गंगा मुद्दा क्यों नहीं?

Submitted by Hindi on Fri, 08/01/2014 - 11:31
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Source
कल्पतरू एक्सप्रेस, 20 अप्रैल 2014
जिस गंगा को हम सदियों से पूजते आए हैं, जिसके किनारे हमारी सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ है, आज वही गंगा संकट के कगार पर है। लगातार कल-कारखानों और घरों से निकलने वाले जहरीले रसायनों और गंदे पानी ने इसकी स्वच्छता और पवित्रता को भंग कर दिया है। सरकार के करोड़ों रुपये भी गंगा के मैलेपन को धो नहीं सके हैं। हां, इतना जरूर हुआ है कि इन रुपयों को भ्रष्टाचार का दानव लील चुका है। प्रदूषण के कहर से कराहती गंगा अब मुक्ति चाहती है। अफसोस कि सबको मुक्ति दिलाने वाली गंगा की ‘मुक्ति’ का प्रश्न सियासी दलों के एजेंडेे से गायब है। आखिर क्यों?

गंगा भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की प्रतीक है। हजारों साल की आस्था और विश्वास की पूंजी है। मोक्षदायिनी है। उसका जल अमृत है। शास्त्रों में कहा गया है कि ‘गंगे, तव दर्शनात मुक्ति’ यानी गंगा के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। लेकिन, आश्चर्य इस बात पर है कि आम चुनाव में गंगा मुद्दा नहीं है। वह सियासी दलों के चुनावी एजेंडे से गायब है। किसी भी दल ने अपने एजेंडे में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का संकल्प व्यक्त नहीं किया है। सिर्फ थोथे वादे किए गए हैं जिसका कोई मूल्य-महत्त्व नहीं है।

गत 20 फरवरी को गंगा बेसिन अथॉरिटी का गठन हुए पांच साल हो गए, परंतु कोई जवाब देने को तैयार नहीं कि गंगा अभी तक प्रदूषण से मुक्त क्यों नहीं हुई, जबकि इस पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। आलम यह है कि आज गंगा बेसिन में प्रतिदिन 275 लाख लीटर गंदा पानी बहाया जाता है, जिसमें 190 लाख लीटर सीवेज एवं 85 मिलियन लीटर औद्योगिक कचरा होता है।

पिछले दिनों वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में कहा गया कि प्रदूषण की वजह से गंगा नदी में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरे को बहाने से क्रोमियम एवं मरकरी जैसे घातक रसायनों की मात्रा बढ़ी है। भयंकर प्रदूषण के कारण गंगा में जैविक ऑक्सीजन का स्तर पांच हो गया है, जबकि नहाने लायक पानी में कम से कम यह स्तर तीन से अधिक नहीं होना चाहिए।

गोमुख से निकलने के बाद तकरीबन 2500 किमी. के मार्ग में कॉलीफार्म बैक्टीरिया की उपस्थिति दर्ज की गई है जो अनेक बीमारियों की जड़ है। पिछले दिनों औद्योगिक विष-विज्ञान केंद्र लखनऊ के वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि गंगा के पानी में ई-कोलाई बैक्टीरिया मिला है जिसमें जहरीला जीन है। वैज्ञानिकों ने माना कि बैक्टीरिया की मुख्य वजह गंगा में मानव और जानवरों का मल बहाया जाना है। ई-कोलाई बैक्टीरिया की वजह से सालाना लाखों लोग गंभीर बीमरियों की चपेट में आते हैं। प्रदूषण के कारण गंगा के जल में कैंसर के कीटाणुओं की संभावना प्रबल हो गई है। जांच में पाया गया है कि पानी में क्रोमियम, जिंक, लेड, आर्सेनिक, मरकरी की मात्रा बढ़ती जा रही है।

वैज्ञानिकों की मानें तो नदी जल में हैवी मेटल्स की मात्रा 0.01-0.05 पीपीएम से अधिक नहीं होनी चाहिए, जबकि गंगा में यह मात्रा 0.091 पीपीएम के खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। सफाई अभियान के बावजूद गंगा के जल में कलर का मान 30 हैजेन तक बना हुआ है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने की ठोस पहल नहीं हो रही है।

ऐसा नहीं है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए योजनाएं नहीं बनीं। लेकिन, सच्चाई यह है कि योजनाओं को जमीनी आकार नहीं दिया गया। 1989 में राजीव गांधी की सरकार गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट योजना अमल में लाई। किंतु, जनसहभागिता के अभाव में योजना को पलीता लग गया। जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गंगा बेसिन अथॉरिटी का गठन हुआ तो उम्मीद जगी कि गंगा प्रदूषण से मुक्त होगी, पर पांच साल बाद गंगा पहले से भी कहीं ज्यादा प्रदूषित हो गई। वस्तुत: इसका मूल कारण गंगा के प्रति शासकों और सरकार की उदासीनता है।ऐसा नहीं है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए योजनाएं नहीं बनीं, लेकिन सच्चाई यह है कि योजनाओं को जमीनी आकार नहीं दिया गया। 1989 में राजीव गांधी की सरकार गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट योजना अमल में लायी, किंतु जनसहभागिता के अभाव में योजना को पलीता लग गया। जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गंगा बेसिन अथॉरिटी का गठन हुआ तो उम्मीद जगी कि गंगा प्रदूषण से मुक्त होगी, पर पांच साल बाद गंगा पहले से भी कहीं ज्यादा प्रदूषित हो गई। इसका मूल कारण गंगा के प्रति शासकों और सरकार की उदासीनता है। सरकार के रुख से नाराज होकर गंगा बेसिन अथॉरिटी से जुड़े तीन गैर-सरकारी सदस्य मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त राजेंद्र सिंह, रवि चोपड़ा तथा आरएच सिद्दीकी ने इस्तीफा दे दिया।

