किसके भले के लिए हैं जैव संवर्धित बीज

Submitted by birendrakrgupta on Fri, 08/29/2014 - 13:37
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डेेली न्यूज एक्टिविस्ट, 26 अगस्त 2014
बीटी कपास के बीजों को परीक्षण के तौर पर जब भेड़ों को खिलाया गया तो उनके गुर्दे, फेफड़े, जननांग और हृदय के आकार और वजन में कमी हो गई और यह बीज जिन भी जानवरों को खिलाया गया तो उनके शरीर में श्वेत व लाल रक्त कणिकाओं में भारी कमी पाई गई। यही सारी विसंगतियां बीटी बैगन के बीज के बारे में भी है।जैव संवर्धित बीज यानी बीजों की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ कर उन्हें अपने मनोनुकूल बनाना। इस शताब्दी की शुरुआत से ही इस तरह के बीजों के समर्थन व विरोध का खेल देश में चल रहा है। देश के तमाम जाने-माने वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, कृषि वैज्ञानिक व राजनेता जहां इस तरह के बीजों के देश में परीक्षण पर एतराज जता रहे हैं, वहीं इसी तरह के कई लोग इसके समर्थन में भी लगे हैं, जिसके कारण स्थिति बहुत दुविधापूर्ण हो गई है।

पिछली कांग्रेसनीत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मसले की जांच और सुझाव के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया था, जिसने अपने अध्ययन के बाद इस तरह के बीजों के भारत में परीक्षण न करने की सलाह दी थी। लेकिन केंद्र में सत्तारुढ़ भाजपा की सरकार ने बीती 18 जुलाई को ऐसे 15 बीजों के देश में परीक्षण किए जाने की चुपचाप अनुमति प्रदान कर दी है।

भाजपा सरकार के इस कदम का अन्य तमाम संगठनों के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठन “स्वदेशी जागरण मंच” ने भी विरोध किया है। ध्यान रहे कि वर्ष 2002 में भाजपा नीत राजग ने ही सर्वप्रथम जैव संवर्धित बीजों को बीटी कॉटन यानी कपास के रूप में देश में प्रवेश कराया था। यहां यह चर्चा किए जाने की जरूरत है कि सरकार के इस कदम के पीछे देश में खाद्यान्न बढ़ाने की मंशा काम कर रही है या भारी-भरकम विदेशी कंपनियों को देश के किसानों को लूटने का मौका देने की।

जैव संवर्धित यानी जीएम बीजों के पक्ष में मुख्यतया दो तर्क दिए जाते हैं कि एक तो ये कीटरोधी होते हैं तथा दूसरे इनसे पैदावार ज्यादा होती है। ध्यान रहे कि ये दोनों तर्क इन बीजों को बनाने वाली कंपनियों के हैं। जीएम बीजों का देश में सबसे पहले प्रवेश बीटी कॉटन के रूप में हुआ और बहुत विवादित रहा। बीटी कॉटन की खेती ने जल्द ही उक्त दोनों तर्कों को झूठा साबित कर दिया।

बीटी कपास तैयार होने में 200 दिन से अधिक का समय लेती है, वहीं देसी कपास महज पांच महीने में ही तैयार हो जाती है और इसमें पानी, पोषक तत्व तथा खाद भी बीटी के मुकाबले काफी कम लगती है। इनके प्रयोग को लेकर महाराष्ट्र खासा विवादित रहा, जहां पहले से ही कृषि संबंधी विपदाओं को लेकर किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं कर रहे थे। महाराष्ट्र के विदर्भ जिले की विदर्भ जनान्दोलन समिति ने तुलनात्मक अध्ययन करके साबित किया कि देसी कपास के मुकाबले बीटी कपास हर हाल में नुकसानदेह है। समिति का दावा है कि जहां बीटी कपास तैयार होने में 200 दिन से अधिक का समय लेती है। वहीं देसी कपास महज पांच महीने में ही तैयार हो जाती है और इसमें पानी, पोषक तत्व तथा खाद भी बीटी के मुकाबले काफी कम लगती है। अध्ययन में यह पाया गया कि बीटी बीज बनाने वाली कंपनी का यह दावा भी सही नहीं है कि इस बीज को बोने से फसल में कीट नहीं लगते, लेकिन इस बीटी फसल की वजह से अन्य फसलें कई तरह से प्रभावित होती हैं। बीटी कपास के बीजों को परीक्षण के तौर पर जब भेड़ों को खिलाया गया तो उनके गुर्दे, फेफड़े, जननांग और हृदय के आकार और वजन में कमी हो गई और यह बीज जिन भी जानवरों को खिलाया गया उनके शरीर में श्वेत व लाल रक्त कणिकाओं में भारी कमी पाई गई। यही सारी विसंगतियां बीटी बैगन के बीज के बारे में भी है, जिसे वर्ष 2012 में सांसद वासुदेव आचार्य की अध्यक्षता वाली एक संसदीय समिति ने रोकने की मांग की थी।

