आकाश भाग्यशाली है

Submitted by birendrakrgupta on Wed, 08/06/2014 - 18:56
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 18 अगस्त 2013
हम सब शब्द सापेक्ष हैं। शब्द निरपेक्ष होना असंभव। शब्द प्रभावित करते ही हैं। वे प्रिय लगते हैं और अप्रिय भी। वे मुग्ध करते हैं, मोहित करते हैं और चोट भी करते हैं। शब्द का तीर सीधे वार करता है। सोचता हूं कि शब्द का यह प्रभाव क्या सिर्फ शब्द का ही प्रभाव है। शब्द तो ध्वनि संकेत हैं। क्या इसके भीतर छिपा अर्थ ही हमको प्रभावित करता है। अर्थ शब्द की आत्मा है...आकाश भाग्यशाली है। गुणों के बंटवारे में आकाश को शब्द मिला। आकाश का गुण है शब्द। पंच महाभूतों में आकाश सबसे सूक्ष्म है। सृष्टि का विकास सूक्ष्म से स्थूल की ओर हुआ है। आकाश प्रथम है, सूक्ष्मतम है। न आकाश दिखाई पड़ता है और न उसका गुण शब्द ही। लेकिन ऋग्वेद के ऋषि गा गए हैं कि ऋचाएं परमव्योम में निवास करती हैं। वहीं जहां शब्द देव हैं और अन्य दिव्य शक्तियां भी। वायु दूसरे हैं। इनका गुण है स्पर्श। शब्द गुण उन्होंने आकाश से पाया। वायु दिखाई नहीं पड़ते। अपने स्पर्श गुण के कारण हम सबको छूते हुए निकल जाते हैं और आकाश से मिले शब्द गुण के कारण ध्वनि भी करते हैं। अग्नि तीसरे महाभूत हैं। ताप इनका अपना गुण, लेकिन आकाश के शब्द गुण और वायु के स्पर्श गुण से भी लैस हैं। चौथे हैं जल। इनका अपना गुण रस है। शब्द, स्पर्श और ताप इन्हें आकाश, वायु और अग्नि से मिले। पृथ्वी पांचवी हैं। इनका अपना गुण गंध है, बाकी ऊपर के चारों गुण उनके पास हैं। हम सब पंचभूत निर्मित हैं, सो शब्द, स्पर्श, ताप, रस और गंध आपूरित हैं। लेकिन शब्द गुण आकाशी हैं। आकाश सब तरफ से आवृत्त करते हैं- ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर। सो शब्द भी सब जगह उपस्थित हैं और हम सबको आवृत करते हैं।

शब्द का प्राण है अर्थ। जैसे जीव चाहता है कि हमसे प्राण जुड़े रहें, कभी साथ न छोड़ें, वैसे ही शब्द अपना अर्थ नहीं छोड़ना चाहता। लेकिन कुछ समय से शब्द अपना अर्थ खो रहे हैं। ‘प्रेम’ सुंदर शब्द है। यह वस्तु या पदार्थ नहीं होता। प्रेम उच्चतर भाव है। यह खिलता था त्याग में। प्रेम के लिए सर्वस्व त्याग की भावना थी। अब प्रेम शब्द का अर्थ वह नहीं रहा।

अध्यात्म संस्कृत और हिंदी का पवित्र शब्द है। अध्यात्म का अर्थ है स्वभाव। गहन आंतरिक अनुभूति। अब अध्यात्म का अर्थ पूजा, कर्मकांड और प्रायोजित भजन-कीर्तन हो गया। ‘वेद’ बड़ा सौभाग्यशाली शब्द है। भारत की संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान और दर्शन का प्राचीनतम ज्ञान अभिलेख। दो अक्षर के इस शब्द ‘वेद’ के प्रति भारत की आस्था का माप असंभव है। लेकिन आज एक छोटा वर्ग इसे ईश्वर की वाणी कहता है और बड़ा वर्ग इसकी उपेक्षा करता है।

