अनाज का एक-एक दाना महत्वपूर्ण

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 09/04/2014 - 15:34
Source
कुरुक्षेत्र, मार्च 2012
अनाज का एक-एक दाना महत्वपूर्ण है। खाद्य सुरक्षा के लिए हर दाने की महत्ता समझने की जरूरत है। अनाज का एक दाना किस तरह से किसानों को समृद्ध कर रहा है और देश में खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो रही है, इसके साक्षात प्रमाण हैं उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के टड़िया गांव निवासी प्रकाश सिंह रघुवंशी। श्री रघुवंशी एक ऐसे किसान हैं जो खुद के साथ ही अन्य गरीब किसानों की दशा सुधारने की दिशा में भी अग्रसर हैं। उन्होंने तमाम ऐसे बीजों की प्रजाति विकसित की हैं जो किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा दे रही हैं। उन्नत किस्म के बीजों को विकसित करने के लिए प्रकाश सिंह को दो बार राष्ट्रीय इनोवेशन अवार्ड भी दिया जा चुका है। इस कार्य के लिए राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील एवं पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी उन्हें सम्मानित किया है। तो आइए जानते हैं कि प्रकाश सिंह रघुवंशी ने यह सफरनामा कैसे तय किया।खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर इन दिनों सबसे ज्यादा उत्पादन पर ध्यान देने की जरूरत है। जब तक उत्पादन अधिक नहीं होगा, तब तक खाद्य संकट बना रहेगा। इसी धारणा को ध्यान में रखकर प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रधुवंशी किसानों को बेहतर बीज मुहैया कराने के अभियान में लगे हैं। उन्होंने अब तक सौ से अधिक प्रजातियां विकसित की हैं और इसके लिए राष्ट्रपति द्वारा दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल कर चुके हैं। रघुवंशी महात्मा गांधी से प्रभावित हैं। वह कृषि की अंतर्राष्ट्रीय एसोसिएशन स्लोफूड के स्थाई सदस्य हैं।

रधुवंशी का सूत्र है- अपनी खेती, अपनी खाद, अपना बीज और अपना स्वाद। इस सिद्धांत के जरिए ही वह अब तक गेहूं की करीब सौ प्रजाति, धान की 25 प्रजाति एवं अरहर, सरसों, सब्जियों की विभिन्न प्रजातियां विकसित कर चुके हैं। कृषि विश्वविद्यालयों की ओर से प्रमाणिकता मिलने के बाद वह बीज के छोटे-छोटे पैकेट किसानों तक पहुंचाते हैं ताकि नई प्रजाति का बीज प्राप्त करने के लिए किसानों को पैसे की परेशानी न झेलनी पड़े। वह बीज भी मुफ्त भेजते हैं और कूरियर का खर्चा भी खुद उठाते हैं। किसान जब बीज का छोटा-सा पैकेट प्राप्त करता है तो उससे अगले साल कम से कम इतना बीज तो तैयार कर ही लेता है कि वह अपने खेत में बुवाई कर सके। इस तरह प्रकाश सिंह की ओर से तैयार किए गए बीज उत्तर प्रदेश ही नहीं, उत्तराखंड, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल के करीब 20 लाख से अधिक किसानों तक पहुंच चुके हैं।

साक्षात्कार


प्रश्न- प्रकाशजी, अक्सर कहा जाता है कि खेती से किसान दूर हो रहे हैं। इसके बाद भी आप खेती के प्रति लोगों को आकर्षित करने में जुटे हैं। आपने खेती की शुरुआत कैसे की?

