मुसीबत बढ़ाएगी मानसून की बेरुखी

Submitted by birendrakrgupta on Wed, 07/02/2014 - 12:54
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 2 जुलाई 2014
देश की नई सरकार के सामने बढ़ती महंगाई बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनका नेतृत्व महंगाई को लेकर खासतौर पर चिंतित है। सरकार ने वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाया है। प्रधानमंत्री खुद प्रभावी कदम उठाने के लिए कई दौर की वार्ता कर चुके हैं। पिछले माह के सबसे उच्च दर पर महंगाई पहुंच गई है, जिससे आम आदमी की समस्या बढ़ गयी है।

जब तक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती नहीं मिलती, तब तक सरकार की सब्सिडी समाप्त करने की नीति सर्वहारा और मध्यमवर्ग के लिए घातक साबित होगी। सरकार डीजल पर अभी 35,376 करोड़ और एलपीजी पर 80 करोड़ की सब्सिडी उपलब्ध कराती है। घरेलू रसोई गैस पर सरकार की तरफ से 432.71 रुपए की रियायत मिलती है, जबकि केरोसीन पर यह 32.87 पैसे प्रति लीटर है। इराक पर अतिवादियों के हमले ने इस संकट को और बढ़ा दिया है...हालांकि सरकार ने प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं प्रदेश सरकारों से जमाखारों के खिलाफ विशेष अदालत गठित करने का आदेश दिया है।

30 दिन पुरानी मोदी सरकार के सामने महंगाई नई चुनौती के रूप में है। महंगाई को लेकर विपक्ष ने राजनीति शुरू कर दी है। सरकार अपनी तरफ से इस पर लगाम लगाने के लिए पूरी ईमानदारी से कोशिश कर रही है, लेकिन सरकार की ओर से उठाए गए कदम में सबसे बड़ी बाधा मानसून की बेरुखी बनती दिखती है।

मौसम विभाग ने भी मानसून कमजोर होने की भविष्यवाणी कर दी है। इस स्थिति में महंगाई को नियंत्रित कर पाना सरकार के लिए कठिन चुनौती साबित होगी। मानसून की दगाबाजी सरकार के लिए सबसे बड़ा वायरस साबित होगी।

भारत कृषि पर निर्भर देश है। यहां की 70 फीसदी आबादी कृषि अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। देश में विदर्भ, बुंदेलखंड और दूससे राज्य हैं, जहां मानसून की दगाबाजी और दूसरे कारणों से किसान आत्महत्या को मजबूर होते हैं। इस स्थिति में मानसून की दगाबाजी से सरकार के माथे पर बल पड़ना स्वाभाविक है।

मानसून, महंगाई और अर्थव्यवस्था की कतारबद्ध चुनौतियों से निपटना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। अगर मानसून बेहतर होता, उस स्थिति में कृषि अर्थव्यवस्था सुदृढ़ बनती, जिससे सरकार की चुनौतियां महंगाई पर कम हो जाती। मानसून की दगाबाजी सरकार की इस चुनौती को कई गुना बढ़ा देगी।

सरकार की ओर से आर्थिक सुधार को उठाए गए सरकार के कदम महंगाई को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगे। रेल किराए खासतौर पर माल भाड़े में वृद्धि से खाद्य वस्तुओं की महंगाई और बढ़ेगी। डीजल और पेट्रोल के दामों में वृद्धि का असर भी व्यापक पड़ेगा।

वैज्ञानिकों की माने तो मानसून पर अलनीनों का गहरा प्रभाव पड़ा है। 1875 अब तक 88 बार इसका प्रभाव पड़ा है। 2009 में भी इसके प्रभाव से कम बारिश हुई थी। बरसात न होने से खाद्य उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। किसानों पर कर्ज का बोझ अधिक बढ़ जाएगा। उनकी माली हालत खराब होगी। दूसरी ओर, खाद्य संकट बड़ी चुनौती होगी।

हालांकि देश में अकाल और सूखे की स्थिति में पर्याप्त अनाज भंडारण की सुविधा है, लेकिन प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है।

