ग्लोबल वार्मिंग का धरती पर प्रभाव

Submitted by birendrakrgupta on Tue, 12/30/2014 - 07:24
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कुरुक्षेत्र, जनवरी 2014
यदि वर्तमान गति से पर्यावरण प्रदूषण जारी रहा तो आने वाले 75 वर्षों में पृथ्वी के तापमान में 3-60C की वृद्धि हो सकती है। जिसके बर्फ के पिघलने से समुद्री जल-स्तर में 1 से 1.2 फीट तक की वृद्धि हो सकती है और मुम्बई, न्यूयार्क, पेरिस, लन्दन, मालदीव, हालैण्ड और बांग्लादेश जैसे देशों के अधिकांश भूखण्ड समुद्र में जलमग्न हो सकते हैं।पर्यावरण जैव मण्डल का आधार है, लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद से विकास की जो तीव्र प्रक्रिया अपनाई गई है उसमे पर्यावरण के आधारभूत नियमों की अवहेलना की गई जिसका परिणाम पारिस्थितिक असन्तुलन एवं पर्यावरणीय निम्नीकरण के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है। आज विश्व के विकसित देश हो अथवा विकासशील देश, कोई भी पर्यावरण प्रदूषण के कारण उत्पन्न गम्भीर समस्या से अछूता नहीं है। 1970 के दशक में ही यह अनुभव किया गया कि वर्तमान विकास की प्रवृति असन्तुलित है एवं पर्यावरण की प्रतिक्रिया उसे विनाशकारी विकास में परिवर्तित कर सकती है। तब से लेकर वर्तमान वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या के समाधान हेतु कई योजनाएँ प्रस्तुत की गई, समाधानमूलक उपायों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। बावजूद इसके वास्तविक उपलब्धियाँ अति न्यून ही रही।

तो उसका तात्पर्य यह निकाला जाए कि वैश्विक स्तर पर ईमानदार प्रयास नहीं किए गए। साथ ही विभिन्न राष्ट्रों नें राष्ट्रीय आर्थिक विकास को कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना एवं पर्यावरणीय असन्तुलन के प्रति उदासीन बने रहे। उन तथ्यों की समीक्षा से पूर्व आवश्यकता है कि संक्षेप में उन समस्याओं पर विचार किया जाए जो पर्यावरणीय प्रदूषण को उत्पन्न कर रही हैं एवं जिनके कारण सम्पूर्ण जैव जगत के समक्ष गम्भीर चुनौती उत्पन्न हो गई है।

ग्लोबल वार्मिंग का धरती पर प्रभावग्लोबल वार्मिंग के कारण प्रकृति में बदलाव आ रहा है। कहीं भारी वर्षा तो कहीं सूखा, कहीं लू तो कहीं ठंड। कहीं बर्फ की चट्टानें टूट रही हैं तो कहीं समुद्री जल-स्तर में बढ़ोत्तरी हो रही हैं। आज जिस गति से ग्लेशियर पिघल रहे हैं इससे भारत और पड़ोसी देशों को खतरा बढ़ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग से फसल चक्र भी अनियमित हो जाएगा इससे कृषि उत्पादकता भी प्रभावित होगी। मनुष्यों के साथ-साथ पक्षी भी इस प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग पक्षियों के दैनिक क्रिया-कलाप और जीवन-चक्र को प्रभावित करता है।

ग्लोबल वार्मिंग में सर्वाधिक योगदान CO2 का है। 1880 से पूर्व वायुमण्डल में CO2 की मात्रा 280 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) थी जो आज आईपीसीसी रिपोर्ट के अनुसार 379 पीपीएम हो गई है। CO2 की वार्षिक वृद्धि दर गत वर्षों में (1995-2005) 1.9 पीपीएम वार्षिक है। आईपीसीसी ने भविष्यवाणी की है कि सन् 2100 आते-आते इसके तापमान में 1.1 से 6.40C तक बढ़ोत्तरी हो सकती है। सदी के अन्त तक समुद्री जल-स्तर में 18 से 58 से.मी. तक वृद्धि की सम्भावना है।

