खनन से गंगा तट पर बसे गांव में तेजी से गिर रहा भूजल स्तर

Submitted by admin on Fri, 08/01/2014 - 11:02
.पंजनहेड़ी/ कटारपुर (हरिद्वार) गंगा तट के किनारों के आसपास पोपुलर के पेड़ों के खेतों के बीच बसे इन गांवों में खनन अब स्थायी हो गया है। पंजनहेड़ी के साधुराम कहते हैं, खनन हो कहां नहीं रहा है। सारे गांवों में हो रहा है और नियमित हो रहा है और हम लाठी-गोली के साए में जीते हैं।

इन गांवों में आने वाले हर आदमी को शक की नजरों से देखा जाता है। छोटे-छोटे बच्चे बार-बार की कोशिश के बाद ही मुंह खोलते हैं। उन्हें समझाया गया है कि वे बाहरी लोगों से कोई बात नहीं करें।

कटारपुर गांव के अक्षय मक्की के खेत में पानी देने में व्यस्त हैं, खनन कितने बजे होता है, सर रात 8 से सुबह आठ तक। इतना बोलकर फिर खेत में चले जाते हैं। गांव के बाहर गंगा तट से तकरीबन 30 मीटर दूर स्थित शिव मंदिर में बाबा बृहस्पत पिछले 10 सालों से टिके हैं।



बिना लाग लपेट कहते हैं, खनन होता है, थोड़ी दूर पर एक साध्वी का आनंद स्वरूप आश्रम है, वहां से कुछ दूर जाकर देखो। गंगा के किनारे बनी झुग्गियां और खड़े ट्रैक्टर ट्रालियां गवाह हैं कि बंद होने के बावजूद खनन माफिया का खेल यहां खुला चलता है।

अवैध खनन ने नदी के बेड को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है। कई जगह तो गंगा अपना रास्ता बदल रही है। खनन सेे गंगा में कई गहरे जोहड़ पैदा हो गए हैं। इससे आसपास के गांव का जलस्तर काफी प्रभावित हुआ है, कारण कि गंगा तट के किनारों से हटकर खनन एकदम नदी के बीच में हो रहा है। पत्थर तो सैकड़ों वर्षों से गंगा में जमे हुए हैं, को निकाला जा रहा है।इससे आपास के गांवों का भूजल स्तर तेजी से प्रभावित हो रहा है। ऊपर से पोपुलर की खेती ने भी भूजल स्तर गिराने में खासी भूमिका निभाई है। पोपुलर की खेती यहां इतनी लोकप्रिय हो गई है कि चारों ओर पोपुलर का जंगल सा दिखाई देता है।

यहां के युवक राजेश कहते हैं, सब जानते हैं कि पोपुलर जमीन का पानी ज्यादा खींचता है, लेकिन पोपुलर में कमाई फिलहाल अच्छी है तो पानी का सवाल गौण हो जाता है। किशनपुर, अजीतपुर, मिसरपुर, पंजनहेड़ी में भूजल स्तर पिछले 10 साल में लगातार गिरा है। किशनपुर के बुजुर्ग धांधु की माने तो पिछले आठ साल में भूजल स्तर 5 फुट नीचे चला गया है।

अवैध खनन ने नदी के बेड को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है। कई जगह तो गंगा अपना रास्ता बदल रही है। खनन सेे गंगा में कई गहरे जोहड़ पैदा हो गए हैं। इससे आसपास के गांव का जलस्तर काफी प्रभावित हुआ है, कारण कि गंगा तट के किनारों से हटकर खनन एकदम नदी के बीच में हो रहा है।

पत्थर तो सैकड़ों वर्षों से गंगा में जमे हुए हैं, को निकाला जा रहा है। जब नदी में गहरी खुदाई होगी तो देर- सवेर अपनी प्रकृति को बचाए रखने के लिए भूजल स्तर नीचे जाएगा ही, कारण कि नदी के तट प्रभावित होते हैं। कई जगह तो तट खत्म ही हो गए हैं। परिणामत: पानी ठहरता ही नहीं। जब भी पानी का बहाव तेज होता है वह सब कुछ ध्वस्त करते हुए चला जाता है। तट बह जाते हैं, माफिया तटबंध बनाता भी नहीं है।

