नमामि गंगे का गोमुख

Submitted by birendrakrgupta on Mon, 09/01/2014 - 13:04
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 19 जुलाई 2014
‘नमामि गंगा’ राजग सरकार की पहल है, जो हासिल उपलब्धियों के आधार पर होनी चाहिए। इसे तमाम संगठनों से सौहार्द-भाव जताते हुए नए आयाम हासिल करने चाहिए..

यमुना और सतलुज जैसी देश भर में अनेक नदियां हैं, जिनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। उनकी तरफ भी ध्यान दिए जाने की दरकार है। हैदराबाद में मुसी नदी तथा पुणे में मुला-मुठा नदी को ही लें। दोनों नदियां नालों में तब्दील हो चुकी है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्यक्रम के तहत यमुना पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए यमुना एक्शन प्लान पर कार्य शुरू किया गया है। नमामि गंगा के आगे बढ़ने के साथ ही इन सभी पहल और प्रयासों को गति मिलनी चाहिए। वित्त मंत्री ने अपने हालिया बजट भाषण में महत्वाकांक्षी परियोजना ‘नमामि गंगा’ की घोषणा की। इसके लिए 2,037 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। अलबत्ता, इस बारे में अभी कुछ ज्यादा पता नहीं चल पाया है। लेकिन सवाल है कि परियोजना में नया क्या है? इसे लेकर जोर-शोर से जो कुछ बखाना जा रहा है, क्या वह तर्कसंगत है?

राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद पर आसीन होते ही राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में 6 जनवरी, 1985 को गंगा को निर्मल करने संबंधी एक प्रमुख कार्यक्रम की घोषणा की थी। फरवरी, 2009 में तत्कालीन मनमोहन सिंह ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था। साथ ही, अपनी अध्यक्षता में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) के गठन की घोषणा की थी। इसमें उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों के अलावा प्रसिद्ध कार्यकर्ताओं और पेशेवरों को शामिल किया गया। एनजीआरबीए को गंगा बेसिन में स्थित राज्यों में समरूपी प्राधिकरणों का सहयोग मिलता है, जिनके अध्यक्ष संबद्ध राज्यों के मुख्यमंत्री होते है।

एनजीआरबीए को पूर्व के गंगा एक्शन प्लान (गेप), जिस पर कोई 900 करोड़ रुपए व्यय किए जा चुके थे, की खूबियों और खामियों पर खासा विचार करने के उपरांत बनाया गया था। गेप के चलते पानी की गुणवत्ता में गिरावट थमी। सच तो यह है कि कई स्थानों पर इसमें सुधार तक देखा गया। बढ़ती जनसंख्या और अन्य तमाम दबावों के बावजूद यह उपलब्धि हासिल की जा सकी। गेप ने सुनिश्चित किया कि विघटित ऑक्सीजन पर हर सूरत में स्वीकार्य सीमाओं में रहे लेकिन जैव-रासायनिक ऑक्सीजन डिमांड वेल्यू में उतार-चढ़ाव विघटित ऑक्सीजन की तुलना में कहीं ज्यादा थे। इसके अलावा, मलीय कोलिफार्म गणनांक भी ज्यादातर आंकलित सीमा से अधिक थे। खासकर कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी में यह स्थिति देखी गई।

मिशन क्लीन गंगा का क्रियान्वयन


फरवरी, 2009 और मार्च 2014 के बीच एनजीआरबीए ने मिशन क्लीन गंगा क्रियान्वित किया। इसका मुख्य उद्देश्य 2020 तक सुनिश्चित करना था कि नगर निकायों का गैर-उपचारित सीवेज या औद्योगिक अपशिष्ट नदी में नहीं बहाया जाए। इस मिशन के दो लक्ष्य थे-निर्मल धारा और अविरल धारा। दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के लिए एनजीआरबीए ने पांच दूरगामी फैसले किए।

पहला यह कि इसने उत्तर प्रदेश में सीवेज नियंत्रण और उपचार के लिए 2,700 करोड़ रुपए की 81 परियोजनाओं को मंजूरी दी। बिहार के लिए 1,400 करोड़ रुपए, प. बंगाल के लिए 1,200 करोड़ रुपए, उत्तराखंड के लिए 250 करोड़ रुपए तथा झारखंड के लिए 100 करोड़ रुपए की मंजूरी दी गई। यह प्रयास नदी के 3,600 किमी. से ज्यादा लंबे हिस्से के लिए सीवेज नेटवर्क बनाने तथा प्रतिदिन 700 मिलियन लीटर सीवेज उपचार की क्षमता का विकास करने के मद्देनजर किया गया था। वाराणसी के लिए अलग से 500 करोड़ रुपए की परियोजना मंजूर की गई।

दूसरे फैसले के तहत एनजीआरबीए के लिए आईआईटी-कानपुर के मार्गदर्शन में आईआईटी संकाय स्थापित किया गया। इस कंसोर्टियम को समग्र गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान तैयार करना था। साथ ही, इस योजना के प्रावधानों को कानूनी तौर पर कारगर बनाने की जिम्मेदारी भी इसे सौंपी गई।

