12वीं पंचवर्षीय योजना में जल क्षेत्र में नयी शुरुआत

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 01/08/2015 - 17:37
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योजना, नवम्बर 2013
21वीं सदी में प्रवेश के साथ भारत को एक बड़े जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। इस संकट की वजह से हमारे नागरिकों के पीने के पानी के बुनियादी अधिकार संकट में पड़ गए हैं; इससे लाखों लोगों की आजीविका भी जोखिम में पड़ गई है। अर्थव्यवस्था के तीव्र औद्योगीकरण की माँग और समाज में शहरीकरण की प्रवृत्ति ऐसे समय उत्पन्न हुई है, जब जलापूर्ति बढ़ाने की क्षमता सीमित है, जलस्तर गिर रहे हैं और जल की गुणवत्ता के मुद्दे तेजी से उभर रहे हैं।

बड़े बाँधों की सीमाएँ


विशेषज्ञों के ताजा आकलन के अनुसार व्यवहार्य अतिरिक्त जल भण्डारण की व्यवस्था करने में नयी बड़ी बाँध परियोजनाओं की भूमिका परिमित हो गई है (अकरमैन, 2011)। नदियों को आपस में जोड़ने के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ने भी बड़ी समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। हिमालयी नदियों को प्रायद्वीपीय नदियों के साथ जोड़ने की व्यापक प्रस्तावित परियोजना पर 2001 में 5,60,000 करोड़ रुपये की लागत का अनुमान लगाया गया था। भूमि जल-प्लावन और अनुसन्धान एवं गवेषणा (आर एण्ड आर) पैकेजों की लागत इसमें शामिल नहीं थी। परियोजना की सतत् लागत के बारे में कोई ठोस अनुमान उपलब्ध नहीं है, जैसे पानी को ऊँचाई तक ले जाने के लिए अपेक्षित बिजली की लागत के बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया गया।

सापेक्षिक सहजता और सुगमता के साथ विकेन्द्रीकृत पहुँच होने के कारण भूमिगत जल भारत में कृषि और पेयजल सुरक्षा का आधार है। भूमिगत जल साझा-पूल संसाधन है, जिसका इस्तेमाल देश भर में करोड़ों किसानों द्वारा किया जाता है। पिछले 4 दशकों में सिंचाई क्षेत्र के अन्तर्गत शामिल किए गए कुल क्षेत्र का 84 प्रतिशत हिस्सा भूमिगत जल पर निर्भर है। मानसून पर हमारी निर्भरता को देखते हुए एक समस्या यह भी है कि सभी प्रायद्वीप में नदियों में ‘अतिरिक्त जल’ सामान्यतः एक ही समय आता है। नदी घाटियों के बीच परस्पर जल-अन्तरण योजना में एक बड़ी समस्या यह है कि थाले में आने वाले राज्यों की उचित आवश्यकता का हिसाब कैसे लगाया जाएगा, जो समय के साथ-साथ बढ़ती जाएगी। इसके अलावा भारत की स्थलाकृति और प्रस्तावित नदियों को जोड़ने के मार्गों की दूरी को देखते हुए मध्यवर्ती और पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्र इनके दायरे में नहीं आते हैं, जो एमएसएल से ऊपर 300 मीटर से अधिक की ऊँचाइयों पर स्थित हैं।

यह आशंका भी है कि नदियों के जोड़ने से अनुप्रवाही क्षेत्रों में बाढ़ के जरिए होने वाली पोषक तत्वों की प्राकृतिक आपूर्ति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। भारत के पूर्वी तट के साथ, सभी प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियों के विस्तृत डेल्टा क्षेत्र हैं। सम्पर्क के लिए नदियों पर बाँध बनाने से तलछट की आपूर्ति कम हो जाएगी और तटीय और डेल्टा क्षेत्रों का क्षरण होगा, जिससे कमजोर तटीय पारिस्थितिकी प्रणालियाँ नष्ट हो जाएँगी।

इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि इस कार्यक्रम से मानसून प्रणाली पर भी महत्वपूर्ण असर पड़ेगा (राजमणि और अन्य, 2006)। बंगाल की खाड़ी में समुद्री सतह का तापमान उच्च (28 डिग्री सेण्टीग्रेड से अधिक) बनाए रखने में कम लवणता और कम घनत्व वाली जल परत की भूमिका है, जिससे कम दबाव वाले क्षेत्रों का निर्माण होता है और मानसून की गतिविधियाँ सघन होती हैं। प्रायद्वीप के ज्यादातर हिस्सों में वर्षा को कम लवणता वाली यही जल-परत नियन्त्रित करती है। इस परत को क्षति पहुँचने से प्रायद्वीप में जलवायु और वर्षा की स्थिति पर गम्भीर दीर्घावधि प्रभाव पड़ सकते हैं, जिससे बड़ी आबादी की जीविका ख़तरे में पड़ सकती है।

भूमिगत जल का संकट


सापेक्षिक सहजता और सुगमता के साथ विकेन्द्रीकृत पहुँच होने के कारण भूमिगत जल भारत में कृषि और पेयजल सुरक्षा का आधार है। भूमिगत जल साझा-पूल संसाधन है, जिसका इस्तेमाल देश भर में करोड़ों किसानों द्वारा किया जाता है। पिछले 4 दशकों में सिंचाई क्षेत्र के अन्तर्गत शामिल किए गए कुल क्षेत्र का 84 प्रतिशत हिस्सा भूमिगत जल पर निर्भर है। भारत, विश्व में भूमिगत जल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और उसकी तत्सम्बन्धी माँग सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही है। किन्तु, भूमिगत जल का दोहन टिकाऊ स्तरों से अधिक किया जा रहा है। अनुमान है कि भारत में तीन करोड़ भूमिगत जल संरचनाएँ कार्यरत हैं। अत्यधिक निकासी होने से भारत में भूमिगत जल की मात्रा और गुणवत्ता के ह्रास का गम्भीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

भारत में सभी जिलों में करीब 60 प्रतिशत क्षेत्रों में भूमिगत जल की मात्रा या गुणवत्ता या दोनों से सम्बन्धित समस्याएँ हैं। केन्द्रीय भूमिगत जल बोर्ड के ताजा मूल्यांकन (सीजीडब्ल्यूबी, 2009) के अनुसार अखिल भारतीय स्तर पर भूमिगत जल के विकास का स्तर 61 प्रतिशत है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में यह स्तर शत-प्रतिशत को पार कर गया है। इसके बाद तमिलनाडु (80 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (71 प्रतिशत) का स्थान है।

महत्वपूर्ण बदलाव की आवश्यकता


देश के व्यापक हिस्सों में जल संसाधनों के विकास की स्पष्ट सीमाओं को देखते हुए 12वीं पंचवर्षीय योजना में इस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है कि इस दिशा में कैसे आगे बढ़ा जाए। एक बात साफ है कि परम्परागत दृष्टि से काम नहीं चलेगा। नयी युक्तियाँ तत्काल अपनाने की आवश्यकता है, जिनके लिए श्रेष्ठ विद्वानों और विशेषज्ञों को मिल कर काम करना होगा। इसे ध्यान में रखते हुए योजना प्रारूपण का नया ढंग अपनाया गया। योजना आयोग के इतिहास में पहली बार 12वीं योजना में जल क्षेत्र सम्बन्धी सभी कार्यदलों की अध्यक्षता सरकार के बाहर से जाने-माने विशेषज्ञों को सौंपी गई। 2011-12 में कई महीने के विचार-विमर्श के बाद एक नया मार्ग खोजा गया, जिससे भारत में जल संसाधन प्रबन्धन में 10 गुणा प्रतिमानी बदलाव आया। इस आलेख में इस बदलाव की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट किया गया है।

