इशारे को समझे समाज

Submitted by Hindi on Sat, 11/22/2014 - 11:54
Source
परिषद साक्ष्य, धरती का ताप, जनवरी-मार्च 2006

बड़े बांध और बड़ी परियोजनाओं के नाम पर हमेशा से शहर और गांव से लाखों की आबादी का विस्थापन होता आया है। अब यह कोई अचरज में डालने वाली बात नहीं रही, क्योंकि विकास के फायदे किस कीमत पर मिलेंगे इस पर बहस की गुंजाइश पूंजीवादी सत्ता नहीं छोड़ती है। यही वजह है कि सत्ता द्वारा लादा गया विकास आम जनमानस की तबाही की कीमत मांगता है। यह कीमत भारत की जनता ने न जाने कितनी बार चुकाई है। इसका सहज अनुमान तो अरुंधति राय के 'हरसूद 30 जून' पुस्तक में छपे लेख 'हां, हरसूद और बगदाद में बहुत समानता है' में दिए गए आंकड़ों के आधार पर सहजता से लगा सकते हैं।

08 अक्टूबर, 2005 को भूकंप से हुई तबाही ने समाज को फिर से एक चेतावनी दी है कि प्रकृति के साथ अच्छे संबंध स्थापित करना सीख लें अन्यथा प्रलय में उसके झूठे विकास का दंभ दफन हो जाएगा। मानव सभ्यता का स्थायी या दीर्घकालिक विकास प्रकृति के नियमों के साथ तालमेल बिठाकर ही किया जा सकता है। प्रकृति का अपना एक हिसाब-किताब है जिसकी अनदेखी कर किए जा रहे विकास हमें तबाही की ओर ही ले जाएंगे। इसके अनेक प्रमाण हमारे सामने हैं। गुजरात के कच्छ, महाराष्ट्र के लातूर और उत्तराखंड के चमोली में भूकंप से हुई तबाही हमारे लिए काफी नहीं थी, इसलिए हमने अपने विकास के रास्ते बदले नहीं हैं। तभी तो पाक अधिकृत कश्मीर और जम्मू-कश्मीर में लगभग 90 हजार लोग मारे गए। कई गांव नेस्त व नाबूद हो गए। पानी के झरने और स्रोतों में साफ और स्वच्छ पानी की जगह पीने के सर्वथा अयोग्य पानी बहने लगा है। भूकंप के तुरंत बाद बर्फ के गिरने से बसेरे छिन गए और लोगों को तंबुओं में ठंड से लड़ने को मजबूर होना पड़ा। तबाही का मंजर दिल दहला देने वाला था। प्रकृति पर विजय पाने की लालसा मनुष्य को हमेशा से महंगी पड़ी है। लेकिन प्रकृति तो मनुष्य पर विजय पाने की लालसा कभी भी नहीं रखती है। वह तो हमेशा देना ही चाहती है। वह समता का दृष्टिकोण रखती है। परंतु वह यह जरूर चाहती है कि उनके नियम, जो सैकड़ों-हजारों साल में बने हैं, वह बगैर समझदारी विकसित किए हुए पल में तोड़े नहीं जाएं। वह विकास का भी विरोध नहीं करती है। मगर वह यह तो ज़रूर चाहती है कि कोई भी विकास उसके तर्क को समझे बगैर न हो।

