कैसे बचाएं कृषि को ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से

Submitted by HindiWater on Tue, 11/11/2014 - 11:22
Source
कुरुक्षेत्र, मार्च 2010
विश्व बैंक द्वारा जलवायु परिवर्तन के संबंध में दी गई रिपोर्ट के अनुसार ‘‘ग्लोबल वार्मिंग समस्या की बढ़ती हुई गंभीरता को देखते हुए भारत को ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे वह इस कारण उत्पन्न गंभीर दुष्परिणामों के प्रभाव को कम कर सके। ग्रीनहाऊस गैस सन् 2040 तक दो गुना होने की संभावना है एवं इस सदी के अन्त तक तीन गुना। फलस्वरूप तापमान में वृद्धि होगी; अतिवृष्टि, सूखा, बाढ़, जैसी आपदाएं अधिक होंगी। मौसम अनियमित होगा, समुद्र के स्तर में वृद्धि होगी। इन सबका प्रभाव भारत में बहुत दूर तक होगा। विशेषज्ञों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण फसल का उत्पादन कम होगा, बीमारियां फैलेंगी और यह जैव-विविधता में कमी का कारण होगी।’’ दुनिया भर में मौसम में उथल-पुथल, कहीं सुनामी तो कहीं तूफानों का कहर, कहीं सूखा, कहीं बर्फबारी। ये निष्कर्ष अमेरिका के टेक्सास और इंग्लैंड के ड्यूक विश्वविद्यालय में चल रहे विभिन्न शोधों के निष्कर्ष के आधार पर पर्यावरणविदों और जीव विज्ञानियों ने निकाले हैं। 7 दिसंबर, 2009 को कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर आरंभ हुए संयुक्त राष्ट्र की 15वीं कांफ्रेंस के नतीजे विकासशील देशों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। यद्यपि भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण एशिया ने अमेरिका से राजनीतिक समझौता किया, जिससे गर्म हो रही धरती के तापमान में दो डिग्री की कमी लाने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती का इरादा जताया गया है।

समझौता औपचारिक तौर पर स्वीकृत तो नहीं माना जा सकता, लेकिन वह ‘गौर करने लायक’ जरूर है। कांफ्रेंस में कई चिन्तनीय सच सामने आए हैं। वर्ष 2009 इतिहास का पांचवां सबसे गर्म साल रहा, यह कैसे बचाएं कृषि को ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से निष्कर्ष निकाला विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने। गर्म हो रही धरती का सबसे अधिक प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। भारत के संदर्भ में यह चेतावनी अत्यधिक महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला कृषि है।

कोपेनहेगन में ‘‘ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2010’’ द्वारा जारी सूची में भारत उन प्रथम दस देशों में है जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक ठंड के दिनों का तापमान 3.2 डिग्री और गर्मी का 2.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। तब मानसून की बारिश कम हो जाएगी और ठंड में होने वाली बारिश भी 10-20 फीसदी तक कम होने की आशंका है।

वर्षा की मात्रा कम या ज्यादा होने के अलावा इसके समय में बदलाव का भी फसलों पर बुरा असर पड़ेगा। जलवायु में होने वाला यह परिवर्तन हमारी राष्ट्रीय आय को भी प्रभावित कर रहा है और राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा पिछले तीन सालों में 1.5 प्रतिशत तक कम हुआ है।

वर्ष 2007-08 में यह 17.6 प्रतिशत ही रह गया। 2009 का वर्ष हमारे लिए एक चेतावनी भरा वर्ष रहा है। इस वर्ष 23 प्रतिशत तक कम वर्षा हुई है जिससे फसलें सूख गईं। फलस्वरूप न केवल खाद्यान्नों की कमी का सामना करना पड़ रहा है वरन् खाद्यान्नों की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। एक अनुमान के अनुसार इस वर्ष सूखे की वजह से 20,000 करोड़ रुपए के खाद्यान्नों का नुकसान हुआ है। हमें अब यह सोचना पड़ेगा कि हमारी कृषि व्यवस्था में किस प्रकार के परिवर्तन किए जाएं जो ‘क्लाइमेट-प्रूफ’ हों।

