मृदा संरक्षण के लिए मिट्टी की जांच

Submitted by birendrakrgupta on Sun, 11/09/2014 - 12:53
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Source
कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2011
मृदा संरक्षण की दिशा में सरकार की ओर से विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। किसानों को मिट्टी की जांच कराने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। किसानों को मिट्टी की जांच कराने की विधि बताई जा रही है। उन्हें संतुलित रासायनिक खाद का प्रयोग करने और मिट्टी की उर्वरता बचाए रखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मृदा संरक्षण का प्रयास पहली पंचवर्षीय योजना से ही शुरू हो गया था, जिसका असर तीसरी पंचवर्षीय योजना में दिखने लगा था। किसानों को मृदा परीक्षण के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों से भी अवगत कराया जा रहा है। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी कानून योजना शुरू होने से भी मृदा संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। खेत का पानी खेत में ही रूकने की वजह से उर्वर मिट्टी का बहाव रुका है, जो किसानों को लिए लाभकारी साबित हो रहा है।देश में कृषि विकास को नया आयाम देने के लिए भूमि संरक्षण पर विशेष जोर दिया जा रहा है। खेती को बढ़ावा देने एवं पैदावार बढ़ाने के लिए भूमि संरक्षण की दिशा में सरकार की ओर से कई महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार की ओर से प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत ही भूमि संरक्षण के कई कार्यक्रम शुरू किए गए, लेकिन जिस तरह से विभिन्न आयोगों की ओर से संस्तुतियां आई, उसमें समयानुसार परिवर्तन भी किए गए। देश अनाज उत्पादन की दिशा में आत्मनिर्भर बने, इसके लिए शुरू से ही इस क्षेत्र में समस्याओं को जानने की कोशिश की गई और समय-समय पर तकनीक का विकास और नीति समन्वय निकाय के कानून और संविधान के समुचित उपयोग पर जोर दिया जाता है। मृदा संरक्षण की गतिविधियों का वैचारिक ढांचा बदल गया है। प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान इन कार्यक्रमों की अवधारणाओं में व्यापक सुधार किया गया है। इसी का नतीजा है कि आज हम खाद्यान्न के मामले में काफी आगे हैं। अब एक बार फिर केंद्र सरकार की ओर से मृदा संरक्षण की दिशा में अनोखी पहल की जा रही है। कृषि विभाग के जरिए हर गांव और हर खेत की मिट्टी की जांच कर उनके पोषक तत्वों के बारे में जानकारी ली जा रही है। साथ ही मृदा संरक्षण के लिए किसानों को जागरूक किया जा रहा है। हम अपनी मिट्टी को समुचित तरीके से किस तरह प्रयोग कर सकते हैं और मिट्टी को कैसे बचाया जा सकता है। इसकी ताकत को कैसे संरक्षित किया जा सकता है, आदि तमाम बातें गांवों के किसानों को वैज्ञानिकों की ओर से समझाई जा रही हैं।

मिट्टी परीक्षण


यदि हमें मिट्टी की सुरक्षा करनी है तो उसके बारे में जानकारी होनी भी जरूरी है। मिट्टी की शक्ति और उसकी स्थिति के बारे में हमें तभी जानकारी हो पाएगी, जब हम उसका समय-समय पर परीक्षण कराते रहे। कृषि में मृदा परीक्षण या भूमि की जांच एक मृदा के किसी नमूने की रासायनिक जांच है जिससे भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा के बारे में जानकारी मिलती है। इस परीक्षण का उद्देश्य भूमि की उर्वरकता मापना तथा यह पता करना है कि उस भूमि में कौन से तत्वों की कमी है चूंकि मृदा पोषक तत्वों का भंडार है तथा पौधों को सीधे खड़ा रहने के लिए सहारा देती है। पौधों को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए 16 पोषक तत्वाें की आवश्यकता होती है। ये तत्व हैं- काबर्न, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जस्ता, मैगनीज, तांबा, लौह, बोरोन, मोलिबडेन व क्लोरीन। इन सभी तत्वों का संतुलित मात्रा में प्रयोग करने से ही उपयुक्त पदैावार ली जा सकती है। इन सभी तत्वाें की समुचित उपस्थिति का पता तभी लग सकता है जब हम मिट्टी की नियमित रूप से जांच कराएं। जिस तरह से एक व्यक्ति की जांच कराने से हमें उसके शरीर में आई विकृति के बारे में जानकारी मिलती है, इसी तरह से मिट्टी की जांच कराने से हमें उसमें आई विकृति के बारे में जानकारी मिल जाती है। फिर हम मिट्टी की विकृति को दूर करने में संबंधित तत्वाें का प्रयोग करते हैं। इसलिए हर किसान की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने खेत की मिट्टी की जरूर जांच कराएं।