भू-गर्भ वैज्ञानिक बहुत समय से यह चेतावनी दे रहे थे कि हिमालय पर्वतमाला की गोद में बसे भारत, पाकिस्तान,बांग्लादेश, नेपाल, भूटान आदि देशों में कभी भी एक या इससे अधिक भूकंप आ सकते हैं। उनका मानना है कि भारत और तिब्बत के मध्य टेक्टोनिक प्लेटों के बीच भारी दबाव बन रहा है, जिससे पांच करोड़ आबादी बुरी तरह प्रभावित होगी। पिछली घटनाओं से सबक लेकर हमने आगे की तैयारी नहीं की। हमने बहुमंजिली इमारतों के बनने पर रोक नहीं लगाई। मकानों में भूकंप रोधी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया। बड़े बांध बनने से नहीं रोके और भूकंप आने की जानकारी हमें पहले से हो जाए, इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। दरअसल ऐसी अनदेखी केवल भारत में ही नहीं बल्कि ज्यादातर जगहों पर की गई है। अमरीका में कैटरीना और रीटा से इतनी तबाही नहीं मचती, अगर वहां की सरकार ने 'डाड़क' की मरम्मत की अभियंताओं द्वारा दी गई सलाह मान लिया होता। वहां के अभियंताओं ने प्रशासन की गैर जिम्मेदारियों से तंग आकर इस्तीफा दे दिया। वस्तुत: पूंजीवादी सत्ता आम जनता का इस्तेमाल अपनी समृद्धि के लिए करती है और इसके बदले में सत्ता उसे भूख, बेरोजगारी और मौत तक देती है। जबकि सत्ता कोई भी योजना-परियोजना लागू करने के पीछे आम जनता का बहुत लाभ दिखाती है। सत्य तो यह है कि वह लाभ कभी भी एक बहुत छोटे वर्ग के लिए ही होता है। भूकंप एक प्राकृतिक विपदा तो है परंतु इसके लिए हम कितने दोषी हैं, इसे भी समझना जरूरी होगा।

दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलौर, इलाहाबाद, कानपुर, पटना आदि शहरों में बहुमंजिली इमारतों का प्रचलन-सा है। ताज्जुब की बात यह है कि इसे अच्छा माना जाता है। परंतु पृथ्वी पर पड़ने वाले इसके अत्यधिक भार विपरीत परिणाम के रूप में प्रकट हो रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार मुंबई को शंघाई बनाने पर आमादा है। मुंबई को शंघाई बनाने के सारे दावे खोखले साबित हो गए जब लगातार बारिश ने शहर को पूरा डुबो दिया। यह घटना भी प्रकृति के नियमों की अनदेखी का ही नतीजा है। यह बहस का अलग ही मुद्दा है। फिलहाल शंघाई के विकास को देखें तो यह विकास अस्थायी और कमजोर है। वहां की इमारतें गगन को चूमना चाहती थीं। कुछ ही वर्षों में वे इमारतें जमीन में धंसने लगी हैं। इमारतों में दरार पड़ने लगी है। भविष्य में यहां कभी भी कोई हादसा आकार ले सकता है। क्या हम ऐसे विकास को आधार बनाकर गगन को चूमने की इच्छा पाल सकते है? इस भूकंप में भी बड़ी तबाही का एक बड़ा कारण बहुमंजिली इमारतें और गलत तरीके से निर्मित भवनों के कारण ही है। एक अध्ययन के अनुसार कुछ वर्ष पहले गुजरात के कच्छ में आए 17 सितंबर के भूकंप के झटकों में सबसे कम नुकसान छोटे घरों को ही हुआ था। गौर करने योग्य बात यह है कि औद्योगिक विकास का विकेंंद्रीकरण नहीं किया गया है। जिसके कारण सारे विकास बड़े शहरों में ही सिमट कर रह गए हैं। इस वजह से जनसंख्या का दबाव भी इन्हीं क्षेत्रों पर पड़ा है। बड़ी आबादी को छोटे क्षेत्रफल पर बहुमंजिली इमारतें बनाकर ही बसाया जा सकता है। अच्छा तो यह होता कि उद्योगों की इकाई का विकेंद्रीकरण ही कर दिया जाता।

