जहाँ गंगा सफाई न्याय और लोकतन्त्र का मुद्दा

Submitted by HindiWater on Sat, 12/27/2014 - 12:41
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बिहार और झारखण्ड में सबसे अधिक लम्बा प्रवाह मार्ग गंगा का ही है। शाहाबाद के चौसा से संथाल परगना के राजमहल और वहाँ से आगे गुमानी तक गंगा के संगम तक गंगा का प्रवाह 552 किलोमीटर लम्बा है। गंगा जब सर्वप्रथम बिहार प्रदेश की सीमा को छूती है तब बिहार और उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की 72 किलोमीटर सीमा बनाकर चलती है। जब केवल बिहार से होते हुए बीच भाग से हटने लगती है तब बिहार-झारखण्ड में 64 किलोमीटर सीमा रेखा बनकर गुजरती है। 416 किलोमीटर तक तो गंगा बिल्कुल बिहार और झारखण्ड की भूमि में ही अपने प्रभूत जल को फैलाती है एवं इसकी भूमि को शस्य श्यामला करती हुई बहती है। 03 दिसम्बर 2014, नई दिल्ली। गोमुख से लेकर गंगासागर तक 2525 किलोमीटर के नदीपथ के दोनों ओर स्थित इलाकों की जलदात्री एवं पवित्र जलवाली गंगा का जल पूरी तरह से प्रदूषित हो गया है। बिहार में अस्सी के दशक में गंगा को जलकर जमींदारों से मुक्त करवाया गया था और अब यही से गंगा प्रदूषण मुक्ति के सवाल पर निर्णायक लड़ाई का आगाज हुआ।

बिहार के भागलपुर जिले के कहलगाँव स्थित कागजी टोला की फेकिया देवी का कहना है कि ‘‘अब तक हमने लगातार लड़ाई लड़ी है, जंग जीती है, इस बार भी एक होकर गंगा के सवाल पर निर्णायक लड़ाई लड़ेंगे और गंगा की अविरलता को नष्ट नहीं होने देंगे।’’वह पिछले दिनों भागलपुर जिला मुख्यालय में गंगा मुक्ति आन्दोलन के गंगा पर बैराज बनाने की साजिश के विरोध प्रदर्शन में भाग लेने आईं थी।

फेकिया देवी उस आन्दोलन की गवाह हैं, जिसने दस वर्षों के अहिंसात्मक संघर्ष के फलस्वरूप गंगा को जलकर जमींदारी से मुक्त कराने में कामयाबी हासिल की।

बिहार में आने वाले दिनों में गंगा के सवाल पर निर्णायक लड़ाई का आगाज एक साझा मंच बनाकर होने वाला है। इसकी एक दस्तक इस प्रदर्शन के माध्यम से दी गई है। इस आन्दोलन का केन्द्र भागलपुर बनेगा।

इस प्रदर्शन के पूर्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जलपुरुष राजेन्द्र सिंह की बक्सर, आरा, छपरा, पटना, मुंगेर और भागलपुर में सभा, बेगूसराय के सिमरिया घाट में स्वामी चिदात्मन जी महाराज द्वारा राष्ट्रीय पत्रकार समागम, गोमुख से गंगासागर तक तापस दास के नेतृत्व में साईकिल यात्रा का स्पष्ट सन्देश है कि गंगा की अविरलता कायम रहने से ही गंगा पर आश्रित समुदाय का रिश्ता कायम रह सकेगा।

आने वाले दिनों में व्यापक संघर्ष की व्यापक रणनीति तय की गई है। तय रणनीति के तहत् दिल्ली के हिन्दी भवन में विभिन्न आन्दोलन समूहों की जहाँ बैठक आयोजित की गई, वहीं वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर के संयोजकत्व में गंगा बेसिन के सांसदों की बैठक हुई। इसका मकसद गंगा के साथ हो रहे ​खिलवाड़ के सन्दर्भ में उन्हें रू-ब-रू कराना।