प्रतिमानी बदलाव के 10 तत्व


1. व्यापक सिंचाई सुधार :
बड़े और मध्यम सिंचाई (एमएमआई) क्षेत्र में और विकास की सम्भावनाएँ सीमित होने को देखते हुए 12वीं पंचवर्षीय योजना में संकीर्ण इंजीनियरी-निर्माण-केन्द्रित दृष्टिकोण के स्थान पर अधिक विविधतापूर्ण, हिस्सेदारीपूर्ण प्रबन्धन सन्दर्श अपनाया गया, जिसमें कमान क्षेत्र विकास पर ध्यान केन्द्रित किया गया और जल किफायती इस्तेमाल में सुधार के स्थिर प्रयासों की आवश्यकता उजागर की गई, जो निरन्तर निचले स्तर पर बनी हुई थी। इस तथ्य को देखते हुए कि हमारे जल संसाधनों का करीब 80 प्रतिशत सिंचाई के काम आता है, 12वीं पंचवर्षीय योजना में सिंचाई परियोजनाओं की जल उपयोग सक्षमता में 20 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य रखा गया। इससे न केवल कृषि के लिए बल्कि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के लिए भी पानी की समग्र उपलब्धता पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

अभी तक प्रमुख रुकावट यह रही है कि कई राज्यों में गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ प्रदान करने की सिंचाई विभागों की क्षमताएँ बढ़ते एमएमआई निवेश के साथ तालमेल बिठाए रखने में विफल रही हैं। राज्य नयी एमएमआई परियोजनाओं में पूंजी निवेश की होड़ में लगे हैं, लेकिन वे उनके प्रभावकारी प्रबन्धन पर ध्यान नहीं देते हैं। यह बात इस तथ्य से सम्बद्ध है कि अनेक राज्यों में किसानों से वसूल की जाने वाली सिंचाई सेवा फीस (आईएसएफ) समाप्त कर दी गई है अथवा बहुत कम यानी देय राशि का 2-8 प्रतिशत तक रखी गई है। इस तरह किसानों और सिंचाई विभागों के बीच जवाबदेही का सम्बन्ध टूट जाता है। जहाँ आईएसएफ नियमित रूप से वसूल किया जाता है, वहाँ सिंचाई कर्मचारी किसानों के प्रति अधिक जवाबदेही और दायित्व के साथ काम करते हैं। दोनों के बीच गहरा सम्बन्ध है। जल वितरण की व्यापक अनदेखी होती है और किसान यह उम्मीद करते हैं कि अगर उनसे आईएसएफ की माँग की जाती है तो उन्हें कम से कम बुनियादी सेवा तो प्रदान की जानी चाहिए।

बड़े और मध्यम सिंचाई (एमएमआई) क्षेत्र में और विकास की सम्भावनाएँ सीमित होने को देखते हुए 12वीं पंचवर्षीय योजना में संकीर्ण इंजीनियरी-निर्माण-केन्द्रित दृष्टिकोण के स्थान पर अधिक विविधतापूर्ण, हिस्सेदारीपूर्ण प्रबन्धन सन्दर्श अपनाया गया, जिसमें कमान क्षेत्र विकास पर ध्यान केन्द्रित किया गया और जल किफायती इस्तेमाल में सुधार के स्थिर प्रयासों की आवश्यकता उजागर की गई, जो निरन्तर निचले स्तर पर बनी हुई थी।अपेक्षित प्रमुख बदलाव को अंजाम देने के लिए राज्यों को प्रोत्साहन हेतु एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सिंचाई प्रबन्धन कोष (एनआईएमएफ) बनाया जा रहा है। एनआईएमएफ अपव्ययगत (नॉन-लेप्सेबल) कोष, जो राज्य सिंचाई विभागों को किसानों से की गई आईएसएफ वसूली के समान अंशदान की भरपाई 1:1 के अनुपात से करेगा। अन्तर-कमान क्षेत्रों में एमएमआई स्टाफ के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए राज्य एमएमआई प्रणालियों में केन्द्रीय अनुदान अपने सम्बद्ध आईएसएफ वसूली के अनुपात में करेंगे। भागीदारीपूर्ण सिंचाई प्रबन्धन (पीआईएन) को प्रोत्साहित करने के लिए एनआईएमएफ प्रत्येक राज्य की आईएसएफ वसूली के उस भाग पर बोनस प्रदान करेगा, जो जल इस्तेमालकर्ता संगठनों (डब्ल्यूयूएस) के जरिए वसूल की गई हो और इसमें यह शर्त होगी कि डब्ल्यूयूएस और उनके परिसंघों को आईएसएफ का एक निश्चित हिस्सा रखने की अनुमति दी जाएगी, जिससे वे न केवल वितरण प्रणालियों के मरम्मत और अनुरक्षण कराने में सक्षम होंगे बल्कि जल प्रबन्धन में उनकी हिस्सेदारी भी बढ़ेगी।

