जंगल से गुफ्तगु और थकान की ताजगी

Submitted by HindiWater on Sat, 11/01/2014 - 10:02
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, अक्टूबर 2014

विविधता में एकता को किसी भी जंगल में पाया जा सकता है। आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम स्वयं से संवाद नहीं कर पा रहे हैं। जंगल का मौन इस संवाद को मूर्तरूप देने में हमारी मदद करता है। जंगल की नीरवता में हमारे भीतर की रचनात्मक ऊर्जा हमें संवाद करने में सक्षम बनाती है और हम एक बने-बनाए ढर्रे से बाहर निकल कर अपना कल्पनालोक सृजित करने को तत्पर होते हैं।

सोचिए, आस-पास जब शोर नहीं होता, तो हमें डर क्यों लगता है? सन्नाटे और शांति में, जमीन-आसमान का अंतर होता है। हमारे भीतर भरा शोर हमें चेतना से दूर हटाता है। वह हमें शांति से भी डरना सिखाता है। वैसे जंगल अकेलेपन का अहसास पैदा करता है। वहीं दूसरी तरफ खुद को देखना, खुद से बात करना और खुद में झांकना भी तो डराता है।

पिछले दिनों मैने नेपाल में बिलकुल अनछुए से जंगल देखे। हिमालय के करीबी रिश्तेदार पहाड़ों पर बसे ये जंगल इस बात का भी प्रमाण हैं कि प्राप्त अभय उन्हें कितना विशाल, भव्य और आभावान बना सकता है। शुरू में उनकी सघनता से मेरा संघर्ष होता रहा क्योंकि मैं उनके भीतर झांकने की कोशिश जो कर रहा था। जबकि वो तो सूरज को भी अपने अंदर झांकने नहीं देते तो मेरी नजरों को भला कैसे भीतर जाने देते? फिर भी उनकी नजर बचाकर मैं चुपके से उनके भीतर चला गया।

वहां मौजूद हर दरख्त अपने आप में एक पूरा परिवेश ही था। कोई भी पेड़ अकेला नहीं था। किसी पर छोटे पत्तों की, तो किसी पर बड़े पत्तों वाली बेलें लिपटी थीं। टूटी हुई बड़ी डगालों में बने गड्ढों में कोई और सहजीवी बस गया था। किसी भी पेड़ ने उन्हें अपने पर बसने से रोका नहीं और न ही उनका रंग या जाति पूछी। उन पर चढ़ी काई की मोटी परत मुझे उनकी उम्र का अहसास करा रही थी। यह काई पेड़ का शृंगार है।

घोंघे, इल्लियां और मकड़ी उन्हें गुदगुदाते रहते हैं। जब वे उसके पत्ते भी खा लेते हैं तो वह उनके लिए नए पत्ते ले आता है। कहते हैं कि काई बीमारी का घर होती, तो जंगल खड़ा कैसे है? उसे तो सूख जाना चाहिए था। वहीं अधूरी खाकर छोड़ी गई पत्तियां ठीक वैसे ही दिख रही थीं, जैसे हमारे बच्चे आधा खाना खाकर छोड़ देते हैं।

जंगल का मतलब केवल शेर, चीते या भालू जैसे जानवर भर नहीं है। घने जंगल की झाड़ियों में जंगली मुर्गों की अचानक हुई हलचल ने मुझे बड़े जानवर जितना ही चौंकाया था।

बेहिसाब पंछी, कुकुरमुत्ते, मकड़ियां, इल्लियां, घोंघे, काई, घास, मिट्टी, पत्थर, पेड़-पौधे, जमीन से बाहर निकल आई जड़ें, झींगुर, ऊंचाई और गहराई, टुकड़ों में धूप और कुछ टुकड़े छांव, नमी के साथ टहलती हवा, सन्नाटे के बीच तेज आवाजें और वहां रहने वाले इंसान, ये सब मिलकर जंगल की दुनिया बनाते और बसाते हैं।

मेरे पहुंचने से पहले ही जैसे वहां कोई आया था जो हर पत्ती, तने और घास के एक-एक तिनके को धो-पोंछ कर चमका गया था। उससे बहुत पहले कोई और भी यहां आया था जो पत्थरों को सुन्दर-सुन्दर आकार दे गया था। कोई पत्थर गोल, कोई तिकोन, चतुष्कोण, और कोई तो पता नहीं कितने कोण का था।

यहां मुझे समझ आया कि गोलाई भी एक सी नहीं होती। यहीं पर मुझे यह भी पता चला कि किताबों में दिए आकारों से अलग तमाम ऐसे आकार होते हैं जिन्हें आप कोई नाम नहीं दे सकते।

