बाढ़ के बाद बेबस हुए लोग

Submitted by HindiWater on Thu, 10/30/2014 - 14:57
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चरखा फीचर्स, अक्टूबर 2014
बाढ़ के बाद इस गांव में लोगों को आजीविका के साधन जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस गांव के ज्यादातर लोगों का पेषा खेतीबाड़ी या मजदूरी है। बाढ़ ने खेती-बाड़ी को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। लिहाजा खेती-बाड़ी के बर्बाद होने से लोगों के पास आजीविका का कोई दूसरा साधन नहीं बचा हैं। लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि वह अपने सर पर छत के साए का इंतजाम करें या पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी का। बाढ़ के बाद अभिभावकों को अपने बच्चों को पालना, उनकी पढ़ाई-लिखाई और उनके लिए आजीविका के साधन जुटाना एक बड़ी चुनौती हो गया है। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के बाद अब जम्मू एवं कश्मीर राज्य में भी सियासी पारा अपने चरम पर है। निर्वाचन आयोग ने राज्य में 5 चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए अधिसूचना जारी कर दी है। राज्य की 15 विधानसभा सीटों पर 25 नवंबर को मतदान होगा।

सीमावर्ती जिले पुंछ में भी सियासी पारा अपने चरम पर है। राज्य में विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद जिले के सभी राजनेताओं ने जनता से लोक लुभावन वाले वादे करने शुरू कर दिए हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि बाढ़ के कारण जिले में जो जबरदस्त तबाही और बर्बादी हुई थी, उस समय इन असहज लोगों की मदद के लिए कोई आगे क्यों नहीं आया? जिले में आई बाढ़ ने मंडी तहसील के सलोनियां में भी जबरदस्त तबाही मचाई। इस बाढ़ में न जाने कितने लोग घायल हुए और न जाने कितनों ने अपने घर-बार खोए।

सलोनिया गांव में तकरीबन दो किलोमीटर जमीन खिसकने सेे आठ घर पूरी तरह बर्बाद हो गए और कुछ घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए। गांव के स्थानीय निवासी शौकत हुसैन (24)के पिता गुलाम हुसैन और उनके चाचा मोहम्मद शफी अपनी जमीन में से पानी को निकाल रहे थे कि अचानक पहाड़ के उपरी हिस्से से ज़मीन खिसक गई और दोनों की मौत हो गई। पिता और चाचा की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी शौकत हुसैन के कंधो पर आ गई है। शौकत हुसैन 12वीं कक्षा के छात्र हैं और अब पढ़ाई के साथ-साथ मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं।

शौकत हुसैन के परिवार में 16 सदस्य हैं जिनमें उनकी 6 बहने और अपने दो बच्चे हैं। यह सभी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। पिता के देहांत के बाद यह अपनी आगे की पढ़ाई कर पाएंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। उन्होंने आगे बताया कि मैं मजदूरी करके रोजाना 2 सौ रुपए प्रतिदिन कमाता हूं। मुझे समझ में नहीं आ पा रहा है कि मैं 2 सौ रुपए में अपने इतने बड़े परिवार का भरण-शोषण कैसे करूं।

घरों के पूर्ण या आंशिक रूप से बर्बाद हो जाने के बाद इस गांव के प्रभावित लोगों के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं बचा हैं। बाढ़ की वजह से जिले में कुल 818 पक्के घर जबकि 8,412 कच्चे घरों को पूर्ण या आंशिक से नुकसान पहुंचा है। सर्दी का मौसम आने को हैं ऐसे में इस गांव के लोगों के पास सर पर छत का कोई साया नहीं है। सलोनियां के लोगों को बाढ़ के बाद तहसीलदार मंडी ने टैंट तो दिए मगर टैंट गाड़ने के लिए खंबे नहीं दिए। लिहाज़ा गांव के लोगों को टैंट का भी कोई खास फायदा नहीं हुआ।

इस बारे में गांव के स्थानीय निवासी अब्दुल हमीद (56) का कहना है कि सरकार ने किसी भी किस्म का मुआवजा अभी तक हम लोगों को पूर्ण या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मकानों के लिए नहीं दिया है। हम लोगों के पास दोबारा घर के निर्माण के लिए लकड़ी का बंदोबस्त भी नहीं है और न ही हम दोबारा लकड़ी खरीदकर मकान का निर्माण कर सकते हैं। उन्होंने आगे बताया कि आठ मकान इस गांव में ऐसे हैं जोकि पूरी तरह गिर गए हैं और हर मकान को दोबारा निर्माण करने के लिए तकरीबन 5 लाख रुपए जबकि अस्थायी मकान के निर्माण के लिए दो लाख की जरूरत है।

ऐसे में समझ में नहीं आ रहा है कि जिन लोगों के सर पर छत का साया नहीं है वह सर्दी और बर्फबारी के मौसम में कैसे रहेंगे। सर्दी के मौसम से पहले लोगों को सर पर छत, कंबल, गर्म कपड़े और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की सख्त जरूरत है। सरकार को इस ओर संजीदगी से ध्यान देने की जरूरत है।

बाढ़ के बाद इस गांव में लोगों को आजीविका के साधन जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस गांव के ज्यादातर लोगों का पेषा खेतीबाड़ी या मजदूरी है। बाढ़ ने खेती-बाड़ी को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। लिहाजा खेती-बाड़ी के बर्बाद होने से लोगों के पास आजीविका का कोई दूसरा साधन नहीं बचा हैं। लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि वह अपने सर पर छत के साए का इंतजाम करें या पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी का। बाढ़ के बाद अभिभावकों को अपने बच्चों को पालना, उनकी पढ़ाई-लिखाई और उनके लिए आजीविका के साधन जुटाना एक बड़ी चुनौती हो गया है।

बाढ़ से क्षति के बारे में गांव के स्थानीय निवासी गुलाम हुसैन कहते हैं कि इस गांव में कोई भी परिवार ऐसा नहीं हैं जो बाढ़ के प्रकोप से बच पाया हो। उन्होंने बताया कि बाढ़ से सबसे ज्यादा नुकसान छात्र-छात्राओं को हुआ है क्योंकि घरों के पूर्ण या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त होने से बच्चों का भविष्य अंधकार में डूब गया है। उन्होंने आगे बताया कि गांव के हर परिवार का कुछ-न-कुछ नुकसान जरूर हुआ है।

किसी का घर क्षतिग्रस्त हुआ, किसी की खेती बाड़ी बर्बाद हुई, किसी की जान गई तो किसी को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचा है। इस बारे में गांव के एक और स्थानीय निवासी गुलाम दीन कहते हैं कि सलोनियां में बाढ़ की वजह के बाद बिजली की हालत काफी खस्ताहाल हो गई है। बाढ़ से पहले बिजली के दीदार तो हो जाते थे लेकिन अब वह भी नहीं होते। बिजली की खस्ताहाली की वजह से बच्चे रात को पढ़ नहीं पाते हैं।

इस बार के विधानसभा चुनाव में यहां के लोगों को ऐसे प्रत्याशी को सत्ता की कमान सौंपनी होगी जो बाढ़ के बाद जिले में हुए नुकसान की भरपाई के साथ-साथ जिले के चहुमूखी विकास की बात करे। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि चुनाव के बाद पुंछ का विकास होगा या नहीं, लेकिन फिलहाल तो उम्मीद की किरन के साथ यहां के लोग जिंदगी के सफर में आगे बढ़ रहे हैं।

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