इसी कड़ी में भागलपुर के कला केन्द्र में आन्दोलन के प्रमुख सहयोगियों की बैठक हुई। इस बैठक के बाद आगे की रणनीति तय की गई। तय की गई रणनीति के तहत् बिहार के मुंगेर के बरियारपुर में देश के युवाओं का एक प्रशिक्षण शिविर 6 से 8 फरवरी तक बरियारपुर में होगा।

इस प्रशिक्षण शिविर का मकसद युवाओं को प्रशिक्षित करना है। ताकि आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता की अगली पीढ़ी तैयार की जा सके। इसके बाद 20, 21 एवं 22 फरवरी 2015 को भागलपुर के कहलगाँव के कागजी टोला में गंगा मुक्ति आन्दोलन का स्थापना दिवस मनाया जाएगा।

इस कार्यक्रम के बाद प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 20, 21 एवं 22 मार्च 2015 को नदी घाटी आन्दोलनों के प्रमुख कार्यकर्ताओं का जमघट सर्व सेवा संघ वाराणसी में होगा। अन्तिम दिन राजघाट पर गंगा पर आश्रित समुदायों की सभा होगी। इसके पश्चात् वाराणसी घोषणा पत्र जारी किया जाएगा।

बिहार और झारखण्ड में सबसे अधिक लम्बा प्रवाह मार्ग गंगा का ही है। शाहाबाद के चौसा से संथाल परगना के राजमहल और वहाँ से आगे गुमानी तक गंगा के संगम तक गंगा का प्रवाह 552 किलोमीटर लम्बा है।

गंगा जब सर्वप्रथम बिहार प्रदेश की सीमा को छूती है तब बिहार और उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की 72 किलोमीटर सीमा बनाकर चलती है। जब केवल बिहार से होते हुए बीच भाग से हटने लगती है तब बिहार-झारखण्ड में 64 किलोमीटर सीमा रेखा बनकर गुजरती है।

416 किलोमीटर तक तो गंगा बिल्कुल बिहार और झारखण्ड की भूमि में ही अपने प्रभूत जल को फैलाती है एवं इसकी भूमि को शस्य श्यामला करती हुई बहती है। इस स्थिति का आकलन करते हैं तो मछुआरे, किसानों, नाविकों और पण्डितों की जीविका का आधार है गंगा।

गंगा के किनारे बसे मछुआरों ने गंगा को प्रदूषित होते हुए देखा है, उसकी दुर्दशा देखी है और इसे बनते हुए देखा है।

1993 के पहले गंगा में जमींदारों के पानीदार थे, जो गंगा के मालिक बने हुए थे। सुल्तानगंज से लेकर पीरपैंती तक 80 किलोमीटर के क्षेत्र में जलकर जमींदारी थी। यह जमींदारी मुगलकाल से चली आ रही थी। सुल्तानगंज से बरारी के बीच जलकर गंगा पथ की जमींदारी महाशय घोष की थी।

बरारी से लेकी पीरपैंती तक मकससपुर की आधी-आधी जमींदारी क्रमशः मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल के मुसर्रफ हुसैन प्रमाणिक और महाराज घोष की थी। हैरत की बात तो यह थी कि जमींदारी किसी आदमी के नाम पर नहीं बल्कि देवी-देवताओं के नाम पर थी। ये देवता थे श्री श्री भैरवनाथ जी, श्री श्री ठाकुर वासुदेव राय, श्री शिवजी एवं अन्य। कागजी तौर जमींदार की हैसियत केवल सेवायत की रही है।

सन् 1908 के आसपास दियारे के जमीन का काफी उलट-फेर हुआ। जमींदारों के जमीन पर आए लोगों द्वारा कब्जा किया गया। किसानों में संघर्ष का आक्रोश पूरे इलाके में फैला।

जलकर जमींदार इस जागृति से भयभीत हो गए और 1930 के आसपास ट्रस्ट बनाकर देवी-देवताओं के नाम कर दिया। जलकर जमींदारी खत्म करने के लिए 1961 में एक कोशिश की गई भागलपुर के तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर ने इस जमींदारी को खत्म कर मछली बन्दोबस्ती की जवाबदेही सरकार पर डाल दी।