मृदा परीक्षण का उद्देश्य


1. मृदा की उर्वराशक्ति की जांच करके फसल व किस्म विशेष के लिए पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा की सिफारिश करना तथा यह मार्गदर्शन करना कि उर्वरक व खाद का प्रयोग कब और कैसे करें।
2. मृदा में लवणताएं, क्षारीयता तथा अम्लीयता की समस्या की पहचान व जांच के आधार पर भूमि सुधाराें की मात्रा व प्रकार की सिफारिश कर भूमि को फिर से कृषि योग्य बनाने में योगदान करना।
3. फलाें के बाग लगाने के लिए भूमि की उपयुक्तता का पता लगाना।
4. किसी गावं, विकासखडं, तहसील, जिला, राज्य की मृदाआें की उर्वराशक्ति को मानचित्र पर प्रदर्शित करना तथा उर्वरकों की आवश्यकता का पता लगाना। इस प्रकार की सूचना प्रदान कर उर्वरक निर्माण, वितरण एवं उपयोग में सहायता करना।

मृदा परीक्षण में सावधानियां


मृदा परीक्षण के लिए सबसे पहले मृदा का नमूना लिया जाता है। इसके लिए जरूरी है कि मृदा का नमूना पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करे। यदि मृदा का नमूना ठीक ढंग से नहीं लिया गया हो और वह मृदा का सही प्रतिनिधित्व न कर रहा हो तो भले ही मृदा परीक्षण में कितनी ही सावधानियां क्याें न बरती जाएं, उसकी सिफारिश सही नहीं हो सकती। इसलिए खेत की मृदा का नमूना पूरी सावधानी से लेना चाहिए। नमूना लेनेे के लिए किसान को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी खुरपी, फावड़े, लकड़ी या प्लास्टिक की खुरचनी साफ हो।

रासायनिक कृषि का प्रचलन कैसे हुआ, इसके इतिहास को हमको जानना पड़ेगा। फ्रांस के कृषि वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि पौधों के विकास के लिए मात्र तीन तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की अधिक आवश्यकता होती है। उनके अनुसार ये तीन तत्व पौधों को दे तो पौधों का अच्छा विकास एवं अच्छी उपज प्राप्त हो सकती है। 1840 में जर्मन वैज्ञानिक लिबिक ने इन तीनों के रासायनिक संगठक एनपीके को खाद बनाकर फसलों की बढ़वार के लिए इस रसायन को भूमि पर डालने के लिए प्रोत्साहित किया। 1. मृदा का नमूना इस तरह से लेना चाहिए जिससे वह पूरे खेत की मृदा का प्रतिनिधित्व करे। जब एक ही खेत में फसल की बढ़वार में या जमीन के गार्डन में, रंग व डलान में अंतर हो या फसल अलग-अलग बोई जानी हो या प्रबंध में अंतर हो तो हर भाग से अलग नमूने लेने चाहिए। यदि उपरोक्त सभी स्थिति खेत में एक जैसी हो तब एक ही नमूना लिया जा सकता है। ध्यान रहे कि एक नमूना ज्यादा से ज्यादा दो हेक्टेयर से लिया जा सकता है।
2. मृदा का नमूना खाद के ढेर, पेड़ों, मेढ़ों, ढलानाें व रास्ताें के पास से तथा ऐसी जगहों से जाे खेत का प्रतिनिधित्व नहीं करती है, न लें।
3. मृदा के नमूने को दूषित न होनेे दें। इसके लिए साफ औजारों से नमूना एकत्र करें तथा साफ थैली में डालें। ऐसी थैली काम में न लाएं जो खाद एवं अन्य रसायनों के लिए प्रयोग में लाई गई हो।
4. मृदा का नमूना बुआई से लगभग एक माह पूर्व कृषि विकास प्रयोगशाला भेज दें जिससे समय पर मृदा की जांच रिपोर्ट मिल जाए एवं उसके अनुसार उर्वरक एवं सुधारकों का उपयोग किया जा सके।
5. यदि खड़ी फसल में पोषक तत्वाें की कमी के लक्षण दिखाई दें और मृदा का नमूना लेना हो तो फसल की कताराें के बीच से नमूना लेना चाहिए।
6. जिस खेत में कंपोस्ट खाद, चूना, जिप्सम तथा अन्य कोई भूमि सुधारक तत्काल डाला गया हो तो उस खेत से नमूना न लें।
7. मृदा के नमूने के साथ सूचना-पत्र अवश्य डालें जिस पर साफ अक्षराें में नमूना संबंधित सूचना एवं किसान का पूरा पता लिखा हो।
8. सूक्ष्म तत्वाें की जांच के लिए नमूना लेतेे समय अतिरिक्त सावधानियां बरते।
9. धातु से बने औजाराें या बर्तनों को काम में नहीं लाएं क्योंकि इनमें लोहा, जस्ता व तांबा होता है। जहां तक संभव हो प्लास्टिक या लकड़ी के औजार काम में लें।
10. यदि मृदा खोदने के लिए फावड़ा या खुरपी ही काम में लेनी पड़े तो वे साफ होनी चाहिए। इसके लिए गड्ढा बना लें व एक तरफ की परत लकड़ी के चौड़े फट्टे या प्लास्टिक की फट्टी से खुरचकर मृदा बाहर निकाल दें। फिर इस प्लास्टिक या लकड़ी के फट्टे से 2.3 सेंमी मोटी परत ऊपर से नीचे तक 15 सेंमी. और 10-15 जगहों से मृदा एकत्र करके मृदा का नमूना तैयार कर सूचना पत्रक सहित कृषि विकास प्रयोगशाला में भेज दें।