अंग्रेजों ने सिंचाई व्यवस्था के लिए नहर और बांध की अवधारणा हमें दी, जिसके परिणाम अधिकांशत: नकारात्मक ही रहे हैं। एक घन मीटर पानी का भार एक टन के बराबर होता है। हिमालय और उसकी तराई जो भूकंप की दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील है। वहां बहुत बड़ी-बड़ी परियोजनाएं लाद दी गईं। केवल पश्चिमी हिमालय में दर्जन से ज्यादा बांध की योजना है। इनमें कुछ काम कर रही हैं, कुछ निर्माणाधीन हैं। करोड़ों-अरबों की लागत से बनने वाली इन बांध परियोजना की ऊंचाई बहुत ज्यादा होती है। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इनमें कितने घन मीटर पानी का दबाव बनेगा। वाडिया इंस्टिच्यूट ऑफ हिमालयन जियालॉजी केभूत-पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस पी नौटियाल ने टिहरी परियाजना के संबंध ने कहा था कि इस क्षेत्र की सारी चट्टानें फटने वाली किस्म की हैं, इसलिए इतने बड़े आकार के बांध के लिए सशक्त नींव नहीं बन सकती। यहां शहरों, महानगरों को चकाचौंध करने को लेकर दी गईं इन चेतावनियों के बावजूद उत्तराखंड के फेलंडा में बड़ी परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है।

इन बांधों से केवल भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा नहीं आती है बल्कि हिमाचल प्रदेश के मणिकरण तापघर के लिए संचित जल भंडार के बढ़ जाने से बाढ़ का संकट भी आया था। हजारों-हजार एकड़ जंगल उजाड़ दिए जाते हैं। लोगों को उनकी मिट्टी, संस्कृति से उजाड़ दिया जाता है। पुनर्वास का झूठा ढ़ोंग हर बार रचा जाता है, लेकिन कभी टिहरी, कभी विष्णु प्रयाग और कभी हरसूद उजड़ते हैं। ऐसे उजाड़े गए लोगों की संख्या केवल भारत में 3.5 करोड़ है। अगर इतनी बड़ी तबाही के बाद भी हम नहीं संभल पाए तो उजड़ते हिमालय को बचाने की सुंदरलाल बहुगुणा की ज़द्दोजहद हमारे काम नहीं आएगी। भूकंप, बाढ़, तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं का असर और बढ़ेगा। संख्या सैकड़े और हजार से बढ़कर लाखों में पहुंचेगी। 1923 में भूकंप की तबाही से जापान में 1.43 लाख, 1976 में चीन में 6.55 लाख और 2004 में इंडोनेशिया में 2.20 लाख लोग मारे गए। जापान अब भी ज्वालामुखी के ढेर पर बैठा है परंतु उसने प्रकृति से साहचर्य स्थापित करना सीखा है। भूकंप के झटके वहां रोज़ महसूस किए जाते हैं, परंतु नुकसान नदारद ही होता है। शायद विकास के इसी मापदंड को हमें स्वीकार करना होगा तभी हम ऐसे जलजलों से छुटकारा पा सकेंगे।

पहले हरसूद अब टिहरी और….
बड़े बांध और बड़ी परियोजनाओं के नाम पर हमेशा से शहर और गांव से लाखों की आबादी का विस्थापन होता आया है। अब यह कोई अचरज में डालने वाली बात नहीं रही, क्योंकि विकास के फायदे किस कीमत पर मिलेंगे इस पर बहस की गुंजाइश पूंजीवादी सत्ता नहीं छोड़ती है। यही वजह है कि सत्ता द्वारा लादा गया विकास आम जनमानस की तबाही की कीमत मांगता है। यह कीमत भारत की जनता ने न जाने कितनी बार चुकाई है। इसका सहज अनुमान तो अरुंधति राय के 'हरसूद 30 जून' पुस्तक में छपे लेख 'हां, हरसूद और बगदाद में बहुत समानता है' में दिए गए आंकड़ों के आधार पर सहजता से लगा सकते हैं। उनका मानना है कि भारत में ही 3.5 करोड़ लोगों को बड़े बांधों के निर्माण के कारण उजाड़ा जा चुका है। सबसे बड़ी त्रासदी तो यह है कि उस क्षेत्र में बसे जंगल और जंगल में बसी आबादी की शिद्दत से रची और बसाई गई संस्कृति को बगैर किसी समझौते के या उचित मुआवजे के उजाड़ दिया जाता है।