आईपीसीसी की रिपोर्ट में इस बात की चेतावनी दी गई है कि समस्त विश्व के पास ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए मात्र 10 वर्ष का समय और है। यदि ऐसा नहीं होता है तो समस्त विश्व को इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2080 तक 3.80 अरब लोगों को पानी उपलब्ध नहीं होगा। 60 करोड़ लोग भूखे मरेंगे। खासकर के इससे अल्प विकसित देशों को हानि होगी। अल्पाइन क्षेत्रों और दक्षिणी अमेरिका के आमेजन वन के समाप्त हो जाने की सम्भावना है। प्रशान्त क्षेत्र के कई द्वीप जलमग्न हो जाएँगे। वायुमण्डल के इस प्रकार के परिवर्तन को रेडिएटिव फोर्सिंग द्वारा मापा जाता है। आईपीसीसी के प्रमुख आर.के. पचौरी ने जलवायु परिवर्तन के लिए निम्न कारकों को उत्तरदायी बताया है :

1. औद्योगीकरण (1880) से पूर्व CO2 की मात्रा 280 पीपीएम थी जो अब (2005 के अन्त में) बढ़कर 379 पीपीएम हो गई है।
2. औद्योगीकरण के पूर्व मीथेन की मात्रा 715 पार्ट्स पर बिलियन (पीपीबी) थी और 2005 में बढ़कर 1734 पीपीबी हो गई है।
3. मीथेन की सान्द्रता में वृद्धि के लिए कृषि एवं जीवाश्म ईन्धन को उत्तरदायी माना गया है।
4. उपरोक्त वर्षों में नाइट्रस ऑक्साइड की सान्द्रता क्रमशः 270 पीपीबी से बढ़कर 319 पीपीबी हो गई है।
5. समुद्री तापमान में भी 3000 मि.मी. वृद्धि हुई है।
6. समुद्री जल-स्तर में वृद्धि 1961 के मुकाबले 2003 में औसत वृद्धि 1.8 मि.मी. हुई है।
7. पिछले 100 वर्षों में अण्टार्कटिका के तापमान में दोगुना वृद्धि हुई है तथा इसके बर्फीले क्षेत्रफल में भी कमी आई है।
8. मध्य एशिया, उत्तरी यूरोप, दक्षिणी अमेरिका आदि में वर्षा की मात्रा में वृद्धि हुई है तथा भूमध्य सागर, दक्षिणी एशिया और अफ्रीका में सूखा में वृद्धि दर्ज की गई है।
9. मध्य अक्षांशों में वायु प्रवाह में तीव्रता आई है।
10. उत्तरी अटलाण्टिक से उत्पन्न चक्रवातों की संख्या में वृद्धि हुई है।

आईपीसीसी की रिपोर्ट में इस बात की चेतावनी दी गई है कि समस्त विश्व के पास ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए मात्र 10 वर्ष का समय और है। यदि ऐसा नहीं होता है तो समस्त विश्व को इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।

कुछ वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि वैश्विक तापन से पृथ्वी की अपनी धुरी पर घूमने की गति में लगातार कमी होती जा रही है। जर्मनी के वैज्ञानिकों के एक शोध के अनुसार भविष्य में पैदा होने वाली सन्तान में लड़कों की संख्या बढ़ेगी जिसका कारण लड़कों का लिंग निर्धारण करने वाले Y-गुण सूत्र में गर्मी को सहन करने की क्षमता अधिक होती है। अभी तक के इतिहास में 1990 का दशक सर्वाधिक गर्म रहा।

आइए अब हम वायुमण्डलीय प्रदूषण के कारणों की चर्चा करते है जिसमें ग्रीन हाउस प्रभाव और ओजोन क्षरण मुख्य है।

वर्ष 2004 में CO2 की मात्रा

देश

CO2 की मात्रा (बिलियन टन प्रति वर्ष)

प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष (टन में)

