सूखे से निबटना असंभव भी नहीं

Submitted by HindiWater on Tue, 08/05/2014 - 10:30
Source
पंचायतनामा, 28 जुलाई - 3 अगस्त, 2014, पटना

विश्व भर के पच्चीस चुनिंदा वैज्ञानिकों द्वारा अनुमोदित इस रिपोर्ट में दुनिया का तापमान दो से तीन डिग्री बढ़ जाने की स्थिति में दक्षिण एशिया सहित विश्व के अन्य भागों में कृषि-उत्पादन, जल-संसाधन तथा तटीय इलाके के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया गया है। तापमान में बढ़ोतरी के साथ बारिश की नियमतिता में हेर-फेर होगा। कहीं ज्यादा बारिश होगी तो कहीं सूखा पड़ेगा। बाढ़ आएगी, बीमारियां बढ़ेंगी और इन सारी बातों के कारण आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों की जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगी।

सूखा दुनिया में करीब 84 करोड़ लोगों को भुखमरी का शिकार बनाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। यह एक ऐसी बड़ी प्राकृतिक आपदा है, जो दुनिया के किसी-न-किसी भाग में लगभग नियमित रूप से अपना असर डालती रही है। तकनीकी रूप में किसी स्थान पर दीर्घकालीन औसत के आधार पर 90 प्रतिशत से कम वर्षा होना, सूखे की स्थिति माना जाती है। जहां कहीं भी उसका असर होता है। उस क्षेत्र या देश में कृषि उद्योग, अर्थतंत्र, वाणिज्य, खाद्य व्यवस्था, स्वास्थ्य प्रणाली तबाह हो जाती है। भौगोलिक और मौसम वैज्ञानिक स्थिति के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का अधिकतर इलाका बार-बार सूखा से प्रभावित होता है।

दक्षिण पश्चिम मॉनसून से होने वाली वर्षा की मात्रा में अनियमितता भारत में सूखा पड़ने का प्रमुख कारण है। भारत में सन् 1891 से 2002 के बीच कुल 22 बार भीषण सूखा पड़ा। पिछले 100 सालों में केवल तीन बार 1904-05, 1965-66 और 1986-88 में सूखा पड़ने की घटनाएं हुई। सूखे से फसलों को व्यापक नुकसान होता है, जिससे अनाज और चारे की भारी किल्लत हो जाती है।

भूमिगत जल के स्तर तथा गुणवत्ता में गिरावट से स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। सूखे के दौरान राहत कार्यों पर खर्च की गई राशि से सरकार के संसाधनों पर बोझ बढ़ जाता है। अनुमान है कि वर्ष 2002-03 में केंद्र ने सूखे से प्रभावित राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों को 11.57 करोड़ रूपये की भारी रकम सहायता के रूप में दी।

इसी तरह सूखे से 1996-2001 के दौरान 13.8 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। सूखे के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए भारत सरकार ने पिछले करीब तीन दशकों में कई दीर्घकालीन और अल्पकालीन नीतियां बनाई है और संबंधित राज्यों के सहयोग से राहत और विकास कार्यक्रम लागू किए है।

इन उपायों में पर्याप्त अनाज और चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना, भूतलीय और भूमिगत जल का युक्ति संगत उपयोग, सूखे की आशंका वाले राज्यों से मवेशियों के पलायन को रोकना, जानवरों के कैंपों में मवेशियों की नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच, सही फसलों, फसल चक्र और कृषि वैज्ञानिक तौर तरीकों का चयन, सूखे से प्रभावित लोगों की अतिरिक्त आमदनी बढ़ाना, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाना और काम के बदले अनाज, बरानी खेती वाले इलाकों में राष्ट्रीय जलागम क्षेत्र, सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास कार्यक्रम आदि शामिल है।

सूखे का असर कम करने के इन कार्यक्रमों के विश्लेषणात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि कुछ फायदेमंद अपवादों को छोड़ कर उनकी उपलब्धियां बड़ी फीकी और एकतरफा रही हैं और कुछ मामलों में तो ये कार्यक्रम पूरी तरह असफल रहे हैं। सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति ने दो महत्वपूर्ण कार्यक्रमों यानी सन् 1974 के सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों के कार्यक्रम और सन् 1977-78 के सूखा विकास कार्यक्रम की उपलब्धियों को निराशाजनक बताया है।