इसी प्रकार मात्रात्मक जल वितरण को प्रोत्साहित करने के लिए एनआईएमएफ किसी राज्य की आईएसएफ वसूली के उस हिस्से पर बोनस प्रदान करेगा जो आउटलेट स्तर पर जल इस्तेमालकर्ता संगठनों (डब्ल्यूयूएस) को की गई मात्रात्मक जलापूर्ति के जरिए एकत्र की गई हो। इसका स्पष्ट संकेत यह है कि जल इस्तेमालकर्ता संगठनों का सशक्तीकरण जल के मूल्यन और आईएसएफ वसूली को अधिक पारदर्शिता एवं भागीदारीपूर्ण ढंग से करने की प्रक्रिया का आधार है। ये प्रस्ताव पिछले कुछ वर्षों में आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में जमीनी स्तर पर प्राप्त अनुभवों पर आधारित हैं।

सिंचाई में भारी निवेश के परिणाम वांछित नतीजों से बहुत कम रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि कमान क्षेत्र विकास की निरन्तर अनदेखी की गई है और सिंचाई क्षमताओं के निर्माण से उसे अलग रखा गया है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में कहा गया है कि इससे आगे सभी सिंचाई प्रस्तावों (बड़े, मध्यम और छोटे) में कमान क्षेत्र विकास कार्यों को प्रारम्भ से ही परियोजना के अभिन्न अंग के रूप में शामिल किया जाएगा।

2. जलवाही स्तर का भागीदारीपूर्ण प्रबन्धन :
भारत की सिंचाई व्यवस्था में करीब दो तिहाई योगदान भूमिगत जल का है, और घरेलू जल की 80 प्रतिशत आवश्यकताएँ भूमिगत जल से पूरी होती हैं भारत की सिंचाई व्यवस्था में करीब दो तिहाई योगदान भूमिगत जल का है, और घरेलू जल की 80 प्रतिशत आवश्यकताएँ चूँकि भूमिगत जल से पूरी होती हैं, अतः 12वीं पंचवर्षीय योजना में भूमिगत जल के स्थाई प्रबन्धन के लिए जलवाही स्तर मानचित्रण के आधार पर भागीदारीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया गया है, जिसमें साझा-पूल संसाधन (सीपीआर) किस्म के भूमिगत जल को आधार बनाया जाएगा।

यह ऐसी सोच है जो 12वीं पंचवर्षीय योजना में शुरू किए गए भारत के जलवाही स्तरों के मानचित्रण के लिए व्यापक कार्यक्रम को नया आधार प्रदान करती है। यह सोच निम्नांकित पहलुओं पर आधारित है :

1. सतही जल वैज्ञानिक इकाइयों (जल-सम्भर और नदी बेसिन) और भू-जल वैज्ञानिक इकाइयों, अर्थात् जलवाही स्तरों के बीच सम्बन्ध;
2. जलवाही स्तर का निर्माण करने वाली व्यापक प्रस्तर-वैज्ञानिक (लिथोलॉजिकल) संरचना की ज्यामिति के बारे में कुछ विचार जैसे—विस्तार और मोटाई;
3. भूमिगत जल पुनर्भरण क्षेत्रों की पहचान, जो संरक्षण और संवर्धन कार्यनीतियों का नतीजा है;
4. गाँव या जल-सम्भर के पैमाने पर भूमिगत जल सन्तुलन और फसल जल बजटिंग;
5. जलवाही स्तर भण्डार क्षमता सहित भूमिगत जल भण्डार और पारेषण विशेषताओं के सन्दर्भ में प्रत्येक जलवाही स्तर पर अलग-अलग भूमिगत जल मूल्यांकन;
6. खुदाई, गहराई (या ट्यूबवेल अथवा बोरवेल खोदे जाने हैं या नहीं) सहित सामुदायिक स्तर पर नियामक विकल्प, कुओं के बीच दूरी (विशेषकर पेयजल स्रोतों के बारे में), फसल पद्धति, जो न केवल स्रोत (कुआं/ ट्यूबवेल) की बल्कि संसाधन (जलवाही स्तर) की स्थिरता सुनिश्चित करती है और इस बात को ध्यान में रखते हुए कि सभी सम्बद्ध पक्षों में भूमिगत जल का वितरण समानता के सिद्धान्त पर किया जाए, जलवाही स्तर की समझ के आधार पर भूमिगत जल के भागीदारीपूर्ण प्रबन्धन के लिए व्यापक योजना।

