आर्थिक हित या विकास

Submitted by HindiWater on Sat, 08/16/2014 - 16:14
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सजग समाचार परिवर्तन, 30 अप्रैल 2014
अब तक क्या हुआ इसकी फिर सितंबर 2010 में समीक्षा हुई तो पाया गया कि कुछ खास नहीं हुआ और जो भी हुआ वह जमीन के बजाय कागजों पर ज्यादा हुआ। तो फिर समयबद्ध ढंग से पाने के लक्ष्य रखे गए तथा अबकी बार महिलाओं और बच्चों के विकास/उन्नयन पर खास ध्यान देने की बात कही गई। बीमारी भूख व गरीबी से उबरने-उबारने की बात कही गई मानो कि शुरूआत में कुछ और कहा गया था या कोई और लक्ष्य रखे गए थे। वर्ष 2000 के सितंबर महीने में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में विश्व के 189 देशों ने न्यूयार्क में अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इकट्ठे होकर मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (सहस्त्राब्दि के विकास लक्ष्य/उद्देश्य) की घोषणा की थी। सभी देशों ने प्रतिबद्धता जताई थी कि, ‘वे एक अधिक सुरक्षित, संपन्न और समतापूर्ण विश्वव्यापी व्यवस्था के लिए काम करेंगे।’ इस घोषणा को चरितार्थ करने हेतु इसे व्यवहार में चरणबद्ध क्रम से लागू करने में परिवर्तित किए जाने के लिए इन लक्ष्यों को आठ भागों में बांटकर सन् 2015 तक पूरा कर लेने का संकल्प लिया गया था। यह व्यवहारिक क्रम ऐसा रखा गया कि जो भी प्रगति इस दिशा में हो उसे मापा जा सके। उसकी यथार्थ समीक्षा की जा सके।

फिर सन् 2002 में इसके लिए संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि अभियान चलाया गया। इस अभियान का काम था लोगों से सहस्त्राब्दि के विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सहयोग मांगना तथा उन्हें यह सहयोग प्रदान करने की प्रेरणा देना। ताकि जो योजना वर्ष 2000 में बनाई गई थी उस पर अमल हो सके। फिर 2005 में प्रोफेसर जैफरी सचस ने एक अंतिम प्रावधानों की संस्तुति संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव के समक्ष प्रस्तुत की कि किस तरह से व्यवहारिक रूप में इन सहस्त्राब्दि के विकास के लक्ष्यों को, विकास हेतु निवेश कर पाया जा सकता है। फिर ग्रुप-8 के कहे जाने वाले धनवान देशों ने 2005 में ही यह पेशकश की कि गरीबतम् देशों के कर्जे क्यों ना माफ कर दिए जाएं ताकि वे देश अपनी संपत्ति को कर्जे व कर्जों का ब्याज देने के बजाय प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य व गरीबी उन्मूलन जैसे कार्यक्रमों में लगा सकें। फिर लगभग 2006 के आस-पास विश्व में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को बिना विश्लेषण किए ही आपाधापी में तय कर दिया गया था। जिन उद्देश्यों व लक्ष्यों को चुना गया था (है) उनकी वस्तुपरकता व वर्चस्व संदिग्ध नहीं तो कम से कम बेतुकी अवश्य है।

फिर एक और विचित्र बात हुई (जो अब भी हो रही है) तथाकथित देशों ने मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को पाने के लिए जो धन दिया। वह अधिकांश धन तीन मदों में ही खर्च हो गया। पहला मद कर्जे वापस चुकाने का था (है), दूसरा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में तथा तीसरा मद इन सहस्त्राब्दि लक्ष्यों के प्रचार का था। जिसे जागृति बढ़ाने का नाम दिया गया। इन तीनों मदों में जमीनी यथार्थ पर लक्ष्यों का पाना कहां खो गया कोई नहीं जानता।

अब तक क्या हुआ इसकी फिर सितंबर 2010 में समीक्षा हुई तो पाया गया कि कुछ खास नहीं हुआ और जो भी हुआ वह जमीन के बजाय कागजों पर ज्यादा हुआ। तो फिर समयबद्ध ढंग से पाने के लक्ष्य रखे गए तथा अबकी बार महिलाओं और बच्चों के विकास/उन्नयन पर खास ध्यान देने की बात कही गई। बीमारी भूख व गरीबी से उबरने-उबारने की बात कही गई मानो कि शुरूआत में कुछ और कहा गया था या कोई और लक्ष्य रखे गए थे।