टिहरी जलाशय में 1600 एकड़ घना जंगल डूब रहा है। सर्वविदित है कि भारत के कुल क्षेत्रफल पर वनों के आच्छादन के कागजी सच पर विश्वास किया जाए तो भी यह मात्र 19 प्रतिशत ही है। सिद्धान्तत: कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत भूखंड वनाच्छादित होना चाहिए। पर्यावरण संकट के इस दौर में 1600 एकड़ सघन वनों को डुबाया जाना किसी बड़ी साजिश जैसा ही प्रतीत होती है। ऐसी परियोजनाओं को मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो हमेशा ही परिणाम नकारात्मक रहे हैं। हरसूद की बरसी के आंसू अभी सूखे भी नहीं थे कि टिहरी के मातम की तैयारी हमारे विकास के पुरुषार्थ ने कर दी। हालांकि इसकी योजना कोई नई नहीं है बल्कि यह वर्षों में बहुत तेजी से तैयार की गई परियोजना है। नर्मदा सागर परियोजना का शिलान्यास करते हुए तात्कालिक प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने बड़े बांधों के निर्माण से अपनी असहमति जताई थी। इन सबके बावजूद उत्तराखंड उच्च न्यायालय का फैसला सुरंग टी-2 को बंद करने के आते ही बड़े चाक-चौबंद के बीच सुरंग के दरवाजे गिरा दिए गए। दरअसल प्रकृति को देवी-देवताओं के प्रतीक रूप में मानने वाले हमारे इसी समाज का एक हिस्सा, जो अपने ज्ञान और विज्ञान के दंश पर इतना इतराता है कि वह प्रकृति के नियमों की उपेक्षा नालायक संतान की तरह कर देना फैशन जैसा समझता है।

इस परियोजना से 1000 मेगावाट बिजली उत्पन्न करके कुछ लाख घरों को रोशन करके करोड़ों लोगों की आस्था को तिलांजलि दी जा रही है। गंगा, गोदावरी, यमुना और भागीरथी तो हमारे संस्कार में रच-बस गई हैं। आश्चर्य यह है कि गंगा को हिन्दू संस्कृति का सूचक मान कर अपनी राजनीति को रंग देनेवाली सांप्रदायिक शक्तियों की शक्ति अयोध्या में मंदिर बनाने और स्वयात्रा निकालने में ठस हो गई दिखती है। अब धर्म के नाम से ही सही, उनमें उबाल नहीं आता है। सच तो यह है कि उनके पीछे चलनेवाली सीधी-सादी जनता भी अब उनके राम नाम के ढोंग को समझकर उनके नाम से ही बिदकने लगी है। ऐसे में, अपने मुद्दों के लिए तो अपने लोगों को साथ लेकर लड़ना साबित होगा। बिजली नहीं हो, विकास न हो ऐसी बात करना तो बेईमानी है।

परियोजना छोटी हो तो उसके फायदे छोटे और कई चरणों में होंगे, परंतु ऐसे विकास स्थायित्व की गारंटी वाले होते हैं। ऐसी छोटी परियोजनाओं के खतरे भी छोटे और सीमित होते हैं। चीन में लगभग 90 हजार छोटी-छोटी बिजली की परियोजनाएं चल रही हैं। इन परियोजनाओं से न ही विस्थापन के खतरे उत्पन्न होते हैं, न ही हजारों एकड़ जंगल बर्बाद होते हैं और न ही किसी बड़ी घटना की आशंका हमेशा हमारे अंदर कोई डर पैदा करती हैं।ऐसी परियोजना की देखभाल हमारा समाज कम खर्चीले अंदाज में कर सकता है। दरअसल परियोजना में समाज की हिस्सेदारी है या हो सकती है ऐसा सत्ता पर आरूढ़ कोई भी दल वर्तमान समय में नहीं सोचता है। अन्यथा इतने लोगों की तबाही कोई संवेदनशील सरकार कैसे बर्दाश्त कर सकती? इस टिहरी परियोजना पर लगभग 8 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। हालांकि शुरुआती दौर में इस पर 200 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान किया गया था।