मृदा का नमूना लेने की विधि


1. जिस जमीन का नमूना लेना हो उस क्षत्रे पर 10-15 जगहों पर निशान लगा लें।
2. चुनी गई जगह की ऊपरी सतह पर यदि कूड़ा-करकट या घास इत्यादि हो तो उसे हटा दें।
3. खुरपी या फावड़े से 15 सेंमी. गहरा गड्ढ़ा बनाएं। इसके एक तरफ से 2.3 सेंमी. मोटी परत ऊपर से नीचे तक उतार लेंं। इसी प्रकार शेष चुनी गई 10-15 जगहों से भी उप-नमूने एकत्र कर लें।
4. अब पूरी मृदा को अच्छी तरह हाथ से मिला लें तथा साफ कपड़े या टब में डालकर ढेर बना लें। अंगुली से इस ढेर को चार बराबर भागों में बांट दें। आमने-सामने के दो बराबर भागों को वापिस अच्छी तरह से मिला लें। यह प्रक्रिया तब तक दोहराएं जब तक लगभग आधा किलो मृदा न रह जाए। इस प्रकार से एकत्र किया गया नमूना पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा।
5. नमूने को साफ प्लास्टिक की थैली में डाल दें। अगर मृदा गीली हो तो इसे छाया में सूखा लें। इस नमूने के साथ नमूना सूचना पत्रक, जिसमें किसान का नाम व पूरा पता, खेत की पहचान, नमूना लेने की तिथि, जमीन की ढलान, सिंचाई का उपलब्ध स्रोत, पानी निकास, अगली ली जाने वाली फसल का नाम, पिछले तीन साल की फसलों का ब्यौरा व कोई अन्य समस्या आदि का विवरण लिख दें।
6. इस नमूने को कपड़े की थैली में रखकर इसका मुंह बांधकरकृषि विकास प्रयोगशाला में परीक्षण हेतु भेज दें।

पौधे के लिए जरूरी उर्वरक


उर्वरक ऐसे रसायन होते हैं जो पेड़-पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं। पौधों को उर्वरक दो तरह से दिए जाते हैं- एक तो जमीन में डालकर, ये तत्व पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित होते हैं। दूसरे तरीके से पत्तियों पर छिड़काव करके। इससे पत्तियों द्वारा शोषित कर लिए जाते हैं। उर्वरक पौधों के लिए आवश्यक तत्वों की पूर्ति करते हैं। इसलिए पौधे के लिए सभी तत्वों की जरूरत होती है। किसी एक तत्व की अधिकता होना भी नुकसानदायक है और कभी भी पौधे को प्रभावित करती है। इसलिए किसानों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके खेत में जो भी पौधे हो, सभी को समान तत्व मिले। हालांकि पौधों के लिए तीन प्रमुख पोषक तत्व होते हैं, और ये हैं- नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश। इसके अलावा कैल्शियम, गंधक या सल्फर, मैग्नीशियम की भी जरूरत पड़ती है। इसी तरह सूक्ष्म पोषक तत्वों में बोरॉन, क्लोरीन, मैगनीज, लोहा, जस्ता, तांबा, मॉलीब्लेडन, सेलेनियम आदि की भी जरूरत पड़ती है। यदि हम किसी भी पौधों को जरूरत से ज्यादा खाद देते हैं वह मृतप्राय हो जाता है। क्योंकि किसी भी तत्व की अधिकता वह बर्दाश्त नहीं कर पाता है। ऐसे में एक तरफ मिट्टी संबंधित तत्व की अधिकता के कारण अम्लीय, क्षारीय आदि अवस्था में पहुंच जाती है, दूसरी तरफ पौधा भी मृतप्राय हो जाता है। यानी किसानों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए किसान अपने खेत में उतनी ही खाद का प्रयोग करें, जितनी पौधे यानी संबंधित फसल को जरूरत हो।