इससे पहले प्रख्यात पर्यावरणविद् और आइआइटी खड़गपुर के सेवानिवृत शिक्षक स्वामी ज्ञानस्वरुप सांनद (जीडी अग्रवाल) द्वारा भी गंगा विमुक्ति का अभियान चलाया जा चुका है। कई बार आमरण अनशन किए गए, लेकिन सरकार उनकी मांगों पर गौर नहीं फरमा रही है। इसके अलावा स्वामी स्वरुपानंद भी गंगा की सफाई के लिए आंदोलन छेड़े हुए हैं। दिल्ली में संत समाज भी गंगा पर बन रहे बांधों को समाप्त करवाकर उनकी धारा अविरल बनाए रखने के लिए छह प्रस्ताव पारित कर चुका है।

गत वर्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी निर्देश दिया कि सरकार गंगा किनारे दो किलोमीटर के दायरे में पॉलिथीन एवं प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाए। सरकार ने आदेश के पालन का फरमान तो जारी कर दिया, किंतु उसका पालन नहीं हो रहा है। नतीजा देश भर में गंगा के तट पर प्रदूषित करने वाली सामग्री अटी पड़ी है। गौरतलब है कि गंगा बेसिन अथॉरिटी की स्थापना गंगा कार्ययोजना के दो चरणों की विफलता के बाद की गयी। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा प्रस्तुत करते हुए केंद्र सरकार ने कहा था कि गंगा मिशन के तहत सुनिश्चित किया जाएगा कि 2020 के बाद गैर शोधित सीवर और औद्योगिक कचरा गंगा में न बहाया जाए, लेकिन वह वायदे की कसौटी पर खरी नहीं उतरी।

दरअसल सरकार की नजर में गंगा महज बिजली पैदा करने का संसाधन है, जबकि पर्यावरणविद् एक अरसे से गंगा पर बांध बनाए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि गंगा पर हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट लगाने से पर्यावरणीय असंतुलन पैदा होगा।

उत्तर काशी क्षेत्र में लोहारी नागपाला पनबिजली परियोजना को पुन: हरी झंडी दिखाई गई तो गंगोत्री से उत्तरकाशी के बीच गंगा का तकरीबन सवा सौ किलोमीटर लंबा क्षेत्र सूख जाएगा। पर्यावरणविदों का तर्क है कि अगर गंगा पर प्रस्तावित सभी बांध अस्तित्व में आए तो गंगा का 39 फीसद हिस्सा ङील बन जाएगा। इससे प्राकृतिक आपदाओं की संभावना बढ़ जाएगी। गंगा पर बनाए जाने वाले 34 बांधों और गंगा की कोख के खनन को लेकर संत समाज एक अरसे से आंदोलित है।

आज से तीन साल पहले गंगा के किनारे अवैध खनन के खिलाफ आंदोलनरत 34 वर्षीय निगमानंद को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। इसके बावजूद खनन का काम जारी है। सरकार को समझना होगा कि गंगा का जितना आर्थिक महत्त्व है, उससे कहीं ज्यादा धार्मिक, सांस्कृतिक व पर्यावरणीय महत्त्व है। गंगा लोगों की आस्था से जुड़ी है, लेकिन यह आस्था भी गंगा प्रदूषण के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। गंगा के घाटों पर हर वर्ष लाखों शव जलते हैं। शवों को जल में फेंका जाता है। दूर स्थानों से जलाकर लाई गई अस्थियों को विसर्जित किया जाता है। क्या ऐसी आस्थाएं गंगा को प्रदूषित नहीं कर रही हैं? हद तो यह है कि गंगा सफाई अभियान से जुड़ी एजेंसियां भी गंगा से निकाली गई अधजली हड्डियां और राखों को पुन: गंगा में उड़ेल देती हैं।

आखिर इस सफाई अभियान से गंगा प्रदूषण से मुक्त कैसे होगी? समझना होगा कि जब तक आस्था के उमड़ते सैलाब पर नैतिक रोक नहीं लगेगी, तब तक गंगा को प्रदूषण से मुक्त नहीं किया जा सकता। गंगा की निर्मलता और पवित्रता बनाए रखने के लिए समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और संत समाज सबको एक मंच पर आना होगा।

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