बीते एक दशक में हमारे देश के खाद्यान्न उत्पादन में पांच गुना से अधिक बढ़ोत्तरी हुई है। यह बढ़ोत्तरी देसी बीजों से हुई है और इसमें किसी जीएम बीज का कोई योगदान नहीं है। देश की आबादी के लिए और ज्यादा खाद्यान्न चाहिए, यह तर्क इस सच्चाई के सामने झूठा साबित हो जाता है कि हमारे यहां हर साल 58,000 करोड़ रुपयों का अनाज रख-रखाव के अभाव में सड़ जाता है। सरकार इस अनाज को सहेजने की कोशिश क्यों नहीं करती? तमाम राज्यों के उच्च न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सरकारों को फटकार लगा चुके हैं कि यदि अनाज को सहेजना सरकार के वश की बात नहीं है तो उसे गरीबों में बांट दिया जाए।

खाद्यान्न की कथित कमी का बहाना कर रही सरकार के अपने ही आंकड़े बताते हैं कि देश में सिर्फ 43 प्रतिशत जमीन पर यानी कुल छह लाख गांवों में से महज चार लाख गांवों में ही अभी खेती की जा रही है। बाकी की जमीन अन्यान्य कारणों से कृषि योग्य नहीं है, लेकिन इसे सुधारा जा सकता है। देश में 178 लाख एकड़ भूमि लवणीय है। इसे सुधार कर खेती के काम में लाया जा सकता है। इसमें से 47 लाख एकड़ भूमि का सुधार किया भी जा चुका है, जिससे 150 लाख टन खाद्यान्न प्रतिवर्ष प्राप्त हो रहा है। देश में अगर और खाद्यान्न की जरूरत है तो इस तरह आसानी से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और इस तरीके से रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे तथा गांवों से शहरों की तरफ पलायन को भी रोका जा सकेगा।

बीते दो-तीन दशक से देश की कृषि में आश्चर्यजनक प्रयोग हुए हैं। इनसे यदि किसानों ने लाभ उठाया तो कई नए प्रकार के धोखों से भी वे रूबरू हुए। क्या यह सवाल आश्चर्य नहीं पैदा करता कि उन्नत कृषि, उन्नत बीज और उन्नत तकनीक के प्रयोग से उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन किसान की आमदनी बढ़ने के बजाय घटती गई? ज्यादा पैदावार के लिए हाइब्रिड बीज बाजार में आए, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि फसल की तैयारी के समय उसके दाम इस कदर गिरने लगे कि बहुत बार किसानों को अपनी फसल खेत में ही छोड़ देनी पड़ी, क्योंकि उस फसल से मजदूरों की मजदूरी भी नहीं निकल रही थी।

बीते वषों में ऐसी सैकड़ों घटनाएं हो चुकी हैं कि किसानों ने तिल, उड़द, मक्का और बाजरा आदि के उन्नत बीज लाकर बोए। उनमें फलियां भी आईं, लेकिन बीज नहीं बने। मतलब वे निर्वंश बीज थे। किसान तबाह हो गए। बीटी कपास के प्रयोग के बाद से महाराष्ट्र व कर्नाटक जैसे राज्यों में किसानों के तबाह होने और तत्पश्चात आत्महत्या करने की घटनाएं बढ़ गई हैं।बेकार पड़ी जमीन का सुधार तथा अनाज भंडारण की व्यवस्था ये दो ऐसे कारक हैं जिनको अपना कर देश खाद्यान्न की चिंता से न केवल मुक्त हो सकता है बल्कि निर्यातक भी बन बन सकता है। देश में इस वर्ष कमजोर मानसून है। हमारी परंपरागत खेती में ऐसी तमाम फसलें थीं जो कम पानी में भी हो जाती थीं, लेकिन खेती में विदेशी अतिक्रमण ने उन फसलों को नेस्तनाबूद कर दिया। आज किसान के हाथ में वह भी कल्पनातीत कीमत पर!

क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि टमाटर जैसी सब्जी का जो देशी बीज 200-250 रुपए किलो मिलता था वही बीज इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दुकानों से 76,000 रुपए किलो यानी चांदी से भी दोगुनी कीमत पर बेचा जा रहा है? एक बार जब देश के किसान बीज के लिए पूरी तरह इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मोहताज हो जाएंगे, शोषण का इनका असली खेल तो तब शुरू होगा।

बीटी कपास की कंपनी मोंसाटो के चरित्र के बारे में तो जानिए कि वियतनाम युद्ध में उसके जंगलों और फसलों को जलाने के लिए अमेरिकी वायुसेना ने जिन खतरनाक रसायनों का छिड़काव किया था, उसे मोंसाटो ने ही बनाया था।

(लेखक का ईमेल : sunilamar92@gmail.com)

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