जंगल एक कक्षा है

Submitted by Hindi on Tue, 11/25/2014 - 11:02
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परिषद साक्ष्य, धरती का ताप, जनवरी-मार्च 2006
.मेरे कमरे में एक कैलेंडर है। कैलेंडर में छह पेज हैं और ऊपर छपी तस्वीरें जंगली जानवरों की हैं। एक पर शेर का चित्र है। एक पर बंगाल का बाघ छपा है। तीसरे पर एक तेंदुआ है, जो पत्तों में छिपा है। चौथे पर छलांग लगाता लंबा-तगड़ा चीता है। पांचवें पर जंगली भैंसे और छठे पृष्ठ पर बनैले सूअर हैं। ड्राइंग रूम में तो वैसे भी हम इनके अंग-उपांग सजाते रहे हैं- कहीं सींग, कहीं खाल, कहीं माथा, कहीं बाल, कहीं कुछ, कहीं कुछ। इन सबके पीछे शायद यही सब निहित रहता है कि हम भी अच्छे लगें, वे भी अच्छे लगें। लेकिन मुझे वे तस्वीरें कुछ और कहती दिखाई पड़ती हैं। पंखे की हवा जब इन कागजी पृष्ठों के लिये आंधी बन जाती है और वे पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं तो सब कुछ गड्डमड्ड होकर सामने एक जंगल बन जाता है, वे जानवर चौंकते हैं, भागने लगते हैं, यह कहते हुए कि हमें केवल कैमरे और कमरे में ही कैद रखोगे? और तब सचमुच कमरे से बाहर आकर उनके बारे में सोचने का मन करता है।

मैं अपने एक दोस्त के यहां जाता हूं। उनके ड्राइंग रूम में एक बहुत बड़ा फोटो टंगा हुआ है। मेरे दोस्त के पितामह बंदूक लिये एक मरे हुए शेर पर बहादुरी के साथ खड़े हैं। बड़ा रोबदार असर पड़ता है। और तब मन फिर बुझ जाता है। सोचता हूं कि एक निहत्थे और निर्दोष जानवर के प्रति कई लोगों का दिखाया गया यह पराक्रम क्या वास्तव में पराक्रम है? मनुष्योचित है? रक्षा का दायित्व मनुष्य का कर्तव्य है। संसार को संरक्षण देने में वह हर तरह से प्रयत्नशील रहा है। और संसार के जीवों के प्रति दया दिखाते रहने वाला वह व्यक्ति निश्चय ही शिक्षक रहा होगा, बाहर से भी और भीतर से भी। शिक्षक की बहुत बड़ी भूमिका है। वह गर्जन का विरोध करता है और सभी को संरक्षण देता है।

शिक्षक तीन तरह के होते हैं- व्यवसाय या वृत्ति से, व्यवहार से और प्रवृत्ति या स्वभाव से। वृत्ति से तो कोई भी शिक्षक कहला सकता है, मगर होता है वह व्यवहार और स्वभाव से ही। और सच मानिये कि अच्छी बात कहने वाला या अच्छा काम करनेवाला, किसी न किसी रूप में शिक्षक की भूमिका ही निभाता है। समझाकर, बुझाकर, कुछ करके दिखाकर। डॉ. सलिम अली या रमेश बेदी या नरेश बेदी आदि अनेक लोग शिक्षक का ही कार्य तो करते रहे हैं। पशुओं और पक्षियों को सुरक्षा प्रदान करने का संकल्प लेकर ये लोग शिक्षक बन गये हैं। लेनेवाले से देने वाला बड़ा होता है और बचाने वाले से भी बड़ा वह होता है, जो मारने नहीं देने का बीड़ा उठाता है।

