बिहार को बैराज से बचाओ

Submitted by HindiWater on Fri, 08/29/2014 - 10:06
समुद्र से उठने वाले मॉनसून और नदियों के जरिए हिमालय से आने वाली गाद, तलछट और पानी के कारण ही दक्षिण एशिया को सर्वाधिक अन्न उत्पादक क्षमता वाला क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त है। नदी की गाद, तलछट और प्रवाह के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर हम इस गौरव को समाप्त करने का काम करेंगे। नदियों के पानी पर पहला हक समुद्र का है। हम इस हक में भी बाधा उत्पन्न करेंगे। इससे मॉनसून प्रभावित होगा और खेती भी। महाराष्ट्र और गुजरात ऐसे राज्य हैं, जहां किसी भी तीसरे राज्य की तुलना में सिंचाई के लिए सबसे ज्यादा बांध बने। इन दोनों राज्यों ने आजादी से अब तक भारत के कुल सिंचाई बजट का सबसे ज्यादा हिस्सा पाया; बावजूद इसके इनके बांधों में फरवरी आते-आते पानी नहीं रहता।

मार्च आते-आते महाराष्ट्र के गांवों में पानी के टैंकर की आहट हम पिछले कई वर्षों से सुन ही रहे हैं। महाराष्ट्र से होने के बावजूद श्री नितिन गडकरी जी को यह आहट भले ही सुनाई न दे रही हो; लेकिन पहले से फरक्का बैराज के दुष्परिणाम झेल रहे बिहार और बंगाल के सुधीजनों ने गंगा जलमार्ग के खतरे की आहट सुन ली है। गंगा जलमार्ग परियोजना के प्राथमिकता में आने की खबर से ही बिहार-बंगाल के आमजन की बेचैनी बढ़ गई है।

संभवतः बाढ़ और सुखाड़ को एक अमिट लेख मानकर बिहार में इनके लिए आंदोलन का कोई ताजा प्रकरण नहीं है। किंतु ऐसे संदेश हैं कि लंबे अरसे से फरक्का बैराज के दुष्परिणाम झेल रही जनता अब फरक्का बैराज से तकनीकी तौर पर निजात चाहती है; ताकि भारत-बांग्लादेश जलसंधि भी सुरक्षित रहे और बैराज से पलटकर जाने वाले पानी से तबाही से भी लोग बच जाएं। लिहाजा, सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच बैठकों का दौर बढ़ गया है।

बहुत संभव है कि इस परियोजना को लेकर अगले कुछ महीनों में नई केन्द्र सरकार को एक सशक्त आंदोलन का सामना करना पड़े। हो सकता है कि ऐसे में इंटेलीजेंस ब्यूरो इन्हें विकास विरोधी घोषित कर दे। स्थिति बिगड़े और आगे खतरा फरक्का बैराज पर गहरा जाए।

लामबंद हो रहा बिहार


गौरतलब है कि गंगा जलमार्ग परियोजना में विश्व बैंक मुख्य वित्त और तकनीकी सहायक के तौर पर जुड़ गया है। विश्व बैंक की एक टीम अगस्त के पहले सप्ताह में पटना, बंगाल और झारखंड का दौरा भी कर आई है और स्थानीय शासन-प्रशासन से चर्चा भी।

इलाहाबाद से वाराणसी के बीच और वाराणसी से बक्सर के बीच एक-एक बैराज का बनना तय हो गया है। एक डेनिश कंपनी को इसका निर्माण सौंपने का मन भी बना लिया गया है। इसे लेकर खासकर बिहार लामबंद होता दिखाई दे रहा है।

उत्तर-प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में विपक्षी दलों की सरकारें हैं। सिवाय जदयू सांसद अली अनवर के बैराजों को लेकर आमजन की बेचैनी को फिलहाल कोई विपक्षी राजनीतिज्ञ मुखर नहीं हुआ है। कांग्रेसी नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की चेतावनी भी गंगा के अन्य मसलों को लेकर ही थी।

जनता की नब्ज पर राजनीति करने का दावा करने के बावजूद विपक्षी दलों की यह चुप्पी आश्चर्यचकित करने वाली जरूर है। हो सकता है कि प्रदेश की सरकारें विश्व बैंक के दबाव में हो। यह भी हो सकता है कि फरक्का से तबाही के दौरान बंटने वाली राहत की बंदरबांट में शामिल वर्ग, नए बैराजों की आहट में भी अपना मुनाफा ही देख रहा हो। किंतु जो लोग फरक्का बैराज के लगातार दुष्परिणाम झेल रही जनता की जिजीविषा को जानते हैं, वे कह सकते हैं कि राज्य सरकारों को बैराजों पर जल्द ही अपना नजरिया प्रस्तुत करना पड़ेगा।

हिमालय से निकली गंगा, महाराष्ट्र नदियों जैसी नहीं है। गडकरी जी भी जितनी जल्दी यह समझ लें, उतना अच्छा।

फरक्का बैराज अनुभवों की उपेक्षा


चिंता की बात है कि गंगा जलमार्ग परियोजना की परिकल्पना करते वक्त बिहार-बंगाल में बांध, बैराज व तटबंधों के अनुभवों को नजरअंदाज किया गया है। इसे विचारते समय न डॉल्फिन सेंचुरी क्षेत्र के बारे में सोचा गया है और न कछुआ सेंचुरी के बारे में। 2240 मीटर लंबे फरक्का बैराज की असफलता और दुष्परिणाम से भी कुछ नहीं सीखा गया।