हालांकि सुरंग वाली परियोजना का निर्माण आसान होता है। परंतु टिहरी सुरंग परियोजना के खतरे को देखते हुए ऐसी परियोजना को इजाजत देना इतिहास की एक बड़ी भूल साबित होनी तय है। पश्चिमी हिमालय में जहां टिहरी परियोजना ने आकार लिया है, वहां भूकंप के खतरों के आसार बहुत ज्यादा हैं। 260.5 मीटर ऊंची यह परियोजना एशिया की सबसे भीमकाय परियोजना है। इस बांध की झील 5 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है और 23 मीटर गहरी है।

भूगर्भ विज्ञानी प्रो. टी शिवाजी राव तो इसे 'टाइम बम' मानते हैं। उनका मानना है कि अगर किसी कारण-वश टूटन या दरार पड़ती है तो यह मात्र 22 मिनट में खाली हो जाएगा। इससे मचने वाली तबाही का प्रभाव पश्चिम बंगाल तक गंगा के तटवर्ती इलाकों में पड़ेगा। ऐसे कई क्षेत्रों की पहचान की गई है जो बाढ़ के रास्ते में नहीं पड़ते हैं, परंतु अगर बांध टूटता है तो हिमाचल प्रदेश, ऋषिकेश, हरिद्वार, बिजनौर, हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर में भी बाढ़ से भयंकर तबाही मचेगी। इस क्षेत्र में भूकंप की संभावना एक अलग चुनौती लिए मानव समाज में भय भरती रहेगी। 1991 में उत्तरकाशी की धरती रिक्टर पैमाने पर 6.6 की तीव्रता से और चमोली 6.8 की तीव्रता से थर्रा उठी थी। इससे हुई तबाही को याद करके आज भी वहां के स्थानीय निवासियों की आंखें नम हो जाती हैं। प्राकृतिक तबाही लोगों के मन में खौफ पैदा करती है, क्योंकि वह मानव समाज की लगातार की गई गलतियों का हिसाब सूद सहित लौटाती है। एक और बात यह है कि यह समाज के बड़े हिस्से को बगैर किसी भेद- भाव के पीड़ा पहुंचाती है। इसलिए सभी पर डर की छाया एक-सी होती है।

परियोजना में लगे लोग हमेशा सारी आलोचनाओं के लिए अपने तर्क जुटाते हैं परंतु रामायण की एक कथा को समझने की कोशिश करें तो संभव है सारे तर्कों के उत्तर आप ही आप मिल जाएंगे। रामायण की कथा के अनुसार 'शिव के धनुष' की महिमा अपरं-पार थी। उनका धनुष 'पिनाक' इतना मजबूत था कि उसे तोड़ने के लिए योद्धाओं को ललकारा गया। तोड़ना तो दूर उसे कोई हिला भी नहीं पा रहा था। रामचंद्र जी ने उसे एक झटके में तोड़ दिया था। कथा कहने का तात्पर्य यह है कि सारी समस्याओं से लड़ने की योजना बना ली है ऐसे तर्क देने वाले को प्रकृति की शक्ति का अंदाज अपने हिसाब से नहीं बल्कि प्रकृति के बनाए नियमों को सावधानीपूर्वक जांच-परख कर लगानी चाहिए। स्थायी विकास की शर्त यह है कि प्रकृति के साथ साहचर्य बिठाकर चलने से ही खतरों को टाला जा सकता है।

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