खापों के लोकतंत्र में मोल का पानी पीता दुजाना

Submitted by HindiWater on Sun, 08/31/2014 - 11:03
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. लोक में जल अपनी पुस्तक में श्याम सुंदर दुबे ने लिखा है, कुआं लोक तीर्थ है। कुआं रस कुंड है। कुआं पूजन कर नई माएं कुएं से मंगलाशीष मांगती हैं। अपने स्तन की पहली दुग्ध धार कुएं में छोड़ती हैं। कहती हैं यह दूध मेरा नहीं है, मेरे बच्चे का भी नहीं। यह तो तुमसे रस लेकर मेरी दुग्ध वाहनियों ने इस अमृत को पाया है।

दुजाना इस परंपरा का वाहक रहा है, लेकिन एक जमाने में नवाबों के शहर समूचे दुजाना को पानी पिलाने वाला दुर्गु का कुआं जब से ध्वस्त हुआ है तब से पूरा गांव मोल का पानी पीता है।

यह गांव झज्जर जिले का वह गांव है, जहां खापों का लोकतंत्र चलता है। शादी-ब्याह से लेकर विधायकों और सासंदों के चुनाव में खापों के फरमान चलते हैं। हरियाणा के इस इलाके में कभी दूध-दही नहीं बिकता था। अब यहां पानी बिकता है।

गांव में मोबाइल मरम्मत की दुकान चलाने वाले पंकज वर्मा बताते हैं, अब आर्थिक रूप से कमजोर दलितों और कुछ दूसरे परिवारों की बात छोड़ दें तो पूरा गांव मोल का पानी पीता है। मेरे एक मित्र महेश जोशी के पिता दिवंगत हरिप्रकाश जोशी कहा करते थे, जब पानी बिकता है तो समाज की हया बिकती है। लेकिन खापों के एजेंडे में पानी बिक्री का सवाल कहीं नहीं है। सुबह ही गांवों में पानी की बिक्री के लिए जयबीर नाम का एक विक्रेता आता है और गांव की महिलाएं मटके लेकर घरों के बाहर खड़ी हो जाती हैं।

यहां का ऐतिहासिक दुर्ग वाला कुआं अब पूरी तरह खत्म हो गया है। ग्रामीणों के मुताबिक यह कुआं तकरीबन 175 साल पुराना है और यहां के दुर्गा नाम के सेठ ने इस कुएं का निर्माण कराया था। यहां पर 8 से 10 भौंण के कई कुएं थे, लेकिन 12 भौंण का केवल यहीं कुआं था और इसका इलाके में काफी नाम था।

गांव के राजकीय उच्चतर विद्यालय के समीप स्थित तालाब के किनारे पर स्थित इस कुए की गहराई 90 हाथ से अधिक थी। गांव के उत्तर पूर्व में बने इस कुएं का चबूतरा 20 फुट से अधिक है। इसमें ईंटें बेरी के कुम्हारों ने मंगवाईं गईं थीं और वहीं के राज मिस्त्रियों ने इस कुएं का निर्माण किया था। यहां के बाजार में 35 साल से दर्जी की दुकान चलाने वाले दीनानाथ के मुताबिक बुजर्ग बताते थे कि इस कुएं के निर्माण में 7 लाख लखौरी ईंटें लगी थी।

कुएं और तालाब के मध्य बाकायदा दो मंजिला खूबसूरत छतरी बनाई गई थी। दो पक्के और सुंदर घाट हैं। घाट, जगति तथा दो मंजिल तिदरी की चिनाई में अनुमानत: 10 लाख से अधिक लखौरी ईंटें लगी हैं। दक्षिण की ओर मुख वाले इस कुएं की नाल की चौड़ाई 9 फुट है। अब यह कुआं खंडहर है। इस पर गांव की महिलाएं गोबर पाथती हैं और इसके भीतर चमगादड़ बसेरा करते हैं।

जलविद्या के प्रति हमारा परंपरागत समाज कितना वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है, इसका एक उदाहरण यहां स्थित संडासिर वाला जोहड़ है। ग्रामीणों के मुताबिक शौच निवृत्ति के बाद सफाई के लिए ग्रामीण किसी जमाने में केवल इसी जोहड़ के पानी का इस्तेमाल करते थे। गांव के पश्चिम में स्थित यह तालाब 6 एकड़ में फैला है। गांव के लोगों ने इसे तीन हिस्सों में बांटा है। शौच निवृत्ति के बाद ग्रामीण इन्हीं कुंओं पर नहाकर घरों को लौटते थे। लेकिन लोगों ने अब इनकी भौंणे भी नहीं छोड़ी हैं।

