जैव तकनीक ने दिखाई विकास की राह

Submitted by birendrakrgupta on Sat, 08/16/2014 - 22:17
Source
पंचायतनामा, 11-17 अगस्त 2014
पराजनीन (ट्रांसजैनिक) फसलें- प्रकृति में अनेक ऐसे पादप है, जिन पर संक्रमण व रसायनों आदि का असर न के बराबर होता है, परंतु वे आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी होते हैं। वहीं दूसरी तरफ वे फसलें जिनसे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले तमाम उत्पाद प्राप्त होते हैं, पर संक्रमण इतनी तेज से होता है कि उत्पादकता शून्य तक हो जाती है। जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा वे जींस अनुपयोगी पौधों को संक्रमणरोधी बनाते हैं को उपयोगी पौधों के जीनोम में प्रत्यारोपित कर देते हैं जिससे यही नया पौधा एक तरफ जो अपने पूर्वज की संक्रमण प्रतिरोधी होता है तो दूसरे पूर्वक की तरह उपयोगी उत्पाद देने वाला। चूंकि इसमें एक पौधा, दूसरे पौधे के जींस को धारण करता है। अत: इस नए उत्परिवर्तित पौधे को पराजीनी (ट्रांसजैनिक) पौधे भी कहते हैं। पूरे विश्व में पराजीनी फसलों की कृषि का प्रचलन तेजी से बढ़ा है जिनमें से प्रमुख हैं-

खरपतवारनाशक प्रभाव शून्य पौधे


फसलों के बीच में उगने वाले अनुपयोगी पौधों (खरपतवारों) को नष्ट करने के लिए खतपतवार नाशकों (हर्बीलाइड्स) का प्रयोग होता है। परंतु अक्सर ये रसायन खरपतवारों के साथ-साथ फसलों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा विकसित पराजीवी फसलों पर इन रसायनों का कोई असर नहीं होता है। इससे केवल खरपतवार ही नष्ट होते हैं, फसल नहीं। ग्लाइफोसेट (एक हर्बिसाइड्स) प्रभाव-शून्य पौधे आज पूरे विश्व में सफलता से उगाए जा रहे हैं।

बीटी फसलें


आज की सर्वाधिक चर्चित ये फसलें, जैव प्रौद्योगिकी का वरदान है। इन पर कीट पतंगों का कोई असर नहीं होता है। इन पौधों के जीनोम में ‘बैसिलस थूरिनजेसिस (बीटी) नामक जीवाणु के जींस प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं क्योंकि ये पौधे बीटी जीवाणु के जींस धारण किए रहते हैं। अत: इन्हें बीटी पौधे भी कहते हैं। यह बीटी जींस किस्टल प्रोटीन का निर्माण करता है जो कि अनेक प्रकार की फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के लिए जहरीला होता है। जैसे ही कोई कीट इन पौधों को खाता है, वह प्रोटीन उसके गले में अवशोषित हो जाता है। अवशोषित होते ही यह वहां की कोशिकाओं को तेजी से नष्ट करना शुरू कर देता है, जिससे थोड़ी ही देर में कीट की तड़प कर मृत्यु हो जाती है। इसकी सफलता को देख कर आज इसे अनेकानेक पौधों में प्रत्यारोपित का कीट संक्रमणमुक्त पौधों को विकसित किया जा चुका है। बीती सोयाबीन एवं बीटी मक्का इसके प्रमुख उदाहरण है।

अन्य अभियांत्रिक उत्पाद

पादप आधारित टीका बनाने में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग आजकर चलन में है। हेपटाइटिस बी, दांत की सड़न, डायरिया आदि में पादप आधारित टीके जैव प्रौद्योगिकी के उपहार हैं। हाइ फ्रक्टोज कार्न सिरपऐसा मीठा पदार्थ है जिसे इन दिनों ठंड पेय बनाने में उपयोग किया जाता है। जैव प्रौद्योगिकी द्वारा उत्पन्न किए गए एंजाइम की सहायता से प्राप्त यह मीठा पदार्थ चीनी से सस्ता एवं स्वास्थ्य के लिए कम नुकसानदेह है। जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा टमाटर की ऐसी प्रजातियां विकसित की गई है जिनमें पानी की मात्रा तथा पकने का समय अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसमें इसके भंडारण एवं आयात निर्यात में काफी सुविधा हुई है। जीन अभियांत्रिक सेब की महक तो बरबस उपभोक्ताओं को आकर्षित करती है। मृदा में ऐसे सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं। इन सूक्ष्म जीवों को जैव उर्वरक कहा जाता है। अनेक जैव उर्वरक अनेक पोषक तत्व तैयार करते हैं। परंतु वायुमंडल से वायवीय नाइट्रोजन को अवशोषित कर उसे पौधों के उपयोग लायक बनाना इसका मुख्य कार्य है। क्योंकि पौधे सीधे वायुमंडल से नाइट्रोजन अवशोषित नहीं कर सकते हैं। जैव प्रौद्योगिकी की मदद से आज अनेक प्रकार के और बढ़ी हुई क्रियाशीलता वाले जैव उर्वरकों का निर्माण कर दिया गया। डाइजोवियम, एजोला, एजोटोवैक्टर ऐसे ही जैव उर्वरक है।


