बाई चारा मत डरो, ‘बंजारी ढाल’ को याद करो

Submitted by admin on Mon, 07/07/2014 - 16:48
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स्व. ओमप्रकाश रावल स्मृति निधि
जब तवा परियोजना आई, तब फिर सैकड़ों लोगों को विस्थापित किया गया। राजनारायण ने बतलाया था कि पिछले पंद्रह सालों में 100 गांवों के करीब 50,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं। शासन की ओर से जमीन के पट्टे दिए जाने के आश्वासन पर लोग किसी तरह जिंदगी बसर करते रहे। लेकिन तब तो उन पर गाज ही गिर गई कि जब यह कहा गया नर्मदा परियोजनाओं के विस्थापितों को यहां बसाया जाएगा, जमीन प्राप्त होने की बची-खुची आशा भी समाप्त हो गई। पिछले नवंबर की बात है। सतपुड़ा की पहाड़ियों में बसे एक गांव भौरा के वन विभाग के कार्यालय पर एक प्रमुख अधिकारी की उपस्थिति में वन विभाग के एक कनिष्ठ अधिकारी ने पांच आदिवासियों को घूस के रूप में लिए गए 1150 रु. वापस किए। सैकड़ों आदिवासियों के समक्ष घूस लौटाने की यह कार्रवाई हुई, जो इसकी मांग कर रहे थे। यह सिलसिला होशंगाबाद के केसला-भौरा क्षेत्र में तेजी से फैला। किसान आदिवासी संगठन ने इस अभियान का नेतृत्व किया था। संगठन ने दावा किया कि उसने रिश्वत में लिए गए 32,000 रु. संबंधित अधिकारियों से वापस करवाए हैं। सतपुड़ा घाटी की एक और घटना का जिक्र मैं यहां करना चाहता हूं। इसी माह में सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय हुआ है, जिसमें यह कहा गया है कि सुनील और राजनारायण को शासन ने अनावश्यक बंदी बनाया तथा इन दो सामाजिक कार्यकर्ताओं को हथकड़ी पहनाना अनुचित ठहराया। इन दोनों युवकों ने इस बात के लिए धरना दिया था कि स्कूल में शिक्षक अनुपस्थित रहता है। शासन कई धाराएं लगाकर इन्हें बार-बार गिरफ्तार करती रही थी।

होशंगाबाद जिले के केसला क्षेत्र में एक गांव है सहेली। करीब 12-13 वर्ष पूर्व डॉ. मल्होत्रा ने अपनी 54 बीघा जमीन राम मनोहर लोहिया को स्मृति में कोई गतिविधि चलाने के लिए दान में देने का निश्चय घोषित किया था। उस समय जनता पार्टी की सरकार थी। देश के विख्यात समाजवादियों की एक समिति बनी थी। लोहिया अकादमी की बड़ी आकर्षक योजना बनी थी। मुझे बताया गया था कि डॉ. मल्होत्रा के द्वारा ही ट्रस्ट के नाम जमीन स्थानांतरित करने में आनाकानी करने के कारण यह योजना धरी-की-धरी रह गई।

80 के दशक के मध्य कुछ नौजवान, जो समाजवादी नेता किशन पटनायक से जुड़े थे, लोहिया का सपना संजोते हुए इधर-उधर घूमते-घामते सहेली की उपरोक्त स्वप्निल लोहिया अकादमी में अटक गए। इटारसी का एक दुबला-पतला 23-24 वर्ष का युवक राजनायण यहां अकेला ही रह रहा था और जागृति फैलाने का काम कर रहा था। इन लोगों ने भी यहीं बस जाने का तय कर लिया। किशन पटनायक कई बार यहां आए। डॉ. मल्होत्रा से चर्चाएं हुई और इन नौजवानों ने सपना संजोया कि यहीं रहकर लोहिया के विचारों को फैलाएंगे। उन्हें आशा हुई कि जमीन का उपयोग वे कर सकेंगे और इसके इंतजाम के लिए एक ट्रस्ट भी बनाया जा सकेगा। दिल्ली यूनिवर्सिटी से निकला छात्र सुनील, आई.आई.टी. के व्याख्याता श्री आलोक, बिहार के श्री सुरेंद्र झा और उनकी पत्नी गिनी झा दो झोपड़ों में (जिसमें उन्होंने लोहिया अकादमी कल्पित की होगी) रहने लगी।

सतपुड़ा अंचल के इस क्षेत्र में मुख्य रूप से दो समस्याएं विकट थी। एक तो पीने के पानी की जरूरत और दूसरी विस्थापन की समस्या। आर्डिनेंस फैक्टरी और उसके अस्त्रों के परीक्षण के लिए प्रूफ रेंज की जरूरत ने सैकड़ों आदिवासियों एवं किसानों को शरणार्थी बना दिया था, शासन ने उन्हें जमीन देने का वायदा किया था। कुछ को मौखिक आदेश पर जमीनें मिली थी। लेकिन बाद में फिर छीन ली गई। कई मजबूर शरणार्थी “प्रूफ रेंज” के दायरे में घुसकर तथा अपनी जान जोखिम में डालकर तांबे-पीतल की खोल बटोरने के लिए दौड़-भाग करने लगे। एक मोटा अंदाज है कि इस प्रक्रिया में 500 लोग मारे गए और जार से अधिक अपंग हो गए। एक गांव छीदपानी इस बात के लिए मशहूर हो गया है कि वहां विधवाएं ही बची हैं। थोड़े बहुत जो पुरुष बचे हैं, वे सब या तो बच्चे हैं या बूढ़े हैं।