इसी का परिणाम है कि इन गांवों में गंगा के किनारे आर्द्रता का अभाव साफ दिखता है। फिर गंगा के पानी का बड़ा हिस्सा तो गंगनहर में चला जाता है। 1840 में प्रॉवी कांटले ने गंगानहर बनाई थी। इससे पहले गंगा का मूल प्रवाह कभी इतना प्रभावित नहीं हुआ। उस वक्त तक हरिद्वार में गंगा का प्रवाह 8500 क्यूसिक होता था। उस समय 7000 क्यूसिक पानी को सिंचाई के निए गंगनहर में डाल दिया और गंगा में केवल 1500 क्यूसिक ही रखा यानी गंगा की निचली धारा को यह पानी मिला।

हरिद्वार में गंगा खननखनन को लेकर यहां के भारतीय जनता पार्टी के विधायक यतीश्वरानंद को लेकर भी लोग कई तरह के सवाल उठाते हैं। मिसरपुर के एक किसान कहते हैं, उनके पास रोज शिकायतें जाती हैं, लेकिन कुछ नहीं होता। अब यहां से विधायक और सांसद दोनों प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के हैं। लेकिन लगता है कि गंगा दोनों की ही एजेंडे में बड़ा सवाल नहीं है। शायद ऐसा होता तो खनन माफिया के विरोध में बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकते थे।

हर की पौड़ी (हरिद्वार) कई बरस से हरिद्वार में रह रहे श्रावस्ती के दुर्गेश तिवारी ने जब बताया कि जिसने हर की पौड़ी की गंगा आरती नहीं देखी और गंगा में डुबकी नहीं लगाई, उसका हरिद्वार आना बेकार। दुर्गेश की इस बात को सुन मैं शाम के समय हर की पौड़ी पर पहुंची। गंगा आरती शुरू हो चुकी थी, असंख्य लोग पूरे भक्ति भाव में हाथों में धूप-दीप, नैवेद्य लिए गंगा आरती में लीन थे।

अभी गंगा आरती वाले घाट पर उतर ही रहा था कि कई बच्चों का हुजूम मेरे ऊपर टूट पड़ा। कई के हाथ में पत्ते के दोनानुमा फूलों की टोकरी और दीप, अगरबत्ती थे। दो के हाथ में गमछे और थैले तो दो-तीन के हाथ में आटे की गोलियां थीं जो पांच रुपए-दस रुपए में मछलियों को गोलियां खिलाकर घर में लक्ष्मी आने की बात कह रहे कुछ ही देरी में गंगा आरती समाप्त हो गई और हजारों की संख्या में गंगा में जलते-बुझते दीप और नए पुराने कपड़े तैरते दिखाई देने लगे।

हरिद्वार में बाबाओं का लोकतंत्र चलता है। उनके संकेतों पर भक्त ही नहीं शासन, प्रशासन भी चलता है। देश के आम आदमी से लेकर प्रधानमंत्री तक उनके दरबारों की शोभा बढ़ाते हैं। लेकिन इस कड़वे को भी कोई नहीं नकार सकता कि गंगा यहीं से सर्वाधिक प्रदूषित भी होती है। कचरा और खान जो गंगा को सबसे अधिक हानि पंहुचाते हैं, यहां जमकर होता है।

हरिद्वार में गंगा में नालान यहां आने वाले पर्यटकों को, न बाबाओं के भक्तों को और न ही बाबाओं को इस बात की परवाह थी कि उन्होंने अभी जिस गंगा की आरती की है, उसी गंगा को अपने कृत्य से वे गंदा और प्रदूषित कर रहे हैं। वहां मिले दक्षिण भारतीय साधु गंगारमी 25 साल पहले यहां आए थे, अब गंगा में रम गए तो गंगारमी।