12वीं पंचवर्षीय योजना में शुरू किए जा रहे राष्ट्रीय जलवाही स्तर प्रबन्धन कार्यक्रम में इनमें से प्रत्येक पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा।

3. भूमिगत जल-ऊर्जा गठजोड़ को तोड़ना :
देश के अधिकतर भागों में जल स्तरों की स्थिति बिगाड़ने में कृषि के लिए बिजली सब्सिडी की वर्तमान व्यवस्था की मुख्य भूमिका रही है। इन्हीं बिजली सब्सिडियों के कारण हरित क्रान्ति आई थी लेकिन भूमिगत जल पर बढ़ते दबावों को देखते हुए, एक रचनात्मक मार्ग ढूँढने की आवश्यकता है, जो किसानों के हितों को नुकसान पहुँचाए बिना भूमिगत जल-ऊर्जा गठजोड़ को समाप्त कर सके। राज्यों द्वारा तलाश किया गया सर्वाधिक कारगर और एकमात्र समाधान यह रहा है कि अनवरत दिन-रात की सुविधा के साथ ग्रामीण बस्तियों और गैर-कृषक उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति करने वाले पावर फीडरों को भौतिक दृष्टि से पृथक कर दिया जाए और खेती के लिए 3-फेज पूर्वानुमेय आपूर्ति देने वाले पृथक फीडर लगाए जाएँ, जो एम समान शुल्क दर के साथ कुल समय के सन्दर्भ में नियन्त्रित हों। इस व्यवस्था से स्कूलों, अस्पतालों और गैर-कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अपेक्षित बिजली उपलब्ध हो सकेगी और जबकि खेती के लिए नियन्त्रित आपूर्ति की जा सकेगी, और जो व्यस्त घण्टों से इतर की जा सकेगी। उदाहरण के लिए गुजरात सरकार ने 2003-06 के दौरान 8 लाख ट्यूबवेलों को अन्य ग्रामीण कनेक्शनों से पृथक करने के लिए 125 करोड़ अमरीकी डॉलर का निवेश किया और 8 घण्टे प्रति दिन की नियन्त्रित लेकिन उच्च गुणवत्तापूर्ण और पूर्ण वोल्टेज के साथ बिजली आपूर्ति व्यवस्था लागू की। इसके साथ ही भूमिगत जल के पुनर्भरण के लिए व्यापक जल-सम्भर विकास कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके विशुद्ध परिणाम इस प्रकार रहे :

(क) विद्युत सब्सिडी आधी हो गई;
(ख) भूमिगत जल का स्तर स्थिरीकरण हुआ; और
(ग) ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बिजली आपूर्ति में सुधार आया।

अन्य उपायों जैसे विशेष रूप से डिजाइन किए गए ट्रांसफार्मरों के जरिए उच्च वोल्टेज वितरण प्रणाली अपनाना और ऊर्जा-सक्षम पम्पसेटों की संस्थापना, के साथ मिला कर देखें तो यह बिजली सब्सिडी वितरित करने का बेहतर तरीका है और इससे ऊर्जा की हानि रोकने और साथ ही जल-स्तर को स्थिर बनाने में मदद मिलती है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में प्रमुख निवेश इसी दिशा में करने का प्रस्ताव है।

