कैसे रोकें गांवों से पलायन

Submitted by birendrakrgupta on Wed, 09/03/2014 - 14:14
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Source
कुरुक्षेत्र, फरवरी 2012
हमारे देश की ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत निरंतर घट रहा है जिसके पीछे मुख्य कारण गांवों से शहरों की ओर पलायन है। आज देश को विकसित देशों की श्रेणी में लाने के लिए गांवों में बुनियादी विकास मूल आवश्यकता है। गांवों में शहरों जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। देश में व्याप्त विभिन्न कुरुतियों को समूल नष्ट करना होगा तथा हर जगह शिक्षा की अलख जगानी होगी। शिक्षा के माध्यम से ही ग्रामीण जनता में जनचेतना का उदय होगा तथा वे विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे।जनगणना 2011 के अनुसार हमारे देश की कुल जनसंख्या 121.02 करोड़ आंकलित की गई है जिसमें 68.84 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में निवास करती है और 31.16 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में निवास करती है। स्वतंत्र भारत की प्रथम जनगणना 1951 में ग्रामीण एवं शहरी आबादी का अनुपात 83 प्रतिशत एवं 17 प्रतिशत था। 50 वर्ष बाद 2001 की जनगणना में ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या का प्रतिशत 74 एवं 26 प्रतिशत हो गया। इन आंकड़ों के देखने पर स्पष्ट परिलक्षित होता है कि भारतीय ग्रामीण लोगों का शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ रहा है।

गांवों से शहरों की ओर पलायन का सिलसिला कोई नया मसला नहीं है। गांवों में कृषि भूमि के लगातार कम होते जाने, आबादी बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं के चलते रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीणों को शहरों-कस्बों की ओर मुंह करना पड़ा। गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी पलायन का एक दूसरा बड़ा कारण है। गांवों में रोजगार और शिक्षा के साथ-साथ बिजली, आवास, सड़क, संचार, स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों की तुलना में बेहद कम है। इन बुनियादी कमियों के साथ-साथ गांवों में भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के चलते शोषण और उत्पीड़न से तंग आकर भी बहुत से लोग शहरों का रुख कर लेते हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकार ने इन कारणों और परिस्थितियों को दूर करने की दिशा में प्रयास नहीं किए हैं। इस संदर्भ में जैसा कि महात्मा गांधी के सत्याग्रह के विभिन्न प्रकारों में एक “हिजरत” था। “हिजरत” का अर्थ है अपने स्थायी व परम्परागत निवास स्थान को स्वेच्छा से छोड़कर अन्य किसी इलाके में जाकर बस जाना। ऐसे व्यक्तियों द्वारा हिजरत के मार्ग को अपनाया जाना चाहिए जो अपने मूल निवास स्थान पर आत्मसम्मानपूर्ण ढंग से रहने में असमर्थ हो तथा दुःखी हो, और जो अन्याय के विरोध में न तो सत्याग्रह करने का नैतिक बल रखते हो और न हिंसात्मक विरोध की शक्ति रखते हो।

अतीत में उग्र अत्याचार से पीड़ित इजराइल के निवासियों ने हिजरत का प्रयोग किया था और वे अन्यत्र जाकर बस गये थे। गांधी जी ने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए 1928 में बारदोली के सत्याग्रहियों को, 1935 में केंथा के हरिजनों को तथा 1939 में लम्बड़ी विट्ठलगढ़ एवं जूनागढ़ की जनता को हिजरत के साधन को अपनाने की सलाह दी थी। हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार मुंशी प्रेमचन्द ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास “गोदान” में लगभग 85 वर्ष पूर्व “गांव छोड़कर शहर जाने की समस्या” को उठाया था जिसकी चर्चा आज हम कर रहे हैं।

एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर रहना और अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास करना पलायन कहलाता है। लेकिन यह पलायन की प्रवृत्ति कई रूपों में देखी जा सकती है जैसे एक गांव से दूसरे गांव में, गांव से नगर, नगर से नगर और नगर से गांव। परन्तु भारत में “गांव से शहरों” की ओर पलायन की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा है। एक तरफ जहां शहरी चकाचौंध, भागमभाग की जिन्दगी, उद्योगों, कार्यालयों तथा विभिन्न प्रतिष्ठानों में रोजगार के अवसर परिलक्षित होते हैं। शहरों में अच्छे परिवहन के साधन, शिक्षा केन्द्र, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा अन्य सेवाओं ने भी गांव के युवकों, महिलाओं को आकर्षित किया है। वहीं गांव में पाई जाने वाली रोजगार की अनिश्चितता, प्राकृतिक आपदा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव ने लोगों को पलायन के लिए प्रेरित किया है।

सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा था कि “पंचायत संस्थाएं प्रजातंत्र की नर्सरी हैं। हमारे देश या प्रजातंत्र की विफलता के लिए सर्वप्रथम दोष नेतृत्व को दिया जाता है। पंचायतों में कार्य करते हुए पंचायत प्रतिनिधियों को स्वतः ही उत्तम प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता है जिसका उपयोग वे भविष्य में नेतृत्व के उच्च पदों पर कर सकते हैं।” पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने एक बार कहा था कि “हमारी योजनाओं का केवल 15 प्रतिशत धन ही आम आदमी तक पहुंच पाता है।” देश के किसी गांव में दिल्ली से भेजा गया एक रुपया वहां पहुंचते-पहुंचते 15 पैसा हो जाता है। यह ऐसा क्यों होता है? वह शेष राशि 85 पैसे कहां चले जाते हैं। इसका एक ही जवाब है कि वह राशि भ्रष्टाचार रूपी मशीनरी द्वारा हजम कर ली जाती है।

पंचायतों के अस्तित्व में आ जाने के बाद सरकार के पास ऐसी बड़ी मशीनरी खड़ी हो जाती है जो बिना खर्च के कार्य करने के लिए तत्पर रहती है जिसमें जनता का विश्वास निहित होता है। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा था कि “पंचायत संस्थाएं प्रजातंत्र की नर्सरी हैं। हमारे देश या प्रजातंत्र की विफलता के लिए सर्वप्रथम दोष नेतृत्व को दिया जाता है। पंचायतों में कार्य करते हुए पंचायत प्रतिनिधियों को स्वतः ही उत्तम प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता है जिसका उपयोग वे भविष्य में नेतृत्व के उच्च पदों पर कर सकते हैं।” राजनैतिक नेतृत्व की शुरुआत पंचायत स्तर से होनी चाहिए। सरदार पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरु, सुभाष चन्द्र बोस तथा गोविन्द बल्लभ पंत केन्द्रीय सरकार में आने से पूर्व नगरपालिकाओं के मेजर या अध्यक्ष रह चुके हैं।

ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन रोकने और उन्हें गांव में ही रोजगार मुहैया कराने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार की ओर से विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भारत में ग्रामीण विकास मंत्रालय की प्रथम प्राथमिकता ग्रामीण क्षेत्र का विकास और ग्रामीण भारत से गरीबी और भूखमरी हटाना है। ग्रामीण क्षेत्रों में गांव और शहरी अन्तर कम करने, खाद्य सुरक्षा प्रदान करने और जनता को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सामाजिक और आर्थिक आधार पर लोगों को सुदृढ़ करना जरूरी है। इसलिए सरकार की ओर से एक नई पहल की गई।

गांवों से शहरों की ओर हो रहे पलायन को रोकने के लिए पूर्व में अनेक प्रावधान किए हैं। सरकार की कोशिश है कि गांव के लोगों को गांव में ही रोजगार मिले। उन्हें गांव में ही शहरों जैसी आधारभूत सुविधाएं मिले। 2 फरवरी, 2006 को देश के 200 जिलों में “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना” के लागू होने के बाद पंचायती राज व्यवस्था काफी सुदृढ़ हुई है। सबसे ज्यादा फायदा यह हुआ है कि ग्रामीणों का पलायन रुका है। लोगों को घर बैठे काम मिल रहा है और निर्धारित मजदूरी (119 रुपये वर्तमान में) भी। मजदूरों में इस बात की खुशी है कि उन्हें काम के साथ ही सम्मान भी मिला है। कार्यस्थल पर उनकी आधारभूत जरूरतों का भी ध्यान रखा गया है। उन्हें यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि “अब गांव-शहर एक साथ चलेंगे, देश हमारा आगे बढ़ेगा।”

