खुशबूदार गोविंदभोग चावल का बड़ा जोन कैमूर

Submitted by birendrakrgupta on Mon, 08/11/2014 - 00:33
Source
पंचायतनामा, 20-26 जनवरी 2014
1. दस हजार आबादी वाला मोकरी गांव सोन नहर के अंतिम छोर पर स्थित है
2. आंध्र प्रदेश, कोलकाता तथा उत्तर प्रदेश आदि में स्थित कृषि अनुसंधान केंद्रों से संपर्क कर बीज मंगवाते हैं और नई तकनीक का उपयोग कर रहे हैं
3. चावल उत्पादन का पचास प्रतिशत कोलकता के चावल व्यवसाई ले जाते हैं और विदेशों में भी निर्यात करते हैं
4. चावल की मांग को देखते हुए किसानों ने को-आपरेटिव भी बना रखा है
कैमूर जिले के प्रगतिशील किसान खुशबूदार गोविंदभोग धान की खेती में लगे हुए हैं। यहां के गोविंदभोग चावल की देश के कई बड़े शहरों में खास मांग है। इन किसानों की देखा-देखी आसपास के गांवों के किसान भी गोविंदभोग धान के उत्पादन में रुचि ले रहे हैं। मदन कुमार सिंह, मुन्ना सिंह, अभिमन्यु सिंह, अभय सिंह व बच्चन सिंह आदि ऐसे किसान हैं, जो इस चावल के उत्पादन से जुड़े हुए हैं। यहां प्रति हेक्टेयर धान की उपज की दर भी राष्ट्रीय मानदंड के करीब है। यही वजह है कि कैमूर की धरती अन्न उत्पादन में पंजाब से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो रही है।

पिछले एक दशक में यहां के किसानों ने अन्न उत्पादन में प्रति हेक्टेयर लगभग 50 क्वींटल तक पहुंचा दिया है। यहां के किसान कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से आधुनिक खेती कर अधिक मुनाफा कमाने में लगे हैं। तभी तो ये किसान आंध्रप्रदेश, कोलकता तथा उत्तर प्रदेश में स्थित कृषि अनुसंधान केंद्रों से संपर्क कर बीज मंगवाने और नई तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। यहां के किसान बुआई और कटाई में मशीन का उपयोग तथा श्रीविधि से खेती करते हैं।

खुशबू व स्वाद विशिष्ट पहचान


कैमूर जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक गांव मोकरी है। इस गांव से मुंडेश्वरी धाम की दूरी लगभग तीन किलोमीटर के आसपास है। कैमूर की पहाड़ी से निकल कर परैया नाला मोकरी गांव पहुंचता है। बरसात के मौसम में पहाड़ से निकले नाले में बहने वाले पानी के साथ-साथ जड़ी-बुटी युक्त मिट्टी खेतों तक पहुंचती है। इसी पानी के गुणात्मक प्रभाव से इस गांव के आसपास लगभग सौ हेक्टेयर में उत्पादित होने वाला गोबिंदभोग चावल अपनी खुशबू व स्वाद के लिए एक विशिष्ट पहचान रखता है। जब गोबिंदभोग धान की फसल खेतों में लहलहाती रहती है, तभी से चावल की बुकिंग शुरू हो जाती है। इस चावल के शौकीन देशों के विभिन्न प्रांतों के साथ विदेशों में भी हैं। चावल को चूल्हे पर चढ़ाने के बाद वाष्प के साथ निकलने वाली खुशबू पूरे घर में फैल जाती है। चावल खाने के काफी समय बाद तक हाथों में खुशबू बनी रहती है। इस वर्ष चावल का उत्पादन कम होने से इसका भाव चालीस हजार रुपए क्वींटल पहुंच गया है।

पांच सौ किसान गोबिंद भोग चावल की करते हैं खेती


गोबिंद भोग चावल न सिर्फ मोकरी गांव को प्रसिद्ध दिलाया बल्कि इसी की बदौलत यहां के किसानों के उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपनी भविष्य को संवारने में लगे हैं। यहां के अनूठे स्वाद वाले इस चावल का राज मोकरी की विशेष मिट्टी एवं परैया नाले में छिपा है। मोकरी गांव के प्रगतिशील किसान ने बताया कि यह गांव सोन नहर के अंतिम छोर पर स्थित है। इस गांव की आबादी लगभग दस हजार है। जिनमें से पांच सौ किसान गोबिंद भोग की खेती करने में लगे हैं। मदन कुमार सिंह, मुन्ना सिंह, अभिमन्यु सिंह, अभय सिंह व बच्चन सिंह आदि किसानों ने बताया कि हम लोग खाने भर चावल रखकर बाकी चावल को बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बंगाल के व्यापारियों को बेच देते हैं।

चावल उत्पादन का पचास प्रतिशत भाग कोलकता के चावल व्यवसाई ले जाते हैं। यही व्यवसाई इस चावल को विदेशों में निर्यात करते हैं। जिले के बेतरी, बौराई, महसुआ, जहूपुर, सीबो, सारनपुर, कुड़ासन दुमदुम, अरानी, घोड़ासन, निबिसाटांढ आदि गांवों में भी गोबिंदभोग धान की खेती किसानों द्वारा की जाती है। परंतु मोकरी गांव के चावल में जो खुशबू पाई जाती है वह कहीं नहीं होती। यही कारण है कि यहां पर चावल तैयार होने के पहले ही व्यापारियों द्वारा एडवांस बुकिंग हो जाती है। इस चावल की मांग को देखते हुए यहां किसान को-आपरेटिव बना कर बिना किसी बिचौलिए के सीधे उपभोक्ताओं से जुड़कर ज्यादा मुनाफा कमाने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही इस पंचायत को निर्मल ग्राम घोषित किया जा चुका है। इससे उत्साहित होकर गोबर गैस प्लांट लगाकर गोबर गैस से गांव को रोशन करने के अलावा खाद का भी इतेमाल करेगी, जिसे चावल का उत्पादन और अधिक होने के साथ स्वास्थ्यवर्द्धक भी होगा।

वैज्ञानिकों से लेते हैं जानकारी


वैज्ञानिकों के सहयोग के रूप में यहां के किसान समय-समय पर वनवासी सेवा केंद्र अघोरा के कृषि वैज्ञानिकों तथा कृषि विज्ञान केंद्र आरा के वैज्ञानिकों से मिलकर जानकारी प्राप्त कर खेती को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं। इन सब के साथ ही धान की फसल में गोबर खाद ,डीपीपी एवं यूरिया का इस्तेमाल उचित मात्रा में किया जाता है। जिससे ज्यादा उत्पादन कर खेती को ज्यादा लाभकारी बनाया जा रहा है। धान के अलावा अन्य फसलों में सरसों, मसूर, गेहूं, चना तथा मटर आदि की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है।

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