शब्दार्थ की आत्मीयता ज्ञानी बनाती है। यह बात वैदिक ऋषियों ने कही है। लेकिन शब्द का अर्थ रट लेने से कोई बुद्ध नहीं हो जाता। बौद्धिक होना आसान है, बोधपूर्ण होना विरल। बोध अनुभूति से आता है, बौद्धिकता सूचना संपन्नता से। दोनो में शब्द की महत्ता है। बौद्धिकता के लिए शब्द की समझ और अर्थ का ज्ञान पर्याप्त है। अनुभूति में शब्द काम नहीं आते।यूनेस्को ने ऋग्वेद को अंतरराष्ट्रीय धरोहर बताया तो भी कोई फर्क नहीं पड़ा। पत्रकारिता और साहित्य में सरल कथन का महत्व है। शब्द सरल या जटिल नहीं होते। शब्द प्रयोग करने वाले ही उन्हें सरल और तरल नहीं रहने देते। शब्द सरलता का संबंध जीवन सरलता से है। जीवन सरल और सीधा हो तो शब्द भी सरल और तरल होकर निकलते हैं।

हम सब शब्द सापेक्ष हैं। शब्द निरपेक्ष होना असंभव। शब्द प्रभावित करते ही हैं। वे प्रिय लगते हैं और अप्रिय भी। वे मुग्ध करते हैं, मोहित करते हैं और चोट भी करते हैं। शब्द का तीर सीधे वार करता है। सोचता हूं कि शब्द का यह प्रभाव क्या सिर्फ शब्द का ही प्रभाव है। शब्द तो ध्वनि संकेत हैं। क्या इसके भीतर छिपा अर्थ ही हमको प्रभावित करता है। अर्थ शब्द की आत्मा है। अर्थवेत्ता शब्द के अर्थ से आत्मीय होते हैं। शब्दार्थ की आत्मीयता ज्ञानी बनाती है। यह बात वैदिक ऋषियों ने कही है। लेकिन शब्द का अर्थ रट लेने से कोई बुद्ध नहीं हो जाता। बौद्धिक होना आसान है, बोधपूर्ण होना विरल। बोध अनुभूति से आता है, बौद्धिकता सूचना संपन्नता से। दोनो में शब्द की महत्ता है। बौद्धिकता के लिए शब्द की समझ और अर्थ का ज्ञान पर्याप्त है। अनुभूति में शब्द काम नहीं आते। शब्द प्रेरणा बेशक उपयोगी होती है। शब्द अनुभूति नहीं देते, लेकिन अनुभूति के प्रकटीकरण में शब्द का कोई विकल्प नहीं। भक्त की अनुभूति विराट होती है। यह हमारा निजी अनुभव नहीं। नारद भक्ति सूत्र में पढ़ा है कि भक्ति अनिर्वचनीय है। शब्द सामर्थ्य के पार की कथा है यह। लेकिन इसे कहने के लिए भी शब्द ही सहारा है।

शब्द की महत्ता का वर्णन शब्दों में कैसे करें? शब्द बंधन हैं और यही मुक्त आनंद का द्वार भी। शब्दभाव प्रकट करते हैं, भावोत्तेजन भी करते हैं। आधुनिक बाजार में भावोत्तेजन वाले शब्दों का व्यापार अरबों-खरबों में है। व्यापारी इसे चैटिंग करते हैं। शब्द अर्थवान ध्वनियां हैं। अति उपयोगी मानवीय पूंजी। मैं राजनीति में हूं। दिनभर बोलता रहता हूं। शब्द संयमी नहीं हूं।

पतंजलि ने अति प्रीतिकर शब्द दिया था- शब्दानुशासन। शब्द संयम जरूरी है। बोलने का अपना उपयोग है, न बोलने का भी अपना उपयोग। किसी वार्ता में बिना बोले ही रह जाने की अपनी महत्ता है। बुद्ध अनेक प्रश्नों पर मौन रहे। विशेषतया ‘ईश्वर’ पर। ईश्वर पर जितने शब्द विश्व में बोले या लिखे गए हैं, उतने शायद ही किसी अन्य शब्द पर। लेकिन ईश्वर का अर्थ जस का तस है।

