथवा लालरंग के छीट के लुगड़े से अपने चेहरों को छिपाए हुए महिलाओं को देखकर आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कस्बे की सभ्यता का प्रभाव कितनी गहराई तक हुआ है।

शिविर की समाप्ति पर जिस श्रद्धा से लोगों ने मामाजी को नमन किया तथा औरतों ने पत्रम् पुष्पम् भेंट दी उस पर मैं सोचता रहा कि एक तरफ सरकार है जो अनुदान आदि के करोड़ों रूपए खर्च करके तथा बड़ी भारी वैतनिक फौज खड़ी करके भी आदिवासियों को कोई विश्वास प्राप्त नहीं कर सकी। दूसरी तरफ एक साधनहीन व्यक्ति है। जिसके पास हर आदिवासी मर्द-औरत अपने दुःख दर्द में इस तरह दौड़ता हुआ आता है जैसे कोई देवी-देवता का मंदिर हो।

खोरावाला नाला पर नीम का दतौन कर रहा था कि कुछ बच्चों को नाले के समीप एक झिरी से पानी ले जाते हुए देखा। सोचा यह गांव कितना खुशनसीब है कि नजदीक ही पानी मिल जाता है, अन्यथा कई जगह मीलों जाना पड़ता है। दूसरी खुशनसीबी यह है कि यह नाला “जीवता” नाला है अर्थात् बारहों महीने बहता रहता है।

लेकिन बदकिस्मती यह है कि 10-12 वर्ष पूर्व भभरिया नाका पर मलिक कलेक्टर के जमाने में बांध बनाए जाने के लिए जांच पड़ताल हुई थी। हर साल पंचायत प्रस्ताव पास करके भेजती है लेकिन कोई उत्तर नहीं। ‘रिसन’ की जांच के लिए गड्ढे खोदे जाते हैं जो अभी तक नहीं खोदे गए हैं। इससे यह साबित होता है कि शासन ने अभी तक वह आधार ही नहीं बनाया है कि जिस पर वह हां या ना का निर्णय ले सके।

बहरहाल इस इलाके के लोग इसी सपने को संजोए जी रहे हैं कि किसी दिन बांध बंधेगा और इसी तहसील के शिवगढ़ क्षेत्र की तरह वे भी अपने खेतों पर दो फसल उगा सकेंगे। मोटा अनुमान है कि खोरा, ठीकरिया, भंडारिया आदि गांवों की तथा पंप लगा देने पर भूरी घाटी के भी लोगों की कम से कम 500-600 एकड़ जमीन को बहुत आसानी से तथा कम खर्च में पानी मिल सकेगा।

क्या शीघ्र ही ऐसी सरकार आ सकेगी जो खेत को पानी पिलाने को अपनी जवाबदारियों में सर्वप्रथम समझे? क्या लोग इस बात को गहराई से समझेंगे कि किसान सबके लिए अनाज पैदा करता है। किसी भी लोक कल्याणकारी सरकार का यह सर्वप्रथम कर्तव्य है कि वह गरीब किसानों के लिए मुफ्त पानी का प्रबंध करें।

साभार - स्वदेश, 11-4-75, प्रस्तुत लेख 03 फरवरी 1995 में छपी स्व. ओमप्रकाश रावल स्मृति निधि पुस्तक से

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