कोपेनहेगन में आयोजित कांफ्रेंस में कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने जलवायु परिवर्तन के भारतीय कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में कहा कि इससे लगभग 64 प्रतिशत लोगों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ेगा जिनके जीवनयापन का साधन कृषि है और सबसे बड़ा डर खाद्य सुरक्षा से संबंधित है।

पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा भी था कि सब कुछ इंतजार कर सकता है लेकिन कृषि नहीं। कृषि एवं जलवायु परिवर्तन का भीषणतम प्रकोप सर्वहारा वर्ग पर पड़ रहा है, जिनकी आय का 50 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा अनाज खरीदने, पानी व स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से अपने को बचाने में खर्च होता है।

ऐसा अनुमान है कि सूखे के कारण खरीफ की फसल में 7.5 प्रतिशत तक तथा मुख्य फसल चावल एवं अन्य अनाज दलहन, तिलहन में लगभग 19.7 प्रतिशत तक कमी की संभावना हो सकती है। भारत में खाद्य उत्पादन में 5 प्रतिशत कमी की संभावना जीडीपी को एक प्रतिशत तक प्रभावित करेगी। इस मात्रा में खाद्यान्न उत्पादकता में कमी बहुत ही हानिकारक है क्योंकि विगत् कई वर्षाें से मानसून की स्थिति ठीक नहीं रही है।

इस वर्ष मानसून के समय में बदलाव की वजह से 51 प्रतिशत तक कृषि भूमि प्रभावित हुई है। नौ प्रतिशत आर्थिक विकास की दर को तभी बनाए रखा जा सकता है जबकि देश में कृषि उत्पादन सही समय पर अच्छे तरीके से हो। स्थिति और भी गंभीर होने के संकेत हैं क्योंकि तापमान बढ़ने से रबी की फसल को नुकसान होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बोवनी के बाद ठंड और ओस में ही गेहूं और चने के पौधे वृद्धि करते हैं। उनमें नई शाखाएं निकलती हैं लेकिन तापमान बढ़ा होने के कारण छोटे-छोटे पौधों में भी बालियां आ गई हैं। ऐसे में दानों का आकार छोटा और पैदावार कम होने की आशंका है। प्रो. स्वामीनाथन ने कहा है कि तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से भारत में 7 मिलियन टन गेहूं के उत्पादन मे कमी आएगी, जिससे 1.5 बिलियन डॉलर का वित्तीय नुकसान होने की संभावना है। तापमान में बढ़ोतरी से देश के कई इलाकों में दिसंबर में ही आम के पेड़ों में बौर दिखने लगे हैं।


कृषि पर ग्लोबल वार्मिंग का असरकृषि पर ग्लोबल वार्मिंग का असर एक अध्ययन के अनुसार यदि तापमान में एक से चार डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है तो भोज्य पदार्थों के उत्पादन में 30 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। जैसे भारत में चावल का वार्षिक औसत उत्पादन 90 मिलियन टन है। तापमान के बढ़ने से इसमें 2020 तक 6.7 प्रतिशत, 2050 तक 15.1 प्रतिशत, 2080 तक 28.2 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। गेहूं के उत्पादन में 2020 तक 5.2 प्रतिशत, 2050 तक 15.6 प्रतिशत, 2080 तक 31.1 प्रतिशत तथा आलू के उत्पादन में 2020 में तीन प्रतिशत, 2050 में 14 प्रतिशत तक कमी होने की संभावना है। सोयाबीन का उत्पादन 2070 तक 5-10 प्रतिशत तक कम होने की संभावना है जबकि सभी खाद्य पदार्थों की मांग में वृद्धि ही होगी। इन सबके अलावा जलवायु परिवर्तन के कुछ और भी प्रभाव खाद्य पदार्थों पर होंगे।

