सुबनसिरी परियोजना में रोज दस करोड़ का नुकसान

Submitted by admin on Fri, 07/04/2014 - 12:07
Source
जनसत्ता, 24 जून 2014

2011 से अटका हुआ है काम


इससे अरुणाचल प्रदेश के महत्वपूर्ण शहरों दापोरिजो, दुंपोरिजो और तामेन आदि के डूबने का खतरा था। इसलिए यह क्रियान्वित नहीं हो सकी। बाद में इसे बाढ़ कम करने की परियोजना के साथ जल परियोजना के रूप में डिजाइन किया गया। निचली सुबनसिरी परियोजना राज्य में 50 हजार मेगावाट बिजली क्षमता लाने के अरुणाचल प्रदेश सरकार के फैसले के तहत किया गया प्रयास है।

ईटानगर, 23 जून (भाषा) बांध विरोधी कार्यकर्ताओं की ओर से असम-अरुणाचल सीमा पर निचले सुबनसिरी के गेरुकामुख में जलविद्युत परियोजना से जुड़े सुरक्षा संबंधी मुद्दे उठाए जाने के बाद रोजाना दस करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है।

सुबनसिरी नदी में 2000 मेगावाट की यह परियोजना देश की सबसे बड़ी परियोजना है। इसे एनएचपीसी बना रही है। 2011 में इस परियोजना का काम रुकने के बाद यह मुश्किल स्थितियों का सामना कर रही है।

शुरुआत में इस बांध की ऊंचाई 257 मीटर रखने की योजना थी। बाद में असम में कृषक मुक्ति संग्राम के बैनर तले बांध विरोधी कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के बाद इसे घटाकर 116 मीटर कर दिया गया। केएमएसएस अध्यक्ष अखिल गोगोई के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि प्रवाह की दिशा में रहने वाले लोगों, जीव-जंतुओं और वनस्पति पर इस बांध का बुरा प्रभाव पड़ेगा।

परियोजना के कार्यकारी निदेशक राकेश ने दौरे पर आए पत्रकारों के समूह से कहा कि हम रोजाना तीन करोड़ रुपए का नुकसान झेल रहे हैं क्योंकि मशीनें और दूसरे उपकरण बेकार ही पड़े हैं। अब तो उन पर जंग लगनी भी शुरू हो गई है।

यह परियोजना इस साल मार्च में शुरू हो जानी थी। राजस्व उत्पादन न होने पर इससे रोजाना सात करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। इस परियोजना का 55 फीसद काम पहले ही पूरा हो चुका है, जिसमें सुरंग, बांध, बिजलीघर और अन्य निर्माण कार्य शामिल हैं।

मशीनों को इस परियोजना स्थल पर इधर-उधर बिखरे हुए देखा जा सकता है। 2011 से काम के लंबित हो जाने के बाद से अधिकतर कर्मचारी परियोजना स्थल छोड़कर जा चुके हैं। इस परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत 6,285 करोड़ रुपए (2002-2005) थी। परियोजना पर प्राधिकरण पहले ही 6,600 करोड़ रुपए का निवेश कर चुका है।

इस परियोजना की लागत अब 1200 करोड़ रुपए से ऊपर जा चुकी है। राकेश ने कहा- और अधिक देरी से परियोजना की लागत में और वृद्धि होगी। इससे लोगों पर यह प्रभाव पड़ेगा कि उन्हें बिजली के लिए ज्यादा कीमत देनी होगी क्योंकि लगातार होने वाली देरी बिजली की अंतिम कीमत को बढ़ाने का ही काम करेगी।

उन्होंने कहा कि बांध विरोधियों की जताई गई चिंताएं गलत पाई गई क्योंकि यह किसी भी तरह से बड़ी बांध परियोजना नहीं थी। यह नदी पर संचालित ऐसी परियोजना है, जिसमें छोटे जलाशयों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

निदेशक ने बताया कि पानी का सिर्फ 10 फीसद ही एकत्र किया जाएगा जबकि 90 फीसद जल विशेष तौर पर डिजाइन की गई आठ सुरंगों के जरिए निकल जाएगा। इससे नदी के प्रवाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। राकेश ने कहा कि शुरू में यह परियोजना ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने बाढ़ नियंत्रण परियोजना के रूप में डिजाइन की थी।

लेकिन इससे अरुणाचल प्रदेश के महत्वपूर्ण शहरों दापोरिजो, दुंपोरिजो और तामेन आदि के डूबने का खतरा था। इसलिए यह क्रियान्वित नहीं हो सकी। बाद में इसे बाढ़ कम करने की परियोजना के साथ जल परियोजना के रूप में डिजाइन किया गया। निचली सुबनसिरी परियोजना राज्य में 50 हजार मेगावाट बिजली क्षमता लाने के अरुणाचल प्रदेश सरकार के फैसले के तहत किया गया प्रयास है।

चीन से शुरू होने वाली नदी, स्रोत से 287 किलोमीटर दूर है। राज्य सरकार ने ऊपरी सुबनसिरी नामक नदी पर 2000 मेगावाट की क्षमता वाली (बांध की ऊंचाई 135 मीटर) और मध्य सुबनसिरी में 1600 मेगावाट की क्षमता वाली (बांध की ऊंचाई 200 मीटर) की दो और परियोजनाएं लगाने की योजना बनाई है।

केंद्रीय जल आयोग के अध्ययन के अनुसार ब्रह्मपुत्र नदी निचले सुबनसिरी बांध से सिर्फ 90 किलोमीटर की दूरी पर है तोे धारा के प्रवाह की दिशा में इसका प्रभाव सिर्फ 30 किलोमीटर तक सीमित रहेगा। इसके परे कोई प्रभाव नहीं होगा।

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