मई 1961 में जमींदारों ने उच्च न्यायालय में इस कार्रवाई के खिलाफ अपील की और अगस्त 1961 में जमींदारों को स्टे ऑडर मिल गया। 1964 में उच्च न्यायालय ने जमींदारों के पक्ष में फैसला सुनाया तथा तर्क दिया कि जलकर की जमींदारी यानी फिशरिज राइट मुगल बादशाह ने दी थी और जलकर के अधिकार का प्रश्न जमीन के प्रश्न से अलग है। क्योंकि जमीन की तरह यह अचल सम्पत्ति नहीं है। इस कारण यह बिहार भूमि सुधार कानून के अन्तर्गत नहीं आता है।

बिहार सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की और सिर्फ एक व्यक्ति मुसर्रफ हुसैन प्रमाणिक को पार्टी बनाया गया। जबकि बड़े जमींदार मुसर्रफ हुसैन प्रमाणिक को छोड़ दिया गया। 4 अप्रैल 1982 को अनिल प्रकाश के नेतृत्व में कहलगाँव के कागजी टोला में जल श्रमिक सम्मेलन हुआ और उसी दिन जलकर जमींदारों के खिलाफ संगठित आवाज उठी।

साथ ही सामाजिक बुराइयों से भी लड़ने का संकल्प लिया गया। पूरे क्षेत्र में शराबबन्दी लागू की गई। धीरे-धीरे यह आवाज उन सवालों से जुड़ गई जिनका सम्बन्ध पूरी तरह गंगा और उसके आसपास बसने वालों की जीविका, स्वास्थ्य व असंस्कृति से जुड़ गया।

आरम्भ में जमींदारों ने इसे मजाक समझा और आन्दोलन को कुचलने के लिए कई हथकण्डे अपनाए। लेकिन आन्दोलनकारी अपने संकल्प ‘‘हमला चाहे कैसा भी हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा’’ पर अडिग रहे और निरन्तर आगे रहे। निरन्तर संघर्ष का नतीजा यह हुआ कि 1988 में बिहार विधानसभा में मछुआरों के हितों की रक्षा के लिए जल संसाधनों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करने का एक प्रस्ताव लाया गया।

गंगा मुक्ति आन्दोलन के साथ वे समझौते के बाद राज्य सरकार ने पूरे बिहार की नदियों-नालों के अलावा सारे कोल ढाबों को जलकर से मुक्त घोषित कर दिया। परन्तु स्थिति यह है कि गंगा की मुख्य धार मुक्त हुई है लेकिन कोल ढाब अन्य नदी-नालों में अधिकांश की नीलामी जारी है और सारे पर भ्रष्ट अधिकारियों और सत्ता में बैठे राजनेताओं का वर्चस्व है।

पूरे बिहार में दबंग जल माफिया और गरीब मछुआरों के बीच जगह-जगह संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। गंगा तथा कोसी में बाढ़ का पानी घट जाने के बाद कई जगह चौर बन जाते हैं ऐसे स्थानों को मछुआरे मुक्त मानते हैं और भू-स्वामी अपनी सम्पत्ति।

सरकार की ओर से जिनकी जमीन जल में तब्दील हो गई उन्हें मुआवजा नहीं दिया जाता। इस कारण भू-स्वामी इसका हर्जाना मछुआरों से वसूलना चाहते हैं। हालाँकि जगह-जगह संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इन स्थानों पर कब्जा करने के लिए अपराधी संगठित होते हैं।

राज्य के कटिहार, नवगछिया, भागलपुर, मुंगेर तथा झारखण्ड के साहेबगंज में दो दर्जन से ज्यादा अपराधी गिरोह सक्रिय हैं और इन गिरोहों की हर साल करोड़ों में कमाई है। गंगा मुक्ति आन्दोलन लगातार प्रशासन से दियारा क्षेत्र में नदी पुलिस की स्थापना और मोटरबोट द्वारा पैट्रोलिंग की माँग करता रहा है लेकिन यह ठण्डे बस्ते में पड़ा हुआ है।

