राजस्थान - थार का मरुस्थल

Submitted by birendrakrgupta on Sat, 09/27/2014 - 13:13
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मरुस्थल का मतलब है मृत्यु इलाका - जहां प्यास लोगों, जानवरों और पौधों को मार सकती है। पानी की भंयकर कमी के समय अगर लोग जानवर यहां से कूच न कर जाएं तो उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है।

थार के मरुस्थल में बहुत कम वर्षा तो होती ही है, पर कई साल ऐसे भी गुजर जाते है जब एक बूंद पानी नहीं बरसता।
पानी है तो सब कुछ है। और जहां पानी नही है वहां क्या है? आओ अपने देश के उस सब से सूखे हिस्से को देखे जहां बहुत ही कम पानी बरसता है। यह है राजस्थान प्रांत के पश्चिम का मैदानी भाग जो थार मरुस्थल कहलाता है।

लूनी नदी राजस्थान के पश्चिमी भाग में बहने वाली एक ही बड़ी नदी है। इसमें भी साल भर पानी नहीं बहता। लूनी के और पश्चिम में पड़ने वाले इलाके में तो कोई नदी दिखती ही नहीं है।

वर्षा


भारत में वर्षा का मानचित्र देखो और समझो कि राजस्थान में किस तरह पूर्व से पश्चिम की ओर जाने पर वर्षा कम होती जाती है।

थार के मरुस्थल में बहुत कम वर्षा तो होती ही है, पर कई साल ऐसे भी गुजर जाते है जब एक बूंद पानी नहीं बरसता।

कई वर्षों बाद कभी-कभी एकाएक काफी बारिश हो जाती है तो अचानक सूखे नदी-नालों में बाढ़ आ जाती है। पर जल्दी ही यह पानी सूख जाता है। इतना पानी भी नहीं होता कि नदी या नाले दूर तक बह सकें। आओ ऐसे सूखे इलाके के जीवन को समझें।

मरुस्थल में लोगों का जीवन


मरुस्थल का मतलब है मृत्यु इलाका- जहां प्यास लोगों, जानवरों और पौधों को मार सकती है। पानी की भंयकर कमी के समय अगर लोग जानवर यहां से कूच न कर जाएं तो उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है। यहां के लोगों का जीवन ऐसे संकट से बचे रहने के उपाय करते हुए बीतता है।

वनस्पति और आबादी


पानी की कमी के कारण ही मरुस्थल में दूर-दूर तक पेड़ नहीं दिखते। कई तरह की छोटी कंटीली झाड़ियां और घास उगती हैं। बस कहीं-कहीं इक्के दुक्के खेजड़ी के पेड़ नजर आ जाते हैं। मरुस्थल के अधिकांश गांव बहुत छोटे हैं, जिनमें 500 से कम लोग रहते है। तुम भारत की जनसंख्या के मानचित्र में देख सकते हो कि मरुस्थल में आबादी कितनी कम है।

भेड़ पालन


यहां गांव के लोग बड़ी संख्या में भेड़ बकरी पालते हैं। पानी की कमी के वक्त घास और कंटीली झाड़ियों के सहारे ही ये जानवर गुजारा कर पाते हैं। भेड़ों की ऊन और मांस के लिए भेड़ों व बकरियों की बिक्री अच्छी होती है। दिल्ली, बंबई जैसे बड़े शहरों में मांस की मांग बढ़ती जा रही है। ऊन की कई चीजे बनती है जो देश-विदेश में बिकती है।

खेती


मरुस्थल के लोगों के लिए भेड़पालन का धंधा महत्वपूर्ण है। यहां पानी की कमी के कारण खेती बहुत कम होती है। साल में किसी तरह एक फसल हो जाए तो बहुत समझो। गांव के लोग बरसात में बाजरा बोते हैं। बाजरा यहां की रेतीली मिट्टी और कम पानी में भी उग जाता है। जुलाई में बाजरा बोया और अक्टूबर में काट लिया।

इसके बाद अगली बरसात तक खेत सूने पड़े रहते हैं। बाजरे की थोड़ी सी फसल से साल भर का काम तो नहीं चल पाता। इसलिए भेड़पालन का धंधा बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन भेड़ पालन का धंधा भी मरुस्थल में रह कर नहीं किया जा सकता।

