ग्रामीण विकास का आधार रोजगार

Submitted by birendrakrgupta on Sun, 08/24/2014 - 10:09
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Source
कुरुक्षेत्र, फरवरी 2013
आजादी के बाद गांवों में विकास और वहां के लोगों के लिए कृषि के साथ-साथ रोजगार के दूसरे अवसर जुटाने के उद्देश्य से तरह-तरह की योजनाएं चलाई गईं। भारत के गांवों में रोजगार की व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे देश की लगभग दो-तिहाई आबादी गांवों में बसती है। जाहिर है गांवों में लोगों के लिए रोजगार जुटाए बिना भारत को विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने का सपना पूरा नहीं हो सकता। यह सच है कि 2005 में शुरू हुए महात्मा गांधी नरेगा की शुरुआत के बाद गांवों में रोजगार का स्वरूप बदला है और इसके अनेक सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। रोजगार किसी भी देश और समाज के आर्थिक विकास की कुंजी है। जिस गति से रोजगार पाने वालों की संख्या और उनकी आमदनी में बढ़ोतरी होती है उसी गति से देश विकास के पथ पर अग्रसर होता है। यह सच्चाई स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान ही गांधीजी ने पहचान ली थी और उन्होंने ग्रामीण स्वराज का नारा दिया था जिसमें गांव के प्रत्येक व्यक्ति के पास सार्थक काम और अपने-आप में आत्मनिर्भर इकाई के रूप में गांव की कल्पना की गई थी। आजादी के बाद गांवों में विकास और वहां के लोगों के लिए कृषि के साथ-साथ रोजगार के दूसरे अवसर जुटाने के उद्देश्य से तरह-तरह की योजनाएं चलाई गईं। भारत के गांवों में रोजगार की व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे देश की लगभग दो तिहाई आबादी गांवों में बसती है। हालांकि शहरीकरण के विस्तार के कारण ग्रामीण आबादी का अनुपात हाल के वर्षों में कुछ कम हुआ है, किंतु 2001 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 72.2 प्रतिशत लोग गांवों में तथा 27.8 प्रतिशत शहरों में बसे थें। जाहिर है गांवों में लोगों के लिए रोजगार जुटाए बिना भारत को विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने का सपना पूरा नहीं हो सकता।

यह सच है कि 2005 में शुरू हुए महात्मा गांधी नरेगा की शुरुआत के बाद गांवों में रोजगार का स्वरूप बदला है और इसके अनेक सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। किंतु यह कार्यक्रम एक रोजगार गारंटी कार्यक्रम है जिसके अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के उन परिवारों के एक समर्थ व्यक्ति को न्यूनतम रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान है जिनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है। इसलिए केवल इस कार्यक्रम के भरोसे ग्रामीण रोजगार का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस अनूठे कार्यक्रम से पहले भी समय-समय पर अनेक योजनाएं चलाई गई हैं जिनके माध्यम से लोगों को सीधे रोजगार देने के साथ-साथ उन्हें रोजगार प्राप्त करने और अपना काम-धंधा चलाने लायक कौशल व क्षमता प्राप्त करने में सहायता देने के प्रयास किए गए हैं। इन सभी योजनाओं के फलस्वरूप देश की बढ़ती आबादी के अनुरूप नौकरियों और व्यवसायों की व्यवस्था करने में मदद मिली है। साथ ही विभिन्न योजनाओं के तहत गांवों में बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं द्वारा सस्ती दरों पर ऋण देने के प्रयास किए जाते हैं ताकि लोग इस वित्तीय मदद से अपनी क्षमता और हुनर के अनुरूप काम-धंधे चलाकर परिवार का भरण-पोषण कर सकें और गांवों के विकास में योगदान दे सकें।

इस सिलसिले में 2004 में चलाई गई ‘काम के बदले अनाज’ योजना काफी कारगर सिद्ध हुई। इसके अंतर्गत गांवों में संपत्ति निर्माण के विविध कार्यक्रमों में काम करने वालों को वेतन के रूप में नकद रकम के साथ-साथ निश्चित मात्रा में अनाज दिया जाता था। असल में इस कार्यक्रम से ही मनरेगा की आधार भूमि तैयार हुई। इसमें पहली बार 100 दिन के रोजगार की गारंटी का प्रावधान किया गया। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और भुखमरी कम करने में काफी मददगार साबित हुई। यह योजना मनरेगा में मिला दी गई है।