हरा कोई एक ही रंग नहीं है। इसकी विविधता का अंदाजा पोखरा से बाग्लुंग के बीच 80 किलोमीटर के पहाड़ चढ़ते हुए हो जाता है। इनकी गणना कर पाना भी संभव नहीं था। बिलकुल हल्का हरा, काई का चमकदार हरा, उत्तिस और साल का गहरा हरा और भी कई। पत्थर के आकारों की ही तरह हर रंग का अलग नाम नहीं हो सकता।

कहीं कोई सीमा नहीं दिखती। ठीक एक ही जमीन से दो अलग-अलग किस्म के पेड़ उगे और बढ़ते चले गए। उनमें कहीं कोई सियासत भी नहीं दिखती। सिर्फ उनके होने का अहसास दीखता है।

यह समझ में भी आया कि अकेले होना संभव ही नहीं है। वहां आकार से कुछ भी तय नहीं होता। मैंने तो अपनी नजरों से ही इन अनछुए जंगलों को छुआ था। छूकर इन्हें पूरा महसूस कर पाना भी संभव नहीं है। सूंघने की अपनी आदत हजारों गंध को खोज रही थी, पर वहां तो पूरा जंगल ही अपने आप में एक परिचित गंध बन चुका था। हर कोने में और हर पगडंडी पर जंगल की एक नई सुगंध मिली।

जब भी किसी पेड़ के करीब गया, तो कोई नई गंध का अहसास हुआ। भिन्नता के चलते ही तो सबका एक स्वतंत्र अस्तित्व है, और दूसरी तरफ एक पूरा जंगल है, जिसमें कोई भी अस्तित्व स्वतंत्र नहीं होता। लेकिन दोनों में कोई विरोधाभास नहीं है। लोग तो कहते हैं कि कुछ पेड़ जहरीले होते हैं? क्या सचमुच? जो दरख्त अपनी उम्र जी चुके थे उन्हें कीड़े, घोंघे, चीटियां, पानी और मिट्टी एक साथ मिलकर अनंत में विलीन कर रहे थे। शायद उनका रूपांतरण हो रहा था।

मैं जंगल से थोड़ा निकलकर अपनी हिसाबी-किताबी दुनिया पहुंचा तो हिसाब लगाया कि यहां पांच तरह के वन हैं। सदाबहार शंकुधारी वन, जिनके वृक्ष बहुत बड़े हैं और ये समुद्र तल से 1850 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ों में पाए जाते हैं। मिश्रित वन, इसमें चिलौं, कटुस और उत्तिस प्रजाति के पेड़ हैं, जो समुद्र तल से 1220 से 1850 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। ये अब खतरे में हैं, क्योंकि इन्हें मार कर लोग घरों में सजाने के लिए उपयोग में लाते हैं। तीसरे वन हैं, मानसून वाले, ये समुद्र तल से 712 से 1219 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं।

इनमें साल, सिमल, बार, पीपल सरीखे पेड़ हैं। चौथे वन हैं झाड़ीदार वन, जिनमें छोटी पत्ती और फूलों वाले छोटे पेड़ होते हैं। पांचवे वन हैं जल धारा या नदी के करीबी वन। ये खास तौर पर नदियों या किन्ही जलधाराओं के पास ही पाए जाते हैं। इस श्रेणियों में 31 तरह की प्रमुख प्रजातियां हैं। इनके अलावा 11 तरह की घास और खरपतवार भी यहां हैं। 2 सेंटीमीटर से लेकर 80 फुट लंबे पेड़ों-वनस्पतियों के बीच यह जंगल बिलकुल बराबरी में बंटा हुआ है। मैं इस विविधता में दिखती समरसता पर भौचक था।

भालू, हिरण, ऊदबिलाव, तेंदुआ, साही, लोमड़ी, जंगली छिपकली समेत 21 तरह के स्तनधारी जंगली जानवर इस दुनिया के निवासी हैं। अलग रंग और प्रकृति के 21 तरह के पंछी भी यहां रहते हैं। पेड़ों और जानवरों में हमारी तरह जातियां नहीं, बल्कि प्रजातियां होती हैं। पर गणना का मेरा यह गणित शायद बहुत सटीक नहीं है।

अपना सब कुछ भूले बिना जंगल से संवाद असंभव है। मैं अभी संख्या और गणित से पूरा बाहर नहीं आ पा रहा था। दिमाग से कचरा हटाए बिना यह महसूस कर पाना भी असंभव है कि जंगल निर्जीव नहीं होते। इसीलिए तो वह मुझमें चेतना भर पा रहे थे। पहाड़ के फेफड़े शायद मेरे भीतर समा गए थे। तभी तो मैं इस थका देने वाले सफर के बाद पहले से ज्यादा तरोताजा महसूस कर रहा था।