यहां इतनी हरियाली कहां कि बड़ी संख्या में भेड़ बकरियां चराई जा सके? इस स्थिति में मरुस्थल के लोग साल भर अपना काम कैसे चलाते है? उनकी बरसाते, गर्मियां और सर्दियां कैसे कटती हैं- यह हम आगे पढ़ेंगे।

बरसात के दिन


मरुस्थल में थोड़ी-सी बरसात में भी बहुत घास उग आती है। खास कर सेवन घास, जो भेड़ों के लिए अच्छा चारा है। बरसात के दिनों में तो भेड़ों को गांव के आसपास चरा लिया जाता है। इन्हीं दिनों बाजरे की खेती का काम भी रहता है।

बरसात में ही पानी जमा करने के लिए कई इंतजाम देखने होते हैं क्योंकिे साल भर फिर पानी का और कोई साधन नहीं होता है।

कई घरों में बीच के आंगन में पक्के टांके (टंकी) होते हैं जिनमें बरसात का पानी इकट्ठा हो जाता है। छत से बहने वाले पानी का निकास ऐसा बनाया जाता है कि पानी टांके में ही गिरे। फिर महीनों तक इस पानी को बहुत बचा-बचा के इस्तेमाल किया जाता है। इस पानी से मनुष्य का काम भी चलता है और जानवरों का भी। कई जगह लोग चारपाई पर बैठकर नहाते हैं और चारपाई के नीचे रखे एक बरतन में इस पानी को इकट्ठा कर लेते हैं। यह पानी घर साफ करने व जानवरों को पिलाने के काम में आ जाता है। यहां लोग सूखी रेत से ही बर्तन मांज लेते हैं। रेत की रगड़ से पीतल के बर्तन को खूब चमका भी देते हैं।

रेतीले मैदान में यहां-वहां पाए जाने वाले गड्ढों या तालाबों में भी बरसात का पानी इकट्ठा होता है। इन छोटे तालाबों का पानी धीरे-धीरे चारों तरफ रिसता रहता है। यह रिसता हुआ पानी बेकार न चला जाए, इसके लिए लोग तालाब के चारों तरफ 25-30 फीट गहरी कुंइयां या बेरियां खोदते हैं। तालाब से रिसता पानी इन कुंइयों में इकट्ठा होता रहता है। जब महीनों बाद तालाब का पानी खत्म हो जाता है तब भी लोगों को अपनी कुंइयों में पानी मिल जाता है।

जहां तालाब व गड्ढे नहीं होते हैं, वहां लोग खुद आसपास की ढाल को देखते हुए जमीन खोदकर पक्की कुंइयां और कुंड बनाते हैं ताकि चारों तरफ गिरा बरसात का पानी इनमें इकट्ठा होता जाए। बरसात के पानी को इकट्ठा करके रखने के ये इंतजाम बहुत जरूरी हैं क्योंकि मरुस्थल में भूजल बहुत नीचे मिलता है। कुंओं में बहुत नीचे व बहुत कम पानी मिलता है। कई कुंओं का पानी खारा होता है।

सारे इंतजामों के बावजूद कई गांवों में लोगों को मीलों चल कर पानी लाना पड़ता है। कहीं औरतें मीलों तक सिर पर घड़े उठाए चलती हैं, तो कहीं ऊंट और गधों पर घड़े लाद के लाए जाते है।

सर्दियां


अक्टूबर में बाजरा कट जाता है। तब खेतों में बाजरे के डंठल खड़े होते है और भेड़ों को चराने के काम आते हैं। इन दिनों भेड़ों पर अच्छी मात्रा में ऊन होता है। क्योंकि उन्हें बरसात में चारा ठीक से मिला था (सिर्फ उन सालों में जब बारिश हुई हो, कई साल तो बारिश ही नहीं होती)।

गांव के सारे परिवार अपनी-अपनी भेड़ों का ऊन काटते हैं। काटने से पहले भेड़ों को धो कर साफ भी कर लेते हैं। ऊन में फंसे कांटे भी निकाल लेते हैं। ऐसे साफ ऊन की कीमत ज्यादा मिलती है। व्यापारी गांव आ कर ऊन खरीद ले जाते हैं।

गांव से दूर जाने की तैयारी


बाजरा कट चुका है। भेड़ों से ऊन भी उतर चुका है। अब सर्दियों के दिन आ ही गए हैं। गांव के आसपास बरसात में उगी घास भेड़े चर चुकी हैं और खेतों में खड़े डंठल भी। अब गांव में रह कर चारा नहीं मिलेगा। सर्दियों और गर्मियों भर जानवरों को क्या खिलांएगे- यह सवाल सब के सामने खड़ा हो जाता है। लोग चारे की तलाश में दूर-दूर तक जाने की तैयारी करने लगते हैं।

