कविता को कास के फूल जैसा होना चाहिए

Submitted by birendrakrgupta on Sun, 10/05/2014 - 16:50
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डेेली न्यूज एक्टिविस्ट, 5 अक्टूबर 2014
क्या कविता कास का वह फूल है, जो सपनों की तरह हर साल उगता है और झर जाता है। क्या कविता दामोदर पर बना बांस का कोई पुल है। अपनी तकलीफों को अपना प्रारब्ध मान बैठा यह जन कैसे कास के फूलों और बांस के पुलों के सहारे जीवन की लड़ाइयां लड़ता है। जीवन की लड़ाइयों में मनुष्य और प्रकृति का आपसी रिश्ता बड़ा अजीब है। धरती की छाती में दूध उतरता है तो कास के फूल खिलते हैं। धानी चूनर दूध के फेन से भींग उठती है। यह शाश्वत कविता है। कविता को कास फूल जैसा होना चाहिए। वह समय के बदलने की गवाही में हरदम खड़ी हो। निर्लिप्त-सी। लेकिन निडर.. यह शरद काल है। ऋतु परिवर्तन का संकेतक। यह ऋतुओं का संधिकाल है। बरसात का मौसम विदा ले रहा है। भोर का तापमान शीत के आगमन का आभास दे रहा है। कास के फूल धान के खेतों के बीच ऐसे दिखते हैं, मानो हरी धरती की मांग किसी ने सफेद फूलों से भर दी हो। यह क्वार का महीना है। क्वार यानी आश्विन। इन दिनों सुबह बड़ी सुहावनी लगती है और शाम का मिजाज भी खुशगवार होता है। दोपहर लेकिन बेरहम होती है। गर्म और उमस भरी।

कुछ दिनों पहले तक जिन कास के फूलों का ऐश्वर्य लुभाता था, वे अब अपना वैभव खोते दिख रहे हैं। एक बच्चा अपने पिता से कहता है, मुझे एक कास फूल ला दो। हवा के गर्म थपेड़ों से कास फूल से सफेद रेशे बिखर कर उड़ रहे हैं हवा में। जैसे सपने बिखर रहे हों। अपने फूलों के बिना यह पौधा कितना उदास लगेगा। यह टाकीपुर स्टेशन है। तारकेश्वर और आरामबाग के बीच। पिछले दिनों तारकेश्वर से आरामबाग के बीच सिंगल लाइन की रेल सेवा शुरू हुई। यह स्टेशन काफी ऊंचाई पर है। खेतों के बीच से रेल की पटरी गुजरती है। धान के खेत हैं दोनों ओर। कुछ खेतों में फसल पककर तैयार हो चुकी है। कटे हुए धान खेतों में पड़े हुए हैं।

इसी इलाके से होकर गुजरती है दामोदर। कुछ एक किलोमीटर की दूरी पर है कनारिया घाट। दामोदर के रेतीले तट पर कुछ दिन पहले तक जो कास के फूलों का लहकता हुआ-सा मंजर था, वह अब किसी वृद्ध के केश की तरह निस्तेज दिख रहा है। दामोदर से रेत निकाली जा रही है। स्थानीय ठेकेदार पंचायतों को कुछ रकम देकर रेत निकालते और बेचते हैं। कतार में खड़े ट्रक अपने भरे जाने का इंतजार कर रहे हैं। अमीरों के मकानों में दामोदर का अवदान दर्ज हो रहा है। निकटवर्ती क्षेत्र अक्सर बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। आखिरकार दामोदर शोक का दूसरा नाम जो ठहरा। आलू और धान उगाने वाले किसान मुआवजे के लिए सरकारी घोषणाओं की राह तकते हैं। उनकी फसलें डूब जाती हैं। कई बार तो घरों के भीतर तक पानी चला जाता है।