रोजगार जुटाने की दिशा में एक और उल्लेखनीय कदम स्वर्णजयंती स्वरोजगार योजना के रूप में उठाया गया। 1999 में प्रारंभ की गई इस योजना के अंतर्गत स्वयं-सहायता समूहों को बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं से आर्थिक मदद मिलती है। कुछ राज्यों में यह योजना बहुत बढ़िया ढंग से चल रही है और इसमें स्वयंसेवी संगठन बढ़-चढ़ कर सहयोग दे रहे हैं। विकलांगों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों के स्वयं-सहायता समूहों को मिलने वाली राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा ऋण तथा 50 प्रतिशत हिस्सा सब्सिडी के रूप में होता है। इस योजना की विशेषता यह है कि इसमें ज़्यादा ज़ोर ग्रामीण समाज के कमजोर वर्गों यानी महिलाओं, विकलांगों तथा अनुसूचित जातियों/जनजातियों के उत्थान पर दिया जाता है। 2009 तक लगभग 67 लाख स्वरोजगारियों के साढ़े 22 हजार स्वयं-सहायता समूहों को सहायता दी गई। इनमें 45 प्रतिशत लोग अनुसूचित जातियों/ जनजातियों के थे।

मनरेगा तथा ग्रामीण रोजगार के अन्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर नजर रखने तथा ग्रामवासियों को इन योजनाओं से लाभ उठाने के कायदे-कानूनों को समझाने के लिए भारत निर्माण सेवकों का कैडर तैयार किया गया है। ये स्वयंसेवी कार्यकर्ता गरीब ग्रामीण परिवारों तथा कार्यक्रमों को लागू करने के तंत्र के बीच कड़ी बनते हैं। भारत निर्माण सेवक ग्रामीण विकास व रोजगार के विभिन्न कार्यक्रमों के बारे में जनचेतना जागृत करने की दिशा में भी काम करते हैं। ग्रामीण रोजगार में गति लाने तथा गांवों में रह रहे लोगों का जीवन-स्तर बेहतर बनाने के उद्देश्य से भारत निर्माण का बहुआयामी कार्यक्रम शुरू किया गया है जिसके अंतर्गत सड़कें, आवास तथा अन्य निर्माण कार्य हाथ में लिए जाते हैं जिनसे बुनियादी ढांचा तो खडा़ होता ही है साथ में बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों को काम भी मिल जाता है। इस कार्यक्रम के 6 अंग हैं जिनमें प्रमुख हैं- प्रधानमंत्री सड़क योजना तथा इंदिरा आवास योजना। इंदिरा आवास योजना गांवों में बेघर लोगों को मकान उपलब्ध कराने तथा उनके निर्माण में बेरोजगारों को काम दिलाने के लिए 1985-86 में शुरू की गई थी। इसके अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को नया मकान बनाने या मौजूदा मकानों में सुधार/मरम्मत करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। इसमें अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लोगों को रियायत दी जाती है। इस योजना का 75 प्रतिशत खर्च केंद्र और 25 प्रतिशत राज्य सरकारें उठाती हैं।

वर्ष 2000 में शरू की गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का उद्देश्य 500 की आबादी वाले प्रत्येक गांव को पक्की सड़क से जोड़ना है। पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में आबादी की सीमा 250 है। इसमें नई सड़क बनाने के अलावा मौजूदा सड़कों को चौड़ा और पक्का करने के काम भी हाथ में लिए जाते हैं। सड़कों के विस्तार से गांवों में उद्योग-व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है तथा बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।

इन सभी कार्यक्रमों से गांवों में रोजगार में लगातार बढ़ोतरी होती रही है किंतु जैसा कि शुरू में कहा गया है ग्रामीण रोजगार की दृष्टि से जो कार्यक्रम सबसे अधिक कारगर और एक तरह से क्रांतिकारी सिद्ध हुआ है, वो है महात्मा गांधी नरेगा। पिछले 7 वर्षों में इस कार्यक्रम को अधिक पारदर्शी, कारगर और व्यापक बनाने के लिए किए गए सुधारों के फलस्वरूप यह ग्रामीण रोजगार का अनूठा मंत्र और यंत्र बन गया है। इसमें नए-नए काम जुड़ते जा रहे हैं जिससे इससे लाभ उठाने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। पहले यह नरेगा के नाम से जाना जाता था, लेकिन बाद में महात्मा गांधी का नाम जुड़ जाने से इसका नाम मनरेगा हो गया।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी काननू ‘मनरेगा’ 2 सितंबर, 2005 को अस्तित्व में आया और इसके अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम 2 फरवरी, 2006 को लागू हो गया। शुरू में यह कार्यक्रम देश के 200 जिलों में लागू किया गया। वर्ष 2007-08 में इसका क्रियान्वयन 330 जिलों तक बढ़ाया गया और 1 अप्रैल, 2008 से देश के सभी जिलों में इसे लागू कर दिया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य गांवों के उन परिवारों को साल में कम से कम 100 दिन का रोजगार दिलाना है जिनके वयस्क सदस्य बेरोजगार हैं और मेहनत-मजदूरी करने को तैयार हैं।