पहाड़, नदी और समाज का अटूट रिश्ता


जंगल केवल जमीन के ऊपर ही नहीं होता बल्कि जमीन के भीतर भी उतना ही घना और गहरा फैला होता है। जड़ें जमीन के अंदर फैल कर मिट्टी को थाम लेती हैं। यह छोटे-छोटे कण मिलकर मिट्टी को एक आधार बना लेते हैं। यह जड़ें ही इसे नदी में बह जाने से बचा लेती हैं। जंगल मूसलाधार और कभी-कभी कई दिनों तक होने वाली बारिश को भी अपने भीतर थाम लेता है। लंबी यात्रा करके यह नदी भारत के बिहार राज्य के हरिहर क्षेत्र में गंगा नदी में मिल जाती है। गंगा जो उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में दूषित और बीमार होकर यहां पहुंचती है गंडक से मिलकर स्वस्थ्य होकर पुनर्जीवन पा जाती है।

नेपाल का धौलागिरी अंचल, अन्नपूर्णा पर्वत का आधार है। यह प्रकृति और मानव समाज को समझने के लिए सबसे उम्दा विश्वविद्यालय है। धौलागिरी शब्द की उत्पत्ति “धवल” से हुई है, जिसका मतलब होता है बहुत चमकीला सफेद तथा “गिरी” यानि पर्वत। धौलागिरी पर्वत दुनिया का सातवां सबसे ऊंचा पर्वत है। इसकी ऊंचाई 8167 मीटर है। इसे एक अंचल भी माना जाता है, जिसमें नेपाल के चार जिले शामिल हैं। बाग्लुंग इनमें से एक है।

हिमालयी पहाड़ों के हिमखंडों से निकल कर काली गंडक नदी अपनी पूरी तीव्रता से प्रवाहित हो रही है। जंगल और नदी के रिश्ते हमें समझा रहे हैं कि वे संसार को बनाए रखना चाहते हैं। जब तक कोई जंगल पर आक्रमण करके उनका विनाश नहीं कर देता तब तक नदी अपना रास्ता नहीं बदलती।

यूं तो जंगल केवल जमीन के ऊपर ही नहीं होता बल्कि जमीन के भीतर भी उतना ही घना और गहरा फैला होता है। जड़ें जमीन के अंदर फैल कर मिट्टी को थाम लेती हैं। यह छोटे-छोटे कण मिलकर मिट्टी को एक आधार बना लेते हैं। यह जड़ें ही इसे नदी में बह जाने से बचा लेती हैं। जंगल मूसलाधार और कभी-कभी कई दिनों तक होने वाली बारिश को भी अपने भीतर थाम लेता है।

लंबी यात्रा करके यह नदी भारत के बिहार राज्य के हरिहर क्षेत्र (सोनपुर) में गंगा नदी में मिल जाती है। गंगा जो उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में दूषित और बीमार होकर यहां पहुंचती है गंडक से मिलकर स्वस्थ्य होकर पुनर्जीवन पा जाती है। इस नदी को अब तक बांधा नहीं गया है। दुखद यह है कि भारत सरकार अब नेपाल को इस बात के लिए प्रेरित कर रही है कि वह गंडक सरीखी नदियों पर बांध बनाए और बिजली पैदा करे। इससे हिमालय के पहाड़ कमजोर होंगे और प्राकृतिक आपदाएं भी आएंगी।

दूसरी तरफ पहाड़ों में बसे जंगल एक योजना बनाकर कोने-कोने में रात भर हुई बारिश की बूंदों को समेटे ले रहे थे। कितनी व्यवस्थित है प्रकृति। जब तक आसमान का पानी जमीन से नहीं टकराता, तब तक वह बूंद बना रहता है। जमीन उसका रूप, आकार और प्रभाव बदलकर उसे धारा में बदल देती है। पता नहीं इन पहाड़ों का पेट कितना बड़ा है, जो बूंदों को धारा तो बना देता है, पर बाढ़ बनने से रोक देता है।

धौलागिरी हिमालयी पहाड़ों से ये धाराएं निकलकर काली गंडक नदी में समा जाती हैं। इसे एक धारा कहें या एक नदी, यह इंसान जानवरों, पेड़ों, पक्षियों, सरीसृपों, मछलियों और सूरज को उनका हिस्सा देती हुई चलती है। कोई उससे उसका प्रवाह, उसकी निर्मलता, उसकी तरलता छीनने की कोशिश नहीं करता। उन्हें पता है, नदी के होने से जंगल है और जंगल के होने से नदी और पहाड़।

ये दीगर बात है कि इंसान नदी से भी उसके नदी होने का हक भी छीन लेना चाहता है। अब काली गंडक में से भी खोदकर रेत निकाली जाने लगी है। बस यहीं से शुरुआत होती है, नदी के विनाश की। क्योंकि इससे नदी की वो झिरें मिटने लगती हैं, जिनसे आकर वह नदी में मिलती है।

