जिन ढूंढा तिन पाइंया

Submitted by birendrakrgupta on Sun, 01/19/2003 - 13:27
Source
रांची एक्सप्रेस, 19 जनवरी 2003
पानी बचाने, पानी के संरक्षण के छोटे-बड़े प्रयास झारखंड के सौकड़ों गांवों में देखने को मिल रहे हैं। स्थानीय पारिस्थितिकी, स्थानीय जरूरतों और परंपरागत ज्ञान पर ही पानी बचाने, पानी को सालों भर उपयोग में लाने की जुगत भिड़ाई गई है। गांव के लोग जानते हैं कि बड़ी परियोजनाएं तो सरकारी खजाने को भरने के लिए हैं, लेकिन पानी का खजाना तो बूंद-बूंद पानी को इकट्ठा करने से ही भरेगा, बढ़ेगा और संकट के समय काम आएगा।रांची। जिन ढूंढा तिन पाइंया। झारखंड के सैकड़ों गांवों के फौलादी इरादों वाले ग्रामीणों ने अंततः इसे साबित कर दिखाया। आखिर में गांव वाले ढूंढ क्या रहे थे? अपने खेत के लिए समय पर पानी, घर के दैनिक कार्यों के लिए पानी और समाज की आंखों में पानी। पलामू, लातेहार, गुमला और चाईबासा के सैकड़ों गांवों में घुमते हुए स्पष्ट दिखता है कि कैसे ग्रामीणों की पहल ने क्षेत्र का नक्शा ही बदल दिया है। इनकी पहल में न तो सरकारी संस्थाओं का विशेष सहयोग रहा और न ही दाता संस्थाओं का। बस कुछ था तो समुदाय की एकता की ताकत, सामुदायिक देशज ज्ञान और अपने बलबूते किस्मत बदलने का जज्बा। लगातार सूखे की आपदा और अकाल ने ग्रामीणों को सोचने को मजबूर किया। मानसून का तो कोई भरोसा नहीं है, कभी कम तो कभी ज्यादा। लेकिन एक बात तय है कि यदि बारिश के समय फालतू बहने वाले पानी को एकत्रित कर ली जाए तो संकट से उबरा जा सकता है। थोड़े समझदार लोगों ने यह ज्ञान समुदाय के बीच बांटना शुरू किया। पहले तो लोगों को समझ में नहीं आया कि पानी बचाया कैसे जाए? फिर जब दूसरे राज्यों के अनुभव बांटे जाने लगें तो लोगों की रुचि इसमें बढ़ी। फिर शीघ्र ही ग्रामीणों को इन प्रयासों के परिणाम भी दिखने लगे और एक गांव से यह कई गांवों में मुहिम के तौर पर चलने लगा।

लातेहार जिले के जालिम पंचायत में उदयपुरा पहाड़ी से नाला स्वतः बहता रहता है। वर्षों से पानी यूं ही बर्बाद होता रहा। 1992 में जब अकाल की चपेट में गांव आया तो लोगों में चेतना जगी और तय किया गया कि फालतू बहने वाले पानी को दिशा दी जाए, पानी को बचाया जाए। ग्रामीणों ने इस नाले को बांधा और आज सौ एकड़ से ज्यादा की खेती पर सूखा का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। ग्रामीणों ने अपनी उत्कृष्ट तकनीक का परिचय दिया और बिना किसी ऊर्जा के खरीना नाला के पानी को रोककर ऊपर चढ़ाया। पानी का ऊपर चढ़ाने के क्रम में ‘वीयर’ बनाया गया। ‘वीयर’ बरसात के दिनों में खुला रहता है, लेकिन गर्मी के दिनों में ग्रामीण इसे बांध देते हैं ताकि पानी खेत पर पहुंच जाए। लेकिन इतना करने के बाद संकट उत्पन्न हुई कि थोड़ी-थोड़ी अवधि में ‘वीयर’ में बालू आ जाता और पानी का जमाव घट जाता। इससे बचाव के लिए ग्रामीणों ने जगह-जगह ‘स्टोन बंडिंग’ की।

गांव के महावीर सिंह (55 वर्ष) बताते हैं नाले को बांधने के बाद कभी सूखा नहीं पड़ा। कमाने के लिए अब कोई बाहर नहीं जा रहा है। चौदह मन धान की खेती है। गरमा तथा भदई दोनों बोते हैं। रामतोराई, आलू, बैगन, गोभी सब कुछ अब ग्रामीण उपजा पा रहे हैं। वे बताते हैं कि औरंगा नदी इधर से गुजरती है, लेकिन इसकी जरूरत गांव के लोगों को चैनपुर प्रखंड के नेउरा पंचायत के टेमराई गांव में कभी राजाओं ने दर्जनों तालाबें बनवाई थी। राजा का शासन खत्म हुआ और राजाओं के लिए बने तालाब प्रजा के लिए हो गए। अब ग्रामीणों ने अपनी पहलकदमी से इसे पानी बचाने के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। बरसात के समय इन तालाबों में पानी जमा होते हैं और संकरी नालियों से पानी खेतों तक पहुंचते हैं। गांव के बाल किशुन राम बताते हैं तालाबों के रखरखाव से गांवों में खेत फिर से लहलहाने लगे हैं। टांड़ पर भी खेती शुरू हो गई है।