अमेरिका

5.9

23.6

चीन

4.7

1.0

रूस

1.7

4.7

जापान

1.3

10

भारत

1.1

1


ग्लोबल वार्मिंग में विभिन्न देशों का योगदान (प्रति वर्ष में)

संयुक्त राज्य अमेरिका

30.3

यूरोप

27.7

सोवियत संघ

13.7

भारत, चीन और विकासशील एशिया

12.2

दक्षिण और मध्य अमेरिका

3.8

जापान

3.7

पश्चिम एशिया

2.6

अफ्रीका

2.5

ऑस्ट्रेलिया

1.1

कनाडा

2.3


ग्रीन हाउस प्रभाव


वायुमण्डल के संघटन में CO2 एक महत्वपूर्ण कारक है। कुछ और अन्य गैसें और CO2 सूर्य की किरणों का अवशोषण करके वायुमण्डल को अपेक्षित ताप तक गर्म रखती है। इसे ही ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं। इस प्रभाव में मुख्य भूमिका CO2 के अलावा CH4, CFC, N2O और O3 गैसें हैं। ये गैसें पृथ्वी के चारों ओर एक आवरण बना लेती हैं। जिसमें सौर विकिरण प्रवेश तो कर लेता है लेकिन वापस नहीं जा पाता है और पृथ्वी तथा वायुमण्डल दोनों का ताप बढ़ता है। ग्रीन हाउस प्रभाव की घटना बहुत पुरानी है। लेकिन इस पर पहले ध्यान नहीं दिया जाता था। जब औद्योगीकरण की शुरुआत हुई तो यह प्रभाव चर्चा में आया।

यदि वर्तमान गति से पर्यावरण प्रदूषण जारी रहा तो आने वाले 75 वर्षों में पृथ्वी के तापमान में 3-60C की वृद्धि हो सकती है। जिसके बर्फ के पिघलने से समुद्री जल-स्तर में 1 से 1.2 फीट तक की वृद्धि हो सकती है और मुम्बई, न्यूयार्क, पेरिस, लन्दन, मालदीव, हालैण्ड और बांग्लादेश जैसे देशों के अधिकांश भूखण्ड समुद्र में जलमग्न हो सकते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के संकेत


1. फैलती बीमारियाँ।
2. ऋतुओं का समय-पूर्व आगमन।
3. वनस्पति और जीवों के क्रिया-कलाप में परिवर्तन।
4. पानी के ताप में वृद्धि से मूँगा भित्ति संकट में।
5. भारी वर्षा, बाढ़, बर्फबारी, सूखा आदि।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव


1. तापमान में तीव्र बढ़ोत्तरी।
2. समुद्री जल-स्तर में वृद्धि।
3. पहाड़ों से पिघलते ग्लेशियर।
4. जल संकट।

ग्लोबल वार्मिंग कम करने के उपाय


1. CO2 का स्तर कम किया जाए।
2. विभिन्न माध्यमों से कूड़ा-करकट कम करें।
3. बिजली के उपकरणों के अनावश्यक प्रयोग से बचें।
4. वनों का संरक्षण करें।
5. आम बल्बों के स्थान पर सीएफएल का प्रयोग करें।
6. वृक्षारोपण कार्यक्रम जलाया जाए।
7. ऑक्सीजन के लिए वनों का बचाव आवश्यक।