शायद बादलों को भी अपने काम का अहसास है। मन में एक सवाल उठ रहा था कि जब हम अपनी दुनिया से निराश हो जाते हैं तो नदी-पहाड़ों और जंगल की त्रिकोणी दुनिया में ही क्यों आना चाहते हैं? यहां ऐसा क्या होता है जो हमारी निराशा को मिटा देता है? कुछ तो है, जिसे हम सभी लोग हवा में, हजारों झींगुरों की एक साथ निकल रही अविकल धुन में, पहाड़ी झरनों में तथा पहाड़ों पर चढ़ते समय खुलते फेफड़ों में महसूस कर सकते हैं।

बाग्लुंग के तातापानी मोहल्ले तक पंहुचने के लिए हमने डेढ़ घंटे की फेंफड़ा खडकाऊ चढ़ाई चढ़ी। मन में यह सवाल लेकर हम चढ़े थे कि यहां के लोगों का कितना कठिन जीवन है यहां के लोगों का? इनके आसपास कुछ नहीं है। इन्हें हर छोटी-मोटी जरूरत के लिए पहाड़ चढ़ना-उतरना पड़ता हैं। 65 घरों की यह बस्ती पहाड़ से नीचे क्यों नहीं उतर आती? इस सवाल का जवाब 60 साल की चूराकुमारी किसान (यहां रहने वाली एक दलित महिला) देती हैं। उसने बताया यह कोई पीड़ा नहीं है। जैसे कुछ लोग सपाट सड़क पर चलते हैं, वैसे ही हम पहाड़ पर और जंगल में चढ़ते हैं।

हमारे रिश्ते केवल आपस में ही नहीं हैं, (जंगल और पहाड़ की तरफ देखते हुए कहती हैं) इनसे भी तो हैं। यहां पिछले कई सालों में एक भी महिला की मातृत्व मृत्यु नहीं हुई, कोई बच्चा कुपोषण से नहीं मरा, एक भी बलात्कार नहीं हुआ। बच्चे पाठशाला जाते हैं। हमें दुख यह पहाड़ नहीं देते, अपना समाज देता है। जब काम-काज नहीं मिलता तो दूसरे शहर पलायन करना पड़ा। हर घर से कोई-न-कोई कतर, मलेशिया, जापान या भारत में जाकर काम कर रहा है। यहां जातिगत भेदभाव चुनौती पैदा करता है, जंगल या पहाड़ नहीं। हमें तो यहीं अच्छा लगता है बस।

इस इलाके के लगभग 7 हजार युवा प्रतिवर्ष पलायन करते हैं, क्योंकि सामाजिक भेदभाव ने उनके स्थानीय अवसर छीन लिए हैं वरना उन्हें यहां काम मिल सकता था। इसी बदहाली के पलायन की स्थिति को अब सरकारें अवसर के रूप में पका रही हैं, ताकि इसे आधार बना कर यहां विकास के नाम पर बड़ी परियोजनाएं लाई जा सकें। उनके नजरें पहाड़ों के बीच की त्रिशूली और काली गंडक नदी पर है।

जंगल शायद इसलिए अब भी बचा हुआ है, क्योंकि ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचना अब भी थोड़ा कठिन है या फिर इसलिए क्योंकि लोग इन्हें अपना आराध्य मानते हैं।

धौलागिरी के लोगों ने अपने विश्वास के चलते इन्हें (पेड़ों-पहाड़ों) को अब तक मिटने नहीं दिया तो भी क्या इससे वे खुद संकट से बच जाएंगे? बड़ा पेचीदा सवाल है क्योंकि हमारे घर को ठंडा रखने के लिए जो गर्मी और जहर हम बाहर फेंक रहे हैं, वह किसी सीमा में बंधता नहीं है। वह धौलगिरी भी पहुंच जाता है। वह हिमालय पर्वत श्रृंखला के बर्फ के पहाड़ों को भी पिघला रहा है।

जब बर्फ के पहाड़ पिघलेंगे तो काली गंडक में भी बाढ़ आएगी और विनाश आएगा। दुनिया में एक व्यक्ति या एक समुदाय के कर्म दूसरे व्यक्ति, समुदाय और क्षेत्र को सीधे-सीधे प्रभावित करते हैं। यहां भी करेंगे। यही कारण है कि मैं धौलागिरी के पहाड़ों के बीच बसे गांवों से खुद को अलग करके नहीं देख सकता, क्योंकि उनसे मेरा कुछ-न-कुछ रिश्ता तो है ही।

जीवन में रंग भरते जंगल


जंगल या नदी ने भी अपने लिए कभी किसी बस्ती को नहीं उजाड़ा। वहीं हमें लगता है, नदी-पहाड़-जंगल को मिटाकर ही हमारी उन्नति हो सकती है। क्या उन्हें मिटाए बिना हमारी बस्ती का बसे रहना संभव नहीं है? नेपाल की राजधानी काठमांडू से पश्चिम दिशा में लगभग 275 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा-सा शहर है-बाग्लुंग। यहां के जंगल और पहाड़ दोनों अनूठे हैं। इतने ऊंचे पहाड़ मैंने पहली बार देखे। यह विशालकाय पहाड़ धौलागिरी हिमालय की श्रृंखला के पहाड़ हैं। बाग्लुंग की जनसंख्या कोई 30 हजार है। यहां एक नजदीकी बसाहट तातापानी में 64 दलित परिवार रहते हैं।