उत्तर- भारतीय मिट्टी में अपार शक्ति है। इसे पहचानने की जरूरत है। खेती कभी भी घाटे का सौदा नहीं रही। बस, इसे तरीके से करने की जरूरत है। कई बार हम खाद, बीज आदि में भी धोखा खा जाते हैं और खेती घाटे का सौदा हो जाती है। इसलिए मेरा सूत्र है- अपनी खेती, अपनी खाद, अपना बीज, अपना स्वाद। इस सूत्र के जरिए ही मैंने खेती की और परिवार में आज किसी चीज की कमी नहीं है। मेरा पूरा परिवार खेती से जुड़ा रहा है। पिताजी अध्यापक थे, लेकिन खेती में भी जुटे रहते थे। हम लोग लघु किसान हैं। बचपन से ही मुझे खेती के प्रति ललक थी। पिताजी के साथ खेती में काम बंटाता और फिर खेती में पूरी तरह जुट गया। परिवार की आर्थिक समस्या और गिरते उत्पादन ने सोचने के लिए विवश किया। हमने बीज बैंक बनाया। अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों को एकत्र कर उन पर प्रयोग किया। यह प्रयोग सफल रहा। एक के बाद एक प्रजातियां विकसित हुईं। गेहूं, सरसों, अरहर, धान की विभिन्न प्रजातियों से भरपूर उत्पादन मिलने लगा। आज पूरा देश हमसे बीज मांगता है। किसान विभिन्न कंपनियों के बीज के बजाय मेरे बीज पर भरोसा करते हैं और कम लागत में अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।

प्रश्न- आपके परिवार में कौन-कौन लोग हैं और खेती से जीविका कैसे चला रहे हैं?

उत्तर- मेरे परिवार का हर सदस्य पूरी तरह से मेरा सहयोग करता है। खेती के जरिए ही मैं अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला रहा हूं। यहां तक कि मेरी एक बेटी भी बीजों की प्रजाति विकसित करने में मेरा पूरी तरह से सहयोग कर रही है। उसने अपने स्तर पर कई प्रजातियां भी विकसित की हैं, जो किसानों के लिए काफी लाभकारी साबित हुई हैं। मुझे भरोसा है कि वह खेती के क्षेत्र में खूब नाम कमाएगी। मेरे बच्चे खुद तो खेती करते ही हैं साथ ही पड़ोसियों को भी खेती के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रश्न- आप एक साधारण किसान से बीजों की प्रजाति विकसित करने वाले किसान कैसे बन गए? बीजों को तैयार करते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?

उत्तर- खेती के दौरान कई बार मुझे आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ा। इस दौरान मैंने महसूस किया कि बीज तो किसान ही तैयार करते हैं, लेकिन विभिन्न कंपनियों की ओर से किसान के बीज को खरीद कर उसे महंगे दामों पर बेचा जाता है। इस तरह बीज के नाम पर किसानों का आर्थिक शोषण भी होता है। कंपनियां विभिन्न बीजों के दो सौ रुपये प्रति किलो तक वसूलती हैं और किसान अधिक मुनाफे की कामना के लिए बीज खरीदता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वह ठगा गया। मेरे साथ भी ऐसी घटनाएं हुई। इसलिए मैंने प्रयोग शुरू किया। एक के बाद एक प्रजाति तैयार कीं, जिसे कृषि वैज्ञानिकों ने भी प्रमाणित किया। मैं इस बात का ध्यान रखता हूं कि जो प्रजाति विकसित हो, उसे बीज के रूप में कम से कम प्रयोग करना पड़े। इससे कई फायदे होंगे। उदाहरण के तौर पर देखें तो जो किसान खेत में 10 किलो बीज डालता था, उसे दो किलो डालना पड़े। इसके साथ ही कम क्षेत्रफल में अधिक उत्पादन मिले। इस तरह बीज के रूप में अनाज का कम प्रयोग होगा तो दूसरी तरफ कम क्षेत्रफल में अधिक उत्पादन होगा। इससे सबसे ज्यादा फायदा लघु एवं सीमांत किसानों को मिलेगा।

प्रश्न- खाद्यान्न संकट को लेकर भारत ही नहीं पूरे विश्व में बहस छिड़ी हुई है। भारतीय किसान खाद्यान्न संकट दूर करने में किस तरह से अपनी भूमिका निभा सकते हैं?