ओजोन क्षरण


वायुमण्डल के स्ट्रेटोस्फीयर में 20 कि.मी. की मोटाई में ओजोन गैस पायी जाती है। ओजोन (O3) अत्यन्त क्रियाशील गैस मानी जाती है। सूर्य के प्रकाश की पराबैगनी किरणें अन्तरिक्ष से पृथ्वी की ओर आती हैं तो पृथ्वी के वायुमण्डल की समताप मण्डल परत पर उपस्थित ऑक्सीजन के अणुओ को परमाणुओं में तोड़ देती हैं। ऑक्सीजन के ये एकांकी परमाणु उसके अणु से मिलकर (O2+O= O3) ओजोन का निर्माण करते हैं। ओजोन अपनी सक्रियता के कारण नाइट्रस ऑक्साइड के साथ क्रिया करके विघटित होती है। इस प्रकार विनाश और निर्माण की प्राकृतिक प्रक्रिया से गतिक सन्तुलन बना रहता है। इस सन्तुलन में उस समय बाधा आती है जब वायुमण्डल में सीएफसी तथा क्लोरीनयुक्त अन्य यौगिक (हेलोन्स, कार्बन टेट्राक्लोराइड) अधिक मात्रा में आने लगते हैं। अब ये क्लोरीन के परमाणु ओजोन के साथ क्रिया करके क्लोरीन मोनो-ऑक्साइड (सीएलओ) बनाते हैं तथा ओजोन को ऑक्सीजन में तोड़ देते हैं। इसे ओजोन क्षरण कहा जाता है। क्लोरीन पुनः उत्प्रेरक का कार्य करता है और अभिक्रिया क्रियाशील रहती है।

ओजोन छिद्र का पता सर्वप्रथम 1973 में अमेरिका के वैज्ञानिकों ने अण्टार्कटिका के ऊपर लगाया। 1985 में जोसफ फोरमेन ने ओजोन परत में 50 प्रतिशत का ह्रास देखा। ओजोन ह्रास मानव के लिए चिन्ता का विषय है। क्योंकि इससे मनुष्य को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं जिसमें प्रमुख हैं- चर्म कैंसर, पेड़-पौधों के क्लोरोफिल पर भी विपरित प्रभाव देखा जा रहा है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम ओजोन क्षरण पदार्थ (ओडीसी) के स्थान पर ओजोन मित्र पदार्थ (ओएफसी) जैसे- हाइड्रोक्लोरोफ्लोरो कार्बन, का प्रयोग करें।

क्र.सं.

वायु प्रदूषण

प्राथमिक अथवा द्वितीयक

मुख्य स्रोत

1.

ओजोन (O3)

द्वितीयक पदार्थ

वायुमण्डलीय परिवर्तन से उत्पन्न जो स्वयं चालित वाहनों से उत्सर्जित नाइट्रोजन डाइऑक्साइड व हाइड्रो-कार्बन के प्रति क्रिया से उत्पन्न पदार्थ।

2.

सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)

प्राथमिक पदार्थ

फैक्ट्रियों में ऊर्जा उत्पादक यन्त्रों/मशीनों अथवा किसी ठोस पदार्थों के पिघलाने वाले संयन्त्र से उत्पन्न।

3.

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2)

 प्राथमिक/द्वितीयक पदार्थ

उच्च तापक्रम पर उत्पन्न ज्वलन प्रक्रिया के उपरान्त सीधे उत्पन्न या वायुमण़्डलीय परिवर्तन द्वारा उत्पन्न अथवा उर्वरक के संयन्त्रों/उत्पाद द्वारा उत्सर्जित।

4.

हाइड्रोजन फ्लोराइड (HF)

प्राथमिक पदार्थ उत्पन्न

सुपर फॉस्फेट, एल्यूमिनियम गलन के दौरान।

5.

इथिलीन

प्राथमिक पदार्थ

ज्वलनशील प्रक्रिया अथवा प्राकृतिक उत्पाद।

6.

नाइट्रस ऑक्साइड (NO)

प्राथमिक पदार्थ

ज्वलनशील प्रक्रिया अथवा प्राकृतिक उत्पाद।

7.

क्लोरीन (Cl2)

प्राथमिक पदार्थ

द्रव्य बहाव/निर्माण से उत्पन्न द्रव्य।

8.

हाइड्रोजन क्लोराइड

प्राथमिक पदार्थ

प्लास्टिक पदार्थों के ज्वलन से उत्पन्न पदार्थ।

9.

विषैला पदार्थ

प्राथमिक पदार्थ

पिघलन एवं ज्वलन प्रक्रिया से उत्पन्न पदार्थ।

10.

