कृषि ही दक्षिण कोरिया का भविष्य

Submitted by Hindi on Wed, 07/30/2014 - 11:08
Source
कल्पतरू एक्सप्रेस
दक्षिण कोरिया के निर्यात का 82 प्रतिशत केवल 30 बड़े उद्योगपतियों, जिन्हें कोरिया में चाईबोल कहा जाता है, के हाथ में है। कृषि के प्रति सरकार की अनिच्छा से यह देश अब खाद्यान्नों हेतु कमोबेश विदेशों पर आश्रित है। दो दशक पहले यहां के 50 प्रतिशत नागरिक किसान थे जो अब मात्र 6.2 प्रतिशत रह गए हैं। लेकिन इस अंधकार के बीच आशा की किरण भी दिखाई दे रही है।

व्यापारिक दुनिया में दक्षिण कोरिया विश्व की 15वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसे निर्यातोन्मुखी बड़े निगमों जैसे सैमसंग, हुंडई, एलजी, डेवू ने अपने नियंत्रण में रखा हुआ है। ‘चाईबोल राष्ट्र’ कहलाने वाली दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था में 30 सर्वोच्च चाईबोलों का देश के निर्यात में 82 प्रतिशत का हिस्सा है। कल्पना करना कठिन है कि मात्र दो पीढ़ी पूर्व कृषि इस देश की रीढ़ थी। 1970 के दशक में इस देश की जनसंख्या का 50 प्रतिशत किसान थे जो अब घटकर मात्र 6.2 प्रतिशत रह गए हैं। दक्षिण कोरिया का कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से औद्योगिक अर्थव्यवस्था में तेज रूपांतरण अनायास ही नहीं हो गया।

1980 के दशक के प्रारंभ में सामने आई उदारवादी नीतियों व सरकारी विकास मॉडल ने मान लिया था कि अब कृषि कोरिया का अतीत है, भविष्य नहीं। यहां की कृषि पर बड़ी चोट 1994 में पड़ी जब उसने विश्व व्यापार संगठन एवं कृषि पर समझोते को स्वीकार कर लिया और अपने छोटे किसानों को दी जाने वाली सभी छूटों एवं सब्सिडी बंद कर दी। इसका प्रभाव यह पड़ा कि दक्षिण कोरिया आज अपनी आवश्यकता का महज 20 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादन कर पाता है, जबकि 1970 के दशक में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत था।

यदि दक्षिण कोरिया के चाईबोल एवं राजनेता अपने तरीके से काम करते रहे तो दक्षिण कोरिया का कृषि क्षेत्र जो कि छोटे किसानों पर निर्भर है, वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा न कर पाने लायक ठहराए जाने के तर्क पर शीघ्र ही विलुप्त हो जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि हमारा देश कम विकसित देशों से सस्ता अनाज आयात कर सकता है और इसमें कोरिया से बाहर अफ्रीका व दक्षिण पूर्व एशिया में जमीन खरीदकर खेती करना तक शामिल है। इसके बावजूद दक्षिण कोरिया के किसान अपनी वापसी का संघर्ष जारी रखे हुए हैं। वे दो दशकों से विश्व व्यापार संगठन एवं द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझोतों का मुखर विरोध कर रहे हैं।

साथ ही देश में वे घरेलू खाद्य सार्वभौमिकता आंदोलन जारी रखे हुए हैं जो कि पारिस्थितिकीय तौर पर टिकाऊ, सामाजिक समानता और स्वास्थ्यकर भोजन को प्रोत्साहन देते हुए ग्रामीण आजीविका व कृषि समुदाय के पुनुरुद्धार को प्रोत्साहित करता है। परिणामस्वरूप यह जैविक खेती का एशिया में नया नायक बन गया है। यहां पर अंतरराष्ट्रीय जैविक कृषि आंदोलन संघ ने अपने कार्यालय भी स्थापित कर दिए हैं। यहां विशेषकर दो संगठन कोरिया महिला कृषक संगठन व हांसालिम ने इसमें महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।

कोरिया महिला कृषक संगठन के एक अनुषंग, माय सिस्टर्स गार्डन (मेरी बहनों का बगीचा) की जीओंग यीओल किम कहती है, ‘‘पूंजीवाद में भोजन को अस्तित्व का रक्षाकवच मानने की बजाय वस्तु की तरह बेचा जाता है। हमारा विश्वास है कि इस खाद्य समस्या से निपटने का एक मात्र उपाय किसानों को फलने फूलने के अवसर देना है। ’’उनका मानना है कि आज के बच्चों का ग्रामीण भूमि से कोई रिश्ता नहीं रह गया है। ऐसे में हमारी यह जिम्मेदारी भी है कि खाद्य उत्पादन की प्रक्रिया समझने में बच्चों की भागीदारी हो।