यह फसलों की पौष्टिकता को प्रभावित करेगा। पौष्टिक तत्व जड़ों से फलों तक कम मात्रा में पहुंचेंगे। खाद्यान्न कम वजन के होंगे। फलस्वरूप प्रति हेक्टेयर उत्पादकता प्रभावित होगी। फल एवं सब्जियों के पेड़-पौधों में फूल तो खिलेंगे किंतु फल या तो कम आएंगे या कम वजन और पौष्टिकता वाले होंगे, उनकी पौष्टिकता प्रभावित होगी। बासमती एवं दूसरे प्रकार के चावलों की खुशबू प्रभावित होगी।

परंपरागत फसलें गैर-परंपरागत क्षेत्रों में उगाई जा सकेंगी। तापमान वृद्धि से समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटीय इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोग पहले तो अपने जलस्रोतों के क्षारीय हो जाने की समस्या झेलने को मजबूर होंगे और फिर उनके खेतों और घरों को समुद्र निगल जाएगा। सामुद्रिक सतह के तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने से बहुत से समुद्री जीव-जन्तु ऐसे स्थानों में चले जाएंगे जहां पर वह पहले कभी नहीं रहे।

हिमालय के ग्लेशियर प्रति वर्ष 30 मीटर की दर से घटने लगेंगे जिससे उत्तर भारत के राज्यों में खेती के लिए पानी का संकट पैदा हो जाएगा। आने वाले वर्षों में जलवायु में केवल इन दो बदलावों से करीब पांच करोड़ भारतीय प्रभावित होंगे। इनमें से अधिसंख्य पर्यावरण शरणार्थी के रूप में शहरों की ओर पलायन करेंगे।

एक तरफ जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ा है तो अप्रत्यक्ष प्रभाव आय की हानि और अनाजों की बढ़ती कीमतों के रूप में परिलक्षित हो रहा है।

उपाय


जलवायु परिवर्तन की समस्या का सामना करने के लिए युद्ध-स्तरीय तैयारी की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़, महामारी और कृषि उपज में कमी से जिस बड़े पैमाने पर मौतें होने का अंदेशा है उतनी मौतें तो पृथ्वी पर अब तक हुए किसी भी युद्ध में नहीं हुई। जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों से फसलों को बचाने के लिए हमें जल्दी ही विभिन्न उपायों को अपनाना होगा।

जलवायु के बदलाव के बारे में प्रतिदिन नए समाचार, नए आंकड़े और नए विश्लेषणों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अब भूमण्डल स्तर के ऐसे पर्यावरणीय बदलाव हो रहे हैं जिनके कारण पानी की उपलब्धता और भी विकट होने वाली है। ऐसी स्थिति में पानी की एक बूंद को भी व्यर्थ नहीं जाने देना है। जल संरक्षण को रचनात्मक जन-आंदोलन का रूप देकर आम लोगों का योगदान प्राप्त करना सबसे बड़ी जरूरत है। इसके लिए हमें वाटर हार्वेस्टिंग के अलावा पानी को संग्रह करने के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं करनी होंगी।

खेती में ऐसी तकनीकी का प्रयोग करना होगा जो पानी की बचत कर सकें। भारत में पिछले कई वर्षों से जल संरक्षण, नमी संरक्षण और भूजल दोहन की योजनाएं लागू की गई हैं, लेकिन इसके मिश्रित परिणाम ही प्राप्त हुए हैं। इस संदर्भ में तकनीकी के अधिकतम इस्तेमाल से काफी कुछ हासिल किया जा सकता है। इसरो द्वारा सेटेलाइट मैपिंग अधिकतम परिणाम हासिल करने की दिशा में वॉटरशेड मैनेजमेंट में बेहद लाभकारी सिद्ध हुई है। हमें सिंचाई परियोजनाओं पर और अधिक खर्च करना होगा।

