गंगा : आस्था और तिजारत के बीच

Submitted by HindiWater on Tue, 09/09/2014 - 16:35
Source
कल्पतरु एक्सप्रेस, जुलाई 2014
हवा, पानी, रोशनी, वर्षा इनका कोई जाति धर्म नहीं होता। कुदरत की ये नियामतें संपूर्ण जीव-जगत का आदार हैं, पर इस सियासत और तिजारत की भाषा का क्या करें जो अपने राजनीतिक मुनाफे के लिए भेद करने में किसी तरह का संकोच नहीं करती। कांग्रेस नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने मोदी सरकार के गंगा शुद्धिकरण से जुड़े प्रयासों पर संप्रदाय विशेष अभियान बनाए जाने की कोशिश पर सवाल खड़ा किया है वहीं ‘नमामि गंगे’ योजना के तहत गंगा में जलमार्ग के व्यापारिक उपयोग पर संत समाज ने नाराजगी व्यक्त की है। गंगा मुक्ति से जुड़े कुछ इन्हीं सवाल की पड़ताल करती सामयिकी।

.महानदी गंगा वैसे तो युगों-युगों से चर्चा में रही है लेकिन इधर नए तरीके से चर्चा में आ जाने की खास वजह है उसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंख का तारा बन जाना। जब प्रधानमंत्री की आंख का तारा बन गई है तो समूची भारतीय जनता पार्टी के अंग-अंग का तारा बनने में कितने देर लगती? कांग्रेस भला इस सब को कैसे हजम करे?

राजीव गांधी के सपना देखने बावजूद गंगा सुधर नहीं पाई और उनका अरबों-खरबों रुपये का ‘गंगा एक्शन प्लान’ सिर्फ सरकारी नौकरशाही को ही तरह पाया, तो इसमें राजीव गांधी या राहुल बाबा क्या करें? भाजपाई कहते फिर रहे हैं कि कांग्रेस ने कुछ नहीं किया। अब ऐसे में फौरन चिंता हुई और तत्काल प्रतिक्रिया आ गई कि गंगा का शुद्धिकरण हिंदूवाद के एंगल से न करें! बड़ी समस्या आन खड़ी है कि गंगा किसकी? मेरी या तेरी? पंडित जी की या शेख साहब की? अगड़े की या पिछड़े की? जुलाहे की या मोची की? दलित की या अति महादलित की? समाजवादी या पूंजीवादी? सांप्रदायिक या धर्मनिरपेक्ष? मेरा खयाल है इससे या उससे पूछने की बजाय यह सवाल सीधे गंगा से ही पूछा जाना चाहिए।

भारत की कुल आबादी के 40 प्रतिशत भाग की जीवन संगनी, 11 राज्यों और 2 देशों में पसरी, 2510 किमी. लम्बी गंगा सहस्त्राब्दी से भारतीय संस्कृति पर अपनी अमिट छाप छोड़ती रही है। ऋग्वेद में तो सिंधु और सरस्वती की महिमा का बखान है लेकिन शेष तीनों वेदों से लेकर प्राचीन वैदिक सभ्यता से जुड़े सभी प्रमुख ग्रंथों में आस्था, प्रकृति और विज्ञान के दृष्टिकोण से गंगा के महत्व पर विषद चर्चा मिलती है। प्राचीन और मध्यकालीन भारत के तीन साम्राज्य (मौर्य, मगध और मुगल) और नगर (पाटलिपुत्र, कन्नौज, कड़ा, काशी, प्रयाग, कम्पिल्य, मुर्शिदाबाद, बहरामपुर, कोलकाता आदि) इसी गंगा के मुहानों पर पुष्प-पल्लवित हुए हैं।

कभी दुनिया भर के देशों में अपने पानी की आन रखने वाली गंगा आज विश्व की पांचवे नंबर की ऐसी सर्वाधिक गंदी नदी बन चुकी है जिसका जल पीने, नहाने, धोने और कृषि आदि कार्यों के लिए जहर बन चुका है और प्रतिबंधित है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इक्कीसवीं सदी की गंगा ‘लाइफलाइन’ से ‘डेथलाइन’ में तब्दील हो चुकी है। अब सवाल यह है कि इस मृत्यु रेखा पर जो चलेगा वही मरेगा। चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। दूसरी तरफ गौर करें तो इसे विषभान बनाने में सबसे ज्यादा योगदान हिंदुओं का ही है। मुसलमान, क्रिश्चियन, सिख, पारसी और दूसरों का कम क्योंकि वे देश की जनसंख्या का अल्पमत हैं।

