देश बचाना नहीं है विकास का विरोध

Submitted by admin on Sun, 07/20/2014 - 10:44
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2014
देश का विकास केवल आर्थिक मानकों के आधार से नहीं बल्कि उसमें प्रदूषण पर्यावरण की स्थिति, आरोग्य, शिक्षण, महिलाओं और बच्चों की स्थिति, गांव, किसान, खेती और आदिवासियों की स्थिति को ध्यान में रखकर नापना चाहिए। यूं भी आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या की जीडीपी में गिनती नहीं है! इसमें न तो कुछ नया है न ही गुप्त। यह अनगढ़ व उतावलेपन में तैयार की गई तथ्यहीन रिपोर्ट है। इंटेलीजेंस ब्यूरो (खुफिया ब्यूरो) द्वारा नवनियुक्त प्रधानमंत्री को प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी धन पोषित कुछ गैर सरकारी संगठन भारत के आर्थिक विकास को बाधित कर रहे हैं। यह संगठन देश में कोयला खनन, परमाणु विद्युत केंद्र, जीनांतरित फसल, नदियों को जोड़ने की योजना, औद्योगिक कोरिडोर जैसी परियोजना में बाधक हैं। इससे देश के कुल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में 2 से 3 प्रतिशत की कमी होती है। यदि विदेशी धन के बल से देश विरोधी प्रवृत्ति चलती है तो उसे रोकना चाहिए। वैसे कई गैर सरकारी संस्थाएं (एनजीओ) भी सामाजिक काम के बजाय स्वहित साधते हैं।

इस रिपोर्ट में वेड़छी के संपूर्ण क्रांति विद्यालय के कार्यकर्ता डॉ. सुरेंद्र गाडेकर, तमिलनाडु के एस.पी. उदयकुमार, धरमपुर तालुका के जंगलों में आदिवासियों के उत्थान के लिए 45 वर्ष से सेवायज्ञ चलाने वाले सर्वोदय परिवार ट्रस्ट पिंडवल और वहां की कार्यकर्ता सुजाता शाह, भूदानयज्ञ के दौरान विनोबा की प्रेरणा से बना हुआ गुजरात सर्वोदय मंडल और गांधीजी द्वारा स्थापित गुजरात विद्यापीठ का भी उल्लेख किया है। इसके अलावा देश में सजीव खेती का प्रसार करने वाली कविता कुरुगंती, बीज संरक्षण, बीज अधिकार और सजीव खेती के क्षेत्र में पूरी जिंदगी खपा देने वाली डॉ. वंदना शिवा, डॉ. सुमन सहाय, अरुणा रोड्रिक्स को भी जिम्मेदार ठहराया है। ग्रीनपीस, एम्नेस्टी इंटरनेशनल, पीयूसीएल जैसी पर्यावरण और मानव अधिकार के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्थाओं को जिम्मेदार बताया है।

वस्तुतः देश का विकास केवल आर्थिक मानकों के आधार से नहीं बल्कि उसमें प्रदूषण पर्यावरण की स्थिति, आरोग्य, शिक्षण, महिलाओं और बच्चों की स्थिति, गांव, किसान, खेती और आदिवासियों की स्थिति को ध्यान में रखकर नापना चाहिए। यूं भी आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या की जीडीपी में गिनती नहीं है! इसमें न तो कुछ नया है न ही गुप्त। यह अनगढ़ व उतावलेपन में तैयार की गई तथ्यहीन रिपोर्ट है। कोई निष्णात अर्थशास्त्री भी जीडीपी कम होने के कारणों का सीधा गणित नहीं बता सकता है। सायास लीक की गई इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले अधिकारी के नाम भी प्रकट किए गए हैं।

उपरोक्त आंदोलन आम आदमी के समर्थन से ज्यादा व्यापक व तीव्र हो रहे हैं। उसके कारण कई परियोजना विलंब में हैं। वेदांत की ओडिशा में योजना व बीटी बैंगन भी रुके हैं। जो लोग पर्यावरण संरक्षण के लिए और स्वास्थ्यप्रद आहार के लिए लड़ रहे हैं उनको ही दोषित ठहराने का प्रयत्न हो रहा है। वैसे इस रिपोर्ट को तैयार करने की कार्यवाही पिछली यूपीए सरकार से शुरू हुई थी। यानि सरकार बदल जाए लेकिन दोस्ती थोड़ी ही बदलती है।

आज जनआंदोलनों का संदर्भ भी वैश्विक हो चुका है। आर्थिक से लेकर पर्यावरण की समस्याओं के बारे में सभी देश एक दूसरे के साथ जुड़े हैं। बाजारों का वैश्विकरण हुआ है। यूरोपियन यूनियन बना है। सरहदें मिट गई हैं। वैश्विकरण के समर्थक भी कहते हैं कि अब राष्ट्रवाद से ऊपर उठना होगा, तभी तो व्यापार विकसित होगा। इस संदर्भ में विश्व की दाता एजेंसियां केवल अपने ही देश में नहीं, लेकिन पूरी दुनिया में और खास करके तीसरे विश्व में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, पर्यावरण, नागरिक अधिकार, प्राकृतिक स्रोतों का संवर्धन आदि पहलुओं पर काम करने वाली स्वैच्छिक संस्थाओं को धन देती हैं।