फिर 2013 में समीक्षा हुई तो पाया गया कि प्रगति की ओर हमारी गति विषमतापूर्ण रही। कुछ देशों ने निर्धारित लक्ष्य आंशिक तौर पर पाए हैं जबकि अधिकांश ने तो एक भी लक्ष्य नहीं पाया और ना ही इस ओर ध्यान दे पाए हैं। वे इससे अछूते ही रहे।

वर्ष 2015 सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से प्राप्त करने अर्थात उन्हें जमीनी यथार्थ में तब्दील कर लेने की अवधि तय की गई थी। अभी वर्ष 2014 लगभग आधा बीत चुका है। विगत् 13 वर्षों के परिणाम हमारे सामने हैं। इसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि आगामी एक डेढ़ वर्ष में कोई चमत्कार हो। कौन दोषी है इसमें?

ऐसे कई सवाल है जिनका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। फिर भी कोई साफ-साफ कह नहीं पा रहा है या फिर कहना नहीं चाह रहा है।

जिस तरह से प्रकृति में मूलतत्वों जल, वायु, उर्जा, धरती व आकाश के मध्य असंतुलन उत्पन्न हो रहा है और वही असंतुलन मानव शरीर में भी तरह-तरह की विकृतियों व बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है। उससे तो यही लगता है कि कहीं हम विकास के नाम पर गलत दिशा में ही न चले जा रहे हों। पीछे मुड़कर देखें और अपने ही देश का उदाहरण लें तो, हम पाते हैं कि उपनयन के समय दिया गया पहला मंत्र या संकल्प यही होता है, जिसमें मुमुक्ष स्वच्छ जल ग्रहण करने का संकल्प प्रकटतः लेता है। जैसे, जिन देशों ने पैसा दिया कि यह पैसा सहस्त्राब्दि के विकासमान लक्ष्यों को पाने में लगाओ न कि कर्ज अदा करने में व प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में। वे देश वही पैसा पुनः कर्ज अदायगी के रूप में स्वीकार कैसे कर लेते हैं। दूसरे जो धन प्रचार में खर्च होता है। वह गरीब देशों से अमीर देशों की ओर बहता है। क्योंकि महंगे सलाहकार तथा विशेषज्ञ उन्हीं देशों में आते हैं जो कि लक्षित देश में सह प्रवास पर रहकर कुछ आंकड़े तैयार कर वापस चले जाते हैं।

सवाल उठता है कि क्या मिलेनियम डेवलपमेंट मोल्स के नाम से प्रकाशित किए गए आठ क्रियाकलाप ऐसे हैं जिनकी जानकारी तथाकथित अविकसित देशों को नहीं है? क्या गरीब देशों का शिक्षित वर्ग नहीं जानता कि स्वच्छ पानी के अभाव में इंसान तमाम बीमारियों का लक्ष्य बन जाता है? क्या वे नहीं जानते कि महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया जाना चाहिए? बच्चों का ध्यान रखा जाना चाहिए। हम विषय की जितनी गहराई में जाते हैं उतने ही गहन सवाल हमारे सामने उभरते हैं। हमें सहसा अहसास होने लगता है कि कहीं इस सारे प्रचार-प्रसार में उन देशों को पिछलग्गू बना कर अपने क्रम में शामिल करने की तो नहीं जो कि प्रकृति के साथ मिलजुलकर चलने के अपनी वैकल्पिक व स्वायत्त परंपराओं के अनुसार जीवन जीना जानते हैं? वे जो प्रकृति के संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। वे जो तमाम तकनीकि प्रगति के बावजूद कहीं-न-कहीं अब भी यही मानते हैं कि संभव है कि विकास का वर्तमान ढांचा हमें विनाश की ओर ले जाए।

