शहरीकरण की मुश्किलें

Submitted by admin on Fri, 07/04/2014 - 13:29
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जनसत्ता, 29 जून 2014
भीड़, प्रदूषण और बिजली-पानी जैसी समस्याओं ने भारत के शहरों पर सवालिया निशान लगा दिया है। शहरीकरण की यह अनियोजित रफ्तार कब और कैसे ठीक होगी? पड़ताल कर रहे हैं पंकज चतुर्वेदी।

भारत की कुल आबादी का 8.5 प्रतिशत हिस्सा देश के छब्बीस महानगरों में रह रहा है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि आने वाले बीस-पच्चीस सालों में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या साठ से अधिक हो जाएगी, जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान सत्तर प्रतिशत होगा। मगर चौंकाने वाली बात है कि शहरों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञ आशंकित हैं कि कहीं भारत की बड़ी आबादी शहरी मलिन बस्तियों में न तब्दील हो जाए।

शहरीकरण को विकास और आधुनिकता का पैमाना माना जाता है। स्वाभाविक ही है कि भारत भी इस डगर पर चलना चाह रहा है। लेकिन, जिन विकसित देशों ने शहरीकरण को अपनाया है, उन्होंने शहरीकरण से होने वाली दूसरी मुश्किलों का हल भी तलाश लिया है।

लेकिन भारत जैसे विकासशील व्यवस्था वाले देश में पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट है। और विडंबना यह है कि इस संकट की ओर से हमारे देश में योजनाकार और नीतिकार आंखें मूंदे हुए हैं। असल में शहरीकरण स्वच्छ पानी, स्वच्छ वायु में बाधा बन रहा है।

देश में सौ नए शहर बसाने की तैयारी हो रही है। बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि नए बनने वाले शहर ऊर्जा, यातायात, पानी के मामलों में अपने संसाधनों पर ही निर्भर होंगे, वर्ना यह प्रयोग देश के लिए नया संकट होगा।

नए शहर का मतलब होगा कुछ हजार-लाख एकड़ उपजाऊ खेतों को कंक्रीट द्वारा उदरस्थ होना, पानी के परंपरागत स्रोतों की बलि, हरियाली और नैसर्गिकता का विनाश। और नए संकट होंगे बिजली और पानी की किल्लत, सड़कों पर जाम और चारों तरफ कचरा।

इसमें कोई शक नहीं कि नए शहर बनने से रीयल इस्टेट, सीमेंट लोहे का कारोबार बढ़ेगा, कुछ लोगों को कुछ साल तक मजदूरी और अन्य रोजगार मिलेगा। इससे देश की आर्थिक व्यवस्था के आंकड़े दुरुस्त होते दिखेंगे और उसे विकास भी कहा जाएगा।

लेकिन यह विकास प्रगति होगी या अवगति, इसे समझना जरूरी है। फर्क होता है विकास और प्रगति में। प्रगति में व्यक्ति, समुदाय और प्रकृति वगैरह सबका कल्याण शामिल होता है, जबकि विकास में कुछ कंपनियों का या कुछ लोगों का महज आर्थिक विकास होता है।

क्या गांव में मूलभूत सुविधाएं, परिवहन और संचार, कुटीर उद्योग को सशक्त कर देश के जीडीपी में इजाफा नहीं किया जा सकता? भारत में संस्कृति, मानवता और बस्तियों का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीवन फलता-फूलता रहा है।

बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह वहीं बहने लगी। यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर।

बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और उज्जवल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर शहर की चकाचौंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृत्ति का नतीजा है कि देश में एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या तीन सौ दो हो गई है, जबकि 1971 में ऐसे शहर मात्र 151 थे।

यही हाल, दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की है। इसकी संख्या गत दो दशकों में दोगुनी होकर सोलह हो गई है। पांच से दस लाख आबादी वाले शहर 1971 में मात्र नौ थे जो आज बढ़कर पचास हो गए हैं।

भारत की कुल आबादी का 8.5 प्रतिशत हिस्सा देश के छब्बीस महानगरों में रह रहा है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि आने वाले बीस-पच्चीस सालों में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या साठ से अधिक हो जाएगी, जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान सत्तर प्रतिशत होगा।

मगर चौंकाने वाली बात है कि शहरों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञ आशंकित हैं कि कहीं भारत की बड़ी आबादी शहरी मलिन बस्तियों में न तब्दील हो जाए।

देश की 31.16 प्रतिशत यानी करीब एक तिहाई आबादी अब शहरों में रह रही है। 2011 की जनगणना के आंकड़े गवाह हैं कि गांव छोड़ कर शहर की ओर जाने वालों की संख्या बढ़ी और अब 37 करोड़ 70 लाख लोग शहरों के बाशिंदे हैं।