अमोनिया

प्राथमिक पदार्थ

प्राकृतिक रूप से उत्पन्न अथवा चारे समुच्चय के सड़न से पैदा।

11.

सल्फेट

द्वितीयक पदार्थ

सल्फर डाइऑक्साइड के परिवर्तन से उत्पन्न।

12.

हाइड्रोजन फैरा ऑक्साइड

प्राथमिक पदार्थ

अखबार/पेपर उत्पाद मशीनों से उत्पन्न।

13.

नाइट्रेट

द्वितीयक पदार्थ

प्राकृतिक रूप से उत्पन्न या ज्वलनशील प्रक्रिया से उत्पन्न।

14.

कार्बन डाइऑक्साइड

प्राथमिक पदार्थ

वायुमण्डलीय परिवर्तन से उत्पन्न या स्वयं चालित वाहनों से निकले NO2 व हाइड्रो-कार्बन के प्रतिक्रिया से उत्पन्न पदार्थ।


वातावरण में तीव्र परिवर्तन की तुलना में उदासीन प्रयास


1972– स्टॉकहोम सम्मेलन (यूएनईपी का गठन), 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस घोषित।
1987- माण्ट्रियल समझौता (48 देशों के मध्य)।
1988- आईपीसीसी की स्थापना।
1990- आईपीसीसी की पहली रिपोर्ट — पिछली सदी में धरती का औसत ताप 0.50 बढ़ा।
1992- रियो सम्मेलन एजेण्डा-21 घोषणा जारी।
1996- प्रदूषण कम करने पर अमेरिका की पहली बार सहमति।
1997- क्योटो सन्धि, औद्योगिक देशों का 2012 तक ग्रीन हाउस में 5.4 प्रतिशत की कमी का वचन।
1998- क्योटो सन्धि का पुनरावलोकन (ब्यूनस आयर्स में)।
2001- अमेरिका ने कहा, क्योटो सन्धि कर सकती है हमारी विकास अर्थव्यवस्था को तबाह।
2002- यूरोपीय संघ, जापान समेत कई देशों नें क्योटो की पुष्टि की लेकिन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया शामिल नहीं।
2004- रूस भी क्योटो पर सहमत।
2005- माण्ट्रियल वार्ता जारी।

समस्या


जलवायु परिवर्तन सम्बन्धित आईपीसीसी रिपोर्ट ने दुनिया के सभी देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। लेकिन फिर भी ऐसे विकसित राष्ट्र हैं जो पर्यावरण के प्रदूषण को मजाक समझ रहे हैं और अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहे हैं। अमेरिका जो कि सर्वाधिक प्रदूषण उत्पन्न करता है, अपने आर्थिक विकास में बाधा की दुहाई देकर पर्यावरण सम्बन्धित समझौतों से अलग रहना चाहता है। कुछ इसी तरह की चाल ऑस्ट्रेलिया की है।

ग्लोबल वार्मिंग का धरती पर प्रभाव_ग्लेशियरजो देश बिल्कुल न के बराबर ग्रीन हाउस गैस उत्पन्न करते हैं उनके समझौते पर हस्ताक्षर करने से क्या लाभ जब तक प्रमुख राष्ट्र आगे न आए। हम यह नहीं कह रहे हैं कि विकासशील देशों की जिम्मेदारी कम है। जलवायु परिवर्तन की समस्या वैश्विक है और इसका सामना वैश्विक स्तर पर किया जाना चाहिए। पर्यावरणीय संगठन की प्रमुख सुनीता नारायण ने कहा है कि “अब समय आ गया है कि हम अपनी मूर्खता से बाहर निकलें और निश्चित करें कि हमें तीव्र विकास चाहिए या पर्यावरणीय सुरक्षा।”

अभी हाल ही में पेरिस में एक सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिंग की रोकथाम के लिए 46 राष्ट्रों का संगठन बना है। इसमें विश्व के चार अधिक प्रदूषित देश – अमेरिका, चीन, रूस, भारत शामिल नहीं हुए। आखिर हम चाहते क्या हैं। कुछ दिन बाद जब हमारे सामने से सभी विकल्प उठ जाएँगे तब हम पछताएँगे, अभी हमें यह बात हँसाने वाली लगती है।