हम परंपराओं को स्मरण ही न रखें, बल्कि दूसरों को उनका स्मरण दिलाते रहें। छात्र जानें कि वे स्वस्थ परंपराएं कौन-सी हैं, जो हमारे वर्तमान को स्वस्थ और भविष्य को अस्वस्थ बनाये हुये हैं। वे आश्रम, गुरुकुल आज भी नहीं भूलते। घनघोर जंगल में छात्र और गुरु, कुटिया बनाकर विद्याभ्यास में लीन रहते थे। वन्य प्राणी उनके सहचर, सखा और मित्र होते थे। हिरणों का झुंड कुलांच भरता रहता था। ये उन्हें पालते थे और अन्य जीवों का भी पोषण करते थे। गुरुकुल के आस-पास आखेट वर्जित होता था। इस नियम का पालन राजा भी करते थे और प्रजा भी। ये दृष्टांत आज भी महत्व के हैं।

हम अपने छात्रों को भारत के अवतारवाद की वैज्ञानिकता के बारे में बताएं। ये अवतार कोरी कल्पना या थोथी धर्मभावना पर आधारित नहीं हैं। अवतारवाद में सृष्टि के विकास की वैज्ञानिक प्रक्रिया अन्तर्निहित है: जलमग्न पृथ्वी से पहले मीन यानी मछली, फिर कच्छप यानी कछुआ, फिर वराह यानी सूअर, फिर नृसिंह अर्थात् आधा पशु और आधा मनुष्य। डारविन का सूत्र छोड़ भी दें तो विकास का यह भारतीय सोपान कम सुदृढ़ नहीं दिखता। इन अवतारों की प्रासंगिकता, आज वन्यप्राणियों के संरक्षण हेतु और बढ़ गई है। ईश्वर समझकर ही इनका नाश न होने दें। देवताओं के वाहन याद हैं आपको? गणेश की सवारी चूहा, शिव वृषभ पर आसीन हैं, विष्णु को गरुड़ प्रिय हैं, शीतला को गधा अच्छा लगता है, लक्ष्मी को उल्लू पसंद है, भैरव को श्वान (कुत्ता) तथा दुर्गा को शेर भाता है। क्या यह केवल संयोग है? नहीं। यह हमारी उदारता है। संरक्षण के दायित्व के प्रति हमारा कर्तव्य बोध है। हमने विभिन्न पेड़ों के साथ भी अपने देवताओं को जोड़ा और उनकी रक्षा का भार उठाया। आज पेड़ काटते हुए हमारे हाथ क्यों नहीं थरथराते? सुंदरलाल बहुगुणा की तो आत्मा तक कांप जाती है! घर में तो जंगल लगा देते हैं, बाहर एक पौधा क्यों नहीं लगाते? क्या हो गया है हमे?

महाभारत के शांतिपर्व में एक पक्षी मनुष्य से कहता है कि मनुष्य और पक्षी का सबंध दो ही तरह का है- एक बध का और दूसरा बंध का यानी पकड़कर खा जाओ या पकड़कर पिंजड़े में डाल दो और तड़पते देखकर अपना मनोरंजन करो। अन्य जीवों के बारे में भी यही बात है। या तो नेस्त व नाबूद कर दो या जीवित रखकर तमाशा बना दो। पेरिसवालों ने मुन्ना भालू को द्रवित होकर ही बचाया होगा। सिद्धार्थ ने देवदत्त द्वारा घायल पक्षी को पसीजकर ही बचाया था। गिद्धराज जटायु के माथे पर राम ने हाथ फेरा था। वाल्मीकि तो क्रौंचवध से मर्माहत हो गये थे। क्रूरता और करुणा! करुणा और क्रूरता का यह भाव जीवमात्र का स्वभाव है। अनेक वन्य पशुओं ने भी मनुष्य के लावारिस बच्चों को जंगल में शरण दी है, उन्हें बचाया है। उत्तर प्रदेश के एक ऐसे ही बच्चे की कथा अभी भी ताजातरीन है।