विकास की गलत अवधारणा के कारण गंगा में बाढ़ और कटाव का संकट पैदा हो गया है। कल-कारखानों का कचरा नदियों के जल को प्रदूषित कर रहा है और पानी जहरीला होता जा रहा है।

भागलपुर विश्वविद्यालय के दो प्राध्यापकों केएस बिलग्रामी, जेएस दत्ता मुंशी के अध्ययन से पता चलता है कि बरौनी से लेकर फरक्का तक 256 किलोमीटर की दूरी में मोकामा पुल के पास गंगा नदी का प्रदूषण भयानक है।

गंगा तथा अन्य नदियों के प्रदूषित और जहरीला होने का सबसे बड़ा कारण है कल-कारखानों के जहरीले रसायनों का नदी में बिना रोकटोक के गिराया जाना।

जब नदी की गहराई कम होती है तो पानी फैलता है और कटाव तथा बाढ़ के प्रकोप की तीव्रता को बढ़ाता जाता है। मालदह-फरक्का से लेकर बिहार के छपरा तक यहाँ तक कि बनारस तक भी इसका दुष्प्रभाव दिखता है। फरक्का बैराज के कारण समुद्र से मछलियों की आवाजाही रुक गई। फीश लैडर बालू-मिट्टी से भर गया। झींगा जैसी मछलियों की ब्रीडिंग समुद्र के खारे पानी में होती है, जबकि हिल्सा जैसी मछलियों का प्रजनन ऋषिकेश के ठण्डे मीठे पानी में होता है। अब यह सब प्रक्रिया रुक गई तथा गंगा और उसकी सहायक नदियों में 80 प्रतिशत मछलियाँ समाप्त हो गई। इससे भोजन में प्रोटीन की कमी हो गई। कल कारखानों या थर्मल पावर स्टेशनों का गर्म पानी तथा जहरीला रसायन या काला या रंगीन एफ्लूएंट नदी में जाता है, तो नदी के पानी को जहरीला बनाने के साथ-साथ नदी के स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता को नष्ट कर देता है।

नदी में बहुत से सूक्ष्म वनस्पति होते हैं जो सूरज की रोशनी में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं, गन्दगी को सोखकर ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। इसी प्रकार बहुतेरे जीव जन्तु भी सफाई करते रहते हैं। लेकिन उद्योगों के प्रदूषण के कारण गंगा में तथा अन्य नदियों में भी जगह-जगह डेड जोन बन गए हैं। कहीं आधा किलोमीटर, कहीं एक किलोमीटर तो कही दो किलोमीटर के डेड जोन मिलते हैं।

यहाँ से गुजरने वाला कोई जीव-जन्तु या वनस्पति जीवित नहीं बचता। वहाँ बाटा शू फैक्टरी, मैकडेबल डिसलरी, तेल शोधक कारखाना, ताप बिजली घर और रासानिक अवशेष नदी में गिरते हैं। इसका सबसे बुरा असर मछुआरों के रोजी-रोटी एवं स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

कटैया, फोकिया, राजबम, थमैन, झमण्ड, स्वर्ण खरैका, खंगशी, कटाकी, डेंगरास, करसा गोधनी, देशारी जैसी 60 देशी मछलियों की प्रजातियाँ लुप्त हो गई है। गंगा मुक्ति आन्दोलन से जुड़ी कहलगाँव की मुन्नी देवी बताती है कि फरक्का बैराज बनने के बाद स्थिति यह है कि गंगा में समुद्र से मछलियाँ नहीं आ रही है।

परिणामस्वरूप गंगा में मछलियों की भारी कमी हो गई है। मछुआरों की बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है। वहीं अनिल प्रकाश कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने गंगा पर 16 बैराज बनाने से पहले फरक्का बैराज के दुष्परिणामों का मूल्यांकन क्यों नहीं किया? 1971 में पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज बना और 1975 में उसकी कमीशनिंग हुई।