नेपाल के पोखरा से बाग्लुंग के बीच हिमालय और धौलागिरी पर्वत श्रृंखला परिवार के सदस्य पहाड़ों पर कुछ घाव नजर आने लगे हैं। इनकी ऊपरी चोटी तक पहुंचने के लिए सड़कें बनाने के लिए पहाड़ों को बारूद लगा तोड़ा गया था। इससे पहाड़ के भीतर तरतीब से जमे हुए पत्थर और मिट्टी खुल गई। बारिश उन खुले हिस्सों को और उघाड़ती जा रही है।

जैसे-जैसे मिट्टी और छोटे-बड़े पत्थर बारिश के वार से निकलते हैं, वैसे-वैसे पेड़ों की जड़ें भी नंगी होने लगती हैं। इनके बाहर आते ही पेड़ मरने लगते हैं और जब पेड़ मरते हैं, तो जंगल मरता है। जब जंगल मर जाएगा तब बीमारी पैदा करना हमारे हाथ में है, उसे न पैदा करना तो हमारे हाथ में है, पर बीमारी का इलाज हमारे हाथ में नहीं है।

सड़क बनाने के लिए हजारों किलोमीटर दूर किया गया बारूदी विस्फोट यहां हमारी जिंदगी को भी दहलाता है। वह केवल पेड़ और पहाड़ को वस्त्रविहीन नहीं करता वह ठीक उसी समय हमारे कपड़े भी उतार रहा होता है। ध्यान से देखो तो लगता है पहाड़ इन घावों से कारण कराह रहा है। जैसे उसे पेड़-तोड़ हो रहा है। इन पहाड़ों की मरहम-पट्टी करना ही हमारी सबसे बड़ी परियोजना होना चाहिए, पर हो इसके उलट रहा है।

अब तो बारूद बिछाना ही हमारी सबसे बड़ी परियोजना है जिसे विकास परियोजना का नाम दिया गया है। क्या इस विकास से पलायन रुकेगा? क्या इससे बीमारियां कम हो जाएंगी? क्या इससे गैर-बराबरी मिटेगी? क्या इससे साफ हवा और पानी मिलेगा? क्या सबको दो वक्त का भरपेट खाना मिलेगा? समाज में सुरक्षा का अहसास पैदा हो पायेगा? ऐसे तमाम सवाल और जवाब आज हमें खुद से ही करना है।

जंगल या नदी ने भी अपने लिए कभी किसी बस्ती को नहीं उजाड़ा। वहीं हमें लगता है, नदी-पहाड़-जंगल को मिटाकर ही हमारी उन्नति हो सकती है। क्या उन्हें मिटाए बिना हमारी बस्ती का बसे रहना संभव नहीं है? नेपाल की राजधानी काठमांडू से पश्चिम दिशा में लगभग 275 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा-सा शहर है-बाग्लुंग।

यहां के जंगल और पहाड़ दोनों अनूठे हैं। इतने ऊंचे पहाड़ मैंने पहली बार देखे। यह विशालकाय पहाड़ धौलागिरी हिमालय की श्रृंखला के पहाड़ हैं। बाग्लुंग की जनसंख्या कोई 30 हजार है। यहां एक नजदीकी बसाहट तातापानी में 64 दलित परिवार रहते हैं। एक तरफ तो इस गांव में हर घर में बिजली है। ज्यादातर प्रसव अस्पताल में होते हैं। पानी तो उनका अपना ही है। बच्चों को सालाना छात्रवृत्ति भी मिल जाती है। छोटे बच्चों को पोषण भत्ता भी मिल जाता है। पर दूसरी तरफ इस दूरदराज पहाड़ी गांव के हर एक घर से बेघर हुआ एक व्यक्ति काम की तलाश में भारत, मलेशिया, कतर या दुबई में है।

ज्यादातर लोग 3 या 4 साल में एक बार घर लौट पाते हैं। इस इलाके में दलित समुदाय और संगठनों ने ताकत के हर केंद्र को चुनौती दी और छुआछूत बंद करने के लिए मजबूर किया। इस इलाके में अब कोई उनसे रिश्वत नहीं मांगता। वे मानते हैं कि सत्ता में अब भी ऊंची जाति के लोग बैठे हैं, वे दलितों को काम नहीं मिलने देते। उन्हें लगभग हर रोज 20-30 किलो वजन उठाकर पहाड़ भी चढ़ना पड़ता है। फिर भी वे पहाड़ छोड़कर पठार में जाना नहीं चाहते।