मनरेगा के बाद बेहतर हुई स्थिति


महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना शुरू होने के बाद मृदा-संरक्षण के लिए चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों को गति मिली है तथा उसके नतीजे भी सामने आने लगे हैं। चूंकि इस योजना के तहत ज्यादातर काम ग्रामीण इलाके में कराए जा रहे हैं। सड़क निर्माण ही नहीं बल्कि मेड़बंदी, बाड़बंदी आदि के जरिए भी पानी के बहाव को रोका गया है। इससे जहां एक ओर खेत का पानी उसी खेत में रूक जा रहा है वहीं मिट्टी का क्षरण भी रूका है। इससे खेत की उर्वरक मिट्टी दूसरे खेत से होते हुए नदी तक नहीं पहुंच पा रही है। पहले खेत की जुताई होते ही बारिश हो जाती थी और उपजाऊ मिट्टी बहकर दूसरे खेत अथवा नदी, तालाब में चली जाती थी। ऐसे में किसान के हिस्से बचती थी कठोर और अनुपजाऊ मिट्टी। फिर किसान को मिट्टी की ऊपरी सतह को उपजाऊ बनाने के लिए रासायनिक व अन्य खादों का प्रयोग करना पड़ता था। उसकी पहली फसल भी भरपूर उत्पादन नहीं दे पाती थी। लेकिन मनरेगा के तहत हर ग्राम पंचायत में कराई जा रही मेड़बंदी की वजह से किसानों को काफी फायदा मिला है। एक तरफ किसानों के खेत की उपजाऊ मिटटी बहने नहीं पा रही है वहीं खेत का पानी खेत में ही रुकने की वजह से जलस्तर में भी बढ़ोतरी हो रही है। इस तरह इस योजना से एक तरफ जहां लोगों को रोजगार मिल रहा है वहीं मृदा संरक्षण की दिशा में भी अहम काम हुआ है।

क्या कहते हैं किसान


किसान सियाराम सिंह कहते हैं कि जब उन्हें रासायनिक खाद के बारे में जानकारी मिली तो वह हर फसल में उसका प्रयोग करने लगे, लेकिन धीरे-धीरे मिट्टी की स्थिति खराब होती गई। हर फसल में पहले से ज्यादा रासायनिक खाद की जरूरत पड़ने लगी। इसी दौरान कृषि विभाग के अधिकारियों की टीम उनके गांव में आई, उन्होंने अपनी समस्या बताई। मिट्टी की जांच कराई तो उसमें कई तत्व समाप्त हो चुके थे, जबकि कुछ तत्वों की अधिकता हो गई है। इसी वजह से उन्हें समुचित उत्पादन नहीं मिल पा रहा था। कृषि विभाग की ओर से दिए गए निर्देश के तहत खेत में खाद का प्रयोग करना शुरू किया तो फसल भी आने लगी और रासायनिक खाद का प्रयोग भी न के बराबर करना पड़ रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारी मात्रा में बचे गोला-बारूद की रासायनिक सामग्रियों को एनपीके खाद एवं कीटनाशक बनाकर बेचने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने व्यापक प्रचार-प्रसार प्रारंभ किया। इससे इन कंपनियों को भारी मात्रा में बचे गोला-बारूद के रसायनों का अधिकतम मूल्य तो मिला ही साथ ही साथ कृषि बाजार में इन कंपनियों की गहरी जड़ें जम गई। भारत तथा एशियाई देशों में औद्यौगिक क्रांति के बाद हरितक्रांति की शुरुआत हुई। इस दौरान विदेशों में हो रहे रासायनिक एवं कीटनाशकों पर ध्यान गया। उसका प्रयोग भारत में भी किया गया। इसका लाभ मिला। इसके बाद धीरे-धीरे रासायनिक खादों का दौर शुरू हो गया।सियाराम सिंह का कहना है कि सिर्फ यूरिया का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। मिट्टी की जरूरत के हिसाब से थोड़ा-थोड़ा जिंक, फास्फोरस, पोटाश व अन्य खादों का भी प्रयोग करते रहना चाहिए। इससे खेत की मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इसी तरह विजयशंकर पांडेय बताते हैं कि वह पहले रासायनिक खादों के दम पर आलू की फसल लेते थे, लेकिन धीरे-धीरे उत्पादन कम होने लगा। वह परेशान हो गए और कृषि विभाग में जाकर मिट्टी की जांच कराई तो पता चला कि मिट्टी का संतुलन गड़बड़ा गया है। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार हरी खाद का प्रयोग किया और फिर रासायनिक खाद के बजाय कंपोस्ट खाद पर जोर देने लगा। पहली फसल कमजोर हुई, लेकिन दूसरी फसल भरपूर आई। अब वह रासायनिक खाद का प्रयोग कम से कम करते हैं।