लातेहार के डोकी सिरिस में सूखा मुक्ति अभियान के तहत छोटे-छोटे बांध बने और दो सालों में अन्य सरकारी योजनाओं की तरह ही प्रशासन ने अपने हाथ खींच लिए। लेकिन अच्छे आगाज को लोगों ने पहचाना और अपने बलबूते अंजाम तक पहुंचाया। डैम में पानी आने लगा और पानी के वितरण की जिम्मेदारी ग्रामसभा ने ले ली। अब जिसे कितनी जरूरत पानी की होगी, ग्राम सभा की बैठकों में तय होते हैं। देखरेख के लिए मामूली-सी रकम ग्रामसभा के कोष में ग्रामीणों को जमा करना पड़ता है। ग्रामसभा अध्यक्ष रामानंदन उरांव बताते हैं कि पानी पंचायत के तहत बने दोनों बांधों से गांव के दो सौ एकड़ से ज्यादा खेतों तक लगभग सालोभर पानी पहुंच रहे हैं। वह बताते हैं कि हमारी कोशिश है कि बरसात के दिनों में ज्यादा से ज्यादा पानी एकत्रित कर ली जाए। इसे तालाबों, पोखरों तथा चुंआ के माध्यम से इकट्ठा करते हैं और फिर बांध तक पहुंचाते हैं। लेकिन गुमला जिले के विशुनपुर के सातों बांध की कहानी इतनी सीधी-सादी नहीं है। 1967 में भीषण अकाल के दौर में ग्रामीणों ने पहाड़ी नदी की धारा को मोड़कर गांव में लाने का बीड़ा उठाया। परिणाम कुछ आता इससे पहले ही बांध ढह गया। अलग-अलग लोग, अलग-अलग बातें। भूत-शैतान से लेकर ढेर सारी कहानियां गढ़ी गईं। भगत ने भी मुर्गा-दारू से लेकर खचिया (रुपए) तक का लाभ उठाया, लेकिन सातों बांध नहीं बंधा। गांव के बूढ़ों से बात कीजिए तो अब भी कई किस्से सुनाते मिल जाएंगे। 1955-86 में गांवों के कुछ उत्साही लोगों ने फिर से इस पहाड़ी नदी को बांधने की मुहिम छेड़ी। ग्रामीणों को लगा कि पानी है तो जिंदगी है और पानी तो सिर्फ और सिर्फ बरसात में ही है। इस क्षेत्र को जानने के बाद ग्रामीणों के श्रमदान और थोड़ी प्रशासनिक मदद से सातों बांध बन गया। स्वयंसेवी संस्था विकास भारती ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई तथा तकनीकी ज्ञान भी दिया। महज सवा तीन लाख रुपए में 225 फीट ऊंचा बांध तैयार हो गया। ग्रामीणों ने अपने चंदे से 2.40 लाख रुपए जुटाए और अब सातों 700 हेक्टेयर भूमि को सिंचित बना रहा है। सालों भर पानी मिलने के चलते धान, गेहूं के साथ-साथ सब्जी, दलहन, तिलहन भी ग्रामीण उपजा रहे हैं।

विशुनपुर प्रखंड के आधे किलोमीटर की दूरी पर बसे कुंबा टोली के ग्रामीण तीन सालों से ‘पानी अपने समीप’ लाने का अभियान चला रहे हैं। गांव के युवकों तथा अधेड़ लोगों का हर साल रोगजार की तालाश में पंजाब जाना और फिर खाली हाथ लौटना कुंबा टोली तथा रेहे गांव के लोगों के लिए दुःस्वप्न जैसा था। गरिझरिया नाले का पानी खेतों तक लाने के लिए ग्रामीण हर वृहस्पतिवार को श्रमदान करते हैं। दो वर्षों से श्रमदान का काम चल रहा है। बरसात के पहले तक पानी ‘अपने समीप’ आ जाएगा – हर ग्रामीण को यह पक्का भरोसा है।

पानी बचाने, पानी के संरक्षण के ऐसे छोटे-बड़े प्रयास झारखंड के सौकड़ों गांवों में देखने को मिल रहे हैं। स्थानीय पारिस्थितिकी, स्थानीय जरूरतों और परंपरागत ज्ञान पर ही पानी बचाने, पानी को सालों भर उपयोग में लाने की जुगत भिड़ाई गई है। गांव के लोग जानते हैं कि बड़ी परियोजनाएं तो सरकारी खजाने को भरने के लिए हैं, लेकिन पानी का खजाना तो बूंद-बूंद पानी को इकट्ठा करने से ही भरेगा, बढ़ेगा और संकट के समय काम आएगा।

(सीएसई मीडिया फैलोशिप के तहत प्रस्तुत आलेख)

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