उनके लिए नदी, जंगल और पहाड़ चुनौती नहीं, बल्कि उनकी ताकत हैं। वास्तविक चुनौती तो अपना खुद का समाज है जो शोषण और छुआछूत को सत्ता का माध्यम मानता है। हमारा समाज यह बात गले क्यों नहीं उतार पाता कि महावीर, बुद्ध, कालिका, शिव और राम का भी जंगल के बिना कोई अस्तित्व नहीं है, तो फिर उसका अस्तित्व इसके बिना कैसे बचा रहेगा? हमारे धर्म और श्रद्धा की धुरी तो जंगल ही हैं। हम अब आध्यात्म की विपरीत दिशा में बहुत दूर जा चुके हैं, जहां मुक्ति नहीं अकाट्य बंधन ही हमारा अंतिम लक्ष्य है।

पहाड़, नदी और जंगल मिलकर धौलागिरी घाटी बनाते हैं। यहां का इंसानी समाज प्रकृति के इस निर्माण का मतलब समझता है। शायद यही कारण है कि सैकड़ों किलोमीटर की इस घाटी में, यहां से निकलने वाले झरनों, सड़कों और पगडंडियों के आसपास कहीं भी गंदगी करना वर्जित है। जंगल, पहाड़ और नदी की त्रिवेणी को देवी माना जाता है।

धरती पर कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया होने पर (धरती का गर्म होना या जलवायु परिवर्तन) पहाड़ को समुद्र को और पानी को खत्म नहीं करेगी यदि किसी का अंत होगा तो कथित विकास करने वाले मानव समाज का। भूभाग तो कहीं भी तैरता रहेगा परंतु हम कहां तैरेंगे? पेड़ तो बीज बनकर बच जाता है, इंसान को फिर पैदा होने के लिए पहले बंदर बनना पड़ेगा। हम यह बनने को इतने तत्पर क्यों हैं?

अक्सर हम अपनी महफिलें सजा कर खुद ही गैरहाजिर रहते हैं। इन जंगलों की महफिल से आप गैरहाजिर नहीं हो सकते। यह हाजिरी इस बात का अहसास कराती है कि पनपते जाओ, देखते जाओ और जैसा है उसे जानो और आगे बढ़ते जाओ। किसी को नकारो मत, उसे भी पुष्पित होने दो। बस इतना ध्यान रखना तुम्हारी कोई रचना, किसी के अस्तित्व के खात्मे पर न टिकी हो। ये जंगल न तो बाहर जाता है, न बाहर से किसी के आने का इंतजार करता है। यह तो बस हमारे भीतर है।

पत्ते, डालियां, घास, टूटे तने, सब कुछ ढेर-के-ढेर जमीन पर गिरे पड़े थे। पानी भी बरसता ही रहा था। यानी उनके सड़ने (यह शब्द एक मनोवृत्ति का परिचायक है) के लिए माकूल व्यवस्था थी, पर वहां सड़ांध क्यों नहीं थी? वहां तो कोई कचरा उठाने और सुगंध छिड़कने भी नहीं आता।

इस लिहाज से तो इन सैंकड़ों किलोमीटर के पहाड़ी जंगलों में तो केवल सड़ांध ही होना चाहिए थी, पर लोग तो यहां खुशबू की तलाश में आते हैं और पाते भी हैं। तो हमारे शहर या बस्ती में फैली सड़ांध कहां से आती है? क्या हमारे व्यवहार और सोच से अलग यहां हमें वही रंग एक अलग अहसास क्यों देते है और जीवंत क्यों लगते हैं? जबकि हकीकत यह है कि हमारी जिंदगी के अधिकांश रंग मर चुके हैं!

भूगोल का आध्यात्म


प्रकृति विरोधी विकास हमें विनाश की ओर ले जा रहा है। हिमालय पर्वत बहुत विशाल होने के बावजूद, बहुत नाजुक पहाड़ भी है। अधिक भारी अधोसंरचनात्मक विकास गतिविधियां यहां विनाश ही लाएंगी। जब किसी सपाट सड़क पर हम आधुनिक वाहन में पर्यटन के लिए निकलते हैं, तब क्या हमें कभी यह अहसास होता है कि धरती के जिस हिस्से पर हम चल रहे हैं, उसका जीवन 4 से 5 करोड़ साल का हो चुका है? यह अहसास तभी होगा जब हम इसके साथ अपने भीतर के तत्वों को जोड़ेंगे। तभी हम पंचतत्वों को पहचान पाएंगे।