गंगा मुक्ति-शुद्धि कैसे हो, सवाल पर थोड़ा नाराज हो अंग्रेजी में कहते हैं-गंगा हमें मुक्त करती हैं, जब वह चाहेगी एक और झटका देगी और सब कुछ शुद्ध हो जाएगा। फिर पूजा शब्द की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि प्रो. मार्क कोलिस ने कहा है- द्रविड़ शब्द पु यानी पूज्य, और चय यानी चढ़ाना मिलकर बना है पूजा।

तमिल में पु और चय मिलाकर पुचायी, पुजायी और पूजा शब्द बनते हैं। फिर कहते हैं, सब गंगा भक्तों की पूजा के लिए एक पुष्प काफी है। हम पहले तो पत्र-पुष्प तोड़कर वृक्षों की हानि करते हैं और फिर इन्हें गंगा में प्रवाहित कर गंगा की।

कोई दस कदम भी नहीं चला था कि तकरीबन 17-18 साल का एक युवक सामने एक रसीद बुक के साथ खड़ा हो गया। बोला- भाई साहब गंगा मैया के रखरखाव के लिए कुछ दान कर दीजिए। मैं बिना कुछ बोले आगे बढ़ गया। बाद में मित्र प्रोफसर सुखनंदन ने बताया कि यहां बहुत सभाएं हैं। गंगा के नाम पर, गाय के नाम पर और गायत्री के नाम पर। साथी मुकेश बोले, सर यहां गंगा और गाय सबसे अधिक बिकते और बेचे जाते हैं।

यह उस वक्त सच भी लगा जब गाय को रोटी, हरा चारा और गुड़ खिलाने का धंधा करने वाले एक युवक ने पितरों की शांति के नाम पर गाय के भोजन के लिए हमसे 50 रुपए की मांग की। लेकिन जब गाय को रोटी-गुड़ खिलाने लगे तो उसने मुंह फेर लिया। गाय यहां पूरी तरह छकी रहती हैं, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस देश में सबसे अधिक दुर्गति गंगा और गाय की हुई है। इन दोनों के दम पर बड़े-बड़े संतों का साम्राज्य चलता है। इस बात पर आज तक बाबाओं के बीच कोई गंभीर चिंतन-मनन नहीं हुआ कि गंगा और गाय की इतनी दुर्गति क्यों नहीं रुकी।

जब कुंभ मेले में शाही स्नान के लिए साधु शासन, प्रशासन, सत्ता और सरकार को हिला सकते हैं तो गंगा शुद्धि के लिए कोई आंदोलन क्यों नहीं खड़ा सकते।

हरियाणा के लोगों से हरिद्वार के प्रबुद्ध लोगों को बहुत शिकायते हैं। गुरुकुल कांगड़ी के एक प्रोफेसर ने यह बात मुझे कही तो मेरे साथ घूम रहे हरियाणावी को खराब लगा, लेकिन जब वापस रात के ठिकाने जांगिड़ भवन की ओर बढ़ा तो गंगाजल में शराब की बोतल ठंडी करके पीते तीन-चार हरियाणवियों को देखा तो वह भी हतप्रभ रह गया।

गंगा औऱ गाय दोनों की दुर्दशाबाद में यहां मिले बहादुरगढ़ के अनूप अहलावत ने रह-रहकर इस बात की पुष्टि की। यहां के बहुसितारा आश्रमों और धर्मशालाओं के एक बड़े हिस्से पर हरियाणा के साधुओं, सेठों का कब्जा है। मोक्षदायिनी गंगा में लोग मुक्ति के लिए आते हैं, लेकिन जाति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे यहां भी नहीं जाति। यहां बने ब्राह्मण भवन, अग्रवाल भवन, जागिड़ ब्राह्मण भवन जाति के अहंकार की तुष्टि करते हैं।

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