तीसरा फैसला यह किया गया कि गांगेय डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव माना गया ताकि नदी को पुनः स्वच्छ बनाने का यह प्रतीक बन सके। चौथे फैसले के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पहली बार अनेक प्रदूषणकारी उद्योगों को नोटिस जारी किए। खासकर कन्नौज से वाराणसी तक नदी के 730 किमी. लंबे हिस्से के लिए ये नोटिस जारी किए गए। इस हिस्से को सर्वाधिक प्रदूषित माना जाता था। नोटिस प्रदूषण नियंत्रण मानकों को लागू कराने में सरकार की दृढ़ता को जताने के लिए जारी किए गए।

पांचवां फैसला था भागीरथी के ऊपरी तरफ तीन पनबिजली परियोजनाओं—लोहारिनाग पाला, पाला मनेरी तथा भैरोंघाटी—को पारिस्थितिकीय कारणों से रोक दिया गया। साथ ही, गोमुख से उत्तरकाशी तक के 100 किमी. लंबे हिस्से को नियमित पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर दिया गया।

सर्वाधिक प्रदूषण गैर-उपचारित सीवेज से


गंगा में 70-75 प्रतिशत प्रदूषण नगरीय और शहरी निकायों का गैर-उपचारित सीवेज छोड़े जाने के कारण है। यही कारण रहा कि एनजीआरबीए ने भावी जनसंख्या वृद्धि को ध्यान में रखते हुए सीवेज उपचार संबंधी ढांचागत निर्माणों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। साथ ही, घोषणा की गई कि इन निर्माणों पर होने वाले व्यय का वित्त पोषण केंद्र सरकार करेगी।

लेकिन सीवेज नियंत्रण, अपशिष्ट उपचार संयंत्रों तथा औद्योगिक प्रदूषण के अलावा नदी के जल-ग्रहण क्षेत्र का उपचार, बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण और खेतों से नदी में आ जाने वाले जैविक रूप गैर-घुलनशील कीटनाशकों पर ध्यान देना भी उतनी ही महत्वपूर्ण गतिविधियां हैं। इस लिहाज से जल की समेकित गुणवत्ता निगरानी प्रणाली बेहद मददगार रही। एनजीआरबीए ने नदी के 2,500 किमी. लंबे मुख्य हिस्से पर महत्वपूर्ण स्थानों पर 134 मानवीकृत स्टेशनों के अलावा 113 स्वचालित स्टेशनों के एक नेटवर्क को मंजूरी दी। इससे 20 महत्वपूर्ण मानकों संबंधी आंकड़ों के जरिए जल-गुणवत्ता की वास्तविक स्थिति जानने में मदद मिलती।

नमामि गंगा को नई दिल्ली के निकट समझे जाने वाले संगठनों के साथ व्यापक वैचारिक जुड़ाव दिखाते हुए आगे प्रस्थान करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में दो वर्ष बाद असेंबली के चुनाव होने हैं। इस कारण संभवतः वहां पक्षपाती राजनीति की झलक देखने को मिले। लेकिन वह सर्वाधिक दुखद पहलू होगा। गंगा संबंधी यह पहल अब तक हासिल हो चुकी उपलब्धियों से भी लाभान्वित होनी चाहिए। इसलिए कि इस दिशा में काफी काम पहले ही किया जा चुका है।

जैसा कि आईआईटी संकाय पहले ही 37 रिपोर्ट पेश कर चुका है। इस प्रकार देश को नदी प्रबंधन के लिए बेसिन स्तर पर बहुत कुछ किए जाने संबंधी सुझाव दे चुका है। यह पहले के नगर-आधारित नजरिए में आया नया मोड़ है। मोटे तौर पर 764 प्रदूषणकारी औद्योगिक इकाइयों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से 704 का निरीक्षण किया जा चुका है। उन्हें जरूरी निर्देश दिए गए हैं। इस प्रकार के निर्देश दिए जाने पर हमेशा से ही राजनीतिक विरोध होता आया है।

लेकिन हम गंगा को स्वच्छ करने को लेकर गंभीर हैं तो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत सख्ती से कार्रवाई करनी होगी। इस कानून का सख्ती से पालन कराने के लिए पांच राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सीपीसीबी के साथ मिल कर कार्य करना होगा। उत्तराखंड में तमाम राजनीतिक दलों के कड़े विरोध को अनदेखा करके ही दिसंबर 2012 में गोमुख से उत्तरकाशी तक के हिस्से को पारिस्थितिकीय तौर पर संवेदनशील घोषित किया जा सका था।

यमुना और सतलुज जैसी देश भर में अनेक नदियां हैं, जिनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। उनकी तरफ भी ध्यान दिए जाने की दरकार है। हैदराबाद में मुसी नदी तथा पुणे में मुला-मुठा नदी को ही लें। दोनों नदियां नालों में तब्दील हो चुकी है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्यक्रम के तहत यमुना पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए यमुना एक्शन प्लान पर कार्य शुरू किया गया है। नमामि गंगा के आगे बढ़ने के साथ ही इन सभी पहल और प्रयासों को गति मिलनी चाहिए।

(इंडियन एक्सप्रेस से साभार)

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