जल संरक्षण व संग्रहण सबसे जरूरी

Submitted by admin on Fri, 07/04/2014 - 09:58
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परंपरागत जल संग्रहण प्रणालीसामान्यतः कृषि लगभग पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा खेती पर आश्रित है। अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती की पैदावार है इसलिए जरूरी है कि संतुलित और समुचित रूप से मॉनसून की कृपा बनी रहे। लेकिन इस वर्ष बारिश औसत से कम है। यह जरूरी है कि भविष्य के लिए जलस्रोतों के बेहतर प्रबंधन के प्रयास किए जाएं।

देश के मौसम विभाग ने इस बार कुछ समय से हम सबको आगाह कर दिया कि इस वर्ष बारिश लगभग 35 प्रतिशत कम होने वाली है।

हमारे सनातन धर्म में कहा गया है कि जब-जब पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ता है, जीवन के सभी आयामों में पाप का समावेश तेजी से करने लगता है तो मानसून के देवता इन्द्र नाराज होकर पृथ्वी पर कम वर्षा देते हैं। यह तो धर्म की बात है। लेकिन विज्ञान इसके मर्म को अलग तरह से हमें बताता है। वे कहते हैं कि कम दवाब का क्षेत्र इस बार कम बन रहा है जिसके कारण वर्षा कम होगी। वैज्ञानिक हमें यह नहीं बताता या समझाता कि आखिर इस बार कमजोर मानसून क्यों हुआ?

आज विकासवाद की जिस अवधारणाओं के पीछे भाग रहे हैं या यों कहें कि पृथ्वी और उसके वातावरण का जिस प्रकार से नाश कर रहे हैं, उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता।

कमजोर मानसून के अनेक कारण हैं। जिसमें प्रमुख रूप से ओजोन परत की भी मुख्य भूमिका हमें दिखाई देती है। थोड़े ही शब्द में ओजोन परत क्या है इसे भी जान लें- ऑक्सीजन के तीन अणु आपस में मिलकर ओजोन गैस का निर्माण करते हैं।

विकास के नाम पर जिस प्रकार सरकार और हमने नदियों को नाला बना दिया है उन नालों से हमारी जल की आवश्यकता पूरी होने की संभावना न के बराबर ही है। अतः परंपरागत जल संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ना उचित और श्रेयष्कर होगा। शायद कम ही लोगों को मालूम होगा कि भारत के हर गांव में प्रतिवर्ष 3.75 अरब लीटर पानी एकत्र किया जा सकता है। जिससे गांव की जनता की पेयजल और पशुओं की जरूरत लायक पूरा पानी ही नहीं खेतों के सिंचाई का काम भी हो सकता है।

पृथ्वी की सतह से 17 से 50 किलोमीटर ऊपर स्ट्रेटोस्फेयर में ओजोन की एक मोटी परत बनती है। इसका मुख्य काम पृथ्वी और सूर्य के बीच एक कवच बनाने की है। दरअसल यह परत सूर्य से निकलने वाली खतरनाक अल्ट्रावायलट यानी पराबैंगनी किरणों (यूवी-1 व यूवी-2) को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकती हैं। जिससे हम सब का जीवन ही नहीं पृथ्वी के समस्त पर्यावरण को सहेज कर समय-चक्र को ठीक व उपयोगी बनाए रखने में सक्षम रहता है।

अब जब हम शिकार हो ही चुके हैं तो हमें अपने जीवन को तो आगे ले जाना ही है- यानि बारिश कम होगी लगभग 35 प्रतिशत तो हमें सचेत तो होना ही चाहिए। सबसे पहले तो हम सब को पानी का उपयोग कम करना आज से ही शुरू कर देना चाहिए।

किसानों को अधिक पानी वाले फसलों को लगाने से निश्चित रूप से बचना चाहिए। जन समुदाय अपने प्राकृतिक जन स्रोतों व अपनी कुदरती विरासतों के प्रति अपने परंपरागत रिश्तों को सक्रियता से निरतंर बनाए रखने और मुश्तैदी दिखाएं।