मरुस्थल के भेड़ पालक हर साल जाते हैं और कई सालों से जाते रहे हैं।इसलिए अब इनके बंधे-बंधाए रास्ते हैं, जहां चारा मिलने का पूरा भरोसा रहता है। यहां दिए नक्शे में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब राज्य दिखाए गए है। राजस्थान के जैलसमेर और बीकानेर के मरुस्थली क्षेत्रों से भेड़पालक कहां-कहां जाते हैं, यह तीरों से दिखाया गया है।

भेड़पालकों के साथ यात्रा


चलो, भेड़पालकों के एक झुंड के साथ हो लें व देखें कि उनके सफर में क्या-क्या होता है.....

जैसलमेर के दो गांवों से 50 भेड़पालक 6,000 भेड़ों और 20-22 ऊंटों के साथ निकले हैं। दोनों गांवों के लगभग सभी घरों से एक-एक दो-दो लोग अपनी-अपनी भेड़ और ऊंट ले के चले हैं। किसी परिवार के पास 70-80 भेड़ हैं। किसी के पास 100-200 भेड़ हैं और कुछ के पास 300 भेड़ भी हैं- गांव में जिन परिवारों के पास जिन परिवारों के पास 40-50 भेंड़ तक हैं- वे इस साल बाहर नहीं जा रहे हैं। वे आसपास थोड़ी दूर तक घूम कर अपनी भेड़ चरा लेंगे।

गांव में औरतें, बच्चे और बूढ़े रह गए हैं। हां, कुछ भेड़पालकों के साथ उनकी औरतें और बच्चे भी चल रहे है। ऊंटो पर सामान लाद दिया गया है और लोग अपने लंबे सफर पर चल पड़े हैं।

पूर्व दिशा में अधिक वर्षा वाले इलाके हैं। भेड़ों को रास्ते में पड़ने वाले बाजरे के कटे खेतों पर चराते हुए लोग जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं तो खेजड़ी और बबूल के पेड़ ज्यादा संख्या में दिखाई देने लगते हैं। इन पेड़ो की पत्तियां और फलियां भेड़ों के लिए बहुत अच्छा चारा है। हमारे भेड़पालक साथी इन पेड़ों की टहनियां काट-काट कर अपनी भेड़ों को खिला रहे हैं। पूर्वी इलाकों में कुछ अधिक वर्षा के कारण ज्यादा जमीन पर खेती होती है, इसलिए खेतों में खड़े डंठल भी ज्यादा मिल रहे हैं।

भेड़ों की देखभाल


हमारे भेड़ पालक साथी रास्ते भर कई चिंताओ से जूझते हैं। महीने भर से चलते-चलते उनकी भेड़ें थक रही हैं। रास्ते में कई बार चारा ठीक से नहीं मिला। ठंड भी बहुत तेज है। भेड़े बीमार पड़ रही है। कई लोग उधार लेने की सोच रहे हैं। रास्ते में पड़ने वाले छोटे शहर में ऊन का व्यापारी रहता है। वह पहचान का आदमी है। लोग उससे पैसे उधार लेते हैं। बाजार से बाजरे का आटा, गुड़ और तेल खरीदते हैं। इन चीजों को मिलाकर रोज भेड़ों को खिलाएंगे। बाजार से दवाई भी खरीदनी पड़ रही है।

दिन भर चलते-चलते जब शाम हो जाती है तो कहीं खेत में, या खुले में डेरा डाल दिया जाता है। ऊंटो से सामान उतारा जाता है और पट खाना पकाने की तैयारी शुरू होती है। बाजरे की रोटी और दाल बनाई जाती है और मिर्ची-प्याज के साथ खाई जाती है। सुबह उठकर भेड़ के दूध की चाय पीकर एक बार फिर बाजरे की रोटी बनाई जाती है। और यह मिर्च व प्याज के साथ खाई जाती है। तब लोग सामान बांध कर दिन भर के सफर के लिए निकल पड़ते हैं।

