पंजाब-हरियाणा में धान, मक्के के किसान संकट में

Submitted by admin on Sun, 07/20/2014 - 09:17
केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की धान की रोपाई सीधे करने और कम करने की सलाह के बावजूद किसान इसके लिए तैयार नहीं हैं। वर्ष 2013 इसका क्षेत्र बहुत कम है। यह तकरीबन 21 हजार हेक्टेयर तक ही पहुंच पाया है। अगले दो वर्षों में इसे पांच गुना करने का लक्ष्य रखा गया है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह लक्ष्य हासिल करने के बाद धान का उत्पादन तो बढ़ेगा ही साथ ही पानी की भी भारी बचत होगी। पंजाब में फसल बुआई का 98 प्रतिशत क्षेत्र सिंचाई क्षेत्र है। बारिश आने में हो रह देरी से पंजाब, हरियाणा के किसानों के सामने संकट गहराता जा रहा है। धान, मक्की के साथ नकदी फसले बोने वाले किसान खासे संकट में हैं। 13, 14 जुलाई को हुई बारिश का किसानों को मामूली सा भी फायदा नहीं हुआ और किसान इसे बूंदाबांदी भी नहीं मान रहे।

हरियाणा में अगेती धान की रोपाई करने वाले काफी किसानों की फसलों पर एक अजीबो-गरीब बीमारी का आक्रमण हो गया है। इससे फसल एकाएक झुलस रही है। किसान धान के पौधे को थोड़ा ऊपर से भी पकड़ता है तो उसके हाथ में धान का सूखा हुआ सा पुआल हाथ में आ जाता है।

करनाल, पानीपत, कुरुक्षेत्र और अंबाला के कई इलाकों में धान की फसल 35 प्रतिशत तक झुलस गई है। भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह के मुताबिक, जिन किसानों ने रोपाई कर दी है, अब उनमें से आधे ने हाथ खड़े कर लिए हैं और आधे संभाल रहे हैं।

अंबाला के चिड़ियाली, चिड़ियाली के आसपास धान की फसल पर पर्याप्त पानी के अभाव में चौपट हो रही है। गन्ने की फसल पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है।

उधर, मेवात में प्याज की फसल चौपट हो रही है। तकरीबन डेढ़ दर्जन प्याज उत्पादक गांवों रावली, भौड़, बिलोंडा, नावली, आगौन, सिधरावट हिरवाड़ी में बारिश न आने से प्याज उत्पादन खासा प्रभावित हो सकता है।

मानसून की देरी का दुग्ध उत्पादन पर भी असर पड़ रहा है। हरे चारे की कमी हो रही है। जर्सी, स्वीडिश और हॉस्टन नस्ल की गायों और भैंसों का दूध सूखने लगा है। अगर, जल्दी और पर्याप्त बारिश नहीं आई तो दक्षिणी हरियाणा में ज्वार, बाजरे की बुआई में देरी हो जाएगी।

उधर, पंजाब में संगरूर और बठिंडा जिले के धान उत्पादक किसानों के सामने बिजली का संकट बहुत बड़ा है। किसानों का धैर्य जवाब देने लगा है। मकोड़साहब के गुरदेव सिंह के मुताबिक, संगरूर जिले के उनके पड़ोसी गांव बामनीवाला के एक किसान ने तो अपनी कई एकड़ खड़ी एकड़ में ट्रैक्टर चला दिया। यहां किसानों को 6 घंटे से अधिक बिजली ही नहीं मिल पा रही है। हालांकि सरकार बिजली की अधिकतम उपलब्धता की बात कर रही है। पंजाब किसान यूनियन के अध्यक्ष सुखदेव सिंह कोकरीकलां ने बताया, अगले एक-दो दिनों में परमात्मा ने कृपा नहीं की तो राज्य में धान का उत्पादन अच्छा खासा प्रभावित होगा।

पंजाब के होशियाापुर जिले के कांडी क्षेत्र के मक्का और नकदी फसलों के उत्पादक किसानों की फसल भी जवाब देने लगी है। पंजाब के किसानों के बीच काम करने वाले गुरप्रीत सिंह ने बताया, कांडी क्षेत्र में मक्के की फसल को पिछले एक हफ्ते में खत्म होने जैसी स्थिति की ओर बढ़ रही है।

अरबी, घीया, कद्दू, करेला की फसलों पर भी मानसून की देरी का खासा दुष्प्रभाव पड़ा है। ये फसलें तकरीबन 50 प्रतिशत तक नष्ट हो गई हैं। अगर मानसून में थोड़ी और देरी हुई और पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो किसानों के सामने आर्थिक चुनौती खड़ी हो जाएगी।

बाजार में सब्जियों की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी भी होगी। जिन्होंने मक्के की पछेती किस्में बोई हैं, वे किसान बड़ी परेशानी में हैं। बाघपुर के सरपंच गुरमीत सिंह के मुताबिक भूजल स्तर भी पिछले एक माह में बहुत अधिक गिरा है। हालांकि मुख्य कृषि अधिकार कुलबीर सिंह देओल कहते हैं कि स्थिति इतनी खराब नहीं है। कांडी क्षेत्र के किसान पूरी तरह से बारिश पर निर्भर हैं।

पंजाब के किसान धान की सीधी रोपाई के लिए तैयार नहीं हैं। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की धान की रोपाई सीधे करने और कम करने की सलाह के बावजूद किसान इसके लिए तैयार नहीं हैं। वर्ष 2013 इसका क्षेत्र बहुत कम है। यह तकरीबन 21 हजार हेक्टेयर तक ही पहुंच पाया है। अगले दो वर्षों में इसे पांच गुना करने का लक्ष्य रखा गया है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह लक्ष्य हासिल करने के बाद धान का उत्पादन तो बढ़ेगा ही साथ ही पानी की भी भारी बचत होगी। पंजाब में फसल बुआई का 98 प्रतिशत क्षेत्र सिंचाई क्षेत्र है। इसमें से 75 प्रतिशत डीजल, बिजली के ट्यूबवेलों, सबमर्सिबलों से सिंचित होता है। केवल कांडी क्षेत्र और इससे जुड़े रोपड़, होशियारपुर और गुरदासपुर के कुछ इलाके बारिश पर निर्भर रहते हैं। औसतन पंजाब में 580 मिमी बारिश होती है। इसमें से 80 प्रतिशत जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर में होती है।

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