मृगया, आखेट और शिकार के रोमांचक वृतांत मनुष्य की विचित्र लीलाओं के आख्यान हैं। सिर्फ मनोविनोद के लिये वे ऐसी लीलाएं रचते थे। घोड़े पर सवार होकर, घोड़ों को पकड़ना, ढोल बजाकर 'हांका' करते हुए जानवरों पर तीरों की वर्षा करना, खदेड़ना, पीछे-पीछे भागना और हत्या करना अजीब शौक है आदमी का! अजीब न्याय है आदमी का! इस तरह अगर आदमी को मारिये तो नृशंसता और पशुओं को मारिये तो उद्यान-यात्रा का सुख! प्राचीन विनोद के ये साधन बदले हैं और अब विश्व भर में नई चेतना आई है। सीखने और सिखाने का न तो कोई समय निश्चित होता है और न व्यक्ति। हर सीखनेवाला छात्र है और सिखाने वाला गुरु। बस, निष्ठा चाहिये।

मनुष्य ने पशुओं से बहुत सीखा है। तैरना सीखा, हवा में उड़ना सीखा। जंगल में पहाड़ की गुफाओं में रहना सीखा। धैर्य और साहस प्राप्त निर्भय जीवन-यापन की कला हमने इन्हीं बंधुओं से सीखी। भित्तिचित्रों के रूप में उत्कीर्ण भिन्न-भिन्न पशुओं की आकृतियां हमारे सभ्य होने के प्रमाण हैं। क्यों नहीं हम इन सबूतों को दस्तावेज में बदल दें? उनकी आंखो में झांकते भय को विश्वास में बदलने का वक्त आ गया है।

कहते हैं कि हम जिसके एहसानमंद होते हैं, उसे नुकसान नहीं पहुंचाते। कृतज्ञता का बदला चुकाने को हम सदैव प्रस्तुत रहते हैं। याद हैं इनके एहसानात? जमाने तक हमारा सैन्यबल इन्हीं की बदौलत कायम रहा। हाथी और घोड़ों की कतारें जिसकी ज्यादा होती थीं, वही लड़ाई में मैदान मारता था। ये अपनी जान देकर हमें विजय दिलाते थे। महाराणा प्रताप का चेतक और अकबर का वह हाथी अविस्मरणीय है। ये पशु जीवट के थे। खूंटे से बंधे रहने वाले पशुओं से भिन्न! पालतू पशु तो परिवार के सदस्य होते हैं, लेकिन ऐसे पशुओं को सदस्य बनाना पड़ता है कौशल से, प्यार और स्नेह से।

दुनिया की कोई चीज फालतू नहीं है। दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं है। सबका उपयोग है, हो सकता है। मेरे लिये नहीं तो उनके लिये, नहीं तो आपके लिये। चींटी से लेकर हाथी तक मनुष्य के लिये उपयोगी हैं। बनैले पशुओं को देखा है आपने? बाघ या शेर? चीता या तेंदुआ? सूअर या भैंस? कितने सुंदर लगते हैं ये। इनका क्रोध भी दर्शनीय होता है। ये इस तरह स्वच्छन्द विचरण करते हैं, मानो जंगल की पहरेदारी पर तैनात हैं। एक डाल से दूसरी डाल पर कूदते-फांदते ये बंदर पेड़ की ऊंचाइयां नापने लगते हैं। कितना अच्छा लगता है उनका ऐसा कहना! कस्तूरी की गंध बरसाते ये हरिण इस तरह चौकड़ियां भरते हैं कि लगता है वे धरती नाप रहे हों। चप्पा-चप्पा छान मारना चाहते हैं, ताकि कोई स्थान गंधरहित न रहे। यह सब इसलिये भी अच्छा लगता है कि हमें जीवन बहुत अच्छा लगता है। वह युग लद चुका, जब हम ‘जीवो जीवस्य जीवनम्’ कहते अघाते नहीं थे। वह तो कायरता थी शायद। आदमी जब भीरु था, तब यह कहकर जान छुड़ा लेता था। आज वह सर्वशक्तिमान है। इसीलिये पहले वह जिनसे डरता था, आज उनकी रक्षा के लिये सन्नद्ध है। क्या नहीं किया मनुष्यों ने? पानी को जीत लिया। हवा को मुट्ठी में बंद कर लिया। आकाश, पहाड़, सागर की कौन कहे, चांद पर भी अपने पदचिह्न उसने छोड़ दिये हैं। अब वहीं निर्भय मनुष्य अभयदान देने निकला है। शक्ति की यही सार्थकता है कि वह निर्बलों को बल दे, संरक्षण दे। अब नया मंत्र फूंका है मनुष्य ने- ‘जीवो जीवस्य जीवनाय' अर्थात् जीव दूसरे जीव की जीवन रक्षा के लिये है।