कोरिया की लोककथाओं में मोठ की फली या ‘नोक्डु’ को किसानों के लिए शुभ माना जाता है। यह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी फलती फूलती है। उम्मीद है कि ठीक इसी तरह तमाम विपरीत अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी कोरिया के किसान वैकल्पिक अर्थव्यवस्था का निर्माण व पारंपरिक खाद्य उत्पादन जारी रखेंगे।इसका समाधान छोटी जोत की खेती में है जिससे प्रत्येक किसान को ठोस नींव मिल सके। उनकी इस प्रक्रिया में प्रत्येक किसान ने 15 घरों में खाद्य पदार्थो की आपूर्ति का काम हाथ में लिया है और इससे उन्हें 15 लाख वॉन या 1400 डॉलर (85,000 रु.) प्रतिमाह तक की आमदनी हो जाती है। इस परियोजना या उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना नहीं बल्कि उपभोक्ता और उत्पादक के मध्य भागीदारी को मजबूत बनाना है। उम्मीद है कि इस प्रक्रिया से घटती ग्रामीण आबादी को पुन: गांवों की ओर वापस लाया जा सकेगा।

इस परियोजना का एक अन्य उद्देश्य कोरिया की वर्तमान कृषि व्यवस्था में महिलाओं को बराबरी का स्थान दिलाकर उन्हें सशक्त बनाना भी है। इसी कार्यक्रम के अंतर्गत सदस्यों ने कोरिया के पारंपरिक बीजों का उत्पादन भी प्रारंभ कर दिया है। समिति को महिला कृषकों के अधिकारों की रक्षा एवं कोरिया के देशी बीजों में निहित सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हेतु 2012 का खाद्य सार्वभौमिकता पुरस्कार भी प्रदान किया गया है।

सन 1986 में अमेरिका व दक्षिण कोरिया द्वारा किसानों के बाजार को प्रतिस्पर्धा हेतु खोलने के काफी पहले से कोरिया के किसानों एवं उपभोक्ताओं ने ‘हांसालिम’ कार्यक्रम प्रारंभ कर दिया था। 2,000 उत्पादकों एवं 3,80,000 उपभोक्ता सदस्यों के साथ हांसालिम दुनिया का सबसे बड़ा व सबसे सफल कृषि सहकारिता उद्यम है।

इसने एक ऐसी वैकल्पिक अर्थव्यवस्था तैयार की है जो कि जैविक कृषकों एवं स्थानीय कृषि को मदद पहुंचाती है, स्वास्थ्यकर भोजन उत्पादित करती है और इस प्रक्रिया में पर्यावरण की सुरक्षा करती है। वैश्विक वित्तीय संकट के चलते भी इसकी वार्षिक बिक्री में 20 प्रतिशत का इजाफा हो रहा है।

हांसालिम कृषक जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन कोरिया में कृषि के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। संस्था के वून सी ओक का कहना है, ‘इसीलिए हम केवल स्थानीय खाद्यों में ही लेन-देन करते हैं। हांसालिम पद्धति से हम जलवायु परिवर्तन से भी निपट सकते हैं।’

हांसालिम कोरिया में पशु चारे का एकमात्र कारखाना भी चलाता है। इसमें नजदीक के किसानों से प्राप्त पदार्थ प्रयोग में लाए जाते हैं। हांसालिम उपभोक्ताओं को स्थानीय स्तर के उत्पादों के लाभ से भी अवगत कराता है। साथ ही इस प्रक्रिया में होने वाली ऊर्जा बचत को भी सामने लाता है। ग्राहकों को इससे ऊर्जा बचत की मात्रा समझने के लिए बिजली के घंटों, टेलीविजन देखने आदि से इस पद्धति की तुलना करके बताता है।

उपरोक्त दोनों प्रयोग सरकार की उदारवादी नीतियों का प्रत्युत्तर हैं और बताते हैं कि चाईबोलो को प्रश्रय देने के लिए किस प्रकार कृषि के साथ सौतेला व्यवहार किया गया है। दक्षिण कोरिया ने 9 द्विपक्षीय समझोतों पर हस्ताक्षर किए हैं और 12 अभी हस्ताक्षर की प्रक्रिया में हैं, जिसमें एक त्रिपक्षीय समझोता जापान व अमेरिका के साथ शामिल है।

अनुमान लगाया जा रहा है कि इन समझोतों के लागू होने के बाद कोरिया के 45 प्रतिशत किसान विस्थापित हो जाएंगे। कोरिया महिला कृषक समिति और हांसालिम पर भी खतरा मंडराने लगा है। वहीं 10 लाख परिवारों के इस तरह के संगठनों के सदस्य बन जाने से प्रतिकार की राह भी खुली है। वैसे सन 1894 में भी कोरिया के किसान अपने पर अत्यधिक कर लगाने के खिलाफ संघर्ष कर चुके हैं।

बाद में वे चीन, जापान, रूस और अमेरिका के जबरिया प्रवेश का मुकाबला भी किया। यहां के किसानों का विश्वास समानता में है। कोरिया की लोककथाओं में मोठ की फली या ‘नोक्डु’ को किसानों के लिए शुभ माना जाता है। यह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी फलती फूलती है। उम्मीद है कि ठीक इसी तरह तमाम विपरीत अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी कोरिया के किसान वैकल्पिक अर्थव्यवस्था का निर्माण व पारंपरिक खाद्य उत्पादन जारी रखेंगे।

(क्रिस्टीनी अहं कोरिया नीति संस्थान की संस्थापक निदेशक हैं और एंडा रीअल कन्नार फूड फर्स्ट/खाद्य एवं विकास नीति संस्थान के फेलो हैं)

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