जिस तरह से प्रकृति में मूलतत्वों जल, वायु, उर्जा, धरती व आकाश के मध्य असंतुलन उत्पन्न हो रहा है और वही असंतुलन मानव शरीर में भी तरह-तरह की विकृतियों व बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है। उससे तो यही लगता है कि कहीं हम विकास के नाम पर गलत दिशा में ही न चले जा रहे हों। पीछे मुड़कर देखें और अपने ही देश का उदाहरण लें तो, हम पाते हैं कि उपनयन के समय दिया गया पहला मंत्र या संकल्प यही होता है, जिसमें मुमुक्ष स्वच्छ जल ग्रहण करने का संकल्प प्रकटतः लेता है। संभव है हर उन छोटे व तथाकथित पिछड़े देशों में ऐसे ही कुछ मंत्र उनकी भाषाओं को ले जाते हैं। जिसे विकास के नाम पर उन्हें भूल जाने को कहा जा रहा है। हमें विकास के इस प्रारूप को यथार्थ में समझना होगा कि क्या हम समान रूप से सबकी भागीदारी से बने विश्व भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं या कि हम ही में से कुछ अधिक समान लोगों के हमारे लिए डिजाइन किए गए जादुई यथार्थ में जो कि हमारे पांव रखते ही जादू की तरह गायब हो जाता है। अस्मिता के संकट के समय बीच का कोई रास्ता होता।

सहस्त्राब्दि मानक लक्ष्य


1. घोर गरीबी और भुखमरी का खात्मा

क. ऐसे लोगों के अनुपात में कमी लाना जिनकी आय 1 अमरीकी डॉलर प्रतिदिन से भी कम है।
ख. संपूर्ण और आयकारक समग्र रोजगार की आपूर्ति जिनमें की युवा व महिलाएं भी शामिल हैं।
ग. भुखमरी का पचास प्रतिशत तक खत्म कर पाना।

2. सार्वत्रिक प्राथमिक शिक्षा सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त हो इसकी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
3. स्त्री-पुरुष के बीच की असमानता पाटी जाए और महिलाओं को शक्तिशाली बनाया जाए।

क. लड़कियों और लड़कों के बीच की प्राथमिक तथा माध्यमिक शैक्षिक स्तर पर व्याप्त खाई पाट दी जाए। यह काम 2015 तक अवश्य पूरा हो जाए।

4. भ्रूण हत्या/शिशु मृत्यु दर में कमी पांच वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों की मृत्यु दर में दो तिहाई तक कमी लाई जाए।
5. जच्चा के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना।

क. जच्चा की मृत्यु दर एक तिहाई तक कम करना।
ख. सब तक प्रसूति के लिए जरूरी साधन मुहैया करना।
6. एच आई वी मलेरिया तथा अन्य बीमारियों को परास्त करना।

क. एच आई वी को खत्म कर उसकी दिशा बदल देना। अर्थात जो पहले से ही इसके शिकार हैं उनको बेहतर चिकित्सा दे पाना।

7. पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना

क. हरेक देश अपनी-अपनी नीतियों में इस तरह के कायदों तथा कार्यक्रमों को समाहित करें जिससे संवहनीय विकास हो सके।
ख. 2010 तक जैव विविधता में हो रहे नुकसान की दर को कम करने का लक्ष्य पाएं।
ग. जिनको साफ पीने का पानी तथा प्राथमिक साफ वातावरण उपलब्ध नहीं हैं ऐसे लोगों की संख्या वर्तमान से पचास प्रतिशत तक कम कर पाएं झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे कम से कम सौ मिलियन लोगों के जीवन स्तर में 2020 तक सुधार लाएं।

8. संतुलित विकास के लिए विश्वस्तरीय भागीदारी विकसित करें।

क. एक खुली नियमाश्रित, गणनीय, पक्षपात विहीन व्यापारिक आर्थिक व्यवस्था बनाएं।
ख. अविकसित देशों की विशिष्ट जरूरतें पूरी करें, दूसरे देशों से घिरे देशों तथा छोटे द्वीपनुमा देशों की मदद करें।
ग. विकासशील देशों के कर्जे को समझदारी से निबटाएं।
घ. फर्मास्यूटिकल कंपनियों के साथ मिलकर विकासशील देशों तक मूलभूत जीवनदायनी दवाएं उपलब्ध कराएं।
ड. निजी क्षेत्र के साथ मिलकर विकसित देशों में नई तकनीक के लाभों को पहुंचाएं। विशेषकर सूचना और प्रसार से संबंधित तकनीक के लाभों को।

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