समुझत बनइ न जात बखानी कहा था तुलसीदास ने। आधुनिक सभ्यता ने शब्द संयम या शब्दानुशासन का गला रेता है। टाक टाइम सस्ता है। लगातार बात करने के निमंत्रण हैं। काम कम, बातें ज्यादा। शब्द अपव्यय का युग है। विदुर ने महाभारत काल में ठीक कहा था- शब्द अब ब्रह्म नहीं रहे। लेकिन बात अर्धसत्य जान पड़ती है। उन्हें कहना चाहिए था कि मनुष्य अब शब्द को ब्रह्म नहीं देख पाता।

शब्द ब्रह्म हैं। ब्रह्म असीम, अनंत और विराट। शब्द भी असीम और विराट में विस्तृत है। बाइबिल का वचन है- प्रारंभ में शब्द था। शब्दों की गणना असंभव। हजारों भाषा बोलियों में असंख्य शब्द हैं, समाज अपने कार्य व्यापार में नित नए शब्द गढ़ता है। शब्द परिवार बढ़ता जाता है। अनेक शब्द प्रयोग में नहीं आते, चलन से बाहर हो जाते हैं तो भी मरते नहीं। जान पड़ता है कि शब्द अमर सत्ता हैं। वे अमर हों या न हों, लेकिन एक बात अनुभव सिद्ध है कि अनेक शब्द भी मनुष्य की तरह सौभाग्यशाली होते हैं। वे गतिशील रहते हैं। इसी तरह अनेक शब्द कम चलते हैं। हम उन्हें कम सौभाग्यशाली कह सकते हैं।

भारतीय भाषाओ में एक ऐसा ही शब्द है राम। राम शब्द का अयोध्या के राजा दशरथनंदन से संबंध है। राम का जीवन भारत में आदर के साथ गाया जाता है, लेकिन शब्द राम का चलन आश्चर्यजनक रूप में विश्वव्यापी है। शब्द राम की ताकत उनसे भी बड़ी है। हाल ही में एक सर्वेक्षण हुआ है। सर्वेक्षण के अनुसार भारत के दो-तिहाई गांव नगर राम शब्द से जुड़े हैं। देश के लाखों व्यक्तियों के नाम के साथ भी राम शब्द जुड़ा हुआ है। राम नाम शब्द में गजब की गतिशिलता है। राम शब्द है और मंत्र भी है। स्तुति उपासना के अलावा सामान्य वार्तालाप में भी ‘राम’ का चलन है।

तुलसीदास शब्द की क्षमता से परिचित थे। वे राम में ब्रह्म देखते थे। राम उनके महानायक, ब्रह्म, ईश सबकुछ थे, लेकिन उन्होंने नाम शब्द की महत्ता को राम से भी बड़ा बताया। लिखा है- राम एक तापस तिय तारी/नाम कोटि खल कुमति सुधारी। राम ने एक तपस्वी की स्त्री को ही तारा, लेकिन नाम ने करोड़ों की मति सुधारी। शब्द की महिमा बड़ी है, वह ब्रह्म राम से भी बड़ा है- ब्रह्मराम ते बड़/बटदायक बर दानि। शब्द संयम और शब्दानुशासन से शब्द अपना वास्तविक रूप प्रकट करते हैं।

अनेक विद्वान तमाम विशेषण आदि लगाकर भी मन की बात नहीं कह पाते। लेकिन सरल जीवन वाले शब्दसंयमी अर्थ आत्मीय होने के कारण कम शब्दों में बड़ी बाते कह जाते हैं। कवि पद्माकर का शब्द संयोजन याद आता है- नैन नचाय, कही मुसकाय लला फिर आइयो खेलन होरी। पतंजलि योग सूत्र में ईश्वर की परिभाषा सिर्फ एक वाक्य में है- क्लेश, कर्म, कर्मफल और आकांक्षा रहित चेतना ईश्वर है। शब्दानुशासन और शब्द संयम का आनंद ही और है, लेकिन आधुनिक काल में शब्द अराजकता है। वातावरण में कोलाहल है। ऐसे कोलाहल के बावजूद शब्द साधना में जुटे अग्रज पत्रकार व साहित्यकार बधाई के पात्र हैं।

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