ग्लोबल वार्मिंग कोई सैद्धांतिक शब्द नहीं है जिसे किताबों मे पढ़ लिया और फिर दिमाग से निकाल दिया। इस सम्बन्ध में सरकार द्वारा जन जागरुकता फैलाई जानी जाहिए। इको-फ्रेण्डली तकनीकी का विकास किया जाना चाहिए। हमने एक ग्रामीण से कहा कि चलो ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए कुछ उपाय करें तो ग्रामीण का जवाब था- “हमें क्या मिलेगा जैसे सब जी रहे हैं वैसे हम भी।” इस कथन से जन जागरुकता की कमी झलकती है जो सरकार द्वारा अभियान चला कर दूर की जा सकती है।

पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में कुछ प्रयास


पर्यावरण संरक्षण कोई व्यक्तिगत समस्या नहीं है बल्कि यह एक वैश्विक समस्या है। विश्व के कई वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने आगाह किया है कि यदि पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले दिनों में तस्वीर भयानक होगी। अगर हम इस बात पर ध्यान नहीं देते तो यह “तात्कालिक विकास के लिए दूरगामी मौत की अनदेखी” होगा। हमें यह निश्चित कर लेना चाहिए कि अन्धाधुन्ध विकास हमारी प्राथमिकता है या पर्यावरणीय सुरक्षा। पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में सबसे पहला कदम 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन के तहत उठाया गया। इस सम्मेलन के बाद भारत में “प्रोजेक्ट टाइगर” चलाने का निर्णय लिया गया और वायु प्रदूषण से सम्बन्धित कानून बनाये गए। इस सम्मेलन में यूएनईपी का गठन किया गया जिसका उद्देश्य विकासशील देशों को पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक सुविधा और सलाह देना था। 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाने की घोषणा इसी सम्मेलन में की गई।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से रियो-डि-जेनेरियो सम्मेलन (1992) आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में एजेण्डा-21 नामक कार्यक्रम निर्धारित किया गया। यह चार भागों में था :

1. विकासशील देशों से सम्बन्धित समस्या, गरीबी निवारण और जनसंख्या नियन्त्रण को आवश्यक माना गया।
2. सबको खाद्य, स्वच्छ जल व सामाजिक सुरक्षा की उपलब्धता।
3. पूँजी स्थानान्तरण को उदार बनाने पर बल।
4. जैव विविधता का सर्वेक्षण।