गंगा का सीना चीरकर देखें तो साफ दिखेगा कि इसकी हत्या के दो कारण हैं- पहला बाहरी और दूसरा भीतरी। यहां तक बाहरी कारणों का सवाल है, अनट्रीटेड पानी, केमिकल उद्योगों का कचरा, खेती में प्रयोग होने वाले उर्वरक, कीटनाशक और दूसरे रसायनों का इसमें बहाव इसके पानी को नष्ट करने वाले प्रमुख तत्व हैं। बड़े-बड़े बांधों से समूचे देश को पाट दिया गया है। पर्यावरण की दृष्टि से यो तो यह बांध समाज के लिए भयावह थे ही, इन्होंने जीवंत नदियों को भी चूस डाला। गंगा के ऊपर बने बांधों ने इसकी निर्बाध जल धारा को पूरी तरह रोक दिया।

1986 में राजीव गांधी ने गंगा शुद्धिकरण का शंखनाद किया। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ठीक दो साल पहले जिस प्रचंड वोट प्रवाह में बहकर राजीव गांधी सत्ता के शिखर तक पहुंचे थे वह एक उन्मादी हिन्दू प्रवाह था। लगातार चार साल की पंजाब अशांति, स्वर्णमंदिर पर भारतीय फौज का ‘आक्रमण’, तदोपरांत श्रीमती गांधी की नृशंस हत्या और उस हत्या का मीडिया से सम्मोहक प्रचार, नतीजे के तौर पर पूरे उत्तर भारत में सिख विरोधी कत्लेआम ने समूचे देश को हिन्दू बनाम गैर हिन्दू संप्रदायों में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं, प्रचंड बहुमत से जीतने के बाद भी राजीव और उनकी कांग्रेस की रथ का हिन्दू प्रवाह थमा नहीं। बाद के सालों में बाबरी मस्जिद का ताला खुलना, शाहबानो प्रकरण पर संविधान संशोधन, असम चुनाव में कांग्रेस का खांटी सांप्रदायिक पैंतरा-आजादी के आंदोलन के वक्त से चली आ रही कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि को तार-तार करके ‘पापी वोट के लिए कुछ भी करेगा’ पार्टी में तब्दील कर दिया। भारतीय समाज और आधुनिक राजनीति में यह एक ऐसा काला अध्याय था जिसने बुनावट के मुल धागों को ही पूरी तरह उलझाकर रख दिया। गंगा के प्रदूषण के खिलाफ उठी देशव्यापी लहर, वैज्ञानिकों की चिंताओं के लगातार ऊंचे होते जाते पहाड़ और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के समांतर एक हिन्दू प्रधानमंत्री ने ‘पवित्र मां’ के बचाव के लिए ‘गंगा एक्शन प्लान’ का एलान कर डाला। पूर्णतः येाजना विहीन, अवैज्ञानिक आधार वाली इस हवा हवाई योजना को आगे चलकर ध्वस्त होना था और आखिरकार वह धराशायी हो गई। गंगा एक्शन प्लान से राजनेताओं, नौकरशाहों और ठेकेदारों की पौ बारह हुई परंतु इससे न तो गंगा का भला हुआ और न देश और समाज का कुछ फायदा।

गंगा का सीना चीरकर देखें तो साफ दिखेगा कि इसकी हत्या के दो कारण हैं- पहला बाहरी और दूसरा भीतरी। यहां तक बाहरी कारणों का सवाल है, अनट्रीटेड पानी, केमिकल उद्योगों का कचरा, खेती में प्रयोग होने वाले उर्वरक, कीटनाशक और दूसरे रसायनों का इसमें बहाव इसके पानी को नष्ट करने वाले प्रमुख तत्व हैं। बड़े-बड़े बांधों से समूचे देश को पाट दिया गया है। पर्यावरण की दृष्टि से यो तो यह बांध समाज के लिए भयावह थे ही, इन्होंने जीवंत नदियों को भी चूस डाला। गंगा के ऊपर बने बांधों ने इसकी निर्बाध जल धारा को पूरी तरह रोक दिया। बनारस की लोकसभा सीट बरकरार रखने के नरेन्द्र मोदी के फैसले से देश के लोगों को उम्मीद हुई कि वह अब गंगा शुद्धिकरण अभियान के लिए नई, तार्किक और वैज्ञानिक नीति के आधार वाली कोई योजना लेकर आएंगे, लेकिन सरकार गठन के सवा महीने बीत जाने के बाद उनकी गंगा मंत्री साध्वी उमा भारती के वक्तव्य उनके फैसले, उनके मंत्रालय के इर्द-गिर्द जमा साधु-संतों और पंडा-पंडियों का शिव से माता गंगा की मुक्ति का कोरस गान, और दूसरी तरफ गंगा अभियान पर पहले बेतुके बजट आवंटन से लोग खासा निराश हुए। बीएचयू और आईआईटी सहित देश भर के वैज्ञानिक आज चिल्ला रहे हैं कि सूखी नदी पर गडकरी जी का जल परिवहन का हास्यास्पद प्लान गंगा के प्रदूषण की मात्रा को और भी गहरा करेगा।