झज्जर मार्ग पर बने जोहड़ जिसे ग्रामीण बावड़ी वाला जोहड़ कहते हैं पर तीन कुएं थे। ग्रामीण अलीशेर के मुताबिक इस कुएं पर आठ भौंण लगी थीं। ये भौंण बहुत मजबूत थी। अब कुएं ठप्प हैं और दक्षिण पूर्व में 5 एकड़ से अधिक क्षेत्र में बने इस तालाब में गांव की गंदगी का एक बड़ा हिस्सा जाता है।

दुजाना के उत्तर-पश्चिम में बेरी रोड पर स्थित सिंघाडे वाले जोहड़ में अब एक भी सिंघाड़ा पैदा नहीं होता। 1995 के बाद यहां सिंघाड़े की खेती खत्म हो गई तो यह खेती करने वाले धीवर समुदाय के लोग भी धीरे-धीरे पलायन कर गए। साफ जोहड़ के साथ स्थित कुआं चालू हालत में हैं, लेकिन दसका यदा-कदा ही कोई इस्तेमाल करता है।

जलविद्या के प्रति हमारा परंपरागत समाज कितना वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है, इसका एक उदाहरण यहां स्थित संडासिर वाला जोहड़ है। ग्रामीणों के मुताबिक शौच निवृत्ति के बाद सफाई के लिए ग्रामीण किसी जमाने में केवल इसी जोहड़ के पानी का इस्तेमाल करते थे। गांव के पश्चिम में स्थित यह तालाब 6 एकड़ में फैला है।

गांव के लोगों ने इसे तीन हिस्सों में बांटा है। शौच निवृत्ति के बाद ग्रामीण इन्हीं कुंओं पर नहाकर घरों को लौटते थे। लेकिन लोगों ने अब इनकी भौंणे भी नहीं छोड़ी हैं। दुजाना के बजार में फोटोग्राफी की दुकान चलाने वाले राकेश भट्टी कहते हैं, तालाबों, कुओं को उनके कब्जों से बचाने की जरूरत है।

 

नरक जीते देवसर

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भूमिका - नरक जीते देवसर

2

अरै किसा कुलदे, निरा कूड़दे सै भाई

3

पहल्यां होया करते फोड़े-फुणसी खत्म, जै आज नहावैं त होज्यां करड़े बीमार

4

और दम तोड़ दिया जानकीदास तालाब ने

5

और गंगासर बन गया अब गंदासर

6

नहीं बेरा कड़ै सै फुलुआला तालाब

7

. . .और अब न रहा नैनसुख, न बचा मीठिया

8

ओ बाब्बू कीत्तै ब्याह दे, पाऊँगी रामाणी की पाल पै

9

और रोक दिये वर्षाजल के सारे रास्ते

10

जमीन बिक्री से रुपयों में घाटा बना अमीरपुर, पानी में गरीब

11

जिब जमीन की कीमत माँ-बाप तै घणी होगी तो किसे तालाब, किसे कुएँ

12

के डले विकास है, पाणी नहीं तो विकास किसा

13

. . . और टूट गया पानी का गढ़

14

सदानीरा के साथ टूट गया पनघट का जमघट

15

बोहड़ा में थी भीमगौड़ा सी जलधारा, अब पानी का संकट

16

सबमर्सिबल के लिए मना किया तो बुढ़ापे म्ह रोटियां का खलल पड़ ज्यागो

17

किसा बाग्गां आला जुआं, जिब नहर ए पक्की कर दी तै

18

अपने पर रोता दादरी का श्यामसर तालाब

19

खापों के लोकतंत्र में मोल का पानी पीता दुजाना

20

पाणी का के तोड़ा सै,पहल्लां मोटर बंद कर द्यूं, बिजली का बिल घणो आ ज्यागो

21

देवीसर - आस्था को मुँह चिढ़ाता गन्दगी का तालाब

22

लोग बागां की आंख्यां का पाणी भी उतर गया

 

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