जब यह बैराज नहीं था तो हर साल बरसात के तेज पानी की धारा के कारण 150 से 200 फीट गहराई तक प्राकृतिक रूप से गंगा नदी की उड़ाही हो जाती थी। जब से फरक्का बैराज बना सिल्ट की उड़ाही की यह प्रक्रिया रुक गई और नदी का तल ऊपर उठता गया। सहायक नदियाँ भी बुरी तरह प्रभावित हुईं।

जब नदी की गहराई कम होती है तो पानी फैलता है और कटाव तथा बाढ़ के प्रकोप की तीव्रता को बढ़ाता जाता है। मालदह-फरक्का से लेकर बिहार के छपरा तक यहाँ तक कि बनारस तक भी इसका दुष्प्रभाव दिखता है।

फरक्का बैराज के कारण समुद्र से मछलियों की आवाजाही रुक गई। फीश लैडर बालू-मिट्टी से भर गया। झींगा जैसी मछलियों की ब्रीडिंग समुद्र के खारे पानी में होती है, जबकि हिल्सा जैसी मछलियों का प्रजनन ऋषिकेश के ठण्डे मीठे पानी में होता है।

अब यह सब प्रक्रिया रुक गई तथा गंगा और उसकी सहायक नदियों में 80 प्रतिशत मछलियाँ समाप्त हो गई। इससे भोजन में प्रोटीन की कमी हो गई। पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में अब रोजाना आन्ध्र प्रदेश से मछली आती है। इसके साथ ही मछली से जीविका चलाकर भरपेट भोजन पाने वाले लाखों-लाख मछुआरों के रोजगार समाप्त हो गए।

गंगा में हर 100 किलोमीटर की दूरी पर बैराज बनाने की बात शुरू की, तब गंगा पर जीने वाले करोड़ों लोगों में घबराहट फैलने लगी है। गंगा की उड़ाही की बात तो ठीक है, लेकिन बैराजों की शृंखला खड़ी करके गंगा की प्राकृतिक उड़ाही की प्रक्रिया को बाधित करना अव्यवहारिक है।

फरक्का बैराज बनने का हश्र यह हुआ कि उत्तर बिहार में गंगा किनारे दियारा इलाके में बाढ़ स्थाई हो गई। बिहार के मुख्यमन्त्री जीतनराम मांझी ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर प्रस्तावित बैराज का विरोध किया है।

गंगा से बाढ़ प्रभावित इलाके का रकबा फरक्का बाँध बनने से पूर्व की तुलना में काफी बढ़ गया। पहले गंगा की बाढ़ से प्रभावित इलाके में गंगा का पानी कुछ ही दिनों में उतर जाता था लेकिन अब बरसात के बाद पूरे दियारा तथा टाल क्षेत्र में पानी जमा रहता है।

बिहार में फतुहा से लेकर लखीसराय तक 100 किलोमीटर लम्बाई एवं 10 किलोमीटर की चौड़ाई के क्षेत्र में जलजमाव की समस्या गम्भीर है। फरक्का बाँध बनने के कारण गंगा के बाढ़ क्षेत्र में बढ़ोतरी का सबसे बुरा असर मुंगेर, नौगछिया, कटिहार, पूर्णिया, सहरसा तथा खगड़िया जिलों में पड़ा।

इन जिलों में विनाशकारी बाढ़ के कारण सैकड़ों गाँव विस्थापित हो रहे हैं। फरक्का बैराज की घटती जल निस्सारण क्षमता के कारण गंगा तथा उनकी सहायक नदियों का पानी उलटी दिशा में लौट कर बाढ़ तथा जलजमाव क्षेत्र को बढ़ा देता है।
फरक्का का सबसे बुरा हश्र यह हुआ कि मालदा और मुर्शिदाबाद का लगभग 800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही उपजाऊ भूमि कटाव की चपेट में आ गई और बड़ी आबादी का विस्थापन हुआ। दूसरी ओर बड़ी- बड़ी नाव द्वारा महाजाल, कपड़ा जाल लगाकर मछलियों और डॅल्फिनों की आवाजाही को रोक देते हैं। इसके अलावा कोल, ढाब और नालों के मुँह पर जाल से बाड़ी बाँध देते हैं।