गंगा बचाने के लिए पूर्व में भी अनेक साधुओं ने अपना सर्वस्व होम किया है। स्वामी निगमानंद सरस्वती जैसे महात्मा तो इसके बचाव के लिए अपने आमरण अनशन के दौरान ‘शहीद’ हो गए लेकिन सरकार के कान पर जूं भी नहीं रेंगी। स्वामी शिवानंद, समर्थ योगी अरविन्द और जीडी अग्रवाल जैसे मनीषियों ने भी इसके लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। अलबत्ता सियासत के गेरुए चोगों में लिपटे साधुओं ने असके लिए न पहले कोई कुर्बानी दी और न अब भविष्य में देते दिख रहे हैं। उनके लिए गंगा सिर्फ वोट राजनीति का एक वैसा ही ताना है जैसा बाना अब तक कांग्रेस के सफेदपोश साधुओं के लिए था। अब यह साफ-साफ दिखने लगा है कि नरेन्द्र मोदी की भविष्य की योजना क्या रंग लाएगी। यूं तो हर देश के लिए हर नदी बेहद महत्त्वपूर्ण और जीवनदायिनी होती है, लेकिन भारत के लिए गंगा सिर्फ नदी भर नहीं है।

यद्यपि इसका पानी दुनिया की नदियों की तुलना में ज्यादा जीवंत और युगों-युगों तक दूषित न होने वाला है साथ ही इसमें कृषि और दूसरे उत्पादन की विराट क्षमता है। लेकिन मात्र नदी से बहुत आगे बढ़कर यह देश के लिए ताजमहल और दूसरे स्मारकों से भी कहीं ज्यादा बड़ी और महान सांस्कृतिक विरासत है। यह एक ऐसी विरासत है जिसने प्राचीन भारत के कई काल मध्यकालीन और आधुनिक युग के अनेक दिवसों का निर्माण किया है। इसका महत्त्व किसी धर्म या संप्रदाय विशेष तक कैसे सीमित रह सकता है। यह न सिर्फ समूचे देश की संपदा है बल्कि सारी दुनिया में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली महानदी है। इसे बचाना है, इसे बचाने के लिए सिर्फ फाख्ता उड़ाने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।

(लेखक वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी हैं।)

जिनके लिए व्यापार है गंगा


डॉ. श्रीगोपालनारसन

लोकसभा चुनाव के समय वाराणसी के मतदाताओं को लुभाने के लिए जिस नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि उन्हें मां गंगा ने बुलाया है, उन्हीं नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही अपनी सरकार के पहले बजट में गंगा पर जलमार्ग बनाकर मां गंगा से व्यापार करने की घोषणा कर दी है। जिसे लेकर उस संत समाज में भी मोदी सरकार के प्रति गहरा आक्रोश व्याप्त है जिसने नरेन्द्र मोदी की सरकार बनाने के लिए अपना खुला समर्थन दिया था। अब वही संत मोदी सरकार के इस फैसले से नाराज हो गए हैं। जिन्हें मनाना और गंगा को व्यापार के चलते पवित्र रख पाना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। मोदी सरकार ने गंगा के लिए हालांकि 2037 करोड़ रुपये की ‘नमामि गंगे’ योजना शुरू करने की घोषणा की है जिसमें नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही गंगा का कायाकल्प करने का दावा किया गया है। हालांकि गंगा के कायाकल्प पहल सरकार ने पहली बार नहीं की है बल्कि इससे पूर्व मनमोहन सिंह सरकार ने भी गंगा की बदहाली सुधारने के लिए करोड़ों रुपये की गंगा बेसिन योजना चलाई थी, परंतु गंगा का कायाकल्प तब भी नहीं हो सका था।

