लोगों को मिले स्वच्छता, विभाग का यही है ‘मिशन’

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 08/07/2014 - 13:01
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पंचायतनामा, 10-16 मार्च 2014
बचपन से पढ़ते आये हैं कि जहां स्वच्छता होती है वहां भगवान का वास होता है। हमारे गांव-पंचायत में भी लोग इस बात को जानते हैं, लेकिन इस बात को लेकर जागरूकता की कमी है। इस कमी को सरकार अपने दावे से पूरा करने की बात कहती है। पेयजल, शौचालय को लेकर तमाम योजनाएं, उनपर काम, जागरूकता को लेकर नुक्कड सभा, नाटक, प्रचार-प्रसार। अंत में लाख टके का सवाल - इसका लाभ कितने लोगों को मिल रहा है? विभाग की बात माने तो लोग लाभाविंत हो रहे हैं। लेकिन हकीकत? राज्य के 38 जिलों में से कुछ ही जिले हैं जहां भू-गर्भीय जल में अशुद्धि नहीं है। अन्य जिले तो अभिशप्त है। आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन जैसे धीमें जहर का सेवन करने को लोग मजबूर हैं। विभाग का दावा है कि शुद्धता और स्वच्छता को लेकर उचित कदम उठाये गये हैं। यह दावा इन तत्वों के जैसा नहीं जिसकी जांच की जाये सिवाय आंकड़ों को मान लेने के। ठीक वैसे ही बड़ी आबादी शौचालय को लेकर वंचित है। इसके लिए भी तमाम योजनाएं हैं। काम भी चल रहा है। किसी चीज की कमी नहीं है। स्वस्थ वातावरण से समाज बनता है। कर के तो देखिए अच्छा लगेगा।
अंशुली आर्य, प्रधान सचिव, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग
जीवन के लिए जितना अहम जल है उतना ही जरूरी है वातावरण का स्वच्छ होना। राज्य की बड़ी आबादी आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन युक्त पानी का जागरूकता के अभाव में सेवन करने को मजबूर है। गांव-पंचायत में शौचालय की कमी एक बड़ी समस्या है। राज्य सरकार ने शौचालय की अहमियत को जानते हुए घोषणा की थी कि अगर जिस घर में शौचालय नहीं होगा, उस घर से कोई पंचायत चुनाव में भागीदारी नहीं करेगा। सूबे में पानी, शौचालय को लेकर क्या स्थिति है? इसे जानने को लेकर सुजीत कुमार ने लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की प्रधान सचिव अंशुली आर्य से बात की।

ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विभाग की क्या भूमिका है? विभाग को अभी कौन-कौन सी योजनाएं हैं?

सूबे के ग्रामीण क्षेत्रों में विभाग के द्वारा पेयजल की आपूर्ति और स्वच्छता संबंधित कार्य कराये जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सुविधा कम से कम 40 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के आधार पर ग्रामीण बसावट के आधार किया जाता है। राज्य में एक लाख 8 हजार के करीब ग्रामीण बसावट हैं जिसमें से लगभग 93 हजार बसावट पूर्ण रूप से आच्छादित हैं, शेष बसावट आंशिक रूप से आच्छादित हैं।

इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में राज्य के सभी घरों में व्यक्तिगत पारिवारिक शौचालय एवं विद्यालय तथा आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय निर्माण का प्रावधान है। एपीएल और बीपीएल दोनों को मिला कर 46.66 लाख शौचालय का निर्माण कराया गया है। इसके अलावा विद्यालयों में 93 हजार के करीब और आंगनबाड़ी केंद्रों में लगभग साढ़े 8 हजार शौचालयों का निर्माण कराया गया है।

विभाग द्वारा मुख्य रुप से पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए चापाकलों का निर्माण कराया जाता है। पूरे राज्य में लगभग 7 लाख चापाकल निर्मित किये गये हैं। इसके अलावा ग्रामीण पाईप जलापूर्ति योजनाएं और सौर उर्जा से चलने वाले पंप के साथ मिनी पाईप जलापूर्ति योजनाओं का कार्यान्वयन कराया जा रहा है। इसके अलावा पेयजल की आपूर्ति के लिए कुछ बहुग्रामीय पाईप जलापूर्ति योजनाओं को भी कराया जा रहा है।