2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इस अवधि में शहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ, जबकि गांव की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी।

देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान साठ फीसद पहुंच गया है, जबकि खेती की भूमिका दिनोंदिन घटते हुए 15 प्रतिशत रह गई है। जबकि गांवों की आबादी अभी 68.84 करोड़ यानी कुल आबादी का दो-तिहाई है।

शहरीकरण का विस्फोटदेश की अधिकांश आबादी अभी भी उस क्षेत्र में रह रही है जहां का जीडीपी शहरों की तुलना में छठा हिस्सा भी नहीं है। यही कारण है कि गांवों में जीवन-स्तर में गिरावट, शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी है और लोग बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं।

जो लोग शहरों के गुणगान में लगे हैं, उन्हें समझना होगा कि शहर दिवास्वप्न से ज्यादा नहीं हैं। देश के बड़े महानगर अब आबादी का बोझ सहने लायक नहीं है। 3,894 शहरों शहर नियोजन या नगरपालिका तक नहीं है। यहां बस खेतों को उजाड़ कर बेढब अधपक्के मकान खड़े कर दिए गए हैं, जहां पानी, सड़क, बिजली की सुविधाएं गांवों से भी बदतर स्थिति में हैं।

सरकारें कॉरपोरेट सेक्टर को पांच साल में कोई इक्कीस 21 लाख करोड़ की सब्सिडी बांट चुकी है। हर साल पचास हजार करोड़ रुपए कीमत की खाद्य सामग्री माकूल रखरखाव के अभाव में खराब हो जाती है।

सरकार को इसकी फिक्र तक नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट को पिछली साल कहना पड़ा कि अगर गोदामों में रखे अनाज को सहेजा नहीं जा सकता तो उसे गरीबों को बांट दो, लेकिन इसके लिए हुक्मरान तैयार नहीं है।

दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होने से जल भराव एक स्थाई समस्या है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की पचास साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बने रहते हैं। बेंग्लुरू में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में छेड़छाड़ की वजह से बाढ़ आती है।

शहरों में बाढ़ रोकने के लिए जरूरी है कि वहां के पारंपरिक जल स्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाया जाए। अगर किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा।

विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं। नतीजा यह हो रहा है कि थोड़ी-सी बारिश में पानी कहीं का कहीं बहने लगता है।

महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव के सबसे बड़े कारण हैं। पॉलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, जैसे कुछ कारण हैं, जो कि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं। महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम है।

यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना जरूरी है, वर्ना आने वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी। इससे यातायात के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा होगा। शहर के लिए सड़क चाहिए, बिजली चाहिए, मकान चाहिए, दफ्तर चाहिए, इन सबके लिए या तो खेत होम हो रहे हैं या फिर जंगल।

जंगल को हजम करने की चाल में पेड़, जंगली जानवर, पारंपरिक जल स्रोत, सभी कुछ नष्ट हो रहा है। यह वह नुकसान है जिसका हर्जाना संभव नहीं है। शहरीकरण यानी रफ्तार। रफ्तार का मतलब है वाहन। और वाहन हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूषित वायु। शहर को ज्यादा बिजली चाहिए, यानी ज्यादा कोयला जलेगा। ज्यादा परमाणु संयंत्र लगेंगे।

औद्योगिकीकरण और अनियोजित कारखानों की स्थापना के वजह से हमारी लगभग सभी नदियां अब जहरीली हो चुकी है। नदी थी खेती के लिए, मछली के लिए दैनिक कार्यों के लिए न कि उसमें गंदगी बहाने के लिए।

गांवों के कस्बे, कस्बों के शहर और शहरों के महानगर में बदलने की होड़, एक ऐसी मृगमरीचिका है, जिसकी असलियत कुछ देर से खुलती है।

शहर में आम तौर पर लोग इसलिए बसना चाहते हैं, क्योंकि इसे रोजगार, सफाई, सुरक्षा, बिजली, सड़क का केंद्र माना जाता है, जबकि आज स्थिति यह है कि वहां सांस लेना भी गुनाह हो गया है।

शहरों में आबादी घनी होने की वजह से वहां संक्रामक रोग तेजी से पैर पसारते हैं। यहां दूषित पानी या हवा भीतर ही भीतर इंसान को खाती रहती है।

शहरों में बीमारों की संख्या बढ़ती रहती है। देश के सभी बड़े शहर इन दिनों कूड़े को निपटाने की समस्या से जूझ रहे हैं। कूड़े को एकत्र करना और फिर उसका शमन करना, एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक बार फिर शहरीकरण से उपज रहे कचरे की मार पर्यावरण पर ही पड़ रही है।