देश की 70 फीसदी आबादी जहां कृषि से जुड़ी है, वहीं 54 फीसदी कृषि केवल मानसूनी बारिश पर निर्भर है। अगर समय से किसानों के दरवाजे मानसून की दस्तक नहीं हुई तो स्थिति बुरी हो जाएगी। मौसम और मानसून का आलम यह है कि केवल 20 फीसदी हस्सों में ही सामान्य बरसात हुई है।

सूखा, महंगाई और दूसरी चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार के कई एतिहाती कदमों में खाद्य सुरक्षा कानून भी है। जुलाई में खत्म होने जा रहे इस कानून की समय सीमा मोदी सरकार ने बढ़ाने का फैसला किया है। यह कानून कांग्रेस की ओर से लाया गया था। सरकार ने सभी राज्यों से इसे लागू करने की बात कही है।

चुनावों के दौरान बड़े-बड़े वायदे करने वाली सरकार अभी तक कांग्रेस की नीतियों का ही अनुशरण किए हुए है। प्रतिपक्ष की ओर से लाख आलोचना झेलने के बाद भी सरकार ने यूपीए सरकार की प्रस्तावित मालभाड़ा योजना को लागू कर दिया।

आर्थिक सुधार या दूसरे मसलों पर भाजपा की नीति कांग्रेस से अलग हट कर नहीं हैं। कुछ वोट बैंक नीतियों को दरकिनार कर देखें तो कांग्रेस और भाजपा केवल दो धड़े हैं, लेकिन इनकी सोच और आत्मा एकमेव है। इसमें कोई विवाद भी शायद दिखे। अब तक सत्ता के बाहर रहकर कांग्रेस की नीतियों की आलोचना करने वाले खुद पीएम और उनकी सरकार कांग्रेस की नीतियों पर ही चलती दिख रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को पीएम पद की शपथ ली थी। चुनावों के दौरान वे एक उम्मीदवार थे, लेकिन अब वे भारत के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने देश की जनता को सुशासन और सुनहली अर्थव्यवस्था के सपने दिखाए थे, लेकिन वह अभी से बिखरता दिखता है। अच्छे दिन आने का वादा जमीनी हकीकत से परे नजर आता है।

महंगाई नियंत्रण पर सरकार अलग-थलग दिख रही है। महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को घेरने वाली मोदी सरकार खुद ही कटघरे में खड़ी हो गई है। कांग्रेस की पिछली सरकार ने भी महंगाई पर नियंत्रण के लिए 100 दिन का समय मांगा था। अभी नमो सरकार ने तो केवल 30 दिन खर्च किया है। इतनी जल्दी नमो सरकार की समीक्षा करना बेइमानी और नाइंसाफी होगी।

समालोचना का धर्म भी इस बात की इजाजत नहीं देता है, क्योंकि इतने बड़े देश की अर्थव्यवस्था का संचालन किसी रिमोट कंटोल सरीखा नहीं है। हालांकि सरकार ने सत्ता में आते ही जनता से जो वादे किए थे, उस पर वह कदम बढ़ाती दिखती है।

भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए नौकरशाही में आमूल चूल परिवर्तन, वैश्विक स्तर की कार्यप्रणाली विकसित करने के लिए आईएसओ-9001 की कार्य संस्कृति हासिल करने की ओर बढ़ता कदम, विदेश नीति की कूटनीतिक सफलता, कालेधन पर एसआईटी का गठन, पारदर्शी शासन व्यवस्था कायम करने के लिए सांसदों और मंत्रियों को संगे संबंधियों को पीए न रखने समेत सरकार के कई कदम सराहनीय हैं, जिससे उसकी मंशा पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं।

देश के एक बड़े वर्ग के लिए सिर पर पैर रख भागती महंगाई सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। यह आम आदमी के सपने लूट लेती है। आंखों से नींद गायब हो जाती है। अटल बिहारी की सरकार कभी प्याज और टमाटर पर बढ़े मूल्य के कारण चली गई थी। कांग्रेस की सरकार जाने के पीछे भी आम आदमी की खींझ और दैनिक जीवन की बढ़ती परेशानी खास वजह थी।

सरकार अब सीधे सब्सिडी मंत्र का जाप कर रही है। उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं दिख रहा है। सरकार वस्तुओं से नियंत्रण खत्म कर सीधे-सीधे खुले बाजार का माहौल पैदा करना चाहती है। वह देश की पूरी अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों के हाथ में सौंपना चाहती है।

पूंजीवादी वर्ग अपना निवेश उसी क्षेत्र में करेगा, जिसमें उसे सबसे अधिक फायदा होगा। वह आम आदमी की चिंताओं का खयाल क्यों करने जाएगा?