जहाँ बच्चा देनेवाली मछलियों का वास होता है। बिहार सरकार ने अपने गजट में पूरी तरह से इसे गैरकानूनी घोषित किया है। बाड़ी बाँध देने से मादा मछलियाँ और उनके बच्चे मुख्य धारा में जा नहीं सकते और उनका विकास नहीं हो पाता है। इसी कारण से गंगा में मछलियों का अकाल हो गया है। इसके खिलाफ सत्याग्रह चलाने का फैसला किया गया है और नमक सत्याग्रह की तर्ज पर सारी बाड़ियों को तोड़ा जाएगा।

अब जब 16 बैराज हर 100 किलोमीटर बनाने की योजना है। इसके परिणामों को समझना होगा। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह बताते हैं कि यह गंगा की अविरलता नष्ट करने की साजिश है। इसका सीधा असर गंगा पर आश्रित समुदायों पर पड़ेगा।

गोमुख से गंगासागर तक साइकिल यात्रा की बिहार मीडिया समन्वयक और पत्रकार अजाना घोष का कहना है कि सही नारा या अवधारणा यह होनी चाहिए कि ‘गंगा को गन्दा मत करो’। थोड़ी बहुत शुद्धिकरण तो गंगा खुद ही करती है। उसके अन्दर स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता है। वहीं सिमरिया में गंगा के सवाल पर राष्ट्रीय पत्रकार समागम के प्रतिभागी और वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतान्त का कहना है कि यह समागम गंगा की अविरलता को लेकर था।

इसमें अमर उजाला के सम्पादक उदय कुमार, नेशनल दुनिया के सम्पादक श्रीचन्द, पांचजन्य के सम्पादक हितेश शंकर, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक पंकज मिश्र, सहारा समय के श्याम किशोर सहाय के साथ-साथ स्वामी चिदात्मानन्द जी महाराज के विचार से एक वातावरण बना है।

स्वामी चिदात्मानन्द जी महाराज ने स्वयं गोमुख से गंगासागर तक की पैदल यात्रा कर असलियत को देखा है। आनेवाले दिनों में यह स्पष्ट संकेत है कि गंगा के सवाल पर एक बड़ा आन्दोलन बिहार से खड़ा होगा।

सम्पर्क— कुमार कृष्णन, स्वतन्त्र पत्रकार
दशभूजी स्थान रोड, मोगलबाजार, मुंगेर, बिहार 811201

नदीजोड़ के मुद्दे पर बिहार मुख्यमन्त्री जीतनराम मांझी द्वारा प्रधानमन्त्री को भेजे गए पत्र को यहाँ देख सकते हैं।

Comments

Submitted by Anonymous (not verified) on Mon, 12/29/2014 - 01:08

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इस आलेख मे कई तथ्य गलत दिए गये है.....बिहार मे जलपुरूष राजेन्द्र सिंह ने पानी को लेकर गम्भीर समाजवादी नेता रामबिहारी सिह के कहने पर आरा,दिघवारा, छपरा, मुंगेर, भागलपुर, कोसी के इलाके मे कई जन सभा कर गंगा और पानी को लेकर लोगो को समझाने का काम किया है... इस अभियान का ही प्रभाव हुआ कि बिहार के मुख्यमंत्री मांझी जी ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर गंगा को लेकर अपनी आपत्ति व्यक्त की...

Submitted by Anonymous (not verified) on Tue, 12/30/2014 - 16:29

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आलेख में जो तथ्य दिये गये हैं,वे सही हैं।गंगा पर 1982 से ही गंगा मुक्ति आंदोलन काम कर रहा है।गंगा मुक्ति आंदोलन के नेता अनिल प्रकाश की पहल पर बिहार के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजा।उन्होंने चार राज्यों के मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखा है।20-21-22 को कहलगाँव में और मार्च में बनारस में गंगा मुक्ति आंदोलन का सम्मेलन भी है।

गंगा को लेकर बिहार मे आन्दोलन चलाते रहे लोगो के बीच जलपुरूष राजेन्द्र सिह और रामबिहारी सिह जैसे प्रभावशाली लोगो के अभियान के बाद बेचैनी है.. मुख्यमंत्री जानते तक नही जिनका नाम, उनके पहल की चर्चा करना ही गलत तथ्य है.. यदि उनके पहल पर मुख्यमंत्री ने पत्र भेजा तो उसकी कापी भी आपने देखी होगी... उसको स्कैन कर लगाना चाहिए..