इसी तरह शंकर यादव बताते हैं कि वह तो रासायनिक खाद पहले से ही कम प्रयोग कर रहे हैं। उनका जोर हमेशा गोबर की खाद और हरी खाद पर रहा है। यही वजह है कि जब उनके खेत की मिट्टी की जांच कराई गई तो किसी तरह की कमी नहीं हुई। इस बार उनके खेत को कृषि विभाग ने फसल प्रदर्शन के लिए चुना है। इस तरह उनके खेत की मुफ्त में जांच भी हो जा रही है और उसमें संतुलित खाद भी पड़ रही है। उनका खेत पूरे गांव के किसानों के लिए अव्वल साबित हुआ है। उसमें कृषि विभाग की ओर से किए गए फसल प्रदर्शन के बाद भरपूर अनाज मिला है। शंकर का कहना है कि उनके एक खेत की मिट्टी ऊसरीली हो गई थी। उस पर भी कृषि विभाग के अधिकारियों ने प्रयोग किया है। ऊसरीली मिट्टी को हरी खाद से उपजाऊ बनाने की कोशिश चल रही है। इसके लिए खेत में सनई की बुवाई हुई थी, जो करीब तीन फीट लंबी होने के बाद ट्रैक्टर से जुताई कर दी गई। पूरी की पूरी फसल मिट्टी में मिल गई है। बारिश के बाद दोबारा जुताई करने से मिट्टी में तमाम पोषक तत्व मौजूद हो गए हैं। सनई की फसल को मिट्टी में दबाने का फायदा उन्हें आलू की फसल में मिलेगा। इस बार उन्होंने ऊसर खेत में वैज्ञानिकों की ओर से बताई गई विधि के अनुरूप आलू की बुवाई की है। उम्मीद है कि कम लागत के बाद भी उन्हें भरपूर मुनाफा मिलेगा क्योंकि उनके खेत की मिट्टी का संतुलन बन गया है।

रासायनिक खाद का इतिहास


रासायनिक कृषि का प्रचलन कैसे हुआ, इसके इतिहास को हमको जानना पड़ेगा। फ्रांस के कृषि वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि पौधों के विकास के लिए मात्र तीन तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की अधिक आवश्यकता होती है। उनके अनुसार ये तीन तत्व पौधों को दे तो पौधों का अच्छा विकास एवं अच्छी उपज प्राप्त हो सकती है। 1840 में जर्मन वैज्ञानिक लिबिक ने इन तीनों के रासायनिक संगठक एनपीके को खाद बनाकर फसलों की बढ़वार के लिए इस रसायन को भूमि पर डालने के लिए प्रोत्साहित किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारी मात्रा में बचे गोला-बारूद की रासायनिक सामग्रियों को एनपीके खाद एवं कीटनाशक बनाकर बेचने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने व्यापक प्रचार-प्रसार प्रारंभ किया। इससे इन कंपनियों को भारी मात्रा में बचे गोला-बारूद के रसायनों का अधिकतम मूल्य तो मिला ही साथ ही साथ कृषि बाजार में इन कंपनियों की गहरी जड़ें जम गई। भारत तथा एशियाई देशों में औद्यौगिक क्रांति के बाद हरितक्रांति की शुरुआत हुई। इस दौरान विदेशों में हो रहे रासायनिक एवं कीटनाशकों पर ध्यान गया। उसका प्रयोग भारत में भी किया गया। इसका लाभ मिला। इसके बाद धीरे-धीरे रासायनिक खादों का दौर शुरू हो गया।

(लेखक कृषि विभाग से जुड़े हैं)

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