प्रकृति का काव्य, काव्य की प्रकृति है। सारा संसार साहित्य प्राकृतिक सौन्दर्य से ओत-प्रोत है। और वहां प्रकृति अकेली नहीं है। पशुओं और पक्षियों का जो विशाल परिवार उसके अधीन है, वह सब किसी-न-किसी रूप में वर्णित है। प्राचीन साहित्य को पढ़ने से ऐसा लगता है कि मनुष्य का इन वन्य प्राणियों से एक तीसरा संबंध भी रहा है, और वह है प्रेम का, सौहार्द का। इनके उन्मुक्त, आडंबरहीन, नैसर्गिक प्रेम ने हमें दूसरों को प्रेम करना सिखाया। इनके प्रेम में आज भी प्रदर्शन नहीं, सहजता मिलती है। अकृतिम! स्वाभाविक! नर और मादा का प्रेम हो, शिशु या शावक की प्रीति हो, सब स्फूर्तिदायक है। ऐसे क्षणों में उनके चंचु, नख, श्रृंग दंत सभी तेजहीन हो जाते हैं, उनमें शैथिल्य आ जाता है। क्या उनका यह आचरण पत्थरों को भी नहीं गला देता होगा?

सैकड़ों झरने फूटे होंगे। सारा वनप्रांत उजाले में नहा उठा होगा! हम भी अपने अंधेरे को प्रेम से खंगाल दें तो सचमुच बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पीने लगेंगे। भारत के प्राचीन वाङ्मय से अगर पशु-पक्षियों के आख्यान, विवरण और कथाएं निकाल दें तो जो बचेगा, वह बहुत प्रभावकारी नहीं होगा। पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक और कथा-सारित्सागर के प्राण ये पशु-पक्षी हैं। पुराणों से लेकर कालिदास और वाण की रचनाओं में इनका बखान है। रामायण के जामवंत और संपाती विलक्षण पात्र हैं। महाभारत में भी इनसे संबंधित कई कहानियां हैं। क्यों नहीं हम बच्चों को एक बार फिर से इनका परिचय दें?

यह जंगल भी वैसी ही एक कक्षा है, जिसमे कुछ वन्यप्राणी दीगर हरकतें करते दिखाई पड़ते हैं, शिक्षक होने के नाते हमारा धर्म है कि उन्हें मनाएं, प्यार दें और मित्र बनाकर छोड़ें। संकल्प सिर्फ इस बात का हो कि वे हमारे किसी व्यवहार से भयभीत न हों, बल्कि आश्वस्त होकर आगे बढ़े। फिर तो हम भरत की तरह शेर की अयाल भी सहला सकते है! ऐंड्रोक्लीज़ के पास आकर जख्ली शेर भी सहानुभूति पा सकता है।