जब तवा परियोजना आई, तब फिर सैकड़ों लोगों को विस्थापित किया गया। राजनारायण ने बतलाया था कि पिछले पंद्रह सालों में 100 गांवों के करीब 50,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं। शासन की ओर से जमीन के पट्टे दिए जाने के आश्वासन पर लोग किसी तरह जिंदगी बसर करते रहे। लेकिन तब तो उन पर गाज ही गिर गई कि जब यह कहा गया नर्मदा परियोजनाओं के विस्थापितों को यहां बसाया जाएगा, जमीन प्राप्त होने की बची-खुची आशा भी समाप्त हो गई।

लोहिया अकादमी में आए इन नौजवानों की प्रेरणा से किसान आदिवासी संगठन का निर्माण हुआ तथा इस संगठन ने जन प्रशिक्षण एवं धरनों, जूलूसों, पैदल यात्राओं, सभाओं आदि कार्यक्रमों के जरिए लोगों आवाज को जबरदस्त ढंग से उठाया। एक बार तो पैदल जुलूस मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा से मिलने भोपाल पहुंचा था। क्षेत्रीय लोग भी इस संगठन की गतिविधियों में जुड़ते गए। किशोर भारती में निर्मित मजदूर आदिवासी संगठन भी जुड़ गया तथा पिपरिया तथा आसपास के क्षेत्र के समता संगठन के युवा साथी एवं बुद्धिजीवी भी जुड़ने लगे। हरगोविंद, गोपाल राठी, हरीप्रसाद, मायाराम, नरेंद्र, वीरेंद्र ऐसे अनेक युवकों की टोली मैदान में सक्रिय हो गई।

वर्तमान युग में जहां जीवन के मूल्य इतने गिर चुके हैं कि कोई बिना पद या धन के लालच के सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने को तैयार ही नहीं होता है। सतपुड़ा अंचल के हिस्से में काम कर रहे समर्पित युवकों की टोली को देखकर किसी भी राष्ट्रप्रेमी का दिल उछल सकता है। लेकिन प्रशासन का रवैया अलग ही रहा। उनकी निगाह में इन युवकों की गिनती अपराधियों और नक्सलवादियों में ही की जाती है।

खैर, व्यवस्था की ओर से कुछ भी कहा जाता रहे, लेकिन ऐसे लोगों को यह धरती पैदा करती रहेगी, जो इसके रहने वालों में जागृति पैदा करने के लिए समर्पित भाव से जूझते रहेगे। राजनारायण और सुनील जेल में थे। उन्होंने तय किया था कि वे जमानत देकर बाहर नहीं आएंगे। राजनारायण के भाई की शादी थी। प्रशासन की ओर से इसरार किया गया, लेकिन उसने जमानत नहीं दी। बैठकों में और आपसी व्यवहार में शालीन और शांत रहने वाले राजनारायण से अधिकारी बहुत डरते थे। क्योंकि कर्म में वह कट्टर था। ऐसे हजारों अनाम युवजन आखिरी आदमी के साथ जुड़कर उनके हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। लोहिया अकादमी का राजनारायण, भी उन्हीं अनाम में से एक था, जो अब नहीं रहा। पिछले दिनों एक जीप दुर्घटना में समता संगठन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष शिवचंद्र तथा ड्राइवर के साथ राजनारायण इस दुनिया से विदा हो गया।

शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित करना भी पाखंड है, ऐसा कई बार महसूस होता है। लेकिन मैं अब थक चुका हूं, आशा ही कर सकता हूं कि समर्पण की बाती जलती रहेगी। राजनारायण ने अपने साथियों के साथ इस क्षेत्र में एक नई चेतना पैदा की है। ये युवक जमीन का उपयोग करते हुए खेती-बाड़ी, खोज या संस्थागत काम तो नहीं कर सके, लेकिन युवकों की इस टोली ने इस इलाके में इतिहास बोध कराया है और आत्मगौरव पैदा किया है। इस क्षेत्र में बंजारी ढाल एक जगह है, जहां महिलाओं ने उनके चारागाह पर अंग्रेजों द्वारा भारी टैक्स लगाने पर हंसिया, लेकर मुकाबला किया था। इस किंवदंती को उन्होंने जिंदा किया है तथा अब लोगों की जुबान पर ये शब्द चढ़ गए हैं- “बाईचारा मत डरो, बंजारी ढाल को याद करो।”

साभार – नईदुनिया, इंदौर, 26.5.90, प्रस्तुत लेख 03 फरवरी 1995 में छपी स्व. ओमप्रकाश रावल स्मृति निधि पुस्तक से

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