पूर्व राष्ट्रपति एवं मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कहा करते थे कि “शहरों को गांवों में ले जाकर ही ग्रामीण पलायन पर रोक लगाई जा सकती है।” उनके इस कथन के पीछे यह कटु सत्य छिपा है कि गांवों में शहरों की तुलना में 5 प्रतिशत आधारभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। रोजगार और शिक्षा जैसी आवश्यकताओं की कमी के अलावा गांवों में बिजली, स्वच्छता, आवास, चिकित्सा, सड़क, संचार जैसी अनेक सुविधाएं या तो होती ही नहीं और यदि होती हैं तो बहुत कम। स्कूलों, कॉलेजों तथा प्राथमिक चिकित्सालयों की हालत बहुत खस्ता होती है। गांवों में बिजली पहुंचाने के अनेक प्रयासों के बावजूद नियमित रूप से बिजली उपलब्ध नहीं रहती। इस प्रकार से गांवों से पलायन के कारण और निवारण निम्न बताए गए हैं-

गांवों से पलायन के प्रमुख कारण


परम्परागत जाति व्यवस्था का शिकंजा

परम्परागत जाति व्यवस्था का शिकंजा इतना मजबूत है कि शासन और प्रशासन भी सामूहिक अन्याय का मुकाबला करने वालों के प्रति उदासीन बना रहता है। जैसाकि पिछले दिनों उत्तर भारत के कुछ राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि में खाप पंचायतों के अन्यायपूर्ण क्रूर आदेशों को देखने पर स्पष्ट हो जाता है जिसमें सड़ते और दबते रहने की बजाय लोग गांव से पलायन करना पसंद करते हैं।

शहरों में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना

औद्योगीकरण शहरीकरण की पहली सीढ़ी है। आजादी के बाद भारत ने देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के इरादे से छोटे-बड़े उद्योगों की स्थापना का अभियान चलाया। ये सभी उद्योग शहरों में लगाए गए जिसके कारण ग्रामीण लोगों का रोजगार की तलाश एवं आजीविका के लिए शहरों में पलायन करना आवश्यक हो गया।

नगरीय चकाचौंध

भारत में गांवों से शहर की ओर पलायन की प्रवृत्ति बेहद ज्यादा है। जहां गांव में विद्यमान गरीबी, बेरोजगारी, कम मजदूरी, मौसमी बेरोजगारी, जाति और परम्परा पर आधारित सामाजिक रुढ़ियां, अनुपयोगी होती भूमि, वर्षा का अभाव एवं प्राकृतिक प्रकोप इत्यादि कारणों ने न सिर्फ लोगों को बाहर भेजने की प्रेरणा दी वही शहरों ने अपनी चकाचौंध सुविधाएं, युवाओं के सपने, रोजगार के अवसर, आर्थिक विषमता, निश्चित और अनवरत अवसरों में आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस प्रकार पुरुष और महिलाओं के एक बड़े समूह ने गांव से शहर की ओर पलायन किया है। वर्ष 2001 से 2011 तक की शहरी जनसंख्या में 5.16 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

शिक्षा और साक्षरता का अभाव

शिक्षा और साक्षरता का अभाव पाया जाना ग्रामीण जीवन का एक बहुत बड़ा नकारात्मक पहलू है। गांवों में न तो अच्छे स्कूल ही होते हैं और न ही वहां पर ग्रामीण बच्चों को आगे बढ़ने के अवसर मिल पाते हैं। इस कारण हर ग्रामीण माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए शहरी वातावरण की ओर पलायन करते हैं।

हालांकि सरकारी एवं निजी तौर पर आज ग्रामीण शिक्षा को बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन जब रोजगार प्राप्ति एवं उच्च-स्तरीयता की बात आती है तो ग्रामीण परिवेश के बच्चे शहरी बच्चों की तुलना में पिछड़ जाते हैं। ग्रामीण बच्चे अपने माता-पिता के साथ गांव में रहने के कारण माता-पिता के परम्परागत कार्यों में हाथ बंटाने में लग जाते हैं जिससे उन्हें उच्च शिक्षा के अवसर सुलभ नहीं हो पाते हैं। इस कारण माता-पिता उन्हें शहर में ही दाखिला दिला कर शिक्षा देना चाहते हैं और फिर छात्र शहरी चकाचौंध से प्रभावित होकर शहर में ही रहने के लिए प्रयास करता है जो पलायन का एक प्रमुख कारण है।