जंगल, पर्वत और झरने लगते तो आध्यात्म का विषय हैं, परंतु पहले यह भूगोल का विषय है और आध्यात्म भूगोल का विषय भी है। इन दृश्यों को जब मैंने भूगोल के साथ जोड़ा तो मुझे इन पर्वतों की ऊंचाई से ज्यादा गहराई का अंदाजा हुआ। वास्तव में आज भारत पृथ्वी के जिस हिस्से पर है (यानी एशिया में) वह 22.5 करोड़ साल पहले ऑस्ट्रेलियाई तटों के आस-पास तैरता एक द्वीप था। टेथिस महासागर इसे एशिया से अलग करता था। इसका जुड़ाव एशिया से नहीं था। धौलागिरी के यह ऊंचे पहाड़ लाखों साल पहले अस्तित्व में थे ही नहीं।

भारत तब गोंडवाना या गोंडवाना भूमि का हिस्सा था। इसमें दक्षिण के दो बड़े महाद्वीप और आज के अंटार्कटिका, मेडागास्कर शामिल थे। भारत, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे देशों से मिलकर बनी यह भूमि। गोंडवाना यानि गोंडों का जंगल। इस अंचल का अस्तित्व 57 से 51 करोड़ साल पहले माना जाता है।

ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक एडवर्ड सुएस ने यह नाम दिया था। आज जमीन, जिस सीमा रेखा और राजनीतिक नक्शे के लिए लोग लड़ रहे हैं, वह पहले ऐसा नहीं था और आगे भी शायद ऐसा नहीं रहेगा। भू-भाग बदलते रहे हैं और आगे भी बदलते रहेंगे। तब यह कैसा राष्ट्रवाद, जबकि राष्ट्रों की कोई स्थाई सीमा-रेखा ही नहीं है?

धरती की ऊपरी सतह को भू-पटल कहते हैं। इसी में खनिज व गैस मिलते हैं। भूपटल के नीचे की सतह को स्थलमंडल कहते हैं। यही महाद्वीपों और महासागरों को आधार देता है। इसकी मोटाई 100 किलोमीटर या इससे कुछ ज्यादा हो सकती है। इस आवरण में मजबूत चट्टानें होती हैं। धरती में स्थलमंडल के नीचे की परत को दुर्बलतामंडल कहते हैं। यह परत द्रवीय या तरल होती है।

मजबूत चट्टानों वाला स्थलमंडल इसी परत पर तैरता रहता है। ये तश्तरियां (जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट कहते हैं) स्थिर नहीं बल्कि गतिमान होती हैं। यानी भू-गर्भीय घटनाओं और परतों की चारित्रिक विशेषताओं के कारण यह खिसकती रहती हैं। इनकी गतिशीलता के कारण ही तीन लाख साल पहले कई महाद्वीप मिलकर विशाल पेंजिया महाद्वीप (उस समय का सबसे बड़ा महाद्वीप, जो कई द्वीपों से मिलकर बना था) बन गए थे।

भारत तब अफ्रीका से सटा हुआ था। 20 करोड़ साल पहले धरती के अंदर ताप संचरण की क्रियाओं के फलस्वरूप होने वाली भू-गर्भीय घटनाओं के कारण यह महाद्वीप टूटने लगा और छोटे-छोटे द्वीपों में बंटकर अलग-अलग दिशाओं में जाने लगा। 8.40 करोड़ साल पहले भारत ने उत्तर दिशा में बढ़ना शुरू कर 6 हजार किलोमीटर की दूरी तय की और 4 से 5 करोड़ साल पहले वह एशिया के इस हिस्से से टकराया।

इस टक्कर के चलते भूमि का एक हिस्सा ऊपर की ओर उठने लगा। दो महाद्वीपों के टकराने व प्लेटों के एक दूसरे पर चढ़ने के कारण हिमालय बना। इन पर्वतों पर समुद्री जीवों के अवशेष मिलते हैं। इन पहाड़ों की ऊपरी सतह के खिरने से जो पत्थर निकलते हैं, वे भी ऐसे ही गोल होते हैं, जैसे नदियों या बहते पानी में आकार लेते हैं, यानी ये हिस्सा कभी न कभी पानी में रहा है।

माना जाता है कि भारत का भूभाग ज्यादा ठोस था और एशिया का नरम, इसलिए एशिया का भूभाग ऊपर उठाना शुरू हुआ और हिमालय पर्वतीय श्रृंखला की रचना हुई। यहां के पर्वतों की ऊंचाई ज्यादा तेज गति से बढ़ी और यह अब भी हर साल एक सेंटीमीटर की दर से बढ़ रही है। क्योंकि भारतीय विवर्तनिक प्लेट (टेक्टोनिक प्लेट) भूकंपों के कारण अब भी धीमी गति से किंतु लगातार उत्तर की तरफ खिसक रही है इसका अर्थ है हिमालय अभी और ऊंचा होगा।