उत्तर- खाद्यान्न संकट से उबरने में किसान अपनी विशेष भूमिका निभा सकते हैं। खेतों से अधिक से अधिक अनाज खलिहान तक पहुंचाना होगा। खड़ी फसल से लेकर अनाज के घर में पहुंचने तक उपज का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। इसे भी बचाने की जरूरत है। कई बार खेत में फसल पककर तैयार रहती है और किसान उसकी कटाई नहीं करवा पाता। इससे काफी दाने गिरकर नष्ट हो जाते हैं। मड़ाई के दौरान भी काफी अनाज बर्बाद होता है। इस बर्बादी को रोकने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

प्रश्न- तकनीकी रूप से बीजों की विभिन्न प्रजातियां विकसित करने में किन लोगों ने आपका सहयोग किया। आपने अपने ज्ञान को कैसे विकसित किया?

उत्तर- मैं अक्सर किसानों के लिए आयोजित होने वाली कार्यशालाओं में भाग लेता रहा। कृषि मेला और कृषि विभाग के अफसरों से संपर्क करके खेती के नए-नए तरीके भी सीखता रहा। कृषि वैज्ञानिकों से मिलता और उनसे बातचीत करके अपनी समस्या का समाधान करता। इस दौरान बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर महातिम सिंह से मुलाकात हुई। उन्हें बीज विकसित करने के लिए प्रेरित किया। यहीं से बीजों की प्रजाति विकसित करने का सफर शुरू हुआ, जो आज भी आगे बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न- आपने कौन-कौन सी प्रजातियां विकसित की हैं और उनकी खूबियां क्या हैं?

उत्तर- गेहूं की प्रजातियां तो कई हैं, लेकिन प्रमुख प्रजातियों में कुदरत नौ की खूबी है कि इसका पौधा 85 से 90 सेंटीमीटर लंबा होता है और उत्पादन 20 से 25 कुंतल प्रति एकड़, कुदरत पांच के पौधे की लंबाई 95 से सौ सेंटीमीटर और उत्पादन 15 से 20 कुंतल और कुदरत 17 के पौधे की लंबाई 90 से 95 सेंटीमीटर व औसत उत्पादन 22 से 25 कुतंल प्रति एकड़ है। चूंकि गेहूं के पौधे से भूसा तैयार किया जाता है जो पशुओं के लिए चारे के काम में आता है। इसलिए गेहूं के पौधे की लंबाई काफी मायने रखती है। इसी तरह धान की प्रमुख प्रजातियों में कुदरत एक का उत्पादन 25 से 30 कुंतल प्रति एकड़ है और यह 130 से 135 दिन लेता है। कुदरत दो का उत्पादन 20 से 22 कुंतल व समय 115 से 120 दिन और लाल बसंती का उत्पादन 15 से 17 कुंतल प्रति एकड़ व समय 97 से सौ दिन का है। इसी तरह अरहर की प्रमुख प्रजातियों में कुदरत तीन, चमत्कार और कृष्णा हैं। इसमें कुदरत तीन का उत्पादन 12 से 15 कुंतल प्रति एकड़, चमत्कार का उत्पादन 10 से 12 एवं कृष्णा का 10 से 13 कुंतल प्रति एकड़ है। इसी तरह सरसों की प्रमुख प्रजातियों में कुदरत वंदना, कुदरत गीता, कुदरत सोनी हैं। इनका औसत उत्पादन करीब 1430 किलो प्रति हेक्टेयर है। सरसों की प्रजातियों का एनआरसीआरएम, भरतपुर की ओर से मूल्यांकन भी किया गया था।

प्रश्न- आप के द्वारा विकसित किए गए बीजों की प्रजातियों की प्रमाणिकता क्या है?