साहित्य के विद्यार्थियों को पता होगा कि साहित्य की बहुविध समृद्धि का श्रेय इन वन्य प्राणियों को है। हम समग्र लोकसाहित्य में आईने की तरह इन मूक पशुओं के साथ अपने नाना संबंधों को साफ-साफ देखते हैं। संपर्क की प्रगाढ़ता, निरीक्षण की तीक्ष्णता और अनुभवों की दूरियां निकटतर होने लगती हैं। 'गवाक्ष’, 'गोधूलि’, ‘गवेषण', 'गोचर', 'गोपाल' आदि अनेक शब्द आज भी अपने युग के स्पर्श से हमें अभिभूत कर देते हैं। 'गीदड़भभकी' और 'बंदरभभकी' सुनी है आपने? नहीं ही सुनी होगी। आज की भाग-दौड़ में न तो कोई घोड़ा बेचकर सो पाता है और न हाथी के नौ मन झूल की ही चिंता करता है। हाथी चलते रहते हैं, कुत्ता भौंकता रहता है। चिंता सिर्फ इतनी है कि ऊंट किस करवट बैठता है? और भी बहुत-से मुहावरे और कहावतें हैं, जो हमने इनके संसर्ग में गढ़े हैं। आदमी कभी बाघ बन बैठता है, कभी शेर की तरह गुर्राता है। पानी में रहकर मगर से वैर नहीं ठानता। कभी-कभी जानवरों की बहादुरी, धूर्तता, कायरता को ओढ़कर हम भी हद कर देते हैं। दया आती है देखकर। और इसी दया की जरूरत है उन वन्य प्राणियों के लिये, जो आखिर पशु हैं- आदत से लाचार!

छात्रों को अभयारण्यों के बारे में बतायें। अभयारण्य- जहां वन्यप्राणी निश्चिंत-निर्भय होकर विवरण करते हैं। उनके आहार-विहार में कोई रोक-टोक नहीं, कोई नियम-कानून नहीं। चिड़ियाखानों से ये भिन्न होते हैं। चिड़ियाखानों में जानवरों को पकड़कर कैद कर देते हैं। खूब ख्याल भी रखते हैं, लेकिन तमाशे की चीज बनाकर। वहां कोई शेर देखा है आपने? कितना लाचार दिखता है। लगता है, किसी ने वज्र को बांध दिया है! अपने मन का बादशाह दूसरे के मन मुताबिक नाचता और नाटक करता है। लेकिन अभयारण्यों में वे खुले रहते हैं और दर्शक पिंजड़े में बंद होता है। प्रकृति के खुले प्रांगण में वे घूमते हैं, गरजते हैं, खेलते हैं और हम उनकी ताकत का अंदाजा लगाते हैं। वहीं मालूम पड़ता है कि सचमुच वे जंगल की शोभा हैं। इन आभूषणों को नष्ट करवाना किसी अंधेरी गली में किसी औरत के गहने छीनने जैसा है।

किसी भी देश के लिये वन गर्व का विषय है। उसकी संपदा राष्ट्रीय समृद्धि की वस्तु है। ऋतुओं के संतुलन के लिये जंगल अनिवार्य हैं। आज सर्वत्र जंगल को बचाने और नये पेड़ लगाने का अभियान चल पड़ा है। यह सुबुद्धि है, जो देर से ही सही, आई तो! इन वनस्थलियों की रक्षा के साथ-साथ वन्य प्राणियों के संरक्षण की आवश्यकता भी महसूस हुई! मंदिर बिना देवता क्या, जंगल बिना जानवर क्या? छात्रों को राष्ट्रीय उद्यानों के बारे में सूचना दें। हर राज्य में, जहां जंगल हैं, राष्ट्रीय उद्यानों का निर्माण हुआ है। घनघोर जंगलों के खास हिस्सों को सुरक्षित-संरक्षित स्थान घोषित करके राष्ट्रीय उद्यान बनाये गये हैं। शिकार की सख्त मनाही होती है ऐसे स्थानों पर। ऊंची मीनारों में निर्भय बैठकर खूंखार जानवरों को अभय और निश्चिंत विचरते देखिये। झारखंड में हजारीबाग और बेतला के राष्ट्रीय उद्यान देखने योग्य हैं। उत्तरांचल का जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान भी दर्शनीय है।