Submitted by Anonymous (not verified) on Tue, 12/30/2014 - 16:33

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आलेख में जो तथ्य दिये गये हैं,वे सही हैं।गंगा पर 1982 से ही गंगा मुक्ति आंदोलन काम कर रहा है।गंगा मुक्ति आंदोलन के नेता अनिल प्रकाश की पहल पर बिहार के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजा।उन्होंने चार राज्यों के मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखा है।20-21-22 को कहलगाँव में और मार्च में बनारस में गंगा मुक्ति आंदोलन का सम्मेलन भी है।

बिहार मे हाल के दिनो मे गंगा को ले लेकर हुई गतिविधि की हकीकत तो जलपुरूष राजेन्द्र सिह जी ही बता सकते है, क्योंकि पुरे अभियान मे उनको देखा गया.... जहा तक आन्दोलन का सवाल है, तो अब तक बन्द कमरो मे चलने वाले आन्दोलन को आम लोगो ने पहली बार राजेन्द्र सिह और रामबिहारी सिह की पहल पर समझा है... मुझे यह भी याद है कि आपने आयोजको से काफी आग्रह कर मुंगेर के कार्यक्रम मे भाग लिया था, ताकि आपके लोग जल के मामले मे आप जैसे लोगो के कथित एकाधिकार पर सवाल न खडा कर दे, जबकि कार्यक्रम का आयोजन बिहार प्रदेश किसान संगठन ने किया था... गंगा के सवाल पर मुख्यमंत्री जी द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की हकीकत को समझने के लिये आपको पटना से प्रकशित हिन्दी समाचार पत्र मे जुलाई माह से लगातार गंगा को लेकर प्रकाशित रिपोर्ट को पढना होगा... जिसके बाद सरकार ने उनसे सम्पर्क किया और पूरी जानकारी प्राप्त कर केन्द्र सरकार को पत्र लिखा... ऐसे मे इसके लिये अनिल प्रकाश नाम के व्यक्ति को क्रेडिट देना उचित नही होगा, यह क्रेडिट आज समाचार पत्र को जाता है... जहा तक अनिल प्रकाश नामक व्यक्ति का सवाल है, तो मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी जानते तक नही होंगे... यदि उनके पहल पर वह पत्र लिखा गया है तो उसकी कापी उनके पास अवश्य होगी.... उसको सार्वजनिक करना चाहिये.. Har Har Gange....

Submitted by Anonymous (not verified) on Wed, 12/31/2014 - 10:43

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एडमिनिस्ट्रेटर महोदय, लेखक को कहिये कि बिहार के मुख्यमंत्री की चिठी को लेकर दावा करने के पहले उसकी कापी स्कैन कर जनता के सामने लाये... तथ्यो को कापी-पेस्ट करने से कोई जल का विशेषज्ञ नही हो सकता है..जलपुरूष राजेन्द्र सिह भी जलगाव की रिपोर्ट देख नाराज है...दरअसल पानी के नाम पर बिहार मे अब तक् दुकानदारी लरने वालो को अपनी दुकान सिमटती हुई नजर आने लगी है...बिहार प्रदेश किसान संगठन ने गंगा को लेकर हाल मे पुरे राज्य की जनता को गोलबन्द कर दिया है... जिसके बाद ऐसे लोगो की बेचैनी स्वाभाविक है.....'आज' हिन्दी समाचार, पटना patnaaj@gmail.com

Submitted by Anonymous (not verified) on Sat, 01/03/2015 - 11:12

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दैनिक आज को किसी पर सवाल उठाने से अपने दामन में झांकना चाहिये। गलत और तथ्यहीन रिर्पोटों के कारण अनेक बार प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया के सामने क्षमा याचना कर चुका है। पहले अपने मुलाजिलों का शोषण बंद करे फिर रामबिहारी सिंह जैसे लोगों की दलाली करे।