रोजगार और मौलिक सुविधाओं का अभाव

गांवों में कृषि भूमि का लगातार कम होते जाना, जनसंख्या बढ़ने, और प्राकृतिक आपदाओं के चलते रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीणों को शहरों-नगरों की तरफ जाना पड़ रहा है। गांवों में मौलिक आवश्कताओं की कमी भी पलायन का एक बड़ा कारण है। गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, आवास, सड़क, परिवहन जैसी अनेक सुविधाएं शहरों की तुलना में बेहद कम हैं। इन बुनियादी कमियों के साथ-साथ गांवों में भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के चलते शोषण और उत्पीड़न से तंग आकार भी बहुत से लोग शहरों का रुख कर लेते है।

गांवों से पलायन रोकने के प्रमुख सुझाव


समानता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना

ग्रामीण पलायन रोकने के लिए सामाजिक समानता एवं न्याय पर आधारित समाज की स्थापना करना अति आवश्यक है। इसलिए सभी विकास योजनाओं में उपेक्षित वर्गों को विशेष रियायत दी जाए। इसके अलावा महिलाओं के लिए स्वयंसहायता समूहों के जरिए विभिन्न व्यवसाय चलाने, स्वरोजगार प्रशिक्षण, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (वृद्धावस्था पेंशन योजना, विधवा पेंशन योजना, छात्रवृत्ति योजना, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना) जैसे अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनसे लाभ उठाकर गरीब तथा उपेक्षित वर्गों के लोग अपना तथा अपने परिवार का उत्थान कर सकते हैं।

इस संदर्भ में मैं एक अपने अनुभव पर आधारित प्रोजेक्ट के माध्यम से गांवों में चुने हुए जन प्रतिनिधियों की व्यवस्था के बारे में जानकारी दे रहा हूं। हमने एक प्रोजेक्ट किया जिसमें ग्रामीण क्षेत्र में चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के बारे में जानकारी जुटानी थी मुख्य रूप से जो ग्रामीण पंच बनाए गए हैं उनकी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक जानकारी प्राप्त करनी थी। जिसमें पंचों ने अपनी व्यथा बड़े गम्भीर ढंग से उजागर की और बताया कि हम पंच तो हैं लेकिन हमें सरकार से मिल रही नई योजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं और न ही कोई प्रशिक्षण की व्यवस्था है।

अधिकतर पंच अशिक्षित व्यक्ति एवं महिलाएं बनाई गई हैं। और लोगों ने हमें कहा कि पंचों के लिए शैक्षिक योग्यता अवश्य निर्धारित की जानी चाहिए तभी ग्रामीण विकास हो सकता है। कुछ लोगों ने यह भी बताया कि हमारे साथ पंचायत में न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं किया जाता है और मात्र जोर-जबर्दस्ती एवं दबाव डालकर प्रस्ताव पर हस्ताक्षर या अगूंठा लगवाया जाता है। अतः यह सामाजिक असमानता एवं अन्याय ही तो है। इस कारण लोग राजनीतिक कार्यों से विमुख होकर अपनी आजीविका में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। अतः इसका उचित समाधान किया जाना चाहिए।

रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना

सर्वप्रथम गांवों में रोजगार के अवसर निरंतरता के साथ उपलब्ध कराए जाए जिससे लोगों को आर्थिक सुरक्षा तो मिलेगी साथ ही वे स्वतः अपनी जीवनशैली में सुधार करेंगे। केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा योजना 2 फरवरी, 2006 को देश के 200 जिलों में शुरू की गई। दूसरे चरण में 130 जिलों में एवं तीसरे चरण में 1 अप्रैल, 2008 को देश के शेष 265 जिलों में मनरेगा कार्यक्रम चलाया गया जिससे ग्रामीणों को रोजगार के अवसर सृजित हुए और गांवों से पलायन भी रुका है।

