सर्वनाश में सर्वसम्मति

Submitted by HindiWater on Sat, 09/13/2014 - 13:01
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, सितंबर 2014
एक दिन होगी प्रलय भी
मत रहेगी झोपड़ी
मिट जाएंगे नीलम-निलय भी
...मौत रानी के यहां उस दिन बड़े दीपक जलेंगे।

भवानीप्रसाद मिश्र

. जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ ने हमारे सामने कुछ महत्वपूर्ण अनसुलझे प्रश्न पुनः खड़े किए हैं। यही पिछले वर्ष उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद भी हुआ था। इस बार भी सारा ध्यान राहत कार्यों की सफलता और असफलता के साथ ही साथ पिछली व वर्तमान सरकार द्वारा इस विषय पर किए गए प्रयत्नों की तुलना तक सिमट कर रह गया। परंतु इन विभीषिकाओं की पृष्ठभूमि पर विचार करने का साहस कोई भी राजनीतिक दल कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है।

पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र इसे ठीक-ठीक समझाते हुए कहते हैं कि “सर्वनाश में सर्वसम्मति” है। इसीलिए वर्तमान सभी राजनीतिज्ञ विकास की इसी सत्यानाशी अवधारणा पर एकमत हैं। हर कोई यह कह रहा है कि कश्मीर में 60 साल बाद इतनी भयानक बाढ़ आई है। लेकिन तब तो इतना विनाश नहीं हुआ था। तो अब क्या हो गया कि विनाश प्रलय में बदल गया?

इस बार की बाढ़ ने एक और बात सिद्ध कर दी है कि राजनीति ने भले ही जम्मू और कश्मीर को दो हिस्सों में बांट दिया हो, लेकिन बाढ़ ने अपना धर्म निभाया और दोनों को एक ही समझा और एक सा डुबोया। गौरतलब है ऊंचे पहाड़ों पर यदि औसत से दो इंच पानी भी ज्यादा (एक साथ) बरस जाता है तो वह तबाही लाने के लिए पर्याप्त होता है और इससे होने वाले विनाश की भविष्यवाणी कोई भी नहीं कर सकता। पहाड़ से पानी नीचे आने के बाद उसे घाटी में फैलने के लिए स्थान चाहिए। जब वह उपलब्ध नहीं होगा या उसे सिर्फ बांध से रोकने का प्रयास किया जाएगा, तो वह प्रलय ही लाएगा।

इस दौरान झेलम पर बना बांध टूटा, डल झील उफना गई और श्रीनगर में एक मंजिल तक पानी चढ़ गया जो अब उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि घाटी में बसा शहर कैसे डूब गया? याद करिए पिछले वर्ष असम में गुआहाटी भी इसी तरह के जलप्लावन का शिकार हुआ था। श्रीनगर के इर्द-गिर्द बने छः लेन के राष्ट्रीय राजमार्ग ने इस शहर को एक “बड़े कटोरे” में बदल दिया है।

बारह महीनों यातायात की उपलब्धता को ध्यान में रखकर बनी इन सड़कों का डिजाइन ही इस तरह का है, जिससे इनकी ऊंचाई बढ़ जाती है। आकल्पकों और इंजीनियरों द्वारा लगातार यह दलीलें दी जाती हैं कि हम निकासी के लिए पुलियाओं आदि का भरपूर प्रावधान करते हैं, जबकि हवाई सर्वेक्षण में इन पुलियाओं की असलियत सामने आ जाती है, क्योंकि वहां से ये सुई के छेद की तरह नजर आती हैं, जिससे की पानी का ठीक निकास कठिन ही नहीं बल्कि असंभव है।