हिमालय की ऊंचाई हमेशा से 1 सेंटीमीटर की गति से नहीं बढ़ रही थी। यदि यह गति होती तो 4 करोड़ सालों में हिमालय की ऊंचाई 400 किलोमीटर हो जाती। पर्यावरणीय कारणों और अनर्थकारी मानव विकास की लोलुपता के चलते विवर्तनिक प्लेटों में ज्यादा गतिविधियां हो रही है और भूकंपों के नजरिए से भी यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील हो गया है।

प्रकृति विरोधी विकास हमें विनाश की ओर ले जा रहा है। हिमालय पर्वत बहुत विशाल होने के बावजूद, बहुत नाजुक पहाड़ भी है। अधिक भारी अधोसंरचनात्मक विकास गतिविधियां यहां विनाश ही लाएंगी।

जब किसी सपाट सड़क पर हम आधुनिक वाहन में पर्यटन के लिए निकलते हैं, तब क्या हमें कभी यह अहसास होता है कि धरती के जिस हिस्से पर हम चल रहे हैं, उसका जीवन 4 से 5 करोड़ साल का हो चुका है? यह अहसास तभी होगा जब हम इसके साथ अपने भीतर के तत्वों को जोड़ेंगे। तभी हम पंचतत्वों को पहचान पाएंगे। वर्ष 2013 में उत्तराखंड की बाढ़ के बाद समझ नहीं आ रहा था कि पहाड़ पर बाढ़ कैसे आएगी? वहां तो बारिश के पानी को रोकने के लिए कहीं कोई बाधाएं ही नहीं है।

गौरतलब है आमतौर पर मेघ बूंदें बरसाते हैं, पर जब बादल फटते हैं तो आकाश से धाराएं बरसती हैं। यानि मौसम का चक्र बदलने की वजह से जमीन और आकाश के रिश्तों में आई कड़वाहट से मेघ गुस्सा हो रहे हैं। अब वे बूंदें नहीं तूफान बरसाते हैं। संकट का दूसरा दौर हमने उत्तराखंड के पहाड़ों में जंगल काट और जलाकर तैयार कर दिया था। अब पानी की धार को कौन रोकेगा? ये धार बांधों से तो नहीं रुकने वाली। ये तो जल्दी ही बांधों को भी बहाकर ले जाने वाली है।

वर्ष 2013 को अपवाद बताने वाले सन् 2014 की कश्मीर की घाटी के प्रलय को क्या कहेंगे। वहां पानी ऐसा रुका कि बस साढ़े साती की तरह जम गया...। श्रीनगर का उदाहरण लीजिए। यह एक कटोरे के रूप में बसा हुआ शहर है। झेलम नदी इसके बीच से गुजरती है। कहीं एकाध जगह थी, जहां से अतिरिक्त मात्रा में आया पानी बहकर निकल जाता था।

इससे पहले वहां वर्ष 1902 में कुछ ऐसी की बाढ़ आई थी। परंतु विकास के पैरोकारों ने कहा कि विकास करेंगे तो इससे स्थिरता आएगी। बस इसी विकास के चलते वो नहरें और धारा बिंदु मिटा दिए गए, जहां से श्रीनगर का पानी बाहर निकलता था। असम और अरुणाचल प्रदेश में भी पिछले साल बाढ़ आई थी और 2 लाख लोग बर्बाद हो गए।

इस साल कश्मीर के बाद उत्तर-पूर्व में फिर से बाढ़ आ गई। इसके कारण व परिणाम दोनों ही हम जानते हैं। वैसे भी यह एक्ट आफ गाड (भगवान का किया-धरा) नहीं है। सोचिए, हम किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं? बीमा और मुआवजा कुछ बचा थोड़ी पाते हैं। राहत कार्यों से नदी की बाढ़, आसमान से बरसने वाला प्रलय और हिमालय की बढ़ती ऊंचाई को कुछ समझ पाएंगे? हर बार की बाढ़ अब पहाड़ों की एक परत को बहा ले जाती है।

अब बाढ़ खेत की मिट्टी की सबसे जिंदा परत को उखाड़ कर ले जाती है। जबकि पहले तो वह उपजाऊ मिट्टी लाती थी। यानि एक बार राहत या मुआवजे देने से अब कुछ न होगा। अगले साल बाढ़ न भी आई, तो खेतों में क्या और कितना उगेगा? किस सरकार या कंपनी में इतनी मानवता है कि वह उत्तराखंड के पहाड़ों का पुनर्निर्माण करने वाली परियोजना चला सके? हम विश्व निर्माण की मूल कथा और उसके विज्ञान को जानना ही नहीं चाहते।

एक नया घर बनाते समय जो कुछ हम फेंक देते हैं, वह मलबा नहीं, बल्कि हमारे अपने अवशेष हैं। हमारा जीवन कुछ सालों का नहीं, बल्कि करोड़ों सालों का है। याद रखिए यह आपदा नहीं, हमारे अपराध हैं। तय कीजिए कौन अपराधी है और कौन दंड देगा? यह आत्मनिर्णय की घड़ी है।

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