गौर कीजिए मार्च 2014 में वेदांत जूथ कंपनी ने कांग्रेस और भाजपा को धन दिया। इस बात को दिल्ली उच्च न्यायालय ने विदेशी सहायता नियमन कानून (एफसीआरए) का उल्लंघन बताया। यदि देश में परमाणु विद्युत केंद्र खड़े करने हों तो केवल विदेश की सरकार से ही नहीं, बल्कि अरेवा जैसी फ्रेंच कंपनी तथा जीई हिटाची और बेस्टिंग इलेक्ट्रिक जैसी अमेरिकन कंपनियों का विदेशी धन लेने में भी सरकारों कोई आपत्ति नहीं है। ईबेना नामक कंपनी के अरबपति मालिक पेरी ओमिड्यार ‘सेवाभावी’ संस्था चलाते हैं, जिसका नाम है ओमिड्यर नेटवर्क। सन् 2003 के बाद इस संस्था ने भारत में सबसे ज्यादा धन लगाया है। भाजपा के एक नेता के पुत्र को उसके सलाहकार के तौर पर रखा है। यह सलाहकार अब सांसद बन गया है और प्रधानमंत्री भी भारत में ई-कॉमर्स व्यवसाय बढ़ाने का प्रवचन दे चुके हैं।

पिछली एनडीए सरकार ने 2002 में राष्ट्रीय जलनीति तैयार की जिससे पानी के निजीकरण के दरवाजे खुले। उसके बाद यूपीए सरकार ने 2012 में जलनीति बनाई। उसमें जल का वितरण और ड्रेनेज प्रणाली के निजीकरण करने की बात आई। आज फ्रांस की मल्टीनेशनल कंपनियां स्वेज और विओलिया भारत में पानी के निजीकरण की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं।

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बुश द्वारा भारत अमेरिका ज्ञान पहल के नाम से अमेरिकी कंपनियों को अपनी तकनीक भारत में बेचने और पैसा लगाने का वातावरण तैयार किया गया था। जीएम बीज लाने वाली कंपनियों को भी पैसा लगाने की अनुमति दी गई है।

प्रसिद्ध बीज कंपनी महिको के साथ मिलकर मोन्सेन्टो ने लाखों डॉलर लगाए हैं। यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है। कांग्रेस ने चुनाव घोषणा पत्र में खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का वचन दिया था। नई सरकार के लिए भी विदेशी निवेश मुकुट का तुर्रा है।

सन् 1991 में आए उदारीकरण के बाद वेदांत के अनिल अग्रवाल ने कहा था “यदि हमें तेल खनन की पूरी छूट दी जाए तो कैर्न इंडिया भारत को वर्ष भर में एक लाख करोड़ रुपया कमा कर दे सकती है। जिससे जीडीपी में 1 प्रतिशत की वृद्धि होगी।” यह तो आने वाली पीढ़ी से छीनकर कमाई दिखाने का छल है। स्वदेशी जागरण मंच जैसी संस्था के कार्यकर्ता अब क्या कर रहे हैं?

विदेशी धन से जनता को भोजन दें, बीमारों की सेवा करें, मदद करें, तो चलेगा। लेकिन भोजन मांगना ही न पड़े, बीमारी आए ही नहीं व मदद मांगनी ही न पड़े ऐसी परिस्थिति पैदा करने के लिए संघर्ष पर सरकारों को आपत्ति है। तकलीफ किससे है? विदेशी धन से या जनता की बढ़ती आवाज से? वैसे तो आईबी की पूरी रिपोर्ट हास्यास्पद है।

विश्व बैंक का कहना है कि भारत को पर्यावरणीय हानि की कीमत जीडीपी के 5.7 प्रतिशत के बराबर चुकानी पड़ती है। साथ ही विश्व के अनेक विकसित देश परमाणु ऊर्जा से किनारा कर चुके हैं। ऐसा ही जीनांतरित बीजों को लेकर भी है।

रिपोर्ट की भाषा से स्पष्ट लगता है कि आईबी ने मान लिया है कि कोयला खनन द्वारा, परमाणु ऊर्जा केंद्रों की स्थापना से, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जी.एम. फसल लाने से और आदिवासियों के अधिकार छीनने से ही देश का विकास होगा। आईबी ने वैज्ञानिक तथ्यों, सरकार की समितियों की रिपोर्टों, संविधानीय प्रावधानों, संसदीय प्रक्रिया और आम जनता के स्वास्थ्य की भरपूर उपेक्षा की है।

भारत में सरकारों को उसी विदेशी धन से आपत्ति है जिससे जनता जागृत होती है, जल-जंगल-जमीन-बीज के लिए अधिकार मांगती है, पर्यावरण संरक्षण होता है, परिवेश प्रदूषण मुक्त होता हो स्वास्थ्यप्रद भोजन तथा मानव अधिकार मिलते हों। इससे सत्ताधीशों को अपने सिंहासन डगमगाने का डर लगता है!

केंद्र की नई सरकार ने गंगा, काशी की सफाई करने का दावा है। लेकिन गंदगी तो प्रधानमंत्री कार्यालय, गृहमंत्रालय और खुफिया एजेंसी के दफ्तर तक ही नहीं बल्कि दिमाग में प्रवेश कर चुकी है। क्या इस गंदगी की सफाई को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी?

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