वैसे जम्मू-कश्मीर में हुए विनाश के दो अन्य महत्वपूर्ण कारण हैं आतंकवाद और पर्यटन। दोनों में ऊपरी तौर पर कोई समानता नहीं दिखती और वस्तुतः भी यह दोनों विपरीत ध्रुव हैं लेकिन इन दोनों से निपटने का एक ही तरीका है, मनमाना निर्माण। दोनों के लिए अधोसंरचना ही एकमात्र निराकरण है। गौरतलब है कि भारत में संभवतः सबसे ज्यादा वन विनाश जम्मू-कश्मीर में ही हुआ है।

विनाश जम्मू-कश्मीर तक ही सीमित नहीं है। भारत के पश्चिमी छोर पर बसा बड़ौदा भी इस समय डूबा हुआ है। वहां भी इतनी ही बढ़ी बाढ़ आई हुई है। शहर उस बांध के दरवाजे खोल देने से डूबा जिस बांध को इस शहर को बाढ़ से बचाने के लिए ही निर्मित किया गया था। कुछ वर्ष पहले उकई बांध की वजह से “हीरों का शहर” सूरत डूबा था और पहली बार भारत के किसी शहर की पहली मंजिल ने बाढ़ के पानी के स्वाद को चखा था। ये सब तो छोटे बांध हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग देश को जोड़ने के बावजूद उसे दो हिस्सों में बांटते हैं और उत्तराखंड, असम, जम्मू-कश्मीर व गुजरात में आने वाली बाढ़ हमें समझा रही है कि हमारा भू-भाग एक ही भूखंड है। आधुनिक विकास को चमकदार बनाने वाले गुजरात में बने बड़ौदा-अहमदाबाद एक्सप्रेस-वे का डूबना भी यही सिद्ध कर रहा है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बाढ़ मौसम की अनिवार्यता है और इसका आना शाश्वत है। इससे निपटा नहीं जा सकता बल्कि इसके साथ रहा जा सकता है और इससे दोस्ती की जा सकती है।अपनी पूरी ऊंचाई पा लेने के बाद (जिसकी प्रशासनिक अनुमति केंद्र की नई सरकार ने दे दी है) नर्मदा नदी पर स्थित सरदार सरोवर बांध से क्या हो सकता है उसके बारे में सोचना ही डर पैदा करने लगता है। हमें याद रखना होगा कि सरदार सरोवर बांध और नर्मदा नदी में झेलम नदी के मुकाबले कई गुना अधिक जलप्रवाह होता है। वहीं गुजरात के ही अहमदाबाद में स्थित “साबरमती रिवर फ्रंट” में बाढ़ आ जाने से अहमदाबाद को भी खतरा पैदा हो सकता है।

10 सितंबर को दिल्ली में एक बैठक में म.प्र. के सबसे बड़े शहर इंदौर की खान नदी की सफाई के लिए साबरमती की तर्ज पर नदी विकास के लिए 2,700 करोड़ की योजना सैद्धांतिक तौर पर स्वीकृत की गई है। योजना में जरा सी गलती पूरे शहर को डुबो सकती है।

जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ से निपटने में मिली असफलता के बाद यह कहा जा रहा है कि इससे बचाव के लिए चार वर्ष पूर्व बाईस हजार करोड़ रु. की योजना भेजी गई थी, लेकिन उस दिशा में कोई कार्यवाही नहीं हुई। यदि यह योजना दो लाख बीस हजार करोड़ रु. की होती और क्रियान्यवन भी हो गया होता तो भी इस विनाश से बचा नहीं जा सकता था।

विकास की इस नई अधोसंरचनात्मक अवधारणा को लेकर विवाद नया नहीं है। अनुपम मिश्र ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद व्याख्यानमाला मेें बताया था कि सड़कों और रेल पटरियां डालने को लेकर पहला विवाद सन् 1936 में उठा था और तब से यह बहस लगातार जारी है। उस दौरान ग्रामीण सड़कें ही ज्यादा थीं, जो कि सतह से ज्यादा ऊंची नहीं होती थीं और पानी के बहाव को बाधित नहीं करती थीं। उसी समय राज्य मार्गों (अब राष्ट्रीय व राज्य राजमार्ग) की संकल्पना सामने आई।