उत्तर- जहां तक बात प्रमाणिकता की है तो यह सच है कि मैं कोई कृषि वैज्ञानिक नहीं हूं, लेकिन परंपरागत तरीके से वर्षों पहले बीज विकसित करने की जो तकनीक थी, उसे मैं अपनाता हूं। इतना ही नहीं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के साथ ही चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने मेरे बीजों को जांचा। यहां के कृषि वैज्ञानिक काफी प्रभावित हुए।

प्रश्न- फिर आपके द्वारा विकसित की गई प्रजातियों को पहचान कैसे मिली?

उत्तर- कई प्रजातियों के विकास के बाद मैं नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के संपर्क में आया। यहां से मुझे काफी सहयोग मिला। खेती के लिए माइक्रो वेंचर इनोवेशन फंड (एमवीआईएफ) से करीब 1.90 लाख का ऋण मिला और विभिन्न स्थानों के लोगों से बातचीत कर विकसित प्रजाति के बारे में बताने का मौका भी मिला। धीरे-धीरे प्रचार हुआ तो बनारस घुमने आने वाले कई विदेशियों ने भी संपर्क किया और यहां आकर खेती करने के तरीके और बीज तैयार करने के तरीके के बारे में जानकारी ली। हमने कोई भी किसान मेला छोड़ा नहीं है। जहां भी किसान मेला लगता है, पहुंच जाता हूं। वहां से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। साथ ही अपनी प्रजाति को किसानों तक पहुंचाने का मौका भी मिलता है। किसान मेले में विभिन्न प्रदेशों से लोग आते हैं। ऐसे में आपसी संवाद से यह जानकारी भी मिलती है कि कहां के किसान कौन-सी खेती कर रहे हैं।

प्रश्न- एक किसान के तौर पर बीज का चयन करते समय किसान को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। आपके द्वारा तैयार की गई प्रजातियों की खासियत क्या है?

उत्तर- हर किसान को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो बीज वह खरीद रहा है, उसकी गुणवत्ता क्या है? वह उत्पादन कितना देगा और उत्पादित अनाज की गुणवत्ता कैसी होगी? खेत में बोया जाने वाला बीज कितने दिन में उत्पादन देगा क्योंकि देश में ज्यादातर लघु एवं सीमांत किसान हैं। लधु एवं सीमांत किसान को कम समय में अधिक उत्पादन लेना पड़ता है। साथ ही उसकी कोशिश होती है कि उसका खेत भी कम से कम लगे। क्योंकि वह दो से चार एकड़ जमीन में अपनी जीविका के लिए सब्जी भी बोना चाहता है और गेहूं भी। इसके साथ ही उसे इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि जीविकोपार्जन के लिए आर्थिक खेती भी करनी है। यानी उसे घर में खाने के लिए सभी खाद्यान्न की भी जरूरत है और अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसा कमाने की भी। जहां तक मेरी प्रजाति का सवाल है तो मैंने गेहूं की कुदरत एक, दो, तीन और धान की लाल बसंती को विकसित किया। कुदरत का उत्पादन प्रति एकड़ करीब 25 से 30 कुंतल है। इनमें विटामिन, कार्बोहाइड्रेट भरपूर मात्रा में हैं। सरसों की प्रजाति में कुदरत-गीता, वंदना और सूर्यमुखी प्रमुख हैं। इसी तरह अरहर में कुदरत तीन, चमत्कार और कृष्णा प्रजाति सबसे बेहतर रही हैं।

प्रश्न- इन दिनों क्या कर रहे हैं?