Submitted by Anonymous (not verified) on Mon, 01/05/2015 - 18:49

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गंगा मुक्ति आंदोलन भारत का एक महत्वपूर्ण जनांदोलन रहा है।1982 से 1987 तक की गतिविदियों का लेखा-जोखा उससमय के अंग्रेजी-हिंदी के राष्ट्रीय अखबारों में किसी को भी सहज रूप में मिल जायेगा।अनिल प्रकाश को हर वह जानता है,जिसकी रुचि जनता के सरोकारों में रही है।यदि सवाल खड़े करनेवाले सज्जन इसे गलत मानते हैं,तो उनकी इस बात से भी प्रतिबद्धता होनी चाहिए कि सही बातों को समने लायें।थोड़ी मेहनत करें।वैसे हमारी रुचि गंगा पर हो रही राजनीति को गलत दिशा में जाने से रोकना होना चाहिए,न कि श्रेय लेने में।चुनौती बड़ी है।गंगा के किनारे बसे लोगों,किसानों,मल्लाहों आदि की जीविका और संस्कृति बचाने का संघर्ष आज सबसे ज्यादा जरुरी है।

Submitted by Anonymous (not verified) on Mon, 01/05/2015 - 18:52

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गंगा मुक्ति आंदोलन भारत का एक महत्वपूर्ण जनांदोलन रहा है।1982 से 1987 तक की गतिविदियों का लेखा-जोखा उससमय के अंग्रेजी-हिंदी के राष्ट्रीय अखबारों में किसी को भी सहज रूप में मिल जायेगा।अनिल प्रकाश को हर वह जानता है,जिसकी रुचि जनता के सरोकारों में रही है।यदि सवाल खड़े करनेवाले सज्जन इसे गलत मानते हैं,तो उनकी इस बात से भी प्रतिबद्धता होनी चाहिए कि सही बातों को समने लायें।थोड़ी मेहनत करें।वैसे हमारी रुचि गंगा पर हो रही राजनीति को गलत दिशा में जाने से रोकना होना चाहिए,न कि श्रेय लेने में।चुनौती बड़ी है।गंगा के किनारे बसे लोगों,किसानों,मल्लाहों आदि की जीविका और संस्कृति बचाने का संघर्ष आज सबसे ज्यादा जरुरी है।

Submitted by Anonymous (not verified) on Tue, 01/06/2015 - 13:04

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गंगा मुक्ति आंदोलन भारत का एक महत्वपूर्ण जनांदोलन रहा है।1982 से 1987 तक की गतिविदियों का लेखा-जोखा उससमय के अंग्रेजी-हिंदी के राष्ट्रीय अखबारों में किसी को भी सहज रूप में मिल जायेगा।अनिल प्रकाश को हर वह जानता है,जिसकी रुचि जनता के सरोकारों में रही है।यदि सवाल खड़े करनेवाले सज्जन इसे गलत मानते हैं,तो उनकी इस बात से भी प्रतिबद्धता होनी चाहिए कि सही बातों को समने लायें।थोड़ी मेहनत करें।वैसे हमारी रुचि गंगा पर हो रही राजनीति को गलत दिशा में जाने से रोकना होना चाहिए,न कि श्रेय लेने में।चुनौती बड़ी है।गंगा के किनारे बसे लोगों,किसानों,मल्लाहों आदि की जीविका और संस्कृति बचाने का संघर्ष आज सबसे ज्यादा जरुरी है।

Submitted by Anonymous (not verified) on Wed, 01/14/2015 - 11:04

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रामबिहारी सिंह को समझना चाहिये सत्ता की राजनीति और जनआंदोलन में फर्क होता है। वे जनआंदोलन को भी राजनीति की दुकान बनाना चाहते हैं। वौखलाहट इतनी क्यों? (संजय जी, यह मॉडरेटर द्वारा थोड़ा सा संपादित है, इसके लिए माफी चाहता हूं। -केसर )संजय कुमारवरिष्ठ उपसंपादकनई बात हिन्दी दैनिक

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