देश के जीव-जंतु और वनस्पति को जानना आवश्यक होता है। देश प्रेम के लिये जरूरी है कि हम देश को जानें। उसकी वास्तविकता को पहचानें। तभी हमारा लगाव पूरे देश के साथ, एक-एक चीज के माध्यम से दृढ़तापूर्वक होगा। इसके लिये पर्यटन सशक्त साधन है। बाघ के चित्र को देखना अलग बात है और बाघ को सामने देखना एक बिलकुल अलग अनुभव है। शिक्षक इस तरह के पर्यटनों का प्रबंध करें। छात्रों को प्रेरित करें कि वे उसमें शरीक होकर देश-दर्शन का लाभ उठाएं। जंगल अब भय का नहीं, ज्ञान के साधन है। यही जंगल पहले साधनास्थल थे, तपोवन कहलाते थे। अब वही जंगल प्रकृति के रहस्यों का अध्ययन केन्द्र हो गया है।

प्रकृति उपदेशक रही है, उसने हमें ज्ञान दिया है। वह पाठशाला है, जहां हम जीवनयापन के पाठ पढ़ते और सीखते हैं। आदिवासियों की दुर्दान्त जीवन-यात्रा, बगैर हार माने, पड़ाव-पड़ाव इसी बात की घोषणा करती है कि यह जंगल घर है, वन्यप्राणी मित्र हैं और विराट प्रकृति अत्यंत ममतामयी है। प्राकृतिक चिकित्सा की प्रणाली आखिर है क्या? जंगल में रहनेवालों का उपचार प्रकृति के अलावा, कौन करता है? घायल शेर को रोज झरने के पानी से अपने घाव का उपचार करते और लाभ होते देख उस जर्मन शिकारी ने जलचिकित्सा की पद्धति का आविष्कार किया था। कितना सीखना है अभी? और बच्चों की उम्र तो ऐसी होती है कि कुछ भी सिखाओ, तुरंत सीख जायेगा। तो हम शिक्षक ऐसी ही अच्छी बातें उन्हें क्यों न सिखाएं?

कहते हैं कि जिनसे लाभ होता है, वे बड़े रुचते हैं। वन्य प्राणी भी लाभकारी हैं। इनसे बड़े लाभ है हमें। जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत ये हमारे काम आते हैं। चाहे मृगछाला हो, को हाथी दांत का सामान। चाहे जूता हो, चाहे छड़ी। सब कुछ मनुष्य के लिये। आये दिन वर्ग में कुछ ऐसे छात्र मिल जाते हैं, जो लगाम नहीं मानते, मनमानी करते हैं। परिवार और समाज में भी ऐसे प्राणी होते ही हैं, लेकिन क्या हम उन्हें मार डालते है? तबाह कर देते हैं? नहीं। हम उन्हें समझाने, सुधारने और सही मार्ग पर लाने का पूरा प्रयत्न करते हैं। तब तक नहीं थकते, जब तक हमें सिद्धि नहीं प्राप्त हो जाती।

यह जंगल भी वैसी ही एक कक्षा है, जिसमे कुछ वन्यप्राणी दीगर हरकतें करते दिखाई पड़ते हैं, शिक्षक होने के नाते हमारा धर्म है कि उन्हें मनाएं, प्यार दें और मित्र बनाकर छोड़ें। संकल्प सिर्फ इस बात का हो कि वे हमारे किसी व्यवहार से भयभीत न हों, बल्कि आश्वस्त होकर आगे बढ़े। फिर तो हम भरत की तरह शेर की अयाल भी सहला सकते है! ऐंड्रोक्लीज़ के पास आकर जख्ली शेर भी सहानुभूति पा सकता है।

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