4. जल-सम्भर बहाली और भूमिगत जल पुनर्भरण :
हमारी सिंचाई प्रणालियों की कार्यक्षमता और स्थिरता में सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए भी, 12वीं पंचवर्षीय योजना में इस तथ्य पर पूरा ध्यान दिया गया है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की माँग इस बात की आवश्यकता को अनिवार्य बनाती है कि हमारे वर्षा आधारित क्षेत्रों की उत्पादकता में महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी की जाए।1 इसके लिए प्राथमिक आवश्यकता है जल-सम्भरों के जीर्णोद्धार और भूमिगत जल के पुनर्भरण के लिए व्यापक कार्यक्रम चलाया जाए। 12वीं पंचवर्षीय योजना में मनरेगा को देश के सबसे बड़े जल-सम्भर कार्यक्रम में रूपान्तरित करने का प्रस्ताव है जिससे सुविचारित समेकित जल-सम्भर प्रबन्धन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी), जो 11वीं पंचवर्षीय योजना में शुरू किया गया था, को नया बल मिलेगा। 12वीं योजना के अन्तर्गत जल निकायों की मरम्मत, अनुरक्षण और जीर्णोद्धार नाम का एक नया कार्यक्रम शुरू करने का भी प्रस्ताव है।

5. ग्रामीण पेयजल और स्वच्छता के प्रति नया दृष्टिकोण :
इस तथ्य को देखते हुए कि एक ही जलवाही स्तर का इस्तेमाल सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए किया जा रहा है और ऐसा करते समय संसाधन के समन्वित प्रबन्धन की कोई व्यवस्था नहीं है, पेयजल की उपलब्धता पर विपरीत असर पड़ा है। वास्तव में हम एक ‘अपरिमित दुष्चक्र’ (विटगेंस्टेन, 1953 सेक. 239) परिदृश्य में फँसने के करीब पहुँच गए हैं, जहाँ एक समस्या दूर करने के प्रयास में प्रस्तावित समाधान वैसी ही अन्य समस्या पैदा करता है। ऐसे में अगर आप उसी पर अमल करते रहे, तो प्रारम्भिक समस्या में अपरिमित वृद्धि हो जाएगी और उसका समाधान कभी नहीं होगा। यह उल्टी चाल एक ‘‘हाइड्रोसिजोफ्रेनिया’’ (यानी जल के प्रति खण्डित मानसिकता) का स्वाभाविक परिणाम लगती है (लल्मास और मार्टिनेज-सेण्टोश, 2005; जार्विस और अन्य, 2005), जिसमें जल जैसे अविभाज्य संसाधन के प्रति एक मनोभाजित दृष्टिकोण अपनाया जाता है और यह दृष्टि जल वैज्ञानिक चक्र की एकता और अखण्डता को पहचानने में विफल रहती है। इस तरह सिंचाई के लिए खोदे जा रहे ट्यूबवेल ज्यादा से ज्यादा जलवाही स्तरों को सुखा रहे हैं, जिनका इस्तेमाल पेयजल के लिए किया जा रहा है।

दूसरी तरफ, स्वच्छता के साथ समाभिरूपता के अभाव के कारण जल की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता है, यहाँ तक कि परिष्कृत स्वच्छता सुविधाओं का प्रावधान करना भी कठिन हो जाता है। भूमिजन्य निक्षालन (आर्सेनिक और लुराइड) के कारण भी जल की गुणवत्ता पर रासायनिक दुष्प्रभाव पड़ता है।

पेयजल कार्यक्रम में इन दोषों की समझ एक नया दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती है, जो आनुषंगिकता के सिद्धान्त पर आधारित है, जिसमें इन समस्याओं का यथासम्भव यथार्थ समाधान निकालने का प्रयास किया जाता है। जलापूर्ति कार्यक्रमों के बारे में स्थान, कार्यान्वयन, स्थिरता, प्रचालन एवं रख-रखाव और प्रबन्धन सम्बन्धी निर्णय स्थानीय जलापूर्ति और स्वच्छता समितियों को सौंपे जाते हैं जो प्रभावकारी कार्यान्वयन के लिए ग्राम पंचायतों की देखरेख में काम करती हैं। एक प्रबन्धन हस्तान्तरण सूचकांक (एमडीआई) के जरिए ग्राम पंचायतों के पदाधिकारियों को किए जाने वाले कार्यों और धन का अधिक महत्वपूर्ण हस्तान्तरण किया जा सकता है और उन्हें प्रेरित किया जा सकता है। अपरिमित वापसी के दुष्चक्र की समस्या का समाधान जलवाही स्रोतों के स्थाई एवं भागीदारीपूर्ण प्रबन्धन का दृष्टिकोण अपना कर ही किया जा सकता है। यह दृष्टिकोण अपनाने से पेयजल के बाएँ हाथ को यह जानकारी रहेगी कि सिंचाई का दायाँ हाथ क्या कर रहा है।