फरक्का बैराज 1975 में बनकर तैयार हुआ। मकसद था कि इसके जरिए 40 हजार क्यूसेक पानी का रुख बदल दिया जाए, ताकि कोलकाता बंदरगाह बाढ़ से बच सके। यह अनुमान करते नदी में आने वाले तलछट का अनुमान नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, आवश्यकतानुरूप मात्रा में पानी का रुख नहीं बदला जा सका।

दुष्परिणाम आज सामने है। बैराज का जलाशय तलछट से ऊपर तक भरा है। पीछे से आनी वाली विशाल जलराशि पलटकर साल में कई-कई बार विनाश लाती है। ऊंची भूमि भी डूब का शिकार होने को विवश है। हजारों वर्ग किलोमीटर की फसल इससे नष्ट हो जाती हैं।

फरक्का बैराज के बनने के बाद से समुद्र से चलकर धारा के विपरीत ऊपर की ओर आने वाली ढाई हजार रुपए प्रति किलो मूल्य वाली कीमती हिल्सा मछली की बड़ी मात्रा से हम हर साल खो रहे हैं, सो अलग। नदी किनारे की गरीब-गुरबा आबादी फरक्का को अपना दुर्भाग्य मानकर हर रोज कोसती है। प्रधानमंत्री जी! बताइए, एक बैराज से उपजी त्रासदी से त्रस्त आबादी 16 नए बैराजों की खबर सुनकर डरे न तो और क्या करे?

गौरतलब है कि प. बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद को भागीरथी दो भागों में बांटती है। मुर्शिदाबाद का पश्चिमी भाग पहले ही मयूराक्षी और द्वारका जैसी पहाड़ी नदियों के उत्पात का शिकार है। भागीरथी में बाढ़ आने पर पूर्वी इलाके में स्थित जलांगी, चुरनी, भैरब, इच्छामति और माथभंगा आदि नदियों का प्रवाह उलट जाता है।

.उलट प्रवाह को तालाबों-खेतों तक पहुंचाने के लिए पहले आप्लावन नहरों का निर्माण किया गया था। यह प्रणाली हजारों साल चली। अब निर्माण की उलटबांसी के कारण फरक्का से उलटकर आया ऊंचा पानी साल में कई-कई बार विनाश लाता है। गंगा पर नए बैराज यह उलटबांसी और बढ़ाएंगे।

महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय पहलू


दरअसल, बैराजों की परिकल्पना करते वक्त यह भी ध्यान नहीं दिया गया कि हिमालय और हिंद महासागर, पूरे दक्षिण एशिया की परिस्थितिकी के निर्धारक हैं।

समुद्र से उठने वाले मॉनसून और नदियों के जरिए हिमालय से आने वाली गाद, तलछट और पानी के कारण ही दक्षिण एशिया को सर्वाधिक अन्न उत्पादक क्षमता वाला क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त है। नदी की गाद, तलछट और प्रवाह के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर हम इस गौरव को समाप्त करने का काम करेंगे। नदियों के पानी पर पहला हक समुद्र का है। हम इस हक में भी बाधा उत्पन्न करेंगे। इससे मॉनसून प्रभावित होगा और खेती भी।

हमें याद रखने की जरूरत है कि किसी भी नदी का एक काम गाद और तलछट को लेकर समुद्र तक पहुंचाना भी है। गंगा एक ऐसी नदी है, जो दुनिया की किसी भी नदी की तुलना में अपने साथ सर्वाधिक गाद और तलछट लेकर चलती है।

उत्तर बिहार की घाघरा, गंडक और कोसी जैसी प्रबल प्रवाह व मिट्टी लेकर चलने वाली नदियां इसमें मिलती हैं। इसी से उत्तर बिहार का उपजाऊ मैदान बना है। डेल्टा के निर्माण में भी इसकी अहम् भूमिका है। पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिला स्थित सुंदरबन द्वीप समूह के अस्तित्व पर पहले ही संकट कम नहीं। गाद और तलछट के मार्ग में रुकावट मैदान के उपजाऊपन और डेल्टा के अस्तित्व पर संकट और बढ़ाएगा।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में वार्षिक वर्षा का औसत पटना में 1000 मिमी से लेकर पूर्वी हिस्सों में 1600 मिमी तक है। दक्षिण के मैदानी इलाके यानी पुराने पटना, गया, शाहाबाद, दक्षिण मुंगेर और दक्षिण भागलपुर में जमीन में आर्द्रता संभालकर रखने की क्षमता कम है।

गंगा किनारे के इलाके छोड़ दें तो इतर इलाकों का भूजल स्तर इतना नीचा है कि कुआं खोद पाना मुश्किल है। बैराज इस संकट को बढ़ाएंगे कि घटाएंगे? परियोजना नियोजकों ने इस दिशा में बैराज के पर्यावरणीय प्रभाव का इसका कोई आकलन नहीं किया गया है। किंतु बिहार के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि कभी बाढ़ से बचाव के नाम पर हमने कोसी को तटबंध में बांधा।

आज कोसी सर्वाधिक तबाही लाने वाली भारतीय नदी है। दामोदर नदी पर बने तटबंध ने प. बंगाल के जिला बर्दवान को तालाबों व समृद्धि का नाश किया और फरक्का बैराज ने खेती-मछली और सेहत का। इसीलिए वे डरे हुए हैं और आक्रोशित भी।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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