भारत में 80 प्रतिशत खेत एक हेक्टेयर से भी छोटे हैं। ऐसी स्थिति में छोटे एवं सीमान्त किसानों को जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप बार-बार आने वाली बाढ़ एवं सूखे का सामना करना बहुत कठिन होता है। अतः प्रो. स्वामीनाथन के अनुसार जिस प्रकार दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में स्व-सहायता समूह एवं सहकारी संगठन कार्य कर रहे हैं, उसी प्रकार छोटे किसानों के लिए स्व-सहायता समूह आधारित कृषि जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न फसलों की घटती उत्पादकता एवं खाद्यान्न संकट से बचने का अच्छा उपाय है। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप भारत पुनः खाद्यान्न पदार्थों की कमी के दौर में प्रवेश कर रहा है जबकि खाद्यान्न पदार्थों की कीमतें विश्व स्तर पर बढ़ रही हैं।

ऐसी स्थिति में खाद्य सुरक्षा के लिए सरकार की अनाज भंडारण की क्षमता बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। फसल सुरक्षा के लिए बीजों का भंडारण भी उतना ही महत्वपूर्ण हो चुका है। अब यह बहुत आवश्यक हो गया है कि हम भंडारण के आधुनिक तरीकों एवं संरचनाओं का इस्तेमाल करें, जिससे फसल कटने के बाद होने वाले नुकसान से बचा जा सके।

नए शोधों के द्वारा ऐसे नई बीजों, फसलों का विकास किया जाना चाहिए जो सूखे और अधिक तापमान को झेल सकें तथा पानी, उर्वरकों की आवश्यकता भी कम हो। इस प्रकार के शोधों के लिए नीति निर्धारकों को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।

ऐसी फसलों के बारे में कृषकों को समय रहते जानकारी देनी चाहिए। सरकार को जलवायु शोध एवं प्रबंधन संस्थान कृषि शोध संस्थानों के आसपास स्थापित करना चाहिए, ताकि जलवायु में हो रहे क्षेत्रवार परिवर्तनों के आधार पर फसलों को परिवर्तित किया जा सके। सूखे के समय नीति निर्धारकों को राशि आबंटित करते समय तात्कालिक कारण एवं उपायों के अलावा लंबी अवधि के उपायों पर भी ध्यान देना चाहिए। बंजर भूमि विकसित करके उसे खेती योग्य बनाना चाहिए।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि यदि देश में खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य हासिल करना है तो सूखाग्रस्त और खराब भूमि को विकसित करने का काम तेजी से करना होगा। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के अनुसार सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए प्रतिवर्ष 7000 करोड़ रु. की राशि आबंटित करनी चाहिए। वर्तमान में यह राशि सूखे के कारण उत्पादन में हुई कमी का 30 प्रतिशत से भी कम है।

बढ़ी हुई राशि का प्रयोग सिंचाई व कृषि के लिए अधोसंरचनात्मक सुविधाओं के लिए अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। यदि नीति निर्धारक समय रहते पर्याप्त विनियोग का निर्णय लेते हैं तो किसानों को राहत मिल सकेगी और वे कृषि कार्य को जारी रख सकेंगे। इसके अलावा इस समस्या से निपटने के लिए सार्वजनिक एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों में और अधिक विनियोग करना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में ऐसे तरीकों की समीक्षा किया जाना आवश्यक है जिसके द्वारा हमारे कृषक जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न कठिनाइयों का सामना करते हुए फसलों का उत्पादन कर सकें एवं उन्हें समुचित लाभ भी हो। कृषि से उनका मोह भंग न हो। समुद्री तटों में रहने वाले समुदायों की रक्षा हेतु उपाय करना आवश्यक है और इसे राष्ट्रीय मिशन में शामिल किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय बातचीत भी महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों से बचने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी, संस्थागत सुधारों की एवं नीतियों में संशोधन की अत्यंत आवश्यकता है। हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए- ‘‘चिडि़या कितनी उड़े आकाश, दाना है धरती के पास’’।

भारत में राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा


वर्ष

राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा

195-51

55.40

1960-61

51.3

1965-66

42.7

1968-69

44.4

1970-71

47.5

1980-81

46.0

1990-91

45.1

2000-01

45.0

2007-08

17.6



(लेखिका हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल में अर्थशास्त्र की सहायक प्राध्यापक हैं।)

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