सूखे से निपटने के उपाय


देश में चलाए गए सूखा राहत कार्यक्रमों की समग्र विफलता से यह जरूरी हो जाता है कि नए उपायों को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जाए। भीषण या सामान्य सूखा तो देश में लगभग हर दो साल बाद पड़ता ही रहा है। अत: भविष्य की संभावनाओं के आधार पर अधिक विस्तृत और समन्वित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। सूखा उपाय के तहत चलाए कार्यक्रमों को समन्वित रूप से स्थाई आधार पर लागू किया जाना चाहिए। स्थान एवं समय संबंधी पर्याप्त आंकड़े एकत्र करने के लिए जोरदार प्रयास करने की आवश्यकता है।

देश में प्रसार सेवाओं को पेशेवर तरीके से मान्यता दी जानी चाहिए। इन सेवाओं के माध्यम से वैज्ञानिकों को फीडबैक मिलने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। देश में उपयुक्त कृषि तकनीक जैसे कम मात्रा में सिंचाई, पूरक सिंचाई, शून्य सिंचाई, संचित वर्षा जल के कारगर प्रयोग, परती भूमि में ऊंची क्यारियां बना कर सिंचाई और देश में ही विकसित केसर आधारित भूमि समतलीकरण तकनीक को लोकप्रिय बनाया जाना चाहिए।

देश में खेती वाले अधिक से अधिक क्षेत्र को सिंचित खेती के दायरे में लाया जाना चाहिए। सूखा प्रबंधन कार्यक्रम में सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक


कृषि वैज्ञानिक रामकेवल ने बताया कि सूखे में मूली, मूंग, अरहर, सरसों और अन्य प्रकार की फसलों को खेतों मेंउगाए जो कम कम लागत में हो सकते है।

सीएसआर के तहत कृषि की जिम्मेवारी भी परिभाषित करेगी सरकार!


हाल में पेश किए गए केंद्र सरकार के बजट में निजी कंपनियों की सामाजिक जिम्मेवारी (सीएसआर) के तहत उन्हें स्लम (मलीन) बस्तियों की जिम्मेवारी सौंपी गई है। यानी केंद्र सरकार के प्रावधान के अनुसार, निजी कंपनियों को अब पिछड़ी व गरीब बस्तियों के विकास के लिए कार्य करना होगा। यह सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है। लेकिन ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या कंपनियां अपने सीएसआर यानी सामाजिक जिम्मेवारी के तहत खेती को बेहतर बनाने के लिए भी कार्य करती हैं? क्या वे इस तरह का कार्य करेंगी? और, क्या सरकार इस तरह का कोई तयशुदा दिशा-निर्देश वैसी कंपनियों को भी देगी?

हालांकि अभी कृषि के लिए किए जाने वाले सीएसआर कार्यों में सरकार व निजी स्तर पर बहुत स्पष्टता नहीं है। लेकिन कई कंपनियां सीएसआर के तहत कार्य कर रही हैं। उदाहरण के लिए आधुनिक ग्रूप अपने प्रोजेक्ट एरिया व उसके आसपास कई तरह के प्रोजेक्ट चलाता है। कंपनी महिला सशक्तीकरण, पंचायती राज सशक्तीकरण,आजीविका, स्वास्थ्य सुविधा, ऐंबुलेंस सेवा के लिए कार्य करती है। वहीं, यह कंपनी कृषि के विकास के लिए अन्नदायनी नाम से एक प्रोजेक्ट चलाती है।

कंपनी के इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य खेती की उपज बढ़ाना है। कंपनी झारखंड व ओड़िशा में इस तरह का प्रोजेक्ट चला रही है। कंपनी लातेहार जिले के मारंगलोइया ग्राम पंचायत के हेबना गांव के 13 किसानों एवं ओड़िशा के मयूरभंज जिले के मयूरधर ग्राम पंचायत के 50 किसानों को आधुनिक व वैज्ञानिक विधि से खेती करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। वहीं, एस्सार, इल्क्ट्रो व जिंदल ग्रूप के प्रतिनिधि भी सीएसआर के तहत कृषि के कार्य करने की बात कहते हैं।

आधुनिक ग्रूप व अन्य दूसरी कंपनियों की तरह ही सामाजिक उन्नयन के लिए किए जाने वाले विभिन्न कार्यों में कृषि के विकास के लिए काम करना भी शामिल रहता है। फिलहाल कृषि के लिए बहुत अधिक विशेषीकृत योजनाएं नहीं हैं। वहीं, एस्सार, इल्क्ट्रो व जिंदल ग्रूप के प्रतिनिधि भी सीएसआर के तहत कृषि के कार्य करने की बात कहते हैं।