राज्य में विद्युत उपलब्धता की कमी और सौर उर्जा की उपलब्धता को ध्यान में रखकर दूर दराज के क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति उपलब्ध कराने के लिए मिनी जलापूर्ति योजनाओं का काम कराया जा रहा है। साथ ही 56 पुरानी ग्रामीण पाईप जलापूर्ति योजनाओं में भी सौर उर्जा चालित पंप को भी कार्यशील बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

सूबे के 11 आईपीएल जिलों में पेयजल की सुविधा के लिए इंडिया मार्का-2 चापाकलों के साथ सौर उर्जा चालित पंप सहित डूवेल पंप की 150 योजनाएं क्रियांवित की जा रही है। 281 और योजनाएं ली जानी है। इन सारी योजनाओं से लोगों को हर समय स्वच्छ पेयजल की सुविधा मिल सकेगी।

राज्य के विभिन्न जिलों में भू-जल में आर्सेनिक, फ्लोराइड एवं आयरन जैसे रसायन पाये जाते हैं। विभाग इन रसायनों से मुक्त पेयजल के लिए कैसा प्रयास कर रहा है?

राज्य के जिलों में पानी को लेकर जगह जगह पर कई तरीके के रसायन पानी में घुले मिलते है। जैसे गंगा नदी के किनारे स्थित 13 जिले जिनमें बक्सर, भोजपुर, पटना, वैशाली, छपरा, समस्तीपुर, दरभंगा, कटिहार, भागलपुर, मुंगेर, बेगुसराय, लखीसराय और खगड़िया के कुछ क्षेत्रों के पानी में आर्सेनिक की मात्रा पायी जाती है। राज्य के पठारी और उप पठारी क्षेत्र के 10 जिलों जैसे भागलपुर, मुंगेर, शेखपुरा, बिहारशरीफ, नवादा, गया, सासाराम, भभुआ, जमुई और औरंगाबाद में भू-गर्भ जल में फ्लोराइड की मात्रा पेयजल के लिए सीमा से ज्यादा है। ठीक वैसे ही उत्तर पूर्वी बिहार के 9 जिले पूर्णियां, किशनगंज, अररिया, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, कटिहार, खगड़िया एवं बेगुसराय में भू-गर्भीय जल में लौह या आयरन की मात्रा पीने की मात्रा से ज्यादा है।

इन प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए चापाकलों के साथ ट्रिटमेंट यूनिट लगायी जाती है। साथ ही इस यूनिट के साथ सौर उर्जा चालित पंप युक्त मिनी पाईप जलापूर्ति योजनाओं का कार्यान्वयन कराया जाता है। आयरन प्रभावित क्षेत्रों के लिए कुल 471 मिनी जलापूर्ति योजना, फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों के लिए 181 मिनी जलापूर्ति योजना एवं आर्सेनिक के लिए 128 मिनी पाईप जलापूर्ति योजना बनायी गयी है। इन योजनाओं से स्वच्छ पेयजल की सुविधा दी जा रही है। इस योजनाओं के सफल संचालन एवं रख-रखाव के लिए विभाग द्वारा मानक संचालन प्रक्रिया तैयार है। उसी के अनुरूप काम होता है।

ग्रामीण स्वच्छता को लेकर विभाग ने कौन-कौन से कदम उठाये हैं?

इसके लिए भी विभाग ने पर्याप्त कदम उठाये हैं। विभाग की यह पूरी कोशिश है कि लोगों को स्वच्छ वातावरण मिल सके। भारत सरकार के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता सुविधा उपलब्ध कराने के लिए निर्मल भारत अभियान चलाया है। इस कार्यक्रम के तहत राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराई जानी है। इसके कार्यक्रम के तहत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों जिसे बीपीएल कहते हैं के साथ-साथ चिन्हित किये गये एपीएल परिवारों जैसे अनुसूचित जाति, जनजाति, छोटे एवं सीमांत किसान, बांस भूमि के साथ भूमिहीन मजदूर, शारिरीक रुप से विकलांग तथा महिला प्रमुख परिवारों को शौचालय निर्माण के उपरांत प्रोत्साहन राशि दिये जाने का प्रावधान है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा 32 सौ रुपये, राज्य सरकार द्वारा 14 सौ रुपये और कम से कम 900 रुपये लाभार्थी को लगाना पड़ता है।