उत्तर- इस साल गेहूं की दो नई प्रजातियां विकसित की हैं, जो 60 दिन में उपज देंगी। इस प्रजाति को व्यापक तौर पर किसानों के बीच पहुंचाने की कोशिश है। जांच-पड़ताल के लिए कृषि विश्वविद्यालयों को भी भेजा हैं। कृषि वैज्ञानिकों की ओर से मुहर लगने के बाद इसका विस्तार करने की इच्छा है। उम्मीद है कि यह किसानों के बीच सबसे ज्यादा प्रचलित होगी। इसके अलावा मैं इन दिनों आसपास के गांवों के बुजुर्गों से मिलकर खेती के उनके अनुभवों को इकट्ठा कर रहा हूं। चूंकि खेती में तमाम ऐसी प्राचीन पद्धतियां थी, जो किसानों के लिए काफी कारगर थी। समय के बदलाव की वजह से नई पीढ़ी ने उन पद्धतियों को भुला दिया। इस वजह से वे विलुप्त हो गई हैं। मेरी कोशिश है कि पुरानी पद्धतियों को फिर से जिंदा किया जाए। विज्ञान भी यह कहता है कि जो चीजें अच्छी हों, उसे ग्रहण करना चाहिए। मैं बुजुर्ग किसानों के अनुभवों और उनकी कला को फिर से संजोने की कोशिश में लगा हूं। उम्मीद है कि यह कोशिश पूरे देश के किसानों के लिए कारगर साबित होगी।

प्रश्न- आज बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। पढ़ाई-लिखाई के बाद नौजवान खेती नहीं करना चाहता। वह नौकरी ढूंढता है और नौकरी न मिलने पर निराश हो जाता है। ऐसे नौजवानों के लिए क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर- जीवन में कुछ करना है तो मन मार कर मत बैठों आगे बढ़ना है तो हिम्मत हार कर मत बैठों। हर नौजवान को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके द्वारा ली गई शिक्षा सिर्फ नौकरी के लिए नहीं है। शिक्षा से व्यक्तित्व निर्माण होता है। जिन लोगों का व्यक्तित्व निर्माण हो जाएगा, वे कभी भी खाली नहीं बैठेंगे और निराश नहीं होंगे। जिन नौजवानों के पास खेती है, वे खेती में जुटें। खेती को अपने ज्ञान के जरिए फायदे का धंधा बनाए और घाटे को लेकर कायम मिथक को खत्म करें। खेती के साथ ही उसके पूरक तमाम कारोबार हैं, उसमें जुटें। जिनके पास खेती नहीं हैं, वे अपनी जीविका चलाने के लिए स्वरोजगार का रास्ता अपनाएं। सिर्फ सरकार के भरोसे बैठकर अपना समय नष्ट न करें क्योंकि सरकारी नौकरियां सीमित हैं। बेरोजगारी कम करने के लिए स्वरोजगार का रास्ता अपनाना होगा।

प्रश्न- आपका सपना क्या है? आप किसानों के लिए क्या चाहते हैं?

उत्तर- मेरा सपना है कि भारत का हर किसान खुशहाल हों, भारत के हर किसान के खेत में कुदरत प्रजाति के बीज पहुंच जाएं। खेती के लिए पैसे की कमी आड़े न आए। किसानों को इतनी खुशहाली मिले कि आत्महत्या की खबरें आनी बंद हो जाएं। मैं व्यक्तिगत रूप से अपना बीज और अपनी खाद की बात करता हूं, लेकिन तमाम किसान अभी भी अपने स्तर पर इसका इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे किसानों के लिए सरकार को पहले से कहीं अधिक सक्रियता दिखानी होगी। किसानों की विभिन्न समस्याओं का समाधान करना होगा। उन्हें बिजली, पानी, खाद के साथ ही बीज की मुकम्मल व्यवस्था करनी होगी। एक ऐसा दिन आए, जब भारत में कोई भी बच्चा कुपोषित न रहे और किसी की भी भूख से मौत न होने पाए। मैं एक ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित करना चाहता हूं, जिसमें खेती के प्रति रुचि रखने वाले छात्रों को पूर्ण रूप से ज्ञान दिया जा सके। मेरे पास खेती के ऐसे अनुभव हैं, जो किताबों में नहीं हैं। इसलिए मैं अपने इस ज्ञान को विद्यार्थियों में बांटना चाहता हूं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
ई-मेलः chandrabhan0502@gmail.com

Disqus Comment