जैसे तालाब, नालों, पुरानी चालों व खालों को सामूहिक संरक्षण देना प्रारंभ कर दें। क्योंकि पिछले पचास-साठ सालों में हमने अपने उपरोक्त जल यंत्रों को बर्बाद ही किया है।

यदि हमें पानी के मामले में संतोषजनक समृद्धि चाहिए तो हमें अपने तालाबों आदि पर विशेष ध्यान देना होगा। जयपुर जिले के लापोड़िया ग्राम के निवासियों ने अपने गांव को तालाब के बल पर जल से मामले में इतना समृद्ध कर लिया है कि पिछले 8-10 सालों में अकाल का कोई प्रभाव वहां नहीं पड़ने दिया है।

इनसे हमें सीखने की जरूरत है कि जहां इतना कम मानसून प्रत्येक वर्ष होता है वहां जल संरक्षण व संग्रहण के बल पर अकाल मुक्त गांव कैसे बना?

जिस प्रकार से हमने अपने सभी नदियों को ही नहीं तालाबों को भी मार डाला है। पहले राज, समाज, महाजन ने मिलकर जलस्रोतों का निर्माण किया था और इसका उपयोग तथा देखभाल भी समाज ही करता था। जल की संरचना का कोई एक मालिक नहीं था। सभी अपना मानकर इनको बचाने में जुटे रहते थे।

परंपरागत जल संग्रहण प्रणालीपानी पर कब्जा करना पाप था, व्यापार करना तो कतई उचित नहीं था। आज हम सब विकास के नाम पर जल का जिस प्रकार से व्यापार करने में जुटे हैं वह हमें युद्ध की तरफ ही ले जाने वाला है।

सरकार जो कुछ कर सकती है वह तो उसे करना ही चाहिए। यानि कम वर्षा से जिन क्षेत्रों में अन्न का अभाव हो वहां अन्न पहुंचाना तो सर्वथा उचित है। लेकिन जल पर एक संपूर्ण समुचित सोच को शोधकर उस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास अभी से प्रारंभ कर देना चाहिए।

विकास के नाम पर जिस प्रकार सरकार और हमने नदियों को नाला बना दिया है उन नालों से हमारी जल की आवश्यकता पूरी होने की संभावना न के बराबर ही है। अतः परंपरागत जल संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ना उचित और श्रेयष्कर होगा।

शायद कम ही लोगों को मालूम होगा कि भारत के हर गांव में प्रतिवर्ष 3.75 अरब लीटर पानी एकत्र किया जा सकता है। जिससे गांव की जनता की पेयजल और पशुओं की जरूरत लायक पूरा पानी ही नहीं खेतों के सिंचाई का काम भी हो सकता है।

सरकार को अभी से यह आकलन शुरू कर देना चाहिए कि बरसात के दिनों में कितना पानी जमा किया जा सकता है। एक मोटे अनुमान लगा कर देखिए- देश के गांवों के लोग साल भर में कुल 8,760 घंटों में एक अनुमान के मुताबिक 341 घंटों की वर्षा होती है जिसमें से सिर्फ 100 घंटों की मूसलाधार बारिश का ही लाभ हम उठा पाते हैं। इन बारिश को सही ढंग से एकत्र करने की ओर सरकार और समाज का ध्यान महत्वपूर्ण है।

मानसूनजल संकट से बचने के लिए सरकार जो नालों को नालों यानि नदी जोड़ की योजना पर जो काम करने वाली है वह दुखदायी ही साबित होने वाली है। जनता तो इन्द्रदेव की प्रार्थना ही करने में लगी रहती है। हमें इससे बाहर आकर कुछ स्थाई उपयोगी परंपरागत जल संग्रहण की जरूरत है।

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