गंगा को मारने की तैयारीमोदी सरकार ने पिछले दिनों गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ‘गंगा मंथन’ नाम से नई दिल्ली में एक बैठक भी बुलाई थी जिसमें गंगा की सफाई और प्रदूषण मुक्ति के लिए विशेषज्ञों को बुलाया गया था। लेकिन शायद गंगा मंथन के नाम पर गंगा की शुद्धि के बजाए गंगा पर जलमार्ग बनाकर गंगा से व्यापार करने की राजनीति तय की गई होगी जो बजट में मुखर होकर सामने आई है।

त्रेता युग में अवतरित हुई गंगा जनकल्याणकारी है जिसमें आस्था की डुबकी लगाते ही लोग पाप मुक्त हो जाते हैं और लोगों के मन व शरीर दोनों निर्मल हो जाते हैं। राधा-कृष्ण की महारास लीला से स्वर्ग में जन्मी मां गंगा भागीरथ की तपस्या से खुश होकर जनकल्याण के लिए बैशाख मास के शुक्ल पक्ष सप्तमी को स्वर्ग को सुख छोड़कर भगवान शिव की जटाओं से होती हुई धरती पर आई। कहा जाता है कि गंगा के ही भरोसे शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान किया था। ताकि गंगा की शीतलता उन्हें विष के ताप से मुक्त कर सके। जिस गंगा ने शिव को शीतलता प्रदान की, वही गंगा भक्तों के लिए भी मोक्षदायिनी है। तभी तो गंगा की गोद में डूबकी लगाते ही भक्त स्वयं को पापमुक्त समझने लगते हैं।

जो लोग धर्म और अध्यात्म के नाम पर गंगा को महिमा मंडित करते हैं, वही लोग इसे प्रदूषित करने में भी पीछे नहीं हैं। अब तो गंगा के उद्गम स्थल गोमुख यानी गंगोत्री में भी श्रद्धालुओं व पर्यटकों ने प्रदूषण फैलाना शुरू कर दिया है। गंगा में सीवेज का गंदा पानी, नालियों के पानी की निकासी, मूर्तियां, हवन की राख और जले अधजले शवों को बहाकर हम गंगा के साथ अन्याय कर रहे हैं। इतना ही नहीं हरिद्वार में तो संत महात्माओं के आश्रम से निकलने वाला गंदा पानी भी गंगा में डाला जा रहा है। इन सबके प्रति आवाज उठाने के बजाए गंगा से ऊर्जा पैदा करने को लेकर राजनीति की जा रही है।

पौराणिक ग्रंथों में भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि गंगा के जल का किसी भी रूप में प्रयोग करने से गंगा की पवित्रता प्रभावित होती हो। इसलिए गंगा नदी पर प्रस्तावित केन्द्रीय एवं निजी उपक्रमों की विभिन्न परियोजनाओं से गंगा की पवित्रता कम होने का सवाल ही नहीं उठता। बस जरूरत है तो इस बात की हम स्वयं गंगा में ऐसा कुछ न डाले जिससे गंगा प्रदूषित हो। गंगा जल की विशेषता ही है कि बरसों तक रखा रहने पर भी यह कभी खराब नहीं होता। लेकिन हमें विचार करना होगा कि गंगोत्री से गंगा सागर तक के 2500 किमी. लंबे सफर में गंगा की हालत क्या-से-क्या हो गई। इस हालत पर कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। अलबत्ता पूर्ववर्ती केन्द्र सरकार ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में एक भारी भरकम बजट जरूर निर्धारित किया था। परंतु यह बजट भी गंगा को प्रदूषण से मुक्त नहीं कर सका। अलबत्ता सांकेतिक रूप में विभिन्न स्वयं सेवी संगठन व चिंतक जरूर गंगा की सफाई का अभियान चला चुके हैं।

सच्चाई यह है कि कलियुग के बीते पांच हजार वर्षों में गंगा सूखने के कगार पर पहुंच चुकी है। गंगा में व्याप्त प्रदूषण के कारण गंगाजल के आचमन और उससे स्नान पर भी सवाल उठने लगे हैं। मोदी सरकार अपने गंगा मंथन अभियान को संचालित कर गंगा की सफाई और शुद्धता की बहाली कराती तो गंगा के प्रति आस्थावान संत समाज उसे धन्यवाद देता परंतु सरकार ने गंगा को लाभ कमाने का जरिया बनाकर जलमार्ग के माध्यम से गंगा को कहीं ज्यादा प्रदूषित करने की स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि इससे गंगा में प्रदूषण बढ़ना अवश्यसंभावी है।