भारत में संस्कृति, मानवता और बस्तियों का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीवन फलता-फूलता रहा है। बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह वहीं बहने लगी। यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर।

असल में, पर्यावरण को हो रहे नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशक में यह प्रवृत्ति पूर देश में बढ़ी है कि शहरों या कस्बों की सीमा से सटे खेतों में अवैध कालोनियां उग आई हैं। बाद में वहां कच्ची-पक्की सड़क बना कर आसपास के खेत, जंगल तालाब को वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट के जंगलों में बदल दिया गया।

देश के अधिकांश शहर बेतरतीब बढ़ते जा रहे हैं। न तो वहां सार्वजनिक परिवहन है, न ही सुरक्षा, न बिजली-पानी। देश में बढ़े काले धन को जब बैंक या घर में रखना जटिल होने लगा तो जमीन में निवेश का सहारा लिया जाने लगा। इससे खेत यानी जमीन की कीमतें बढ़ीं। पारंपरिक शिल्प और रोजगार से पेट न भरने की वजह से लोग शहरों की ओर भागने लगे।

केवल पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं, शहर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदूषण से भी ग्रस्त हो रहे हैं। लोग मानवीय संवेदनाओं से, अपनी लोक परंपराओं और मान्यताओं से कट रहे हैं। तो क्या लोग गांव में ही रहें? क्या विकास की उम्मीद न करें? ऐसे कई सवाल शहरीकरण में अपनी पूंजी को हर दिन कई गुणा होते देखने वाले कर सकते हैं।

असल में, हमें विकास की अवधारणा को बदलना होगा-पक्की सड़क, अंग्रेजी दवाई, अपनी भाषा को छोड़ कर अंग्रेजी का प्रयोग, भोजन और कपड़े का पश्चिमीकरण को विकास मानना उचित नहीं है।

अगर कोई चमड़े का काम करने वाला है, वह अपने काम को वैज्ञानिक तरीके से करना सीखता है, अपने श्रम की वास्तविक कीमत वसूलने के प्रति जागरुक होता है, अपने सामाजिक अधिकार के प्रति सचेत हो जाता है तो जरूरी नहीं है कि वह गांव में अपने हाथ के काम को छोड़ कर शहर में चपरासी बने या दैनिक मजदूर की नौकरी कर संकरी गलियों की गंदी झुग्गियों में रहे।

इंसान की क्षमता, जरूरत और योग्यता के अनुरूप उसे अपने मूल स्थान पर अपने सामाजिक सरोकारों के साथ जीवनयापन करने की सुविधाएं मिलनी चाहिए। अगर विकास के प्रतिमान ऐसे होंगे तो शहर की ओर लोगों का पलायन रुकेगा। इससे धरती को कुछ राहत मिलेगी।

किसान या तो शहरों में मजदूरी करने लगता है या फिर जमीन की अच्छी कीमत हाथ आने पर कुछ दिन तक उसी में डूबा रहता है। दो दशक पहले दिल्ली नगर निगम के एक सर्वेक्षण में पता चला था कि राजधानी में अपराध में ताबड़तोड़ बढ़ोतरी के सात मुख्य कारण हैं।

अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा और गरीबी, खुला आवास, बड़ा परिवार, नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के विचारों में टकराव और नैतिक मूल्यों में गिरावट। वास्तव में, यह रिपोर्ट केवल दिल्ली ही नहीं, दूसरे महानगरों और शहरों में भी बढ़ते अपराधों का भी खुलासा करती है। ये सभी कारक शहरीकरण की त्रासदी की सौगात हैं।

कटते पेड़ : प्रकृति विनाशगांवों में उच्च या तकनीकी संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज, खाद और दवाओं को प्रोत्साहित करना- ये कुछ ऐसे उपाय हैं, जो पलायन रोक सकते हैं।

इस राष्ट्रीय समस्या के निदान में पंचायत समितियां अहम भूमिका निभा सकती हैं। पंचायत संस्थाओं में आरक्षित वर्गों की सक्रिय भागीदारी कुछ हद तक सामंती शोषण पर अंकुश लगा सकती, जबकि पानी, स्वास्थ्य, सड़क बिजली सरीखी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति का जिम्मा स्थानीय प्रशासन को संभालना होगा।

आर्थिक विषमता, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और पारंपरिक जीवकोपार्जन में बदलाव की वजह से शहरों की ओर पलायन ज्यादा बढ़ा है। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को साझा कोशिश करनी होगी। वर्ना, कुछ ही सालों में देश के सामने शहरीकरण की कठिनाइयां इतनी विकराल होंगी कि महानगर बेगार, लाचार और बीमार लोगों से ठसाठस भरे होंगे, और गांव उजाड़ हो जाएंगे।

ईमेल : pc7001010@gmail.com

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