सिंचाई के लिए खोदे जा रहे ट्यूबवेल ज्यादा से ज्यादा जलवाही स्तरों को सुखा रहे हैं, जिनका इस्तेमाल पेयजल के लिए किया जा रहा है।पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता कार्यक्रम के बीच समाभिरूपता को सुदृढ़ करने के लिए कवर किए जाने वाले गाँवों में पाइप के जरिए जलापूर्ति शुरू की जानी चाहिए ताकि प्राथमिकता के अनुसार खुले में शौच जाने की प्रवृत्ति से मुक्ति दिलाई जा सके। उत्सर्जित जल का उपचार और रिसाइकलिंग प्रत्येक जलापूर्ति योजना या परियोजना का अभिन्न अंग होगा। कचरे के प्रबन्धन को एक साथ बढ़ावा देना होगा, जिसमें उपचारित उत्सर्जित जल का पुनः इस्तेमाल खेती और भूमिगत जल पुनर्भरण एवं प्रदूषण नियन्त्रण के लिए किया जाएगा। यह कार्य निर्मल ग्राम पुरस्कार (एनजीपी) विजेता गाँव में प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा।

सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान 1999 में एक माँग आधारित, समुदाय-संचालित कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया था लेकिन इस कार्यक्रम की सफलता सन्तोषजनक नहीं रही। आज भी करीब 60 करोड़ लोगों का खुले में शौच जाना हमारे लिए सबसे बड़ा राष्ट्रीय कलंक है। जनगणना के ताजा आँकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में 2011 में टेलीविजन और टेलीफोन रखने वाले परिवारों का प्रतिशत शौचालय सुविधाएँ और पाइप जलापूर्ति सुविधा रखने वाले परिवारों के प्रतिशत से अधिक था। सम्पूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम के अन्तर्गत गरीबी की रेखा से ऊपर (एपीएल)—गरीबी की रेखा से नीचे (बीपीएल) के भेदभाव और प्रोत्साहन राशि बहुत कम होने जैसे कारणों से यह कार्यक्रम सफल नहीं हो पाया।

इस प्रकार 12वीं पंचवर्षीय योजना में प्रमुख कार्यनीतिक बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इसके अन्तर्गत एपीएल-बीपीएल भेदभाव और अलग-अलग शौचालयों पर ध्यान केन्द्रित करने के स्थान पर आबादी परिपूर्णता दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसके पीछे विचार यह है कि लक्ष्य हासिल करने की अन्धी दौड़ में गुणवत्ता और नतीजों की स्थिरता का त्याग न करना पड़े, भले ही सबके लिए सुविधाएँ पहुँचाने की गति धीमी हो। मनरेगा के साथ समाभिरूपता के जरिए पृथक पारिवारिक शौचालयों के लिए यूनिट लागत सहायता बढ़ा कर 10,000 रुपये कर दी गई है। स्थानीय सामाजिक और पारिस्थितिकीय मानदण्डों के अनुसार शौचालयों का डिजाइन बेहतर बनाया जाएगा। स्थिर परिणामों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने के लिए कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा, जिसमें स्वच्छता और जलापूर्ति के प्रति संयुक्त दृष्टिकोण के परिभाषित मानदण्ड के आधार पर ग्राम पंचायतों की पहचान की जाएगी ताकि निर्मल ग्राम पुरस्कार का दर्जा हासिल किया जा सके। कार्यक्रम की परिणति निर्मल ब्लॉकों, निर्मल जिलों और अन्ततः निर्मल राज्यों तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।

