नदी जो रोजी-रोटी थी

Submitted by HindiWater on Sun, 05/18/2014 - 14:37
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मैं जब गांव से लौटने लगा तो नदी सूखी थी। कुछ डबरे भरे हुए थे उनमें ही लोग मछली पकड़ रहे थे। नदी के किनारे ही परसवाड़ा गांव है, जहां बड़ी आबादी बरौआ कहार समुदाय की है, यह समुदाय तो नदी पर ही निर्भर है। वे नदी में मछली पकड़ते थे और उसकी रेत में तरबूज-खरबूज की खेती करते थे। लेकिन अब नदी सूखने से यह काम नहीं कर पा रहे हैं। दुपहरी का समय था। सूरज की तेज गरमी से बचते-बचाते मैं पड़रिया गांव पहुंचा। वहां बच्चे पेड़ के नीचे खेल रहे थे। गांव के कुछ लोग नदी में जाल डालने के लिए तैयारी कर रहे थे। हालांकि नदी में पानी नहीं है, धार टूट चुकी है।

नदी का धर्म बहना है लेकिन सिर्फ यहां-वहां डबरे भरे हुए हैं, उसी में मछली पकड़ते हैं। कभी यह दुधी नदी सदानीरा हुआ करती थी। यहां एक झरना था, अब वह भी सूख गया है।

मैं जब वहां पहुंचा तो थोड़ी देर में बहुत से लोग वहां जमा हो गए। उमेदी बाई और उसके घर के सदस्य, फुल्लू और लछमन और भी बहुत से। थोड़ी देर में वे खुल गए और अपने दुख-दर्द बांटन लगे। एक के बाद एक समस्या गिनाने लगे- यहां काम नहीं मिलता। पहले के काम-धंधे सब खत्म हो गए। स्कूल अच्छे से नहीं चलता। इलाज की कोई सुविधा आसपास नहीं है और माल्हनवाड़ा और बनखेड़ी में है तो बहुत महंगा है। जंगल से जो निस्तार होता था, वह नहीं होता। जंगल कट गए।

उमेदी बाई कहने लगी कि हमारे पास कोई काम नहीं है। उसका लड़का चमन भी खाली रहता है, बेकाम है। अगर कोई काम मिल जाए तब तो पेट चलेगा। उसे कोई सरकारी जमीन भी नहीं मिली। कुछ बकरिया भर हैं, उनसे गुजारा कैसे चलेगा?

होशंगाबाद के पूर्वी छोर पर स्थित बनखेड़ी तहसील का यह गांव है पड़रिया। दुधी नदी के पार बसा यह गांव भौगोलिक रूप से नरसिंहपुर जिले में है, लेकिन प्रशासनिक रूप से होशंगाबाद जिले में आता है। दुधी नदी ही होशंगाबाद और नरसिंहपुर जिले की सीमा रेखा है।

इस छोटे गांव में अधिकांश रज्झर हैं। पिपरिया-जबलपुर मार्ग से उत्तर की ओर करीब 10 किलोमीटर दूर यह गांव है। बनखेड़ी से करीब 15 किलोमीटर दूर।ग्रामीण बताते हैं उनकी माली हालत अच्छी नहीं है। 5वीं तक स्कूल है, पर गांव के बच्चे आगे नहीं पढ़ पाते। यहां अधिकांश लोगों के पास जमीन नहीं है, कुछ के पास थोड़ी बहुत है।

पहले यह समुदाय अनुसूचित जाति में शामिल था, अब इसे पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया है। ग्रामीण कहते हैं जो थोड़ी बहुत सुविधाएं मिल रही थी वह भी अब नहीं मिलती। पहले कुछ लोगों को सरकारी जमीन भी मिली थी।

यहां का फुल्लू रज्झर कहता है कि हमें अपनी गुजर बसर के लिए जमीन चाहिए। हमें आदिवासियों की तरह सुविधाएं मिलनी चाहिए। रज्झरों को आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) वर्ग में शामिल होना चाहिए। वह कहता है उसके परिवार को पहले कुछ जमीन मिली भी लेकिन दूसरे परिवारों को नहीं मिली।

इस इलाके में पिछले कुछ सालों से आधुनिक खेती की जा रही है। पहले परंपरागत ढंग से हल-बक्खर की खेती होती थी। जब यह लेखक इस गांव में गया तो खेतों में ट्रैक्टर से बखरनी होती देखी।

यहां की उमेदी कहती हैं कि मैंने यहां लाख की खेती होती देखी है। उसे पता है कि लाख की चूड़ियां बनती हैं। लेकिन महंगी होने के कारण उसने कभी नहीं पहनी। वह कहती है कि अब कोसम के पेड़ ही नहीं बचे। सब कट गए। जो हैं वे भी सूख रहे हैं।

वह कहती है कि पहले कभी नदी हमारे गांव के पास से बहती थी, अब छिटककर दूर चली गई। नदी में हम मच्छी मारते थे। अब नदी में पानी ही नहीं है तो मच्छी कहां से मारे। फुल्लु ने कहा मच्छी तो अब भी खाते हैं लेकिन बाजार से लाना पड़ता है। इस नदी में तरबूज-खरबूज की अच्छी खेेती होती थी। उसे बरौआ समाज के लोग करते थे। रज्झर इसमें मछली पकड़कर अपनी गुजर करते थे। अब नदी में रेत ही रेत है। वह रेत भी अब उठाई जा रही है।

भूमिहीन रज्झर और छोटे किसान रज्झर अब अपनी रोजी-रोटी के लिए दिहाड़ी और बटाई का काम करते हैं। कुछ के पास बकरी, मुर्गी और मवेशी भी हैं। आसपास के गांव के किसानों के खेतों में मजदूरी और बटाई करते हैं। खेतों में मजदूरी मौसमी होती है जब खेतों में बौनी या कटाई का काम होता है। कटाई के समय ज्यादा काम मिलता है लेकिन साल भर काम नहीं मिलता।

मैं जब गांव से लौटने लगा तो नदी सूखी थी। कुछ डबरे भरे हुए थे उनमें ही लोग मछली पकड़ रहे थे। नदी के किनारे ही परसवाड़ा गांव है, जहां बड़ी आबादी बरौआ कहार समुदाय की है, यह समुदाय तो नदी पर ही निर्भर है। वे नदी में मछली पकड़ते थे और उसकी रेत में तरबूज-खरबूज की खेती करते थे। लेकिन अब नदी सूखने से यह काम नहीं कर पा रहे हैं।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है जो समुदाय पहले नदी पर आश्रित थे अब केवल मजदूरी कर रहे हैं। उनके पारंपरिक रोजगार कम हो गए हैं या खत्म हो गए हैं। नदी सूख गई है जो उनके पोषण का स्रोत थी। उनकी रोजी-रोटी जो नदी से चलती थी, अब नदी ही नहीं है तो कैसे चलेगी?

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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About the author

बाबा मायारामबाबा मायारामबाबा मायाराम लोकनीति नेटवर्क के सदस्य हैं। वे स्वतंत्र पत्रकार व शोधकर्ता हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से 1989 में बी.ए. स्नातक और वर्ष 2000 में एल.एल.बी.

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