लोगों ने जलजमाव की समस्या की ओर ध्यान दिलाते हुए इस तरह के निर्माण का विरोध किया। परंतु औपनिवेशिक शासन ने इसका जवाब लाठियों और गोलियों से दिया और विकास की इस नई अवधारणा को थोप दिया।

तकरीबन 80 वर्ष पश्चात भी स्थितियों मेें कोई परिवर्तन नहीं आया। विकास की सड़कें और रेलवे पटरियां भी भौगोलिक व जलवायु परिस्थितियों के व्यवस्थित आंकलन के बिना अपनी लंबाई बढ़ाती गई। जम्मू-कश्मीर की बाढ़ के संबंध में कहा जा रहा है कि रेलवे पटरियों के लिए हुए निर्माण ने तटबंधों और कई स्थानों पर ऊंचे बांधों की भूमिका निभाई और पूरा प्रदेश डूब गया।


जम्मू कश्मीर में बाढ़जम्मू कश्मीर में बाढ़श्रीनगर के कटोरा बन जाने की चर्चा हम कर चुके हैं। ऐसा ही विकास पूरे देश में हुआ और राष्ट्रीय राजमार्गों और रेलवे की वजह से अनायास ही लाखों किलोमीटर लंबे तटबंध और बांध बन गए और अभी भी बनते ही जा रहे हैं। नई सरकार भी प्रतिदिन 30 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण का लक्ष्य बना रही है।

ये राष्ट्रीय राजमार्ग देश को जोड़ने के बावजूद उसे दो हिस्सों में बांटते हैं और उत्तराखंड, असम, जम्मू-कश्मीर व गुजरात में आने वाली बाढ़ हमें समझा रही है कि हमारा भू-भाग एक ही भूखंड है। आधुनिक विकास को चमकदार बनाने वाले गुजरात में बने बड़ौदा-अहमदाबाद एक्सप्रेस-वे का डूबना भी यही सिद्ध कर रहा है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि बाढ़ मौसम की अनिवार्यता है और इसका आना शाश्वत है। इससे निपटा नहीं जा सकता बल्कि इसके साथ रहा जा सकता है और इससे दोस्ती की जा सकती है। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप बारिश की अनियमितता बढ़ी है और इसकी तीव्रता में भी अनायास ही जबरदस्त इजाफा हुआ है।

कई स्थानों पर कुछ ही घंटों में पूरे मानसून में बरसने जितना पानी बरस जाता है और इस स्थिति में दुनिया का सर्वाधिक विशाल और मजबूत बांध भी पानी के इस वेग का सामना एक हद तक ही कर सकता है। इस बीच हमारे यहां 100 नए स्मार्ट शहरों के निर्माण की बात चल रही है। इन सभी के लिए विकास की आधुनिकतम तकनीकों के प्रयोग की बात की जा रही है।

हमें विचारना होगा कि इनका कलेवर व स्थान चयन कैसे हो। अभी तक तो शहर एक-एक करके डूबते हैं, क्योंकि पुराने शहर अपनी भौगोलिक स्थितियों व जलवायु के हिसाब से विकसित हुए थे। परंतु एक सी तकनीक से विकसित यह सौ शहर तो एक साथ डूबेंगे। तब क्या होगा? इस पर अभी विचार करना जरूरी है।

इसी बीच नई सरकार के 100 दिन पूरे होते न होते पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने पर्यावरण स्वीकृति के लिए लंबित 324 आवेदनों में से 240 को स्वीकृति प्रदान कर दी। एक भी अस्वीकृत नहीं हुआ। इसके परिणाम भी कुछ वर्षों में सामने आ जाएंगे।

इस हड़बड़ी का समाधान भी संभवतः अनुपम मिश्र के इस कथन “बिना किसी कटुता के हम अपने विकास का पुनरावलोकन करें” में ही निहित है।

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