जैसाकि कानून के नाम से स्पष्ट है कि इसका मूल मकसद गांवों में रोजगार की व्यवस्था करना है। लेकिन इसका प्रभाव केवल रोजगार के अवसर सृजित करने तक सीमित नहीं है। यह कार्यक्रम असल में ग्रामीण जीवन में क्रांति का अग्रदूत सिद्ध हो रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा हरितक्रांति तथा बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे उपायों के समान सामाजिक परिवर्तनकारी कार्यक्रम सिद्ध हो रहा है। बेरोजगारी और गरीबी दूर करने के साथ-साथ यह गांवों में बुनियादी सोच में भी बदलाव ला रहा है। इससे ग्रामीणों में नए तरह का विश्वास व आत्मबल पैदा हो रहा है। यह बात इस तथ्य के रूप में प्रमुखता से उजागर हुई है कि जिन राज्यों में इसे कुशलता और ईमानदारी से लागू किया गया है वहां गांवों से शहरों को पलायन की प्रवृत्ति पर काफी हद तक रोक लग गई है। इससे समाज के गरीब और कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा का पुख्ता ढांचा विकसित हो रहा है और न्यूनतम रोजगार का आश्वासन मिल जाने से ग्रामीण लोग बच्चों की शिक्षा, शिशुओं व महिलाओं के स्वास्थ्य, साफ-सफाई जैसे पहलुओं पर ध्यान देने लगे हैं जो पहले प्रायः उपेक्षित रहते थे।

‘मनरेगा’ की सफलता का एक और आयाम यह है कि इसकी बदौलत गांवों में विकास कार्यों तथा स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण को नई गति मिल रही है। यह कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। इसे चलाने में पंचायती राज संस्थाओं की सक्रिय भूमिका के चलते ग्रामीण प्रशासन का विकेन्द्रीकरण हो रहा है और इस तरह लोकतंत्र तथा पारदर्शिता की जड़े मजबूत हो रही हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे काम हाथ में लिए जाते हैं जिनमें श्रम की अधिक आवश्यकता होती है। अब सिंचाई कार्यक्रम, जल आपूर्ति तथा पशुपालन जैसे नए कार्य भी मनरेगा में शामिल कर लिए गए हैं। यही नहीं, कानून में यह भी शर्त है कि काम के स्थान पर श्रमिकों के लिए पीने के पानी, बच्चों के लिए बाल केन्द्र, आराम करने के लिए शेड आदि की व्यवस्था की जाए। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है कि रोजगार पाने वालों में कम से कम एक तिहाई संख्या महिलाओं की हो। इससे ग्रामीण जनता में बचत की आदत को भी प्रोत्साहन मिल रहा है। डाकघरों और बैंकों में लाखों की संख्या में खाते खुल गए हैं क्योंकि मजदूरी की राशि सीधे बैंकों और डाकघरों में लाभार्थियों के खाते में भेज दी जाती है।

‘मनरेगा’ के अंतर्गत रोजगार देने की प्रक्रिया को यथासंभव सरल और पारदर्शी बनाने का प्रयास किया गया है ताकि लोगों को नियम-कायदों के जंजाल से बचाया जा सके और उनका शोषण भी न होने पाए। जो भी ग्रामीण वयस्क मेहनत-मजदूरी करना चाहते हैं उन्हें ग्राम पंचायत में अपना नाम दर्ज कराना होता है। इन उम्मीदवारों की योग्यता आदि की जांच के बाद उन्हें पंचायत कार्यालय से ‘जॉबकार्ड’ जारी किया जाता है। जॉबकार्ड एक तरह से श्रमिक की रोजगार पासबुक है, जिसमें उसे मिले रोजगार का ब्यौरा दर्ज रहता है। इसमें परिवार के सभी वयस्क सदस्यों के फोटो लगे रहते हैं। जॉबकार्डधारी लोग पंचायत में आवेदन करके सूचित करते हैं कि उन्हें कब और कितने दिन का रोजगार चाहिए। इस प्रकार रोजगार की गारंटी की व्यवस्था लागू हो जाती है। यदि 15 दिन के भीतर रोजगार नहीं जुटाया जाता है तो आवेदक को बेरोजगारी भत्ते का भुगतान किया जाता है। यह भी प्रावधान किया गया है कि रोजगार गांव से प्रायः 5 किलोमीटर की दूरी में ही उपलब्ध कराया जाए। इससे अधिक दूर काम पर लगाए जाने की स्थिति में 10 प्रतिशत अतिरिक्त वेतन देना होगा।