जब तक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती नहीं मिलती, तब तक सरकार की सब्सिडी समाप्त करने की नीति सर्वहारा और मध्यमवर्ग के लिए घातक साबित होगी।

सरकार डीजल पर अभी 35,376 करोड़ और एलपीजी पर 80 करोड़ की सब्सिडी उपलब्ध कराती है। घरेलू रसोई गैस पर सरकार की तरफ से 432.71 रुपए की रियायत मिलती है, जबकि केरोसीन पर यह 32.87 पैसे प्रति लीटर है।

इराक पर अतिवादियों के हमले ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। जिससे सरकार पेट्रो मूल्यों में वृद्धि कर महंगाई को नियंत्रित करना चाहती है। वहीं रेल और माल भाड़े में बढ़ोतरी कर 8,000 करोड़ कमाना चाहती है।

चीनी को भी कड़वी करने का सरकार ने फैसला कर लिया है। चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाने का फैसला किया गया है। यह दोगुने से भी अधिक होगा। इसे 15 से बढ़ाकर 40 फीसदी किया जाएगा। आयात शुल्क में इजाफा से चीनी के दामों में उछाल तय है।

एक अनुमान के अनुसार चीनी का 65 फीसदी हिस्सा औद्योगिक ईकाइयों में खपती है, जबकि घरेलू उपयोग के लिए केवल 35 फीसदी चीनी का उपयोग देश में होता है। इस दशा में सरकार को घरेलू और औद्योगिक चीनी नीति में अंतर करना चाहिए। जिससे आम आदमी की चाय कड़वी न हो।

सरकार का कहना है कि देश में चीनी की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। अगर ऐसी बात है तो फिर आयात शुल्क में वृद्धि की जरुरत क्यों आ गई? सरकार कई मापदंडों पर चल रही है। एक ओर चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाकर जहां इसके आयात को हतोत्साहित करना चाहती है, वहीं दामों में उछाल से आम जनता पर अधिक भार डालने की तैयारी कर रही है।

तीसरी सबसे अहम बात है कि मिल मालिकों को 44,000 करोड़ देकर गन्ना किसानों को भुगतान करना चाहती है। मिलों पर किसानों का 11,000 करोड़ रुपए बकाया है। वहीं सरकार निर्यात को बढ़ाने के लिए 3300 रुपए प्रति टन सब्सिडी भी देने जा रही है।

सरकार की दोहरी नीति समझ में नहीं आती है। एक तरफ आवश्यक वस्तुओं पर सब्सिडी खत्म कर महंगाई का ग्राफ चढ़ाया जा रहा है। दूसरी तरफ कॉरपोरेट जगत को रियायत दी जा रही है। सरकार की यह नीति किसे फायदा पहुंचाना चाहती है, यह समझ से परे है। यही छूट गन्ना किसानों को क्यों नहीं उपलब्ध कराई जाती है?

देश में आज भी कई चीनी मिले सीधे उत्पादन करने के बजाय दूसरे देशों से कच्ची चीनी मंगाकर उसकी पैकेजिंग देश में की जाती है। देश की अर्थव्यवस्था को कड़वी दवा देने का प्रधानमंत्री का फैसला अब आम आदमी पर भारी पड़ रहा है।

नीतीन गडकरी ने चुनावों के दौरान कहा था कि मोदी सरकार आते ही छह माह में महंगाई में 25 फीसदी की कमी आएगी, लेकिन गडकरी का यह वादा उल्टा साबित हो रहा है। महंगाई का अंडर करंट बढ़ता चला जा रहा है।

उधर, इस समस्या से आर्थिक सुधार की ओर बढ़ रही सरकार के माथे पर भी बल है। सरकार की ओर से किए गए अच्छे दिन के वादे पर भी जनता की आवाज उठेगी। विपक्ष का सरकार पर और अधिक हमलावर होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी। अब देखना होगा वह इस पर कितती खरी उतरती है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन से जुड़े हैं। संपर्क- ईमेलः pnshukla6@gmail.com)

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