गंगाः एक नजर में


1. भारतवर्ष में बहने वाली नदियों में गंगा सबसे बड़ी नदी है।2. भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी गंगा, जो भारत और बांग्लादेश को मिलाकर 2510 किमी. लंबी है।
3. इसका प्रवाह क्षेत्र 471,502 वर्ग किमी. में फैला है।
4. देश की सिंचित भूमि का 40 प्रतिशत इसी से सिंचित होता है।
5. 37 प्रतिशत जनता इसके बेसिन में निवास करती है।
6. गंगा एक्शन प्लान-1 और 2 में 2500 करोड़ रुपये का बजट था।
7. मुख्य सहायक नदियां-वामांगी, महाकाली, करनाली, कोसी, गंडक, घाघरा, दक्षिणांगी, यमुना, सोन, महानंदा
8. अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आइने अकबरी’ में लिखा है कि बादशाह अकबर अपने दैनिक जीवन में पीने के लिए गंगाजल ही प्रयोग में लाते थे।
9. वर्ष 1984 में ही प्रदूषण की व्यापकता इतनी थी कि गंगा का जल स्नान योग्य नहीं माना जा रहा था।
10. वर्ष 1984 की प्रदूषित गंगा वर्ष 2000 में आकर तमाम कार्य-समितियों व योजनाओं के बावजूद और अधिक प्रदूषित हुई है।

गंगा में बढ़ रहा प्रदूषणगंगा को हिंदुत्व परियोजना के तौर पर नहीं देखा जाए। यह हिंदुत्व परियोजना नहीं है। यह एक राष्ट्रीय परियोजना है। गंगा सफाई के जरिए राजनीति के धुव्रीकरण का प्रयास नहीं किया जाए। इसे साधु और संतों का कार्यक्रम नहीं बनाइए। गंगा एक राष्ट्रीय नदी है। गंगा देश की संस्कृति को परिभाषित करती है। जवाहरलाल नेहरू भी भारतीय संस्कृति में गंगा की भूमिका पर बोले थे। यूपीए सरकार ने 2009 में ही गंगा सफाई योजना की शुरूआत की थी। ये लोग उसी काम को दोहरा रहे हैं और इसमें कुछ भी नया नहीं है। यूपीए ने अपने कार्यकाल में गंगा समेत सभी नदियों की सफाई को प्राथमिकता में रखा। राजीव गांधी 1986 में ही गंगा एक्शन प्लान बनाए थे।
-जयराम रमेश, पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री

गंगा जल को ब्रह्म द्रव्य और मोक्षदायिनी कहा जाता है। लोग इसे कभी-कभी केवल हिन्दू धर्म से जोड़ते हैं। लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि सम्राट अकबर भी गंगा जल का सेवन करते थे। अंग्रेज यहां से गंगा जल अपने देश ले जाते थे......ये विडम्बना है कि आज गंगा जल को तिलांजलि दे हम बोतलबंद पानी पी रहे हैं।
-राजनाथ सिंह, केंद्रीय गृहमंत्री, भारतीय सरकार

भारत की विकास गाथा में प्रवासी भारतीयों का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति के संरक्षण जैसे क्षेत्रों में प्रवासी भारतीय समुदाय ने काफी योगदान दिया है और अब गंगा नदी के संरक्षण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने में प्रवासी भारतीय समुदाय महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
-अरुण जेटली, वित्त मंत्री भारत सरकार

गंगा मंथनहम गंगा मंथन संवाद के निष्कर्ष पर पूरी ईमानदारी से कार्य करेंगे। हमारा विभिन्न भागीदारों से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श हुआ है और हम शीघ्र ही किसी सही निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे। हर वर्ग के लोग बिना किसी धार्मिक भेदभाव के इस अभियान के प्रति समर्पित है। गंगा पुनरुद्धार कार्यक्रम के लिए पैसे की कोई कमी नहीं रहेगी।
-उमा भारती, केंद्रीय जल संसाधन मंत्री (राष्ट्रीय संवाद ‘गंगा मंथन के दौरान)

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