आधुनिक ग्रूप व अन्य दूसरी कंपनियों की तरह ही सामाजिक उन्नयन के लिए किए जाने वाले विभिन्न कार्यों में कृषि के विकास के लिए काम करना भी शामिल रहता है। लेकिन मौसम में आ रहे बदलाव से खेती को लेकर उत्पन्न हो रही जटिलता से निबटने के लिए इस मुद्दे पर नए ढंग से भारत में सोचने की आवश्यक है। दुनिया के कई देशों में मौसम में आ रहे बदलाव के मद्देनजर कृषि को दीर्घकालिक लाभ को पेशा बनाए रखने के लिए सीएसआर के तहत निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने पर अध्ययन हो रहा है। सीमांत किसानों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर यह और भी जरूरी हो गया है।

कृषि व गैर कृषि निजी व सरकारी कंपनियों सीमांत किसानों के लिए खेती को लाभदायक बनाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकती हैं, जो पलायन रोकने में भी मददगार होगा।

जलवायु परिवर्तन, कृषि के लिए मुश्किल हालात


जून में विश्वबैंक द्वारा जारी एक नए आकलन में चेतावनी दी गई है कि अगले 20-30 सालों में दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में जलवायु परिवर्तन से मुश्किल हालात पैदा होंगे। आकलन में कहा गया है कि तापमान में बढ़ोतरी के साथ मौसम की विकरालता बढ़ती जाएगी। विश्व भर के पच्चीस चुनिंदा वैज्ञानिकों द्वारा अनुमोदित इस रिपोर्ट में दुनिया का तापमान दो से तीन डिग्री बढ़ जाने की स्थिति में दक्षिण एशिया सहित विश्व के अन्य भागों में कृषि-उत्पादन, जल-संसाधन तथा तटीय इलाके के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया गया है। तापमान में बढ़ोतरी के साथ बारिश की नियमतिता में हेर-फेर होगा। कहीं ज्यादा बारिश होगी तो कहीं सूखा पड़ेगा।

बाढ़ आएगी, बीमारियां बढ़ेंगी और इन सारी बातों के कारण आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों की जीवन (खासकर तटीय इलाके में) बहुत मुश्किल हो जाएगी। मानसून-चक्र में बदलाव में, समुद्र के जल-स्तर के बढ़ने और तापमान में बढ़ोत्तरी के साथ दक्षिण एशियाई क्षेत्र में किसानी और जल-संसाधन पर खास बुरा प्रभाव पड़ेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते तापमान से पैदा हालात से निपटने के लिए दक्षिण एशिया में इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश को बढ़ाना होगा और बाढ़ के प्रभाव को कम करने के उपाय करने होंगे।

इसके साथ-साथ ज्यादा तापमान और सूखे की स्थिति को सह सकने लायक फसलों की प्रजातियां विकसित करनी होंगी और भूमिगत जल के दोहन को कम करना होगा। एक उपाय जीवाश्म र्इंधन पर निर्भरता को कम करना और इसके लिए दी जाने वाली सब्सिडी को कम करना भी है।

नहीं पहुंचा नहरों के अंत तक पानी


बक्सर जिले में अधिकतर खेतों में सिंचाई नहीं हुआ। जिसका मुख्य कारण समय पर नहरों में पानी और ससमय बारिश नहीं होना है। आर्थिक रूप से मजबूत किसान ही डीजल पंप के सहारे अपने खेतों की सिंचाई करते नजर आ रहे है। जबकि जिले में प्रत्येक प्रखंड में श्री विधि खेती की जानकारी मुख्य रूप से दी जा रही है, इसके लिए सरकारी स्तर पर बीज भी किसानों को दिया गया, लेकिन कई किसान इस बीज को प्राप्त करने से वंचित रह गए।

डीजल पंप से पटवन का मूल्य इस बार तेज होने से किसानों के चेहरे पर पसीने दिखाई देने लगे। क्षेत्र के किसानकहते हैं, सरकारी स्तर पर मिलने वाले अनुदान, कृषि यंत्र देने में भी भेदभाव किया जा रहा है। सरकारी स्तर पर मिलने वाली जो भी सहायता, सामग्री मिलती है, इसमें भेदभाव होने से सैकड़ों किसान योजनाओं से वंचित हो जाते हैं। नहरों के अंत तक आज भी पानी नहीं मिलने का खामियाजा किसान भुगत रहे हैं।

कुछ समय पहले बिहार सरकार ने बक्सर जिले को सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित कर दिया है। सूखाग्रस्त होते ही आर्थिक रूप से संपन्न किसानों के कान खड़े हो गए ताकि सबसे पहले सूखाग्रस्त होने एवज में मिलने वाली आर्थिक सहायता मिल सके।

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