इसके अलावा मनरेगा के तहत 45 सौ रुपये लगाकर 10 हजार रुपये तक का शौचालय का निर्माण कराया जाना है। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि निर्मल भारत अभियान के तहत मनरेगा के जरिये शौचालय निर्माण हेतु मंत्रिपरिषद की स्वीकृति के बाद संकल्प निर्गत किये जा चुके हैं तथा इसके क्रियान्वयन हेतु ग्रामीण विकास विभाग तथा लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की तरफ से संयुक्त दिशा निर्देश जारी किये जा रहे हैं।

इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा चिन्हित श्रेणी के अलावा अन्य श्रेणी के एपीएल परिवारों के घरों में शौचालय निर्माण हेतु लोहिया स्वच्छता योजना के अंतर्गत 46 सौ रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है। ध्येय यही है कि राज्य के सभी परिवारों में घरों में शौचालय का निर्माण हो सके और निर्मल बिहार बनाने के लक्ष्य को पूरा किया जा सके।

गर्मी के दिनों में यह देखा गया है कि जल और जलापूर्ति को लेकर काफी समस्या आ जाती है। विभाग इसके लिए किस तरह की योजना पर काम करता है?

गर्मी के दिनों में यह समस्या सामने आती है। ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल सुविधा बरकरार रखने के लिये विभाग ने पर्याप्त कदम उठाये है। इसके लिए चापाकलों की मरम्मत एवं रख-रखाव हेतु हरेक प्रखंड में विशेष अभियान के रुप में मोबाइल गैंग रख कर चापाकलों की मरम्मति का कार्य कराया जाता है। गुजरे साल में विभाग के इस पहल का परिणाम बहुत अच्छा रहा।

इसके अलावा विभाग द्वारा विशेष हालात में जरूरत के हिसाब से पेयजल की सुविधा बरकरार रखने के लिए टैंकर के जरिये जलापूर्ति की व्यवस्था की जाती है। अभी हमारे पास लगभग 250 टैंकर उपलब्ध हैं। इसके साथ ही चापाकलों में राईजर पाईप बदलने और बढ़ाने का काम तथा साधारण चापाकलों को विशेष चापाकल में बदला जा रहा है। कोशिश यही है कि पेयजल को लेकर आम लोगों को परेशानी न हो।

विभाग के पास शहरी क्षेत्रों के लिए जलापूर्ति की कोई योजना है या नहीं?

देखिये शहरी क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति मुख्य रुप से नगर विकास एवं आवास विभाग के ऊपर है लेकिन नगर विकास विभाग से योजना की स्वीकृति मिलने के बाद राशि मिलने पर योजनाओं का कार्यान्वयन विभाग द्वारा कराया जाता है। नगर निगम क्षेत्रों को छोड़कर अन्य शहरी क्षेत्रों में शहरी जलापूर्ति योजनाओं के रख-रखाव का काम लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा कराया जाता है।

विभाग के द्वारा किये जा रहे इस पहल को लेकर लोगों में जागरूकता आई है?

बिल्कुल आई है। लोग पहले केवल पानी पीते थे। लोगों का जोर पानी की मात्रा पर रहता था। लेकिन अब परिस्थिति बदल चुकी है। लोग अब मात्रा के साथ गुणवत्ता पर भी ध्यान दे रहे हैं। विभाग समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाता रहता है। हमारा मिशन कामयाब हो रहा है। पेयजल और शौचालय को लेकर विभाग ने सूबे के स्कूलों और पंचायतों से बात की है। कुछ जगहों पर इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया है।

कुछ दिन पहले विश्व बैंक ने भी जलापूर्ति और स्वच्छता को लेकर राज्य सरकार को सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव रखा था। इसके बारे में कुछ बता सकती हैं?

विश्व बैंक ने सूबे में पाईप के जरिये पेयजल आपूर्ति को लेकर राज्य सरकार को सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव दिया था। इस योजना के तहत जलापूर्ति एवं स्वच्छता की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। इसके अंतर्गत पटना, नालंदा, नवादा, बेगुसराय, मुंगेर, बांका, पूर्णियां, मुजफ्फरपुर, सारण और पश्चिम चंपारण में योजना पर काम चल रहा है। इसके जरिये एकल ग्राम, एकल पंचायत तथा बहुग्रामीण योजनाएं प्रस्तावित की जा रही है। इसकी कुल लागत 15 सौ करोड़ के करीब है। योजना 2014 से शुरू है। यह पांच साल का प्रोजेक्ट है।

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