मौलिक सुविधाएं उपलब्ध करवाना

ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए जिसमें, परिवहन सुविधा, सड़क, चिकित्सालय, शिक्षण संस्थाएं, विद्युत आपूर्ति, पेयजल सुविधा, रोजगार तथा उचित न्याय व्यवस्था आदि शामिल हैं। गांवों की दशा सुधारने के लिए एक अप्रैल, 2010 में लागू हुए शिक्षा का अधिकार कानून से इस समस्या के समाधान की आशा की जा सकती है। इस कानून से गांवों के स्कूलों की स्थिति, अध्यापकों की उपस्थिति और बच्चों के दाखिले में वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है। सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से इस कानून को लागू करके गांवों में शिक्षा का प्रकाश फैलने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, वही असमानता, शोषण, भ्रष्टाचार तथा भेदभाव में कमी होगी जिसके फलस्वरूप ग्रामीण जीवन बेहतर बनेगा। इस अभियान के तहत तीन लाख से अधिक नये स्कूल खोले गए जिसमें आधे से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए हैं।

भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन की स्थापना

लोक कल्याण करने एवं ग्रामीण पलायन रोकने के लिए सरकार द्वारा योजना तो लागू की जाती है लेकिन ये योजनाएं भ्रष्ट व्यक्तियों द्वारा हथिया ली जाती हैं जिससे उसका पूरा लाभ जनता को नहीं मिल पाता है। ग्रामीण पंचायती राज क्षेत्र में इन योजनाओं की निगरानी के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए जैसा कि भीलवाड़ा (राजस्थान) में सर्वप्रथम “सामाजिक अंकेक्षण” की शुरुआत की गई। इससे ग्रामीणों में विश्वास जगा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत कृषि के स्थान पर पूंजी आधारित व अधिक आय प्रदान करने वाली खेती को प्रोत्साहन दिया जाए जिससे किसानों के साथ-साथ सीमांत किसानों और मजदूरों को भी ज्यादा से ज्यादा लाभ हो सके। सिंचाई सुविधा, जल प्रबन्ध इत्यादि के माध्यम से कृषि भूमि क्षेत्र का विस्तार किया जाए जिससे न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी साथ ही आय में भी वृद्धि होगी और किसानों में आत्मविश्वास व स्वाभिमान जागृत होगा जिससे ग्रामीण पलायन रुकेगा।

मजदूरों तथा अन्य बेरोजगार युवकों के लिए स्वरोजगार हेतु वित्तीय सहायता एवं प्रशिक्षण की सुविधा तथा प्रशिक्षण केन्द्र गांवों में खोले जाएं। रोजगार के वैकल्पिक साधन यथा बुनाई, हथकरघा, कुटीर उद्योग, साथ ही खाद्य प्रसंस्करण केन्द्र की स्थापना की जाए।स्वयंसहायता समूह, सामूहिक रोजगार प्रशिक्षण, मजदूरों को शीघ्र मजदूरी तथा उनके बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अन्य मनोरंजन की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

सभी राज्यों में मुख्यत:ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुसंगठित एवं पारदर्शी बनाया जाए जिससे लोगों को उचित दामों से खाद्य सुरक्षा व अनाज उपलब्ध हो सके और ग्रामीण पलायन रोका जा सके।

निष्कर्ष


आजादी के बाद पंचायती राज व्यवस्था में सामुदायिक विकास तथा योजनाबद्ध विकास की अन्य अनेक योजनाओं के माध्यम से गांवों की हालत बेहतर बनाने और गांव वालों के लिए रोजगार के अवसर जुटाने पर ध्यान केन्द्रित किया जाता रहा है। 73वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायती राज संस्थाओं को अधिक मजबूत तथा अधिकार-सम्पन्न बनाया गया और ग्रामीण विकास में पंचायतों की भूमिका काफी बढ़ गई है। पंचायतों में महिलाओं व उपेक्षित वर्गों के लिए आरक्षण से गांवों के विकास की प्रक्रिया में सभी वर्गों की हिस्सेदारी होने लगी है। इस प्रकार से गांवों में शहरों जैसी बुनियादी जरूरतें उपलब्ध करवाकर पलायन की प्रवृत्ति को सुलभ साधनों से रोका जा सकता है।

(लेखक मोहन लाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर के राजनीति विज्ञान विभाग में शोधार्थी एवं अतिथि व्याख्याता हैं।)