इधर एक अच्छी बात यह हो रही है कि जागरूक किसान सहकारी समितियों के मार्फत फसलों का बीमा करवा रहे हैं। इस साल बारिश ज्यादा नहीं हुई, सो बाढ़ की स्थिति नहीं पेश आई। दामोदर की गहराई अधिक नहीं है इस क्षेत्र में। बाढ़ इन इलाकों में अमूमन बांंध से छोड़े गए पानी के कारण आती है। मैंने पानी उतरने के बाद इस इलाके के घरों की दीवारों पर पानी के चढ़ने के निशान देखे हैं। प्राकृतिक दुर्योग कहा जाता है, लेकिन प्राकृतिक उतना है नहीं। ऊपरी इलाकों में जलस्तर बढ़ता है, तब वे बांध का गेट खोल देते हैं। दुर्गापुर में डीवीसी बैराज के गेट से गिरते पानी को देख रूह कांप उठती है। हाथी तक सामने आ जाए तो चींटी की तरह बह जाएगा। इलाके के लोग इसे अपना भाग्य मान बैठे हैं। इनके जीवन का संघर्ष अलग किस्म का है। सड़कें बाढ़ में टूट जाती हैं। पुल गिर जाते हैं। कई जगहों पर आज भी बांस और लकड़ी के पुल बने हुए हैं। प्रकृति मनुष्य की सहचरी रही है तो सबसे बड़ी चुनौती भी प्रकृति ही रही है। एक नदी पर बांस के पुल की अमूमन कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन कितने करीने से यहां के लोग बांस के पुल बना लेते हैं। शाल वन की लकड़ियों और बांसों से बना पुल। जिस पर से दोपहिया वाहन बड़े आराम से चला जाता है। ये इसे सांको कहते हैं। मनुष्य की अदम्य जिजीविषा के साक्षी हैं ये। और हैं एक मुकम्मल कविता भी। पूरे छंद में। पूरी लय में। जीवन का पूरा संगीत लिए।

मैं टाकीपुर स्टेशन पर खड़ा सोच रहा हूं कि कविता इन लोगों के लिए किस तरह मददगार हो सकती है। क्या कविता कास का वह फूल है, जो सपनों की तरह हर साल उगता है और झर जाता है। क्या कविता दामोदर पर बना बांस का कोई पुल है। अपनी तकलीफों को अपना प्रारब्ध मान बैठा यह जन कैसे कास के फूलों और बांस के पुलों के सहारे जीवन की लड़ाइयां लड़ता है। जीवन की लड़ाइयों में मनुष्य और प्रकृति का आपसी रिश्ता बड़ा अजीब है। प्रकृति मातृरूप है। शरद ऋतु का उत्सव प्रकृति का ही उत्सव है। ऋतुओं का क्रम चलता रहता है। और उत्सव भी। उल्लास भी। मानव सभ्यता अपने मूल स्वभाव में मातृपूजक है। ये मातृरूप प्रकृति के ही विविध रूप हैं।

कास के फूल भी हर साल खिलते हैं। इन फूलों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि महीना अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से सितंबर है या फिर अक्टूबर। ये तो अपनी एक स्वाभाविक गति से ऋतुचक्र का अनुसरण करते हैं। यह ठीक है कि कोई एलोकेशी सुंदरी इन फूलों को अपने बालों में नहीं लगाती, लेकिन सच यह भी है कि ये न हों तो ढाकियों के ढोल ही न सजें। स्टेशनों पर विजयादशमी के ठीक पहले ढाकी इन्हीं कास के फूलों को अपने ढोल में बांधकर टन-टन-टन-टन धड़ाम-धड़ाम धम-धम-धम का नाद करते हैं। यह शारदोत्सव की पूर्व सूचना होती है। विजय पर्व का उद्घोष। आयोजक अपनी पसंद के ढाकी चुनते हैं तो कास के फूल भी चुपचाप पूजा में शामिल हो लेते हैं। पितृपक्ष में पितरों के स्मरण के साक्षी बनते हैं ये कास फूल और महालया के बाद देवी दुर्गा के आगमन के लिए मचल-मचल उठते हैं। ये फूल किसी बुजुर्ग की तरह खेतों के बीच खड़े अपने घर-परिवार के सकुशल लौट आने के लिए प्रार्थना करते हैं। यह गांव-देहात से शहरों में मेहनत मजदूरी के लिए गए जवानों के घर लौटने का समय है। ट्रेनों में इस समय भीड़ बहुत है।

घरों को लौटते अपने लोगों को देखकर ये कास के फूल जैसे हाथ हिला रहे हों।

धरती की छाती में दूध उतरता है तो कास के फूल खिलते हैं। धानी चूनर दूध के फेन से भींग उठती है। यह शाश्वत कविता है। कविता को कास जैसा होना चाहिए। वह समय के बदलने की गवाही में हरदम खड़ी हो। निर्लिप्त-सी। लेकिन निडर।

ई-मेल : neel.kamal1710@gmail.com

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