इस सम्मेलन में अन्य चार महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए— तापमान नियन्त्रण, वनीय संरक्षण, जैव विविधता, टिकाऊ विकास आदि। तापमान नियन्त्रण के सम्बन्ध में दिसम्बर 1997 में क्योटो में हुए पृथ्वी-5 सम्मेलन में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए कि यूरोप के प्रत्येक देश को 8 प्रतिशत, अमेरिका को 7 प्रतिशत तथा जापान को 6 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने की बात कही गई। साथ ही यह भी निश्चित किया गया कि वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों का स्तर किसी भी स्थिति में 1990 के दशक से ऊपर नहीं जाना चाहिए। इसे प्राप्ति हेतु वर्ष 2012 निर्धारित है। 16 फरवरी 2005 से क्योटो लागू हो गया है। इसी दिशा में एक मुख्य प्रयास जोहान्सबर्ग सम्मेलन (2002) भी है। इसे पृथ्वी-10 सम्मेलन कहा जाता है। क्योंकि रियो के एजेण्डा-21 के कार्यान्वयन की यह 10 वर्षीय (1992-2002) समीक्षा थी।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमनद कम हो रहे हैं और इसके कारण अधिक ऊंचाई की आर्द्र भूमियों के जल-स्तर में परिवर्तन हो रहा है। जिससे अंततः निचले क्षेत्र प्रभावित होते हैं। यद्यपि नेपाल और भूटान से हिमनदों के पिघलने से बाढ़ आ जाने की खबर है तथापि भारत में इस प्रकार की किसी घटना के होने का पता नहीं चला है। आर्द्र भूमि के संरक्षण के लिए सरकार ने कई कार्यक्रम शुरू किये हैं जिनमें सर्वेक्षण और सीमांकन के लिए प्रबन्धन कार्य योजनाओं की तैयारी, कैचमेण्ट क्षेत्र उपचार, गाद निकालना, खरपतवारों की रोकथाम, मत्स्य पालन विकास, सामुदायिक सहभागिता तथा जल प्रबन्धन आदि शामिल हैं। (पसूका)औद्योगिक सभ्यता ने हमें असंख्य भौतिक लाभ पहुँचाए हैं तथा सुख-सुविधाएँ दी हैं किन्तु इन सबके लिए हमें पर्यावरण की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। प्राकृतिक वातावरण की जीवन समर्थक प्रणालियों की सीमाएँ हैं, जिनके बाहर जाने पर वे ठीक से काम करना बन्द कर देती हैं और विफल तक हो जाती हैं। इसलिए पहले से ही संकट का सामना कर रहे विश्व पर्यावरण में हम पहले की तरह नहीं चल सकते क्योंकि अगर हम ऐसे ही चलते रहे तो भावी पीढ़ियों को एक प्रदूषित और शायद असमानताओं से युक्त एक बर्बर विश्व विरासत में मिले, जो सभ्यता विहीन विज्ञान और मानवता विहीन समाज से निर्मित हो।

अतः यदि समय रहते इस समस्या का निराकरण न किया गया तो एक दिन ऐसा आएगा कि प्रदूषण की समस्या सम्पूर्ण मानव जाति को निगल जाएगी। प्रदूषण से बचने के लिए आम आदमी भी कुछ छोटे-मोटे उपाय कर सकता है जैसे वनों तथा पेड़ों की कटाई पर रोक के साथ-साथ वृक्षारोपण, बस्ती तथा नगर के समस्त वर्जित पदार्थों के निष्कासन के लिए सुदूर स्थान पर समुचित व्यवस्था, बस्ती तथा नगर में स्वच्छता व सफाई की ओर विशेष ध्यान, पेयजल को शुद्ध बनाए रखने पर ध्यान देना, इत्यादि।

भारत सरकार ने भी प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए अनेक उपाय अपनाए हैं। केन्द्रीय जन स्वास्थ्य इंजीनियरी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने जल व वायु प्रदूषण को रोकने के लिए अनेक बहुमूल्य सुझाव दिए हैं, जिन पर तेजी के साथ अमल भी किया जा रहा है। कारखानों एवं खानों में प्रदूषण रोकने के उपायों पर औद्योगिक विष विज्ञान संस्थान (लखनऊ) तथा राष्ट्रीय संस्थान (अहमदाबाद) में अनुसंधान कार्य गम्भीरतापूर्वक किया जा रहा है। इसके अलावा केन्द्र सरकार का राज्य सरकारों को कड़ा निर्देश है कि प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों में ट्रीटमेण्ट प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की स्थापना कर दी जाए।

निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है कि पर्यावरण से सम्बद्ध किसी समस्या को हल करने में वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों को आमतौर पर वर्षों लग जाते हैं, फिर भी समाधान आंशिक ही निकल पाता है और कभी-कभी तो किसी सिद्धान्त के विकास, उसे लागू करने और उसके इस्तेमाल में कई दशक लग जाते हैं। दूसरी ओर समाज लगातार पर्यावरण सम्बन्धी नयी समस्याएँ चिन्ताजनक ढंग से पैदा करता रहता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं के बारे में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी विषयक अनुसंधान के प्रति बढ़ती जागरुकता के बावजूद उसके वांछित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं।

(लेखक पर्यावरण सम्बन्धी मामलों के जानकार हैं)
ई-मेल : mayank_129@rediffmail.com

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