भेड़ों की हालत नाजुक होने से पहले ही उनके लिए खुराक और दवा का इंतजाम न किया तो नुकसान बहुत होता है। जानवर रास्ते में मरने लगते हैं। बीमार जानवरों को भी लंबे रास्ते भर हांक के ले जाना मुश्किल होता है। इसलिए, अक्सर बीमार जानवर को रास्ते में ही बेच दिया जाता है। बीमार जानवर की बिक्री की बहुत अच्छी कीमत तो नहीं मिलती, पर फिर भी कुछ रकम तो वसूल हो ही जाती है। इस रकम से बाकी भेड़ों के लिए खुराक व दवाएं खरीदने में मदद मिलती है।

अरावली पहाड़ियों के पास


चलते-चलते दो महीने बीत गए। लो, अब पूर्व में अरावली की पहाड़ियां दिखने लगी है।

अरावली के आसपास के इस इलाके में कई किसान ट्यूबवेल से सिंचाई करने लगे है। वे सर्दियों में गेंहू और चने की फसल लेने लगे है। ऐसे सिंचित खेतों में भेड़ चराना संभव नहीं है। वे असिंचित खाली खेतों में ही जानवर बिठा सकते है। खेतों के मालिक खेत में उगे पेड़ों की पत्तियां जानवरों को खिलाने देते हैं। कई बार, वे भेड़ पालको को कुछ पैसे भी देते हैं।

सर्दियों के महीने इसी तरह मुश्किल से कटते हैं। 4-5 महीनों में भेड़ों पर फिर ऊन हो गया है। घर से दूर, यात्रा के बीच, भेड़ों को साफ करने और खुद उनका ऊन काटने का साधन भी नहीं है और समय भी नहीं है। इसलिए डेरे पर पास के शहर या गांव से ऊन काटने वालों को बुला कर उन्हें पैसे देकर ऊन कटवाई गई। ये लोग एक भेड़ की ऊन काटने का 50 पैसे से 1 रुपया तक लेते हैं।

ऊन व्यापारी की दुकान रास्ते में पड़ने वाले सभी कस्बो-शहरों में है। व्यापारी खुद डेरे पर आकर लोगों से संपर्क साध लेते हैं और ऊन खरीद ले जाते है। सर्दियों के अंत में काटी गई यह ऊन, मात्रा में कम है और साफ भी नहीं है। ऊन की मात्रा कम है क्योंकि सर्दियों भर भेड़ों को अच्छे से चरने को नहीं मिला है। इसलिए इस ऊन से ज्यादा आमदनी नहीं मिलती।

ऊन बेच कर जो पैसे मिले हैं उससे हमारे भेड़पालक साथियों ने व्यापारी का उधार चुकाया है क्योंकि सर्दियों के शुरू में उसी से खुराक और दवाई के लिए पैसे उधार लिए थे। बची हुई रकम गांव भेजी है। गांव में परिवार के लोगों के पास अनाज खत्म हो रहा होगा और वहां गुजारा करना मुश्किल हो रहा होगा। इसलिए उन्हें पैसे भेजना जरूरी है।

गर्मियां


मार्च-अप्रैल का महीना आया। अब लोग हरियाणा की ओर चल दिए हैं। हरियाणा में नदी से निकली नहरों से सिंचाई होती है। रबी में लगभग सभी खेतों में गेंहू है और मार्च में कटता है। अब सभी खेतों में गेहूं के भरपूर डंठल खड़े मिलेंगे। इनमें भेड़े जी भर के चरेंगी।

हरियाणा में चारों तरफ देशी बबूल भी बहुत उगता है। इसकी पत्तियां और फलियां भेड़ों के लिए अच्छा भोजन हैं। हां, यह ध्यान रखना पड़ता है कि भेड़ विलायती बबूल की फलियां न खा ले - ये भेड़ों के लिए जहरीली होती है। अप्रैल मई जून भर हरियाणा के खेतों में चरने को मिलता है।

वापसी यात्रा


गर्मियां निकल गई। अब बरसात के दिन आने वाले है। हरियाणा के खेतों में भी हल चलेंगे। बोनी की तैयारियां होगी। यहां अब भेड़ों को चराना संभव नहीं होगा। हमारे भेड़पालक साथियों को भी मरुस्थल के अपने गांव लौटना है। वहां बरसात में घास उग आएगी।

इसलिए जून-जुलाई में वापसी का रास्ता पकड़ लिया जाता है। गर्मियों में वापसी की लंबी यात्रा भी कठिनाई भरी होती है। रास्ते में सभी खेतों पर बरसात की बोनी की तैयारियां हो रही होती हैं। सिर्फ सड़क किनारे उगी घास व पेड़ों की पत्तियों से ही भेड़ों को पेट भरना पड़ता है। जब तक गांव लौटेंगे, तब तक बारिश हो जाएगी तो चारा मिलेगा- इस उम्मीद में वापसी यात्रा पूरी होती है। इस तरह हमारे भेड़ पालक साथी साल-दर-साल अपना जीवन बिताते है। ऐसे में अगर गांव लौटे और बरसात के महीने सूखे बीत जाएं तो?