सूक्ष्म रोपण (माइक्रोप्रोएगेशन)


कृषि में आज ऐसे उपयोगी पौधे हैं जो तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। इसके कई कारण हैं- एक तो पौधे से बीज बनने तक में कई वर्ष लग जाते हैं। ऊतक संवर्द्धन विधि द्वारा पौधों की संख्या में अल्प समय में संवर्द्धन प्रत्येक कोशिका से नए पौधे विकसित कर लिए जाते हैं।

विषाणु मुक्त पौधे


जैव प्रौद्योगिकी का एक और महत्वपूर्ण अनुप्रयोग ऐसे पौधे विकसित करने में है, जिस पर विषाणु संक्रमण का प्रभाव नहीं होता। ये ऐसे पौधे हैं जिनमें जीनोम में विषाणु के जींस डाल दिए जाते हैं। ये जींस प्रोटीन उत्पन्न करते हैं। विषाणु की संक्रमणमुक्त प्रजातियां हाल ही में व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार की गई है।

खाद्य संवर्धन


कृषि द्वारा उत्पन्न खाद्य पदार्थों के संवर्द्धन में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग हुआ है। प्राचीनकाल में पनीर उद्योग को बछड़ों के ‘जावन’ का प्रयोग होता था परंतु अशुद्धता, अत्यधिक लागत एवं कम उत्पादकता उद्योग को प्रभावित करती थी। 1990 में ‘काइमेसिन’ नामक एंजाइम, जिसे जीन अभियांत्रिकी द्वारा एक जीवाणु से प्राप्त किया गया। पनीर उद्योग में क्रांति ही ला दी। आज पूरे देश में पनीर उद्योग मूलत: इसी एंजाइम पर टिका हुआ है। खाद्य उद्योग का लगभग एक तिहाई हिस्सा किण्वन पर आधारित है। ईस्ट (खमीर-सैकरोमाइसिटीज सेरेविसी) तथा अन्य सूक्ष्म जीव इस किण्वन के लिए उत्तरदायी है। इन्हीं सूक्ष्म जीवों को जीनोम में परिवर्तन कर, उन्नत एवं सुधरी हुई प्रजातियां तैयार करने में जैव प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ईस्ट की तीन अभियांत्रिक प्रजातियों का उपयोग आज दूध के मक्खन से लेकर ब्रेड बनाने तक किया जाता है।

पोषकता


कृषि की पोषकता बढ़ाने में भी जैव प्रौद्योगिकी का योगदान कम नहीं है। आधुनिक युग में भोजन की पोषकता, बाहरी स्वरूप एवं स्वाद के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा है। जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा विकसित पराजीनी सोयाबीन के पौधों से प्राप्त सोयाबीन में प्रोटीन की मात्रा पौधें से उत्पन्न सोयाबीन से 80 प्रतिशत अधिक है। इसी प्रकार पराजीवी आलू एवं दालें जिनमें कांड एवं एमिनो एसिड की मात्रा अपेक्षा से अधिक है, का उपयोग बखूबी हो रहा है। जीन अभियांत्रिक से निर्मित चावल में बीटा कैरोटीन उत्पन्न करने की क्षमता है। बीटा कैरोटिन से विटामिन ‘ए’ का निर्माण होता है जो कि रतौंधी एवं आंख की अन्य बीमारियों को रोकने में सहायक है।

भविष्य की संभावनाएं


कृषि के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी का दोहन अभी बाकी है। वैज्ञानिक फसलों की अनेकानेक प्रजातियों के विकास में लगे हैं। ऐसी फसलें जिन पर वातावरणीय दबाव का कोई असर हों, न तो ताप का, न तो सूखे का और न ही बाढ़ का। कोई फसल किसी क्षेत्र एवं मौसम विशेष की नहीं रह जाएगी। कोई भी फसल किसी भी मौसम में उगाई जा सकेगी। जाहिर है कि इन बातों का भरपूर लाभ कृषि जगत को मिलेगा। उत्पाद तो बढ़ेगा ही, किसानों की निर्भरता मौसम पर नहीं रहेगी। तब सूखा या बाढ़ का प्रकोप उत्पादकता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं कर पाएगा। भारत मे भी जैव प्रौद्योगिकी के महत्व को समझा जा चुका है। वर्ष 1986 में विज्ञान व प्रौद्योगिकी द्वारा अलग जैव प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना की जा चुकी है।

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