रोजगार देने की प्रक्रिया में सरलता और पारदर्शिता के प्रावधानों के बावजूद इसके क्रियान्वयन में कई तरह की कमियों और खामियों की शिकायतें मिलती रहती हैं। कार्यक्रम के सुचारु क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा है - भ्रष्टाचार। हालांकि श्रमिकों के चयन और धन के भुगतान की प्रक्रिया को पारदर्शी रखने के उपाय किए गए हैं, किंतु नैकरशाहों और कुछ स्थानों पर पंचायतों के कर्मचारियों की भ्रष्ट गतिविधियों के समाचार मिलते रहते हैं। कई बार बेनामी श्रमिकों के मास्टर रोल बनाकर उनके नाम से वेतन का भुगतान कराके ये अधिकारी राशि हड़प जाते हैं। ऐसा भी देखने में आया है कि श्रमिकों से हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान कोरे कागज पर लिया जाता है और श्रमिक के काम पर न आने की स्थिति में भी उसके नाम पर भुगतान ले लिया जाता है। वैसे तो कहा जा सकता है कि इस तरह का भ्रष्टाचार अन्य सरकारी योजनाओं में भी चल रहा है लेकिन इस पर रोक लगाए बिना यह कार्यक्रम अपने उद्देश्य से भटक जाएगा और देश के गांवों से गरीबी मिटाने का यह सुनहरा प्रयास विफल हो जाएगा। रोजगार गारंटी कार्यक्रम की इस बात के लिए भी आलोचना की जाती है कि इससे ग्रामीण लोग निठल्ले बन रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि साल में 100 दिन के काम की तो गारंटी है ही। इसलिए वे सोचने लगते हैं कि ज्यादा मेहनत करके कमाई करने की जरूरत नहीं है। इसलिए कार्यक्रम के क्रियान्वयन में जवाबदेही और पारदर्शिता लाने के लिए अनेक उपाय किए गए हैं। इसके लिए सूचना के अधिकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। सूचना के अधिकार के अधिकाधिक इस्तमेाल से इसे लागू करने वाले कर्मियों और पंचायतों के अधिकारियों पर अंकुश लग सकता है।

इसके अलावा कानून में ही सोशल ऑडिटिंग यानी सामाजिक निरीक्षण का प्रावधान कर दिया गया है। इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति या संस्था मनरेगा के रिकार्ड की जांच कर सकता है। पंचायतों के लिए यह अनिवार्य है कि वे सोशल ऑडिट करने वाली संस्थाओं को अपनी बैठकों में बुलाएं। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले कई स्वयंसेवी संगठनों ने सक्रिय भूमिका निभाते हुए भ्रष्टाचार तथा महिलाओं को काम पर न रखने के मुद्दों का पर्दाफाश किया है। सामाजिक निरीक्षण दलों में राज्य सरकार के अधिकारी तथा स्वयंसेवी संगठनों के सदस्य अथवा समाज के जिम्मेदार लोग शामिल रहते हैं।

मनरेगा तथा ग्रामीण रोजगार के अन्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर नजर रखने तथा ग्रामवासियों को इन योजनाओं से लाभ उठाने के कायदे-कानूनों को समझाने के लिए भारत निर्माण सेवकों का कैडर तैयार किया गया है। ये स्वयंसेवी कार्यकर्ता गरीब ग्रामीण परिवारों तथा कार्यक्रमों को लागू करने के तंत्र के बीच कड़ी बनते हैं। भारत निर्माण सेवक ग्रामीण विकास व रोजगार के विभिन्न कार्यक्रमों के बारे में जनचेतना जागृत करने की दिशा में भी काम करते हैं। अनेक राज्यों में इन सेवकों की सेवाओं से ग्रामीण विकास की राह सरल बनती दिखाई दे रही है जिससे प्रेरित होकर इनकी संख्या बढ़ाने का निर्णय किया गया है। इन सेवकों को ग्रामीण क्षेत्रों में रहन-सहन, सामाजिक जीवन तथा विकास के बारे में बाकायदा प्रशिक्षण देने के बाद काम पर रखा जाता है। वे गांव वालों को लाभ पहुंचाने के साथ-साथ सरकार को फीडबैक भी देते हैं जिससे रोजगार तथा अन्य कल्याण कार्यक्रमों में आवश्यक बदलाव व सुधार लाना संभव हो जाता है।

(लेखक भारतीय सूचना सेवा से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। ई-मेल: setia_subhash@yahoo.co.in)

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