सूखा


1987 में यही संकट आ घिरा। घर लौटे और एक बूंद पानी नहीं बरसा, न घास उगी, न बाजरा। झाड़ियों की थोड़ी बहुत पत्तियां कुछ दिनों में चर के खा ली गई। अब कहां जाएं? यह सवाल था। पूरे पश्चिम राजस्थान में सूखा था। हरियाणा वापस तो नहीं जा सकते थे- वहां तो खेतों में फसल खड़ी थी। गांवों पर ही रहे - तो जानवरों को मरने से बचाएं कैसे? जानवर भी मर जाएं तो खुद का गुजारा किस के सहारे करें? खेती तो पहले ही साथ छोड़ चुकी थी।

जानते हो इस हालत में मरुस्थल के सैकड़ों भेड़ पालकों ने क्या किया? पैसे उधार लिए - ट्रक किराए पर लिए और ट्रकों में अपनी भेड़े लाद के मध्य प्रदेश के जंगलों की ओर रवाना हुए। भेड़ो को हांक के लाते तो रास्ते भर उन्हें चरने को नहीं मिलता और भेड़े दम तोड़ देती। इसीलिए ट्रक पे चढ़ा के लाना पड़ा। जंगल में चराना जरूरी हो गया क्योंकि उस समय खेतों में चराया नहीं जा सकता था।

जंगल में हजारों की संख्या में भेड़े चरने आ गई। वन विभाग ने इस पर रोक लगाने की कोशिश की और भेड़ पालकों को बहुत जुर्माना देना पड़ा। वे पहले ही परेशान थे, अब सरकारी रोक-टोक के कारण और परेशान हुए।

रेत के टीले

मरुस्थल में जगह-जगह रेत के बड़े-बड़े टीले हैं। तेज हवाओं के साथ टीलों की रेत उड़कर आगे चली जाती है और इस तरह दूसरी जगह टीला बन जाता है। गर्मियों के बिलकुल सूखे महीनों में रेत की आंधियां चलती हैं। घर के बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।


जैसलमेर, बीकानेर, गंगानगर में जगह-जगह रेत के टीले देखे जा सकते हैं। गंगानगर की सिंचित खेती में रेत के टीलों और आंधियों ने बहुत कठिनाई पैदा की है। सिंचाई की नालियां बार-बार रेत से बंद हो जाती है। खेत में बोई गई फसल पर रेत जम जाती है और छोटे पौधे दब जाते हैं। खेत में कई बार बखरना और बोना पड़ता है। बीच-बीच में नालों से, पौधों से रेत हटानी पड़ती है।


खिसकते हुए रेत के टीलों पर घास व झाड़िया भी नहीं उग पाती। इसलिए ये चराई के काम भी नहीं आते। टीलों पर झाड़ियां लगाकर उन्हें स्थाई बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि उनसे रेत न उड़े और उन पर उगी झाड़ियों से जलाऊ लकड़ी और जानवरों का चारा मिलने लगे।


इस तरह हम समझ सकते हैं कि सूखे इलाकों के लोगों के जीवन की कई कठिन समस्याएं हैं और उनका निदान भी आसान नहीं है।



जंगल में बड़ी संख्या में भेड़ों को चरने देने के लिए ऐसी कोई व्यवस्था करनी होगी ताकि जंगल को नुकसान न हो। यह इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि आज राजस्थान के सैकड़ों भेड़पालक 15-20 लाख भेड़ों को लेकर अपने गांव पूरी तरह छोड़ चुके है। वे अब बरसात में भी वापस नही जाते क्योंकि कई सालों से सूखा पड़ रहा है। वे पूर्वी राजस्थान और मध्य प्रदेश के जंगलों और मध्य प्रदेश के खेतों के बीच घूमते रहते है।

भेड़पालकों के साथ अपनी यात्रा हम यही समाप्त करे। यात्रा उनके जीवन का नियम है। वे जहां रहते हैं, वहां के हालात उन्हें एक जगह बस कर नहीं रहने देते। इसीलिए उनका जीवन तुम्हारे यहां के लोगों के जीवन से इतना फर्क है।

ऊंट


रेगिस्तान का जहाज है ऊंट, यह तुमने जरूर पढ़ा होगा। कुछ लोग यह सोचते हैं कि ऊंट की कूबड़ में पानी भरा रहता है इसलिए ऊंट कई दिनों तक बिना पानी पीए रह लेता है। दरअसल ऊंट की कूबड़ में चर्बी जमा रहती है। जब ऊंट को अच्छा चारा मिलता है तब उसकी कूबड़ में चर्बी चढ़ जाती है। जब कड़की का समय आता है तो ऊंट इसी चर्बी को खर्च करता रहता है और दुबला हो जाता है। हमारे साथ भी यही बात होती है। यह जरूर है कि चर्बी में हाइड्रोजन के कण है जो सांस में ली गई ऑक्सीजन के साथ मिलकर पानी बन जाते हैं। ऊंट के गद्दीदार पैर भी रेत में धंसते नहीं हैं और रेत पर तेजी से जल पाते हैं। अच्छे ऊंट एक घंटे में 16 किलोमीटर तक चल लेते हैं।



सूखे में हरियाली लाने की कोशिश


मरुस्थल में सिंचाई


पश्चिमी राजस्थान में नदियां नहीं हैं। पर ठीक इसके उत्तर में पंजाब राज्य है। वहां सतलज, व्यास, रावी नदियों में साल भर काफी पानी रहता है। 1958 में सतलज नदी से 649 किलोमीटर लंबी नहर पहुंचाने की एक योजना शुरू हुई। यह राजस्थान नहर परियोजना है। इससे मरुस्थल के उत्तरी हिस्सों में सिंचाई होने लगी है। खासकर गंगानगर जिले में। यहां बिलकुल सूखे, रेतीले इलाके में साल भर नहर का पानी बहता है। इससे गंगासागर के सिंचित इलाकों को हुलिया ही बदल गया है।

यहां बाजरे की एक फसल की जगह साल में दो फसलें ली जाती है। गेहूं, चना, कपास, ग्वार, गन्ना, मूंगफली, जीरा, धनिया, मिर्च-कितनी फसलें ली जाने लगी है बीच रेगिस्तान में।

गंगानगर में पहले आबादी बहुत कम थी। नहर आने के बाद सरकार ने पंजाब-हरियाणा के कई किसानों को गंगानगर में बसाया। ये किसान सघन खेती करने में अनुभवी थे। राजस्थान के भी कई किसानों ने सिंचित सघन खेती अपनाई। साल भर सिंचित खेती के होने से, पशुपालन में कठिनाइयां आने लगी। हल व ट्रैक्टर से, सेवन घास उखाड़ दी गई। चारों ओर साल भर खेतों में फसल खड़ी रहती है, तो जानवर चराना मुश्किल हो गया। कई लोगों ने जानवर बेच डाले।

सिंचित खेती के कुछ ही सालों में ऐसी गंभीर समस्या खड़ी होने लगी। रेतीली जमीन में पानी देने से जमीन के नीचे पानी का स्तर ऊंचा होने लगा। यह इसलिए हुआ क्योंकि जमीन से सिर्फ 5 से 20 फीट की गहराई पर खड़िया मिट्टी की कड़ी परत थी। इस परत के ऊपर ही ऊपर नहरों से रिसा पानी इकट्ठा होने लगा और भूजल का स्तर उठने लगा। लगभग 500 वर्ग किलोमीटर का इलाका दलदल बन जाने की स्थिति में है और जमीन भी खारी होती जा रही है। इससे सिंचित खेती को बहुत खतरा है।

कई लोग का सुझाव है कि मरुस्थल में सिंचाई से खेती को बढ़ाने की अपेक्षा पशुपालन को ही बढ़ाना चाहिए। सिंचाई के पानी से घास, झाड़ियां आदि उगानी चाहिए। इससे दलदल की समस्या कम होगी और लोगों की जीविका का पुराना तरीका पशुपालन प्रगति करेगा। सरकार ने घोषणा भी की है कि अब मरुस्थल में नहर से चारागाहों का विकास करने पर जोर दिया जाएगा।

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