6. शहरी भारत में पेयजल और उत्सर्जित जल का संयुक्त प्रबन्धन :
सुरक्षित पेयजल और उत्सर्जित जल का प्रबन्धन सम्भवतः शहरी भारत में सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। यदि हम शहरी जलापूर्ति और कचरा प्रबन्धन के स्थाई समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं तो 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान तत्सम्बन्धी कार्यनीति में महत्वपूर्ण बदलाव अनिवार्य है। इस बारे में निम्नांकित बातें विचारणीय हैं :

1. जलापूर्ति में निवेशों के अन्तर्गत माँग प्रबन्धन, शहर के भीतर असमानता कम करना, और आपूर्ति किए गए जल की गुणवत्ता जैसे मुद्दों पर अवश्य ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए। इसके लिए शहरों को ऐसी योजना तैयार करनी होगी जिसमें बल्क वाटर मीटरों के जरिए वितरण में होने वाली क्षति रोकी जा सके। पानी के सदुपयोग के प्रति जागरुकता पैदा करने के लिए सक्षमता अभियान चलाने की भी आवश्यकता है। प्रचालन और अनुरक्षण लागत में निरन्तर वृद्धि को देखते हुए जल उपयोग प्रभार तय किए जाने चाहिए। निःशुल्क जल की मात्रा की सीमा निर्धारित की जानी चाहिए और उससे अधिक पानी का इस्तेमाल करने वालों से अधिक शुल्क वसूल किया जाना चाहिए।

2. प्रत्येक शहर को जलापूर्ति के प्रथम स्रोत के रूप में अपने स्थानीय जल निकायों पर विचार करना चाहिए। अतः शहरों को जल परियोजनाओं के लिए धन तभी दिया जाना चाहिए, जब वे स्थानीय जल निकायों से जलापूर्ति की जिम्मेदारी लें और स्थानीय जल निकायों और उनके जल ग्रहण क्षेत्रों को संरक्षित करें। यह पूर्व शर्त जल संरक्षण को बढ़ावा देगी और इससे एक ऐसे ढाँचे का निर्माण होगा जो स्थानीय आधार पर जलापूर्ति करेगा और मल-जल का भी स्थानीय रूप में प्रबन्धन करेगा। इसके अन्तर्गत जलापूर्ति और उत्सर्जित जल की वापसी के लिए अलग-अलग पाइप लाइनों की व्यवस्था करनी होगी।

सुरक्षित पेयजल और उत्सर्जित जल का प्रबन्धन सम्भवतः शहरी भारत में सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं।3. मल-जल घटक की व्यवस्था से रहित कोई जलापूर्ति कार्यक्रम मंजूर नहीं किया जाना चाहिए। ‘पूर्ण कवरेज और लागत’ की योजना बनाने के लिए शहरों को उत्सर्जित जल के उपचार के लिए गैर-परम्परागत पद्धतियाँ अपनानी होंगी। उदाहरण के लिए शहर मल-जल का उपचार खुली नालियों में करने पर विचार कर सकते हैं और उत्सर्जित जल के उपचार के लिए वैकल्पिक जैविक पद्धतियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें यह सिद्धान्त अपनाना होगा कि मल-जल प्रणाली के निर्माण की लागत में कमी आए, मल-जल नेटवर्क की लम्बाई कम हो और उत्सर्जित जल का उपचार एक संसाधन के रूप में किया जाए, जिसमें मल-जल को सिंचाई या उद्योग में पुनः इस्तेमाल के योग्य बनाया जा सके। भारतीय शहरों के पास मल के प्रबन्धन के ऐसे नये तौर-तरीके अपनाने के अवसर हैं, जो सस्ते और टिकाऊ हों क्योंकि उन्होंने अभी इसके लिए ढाँचे का निर्माण नहीं किया है।

शहरों को अपनी जल और उत्सर्जित जल योजना के शुरू में ही गन्दे पानी के पुनः इस्तेमाल और री-साइकलिंग की योजना अवश्य बनानी चाहिए और इसके लिए बाद में सोचने का विकल्प नहीं होना चाहिए। पुनः इस्तेमाल के विविध विकल्प अवश्य होने चाहिए जैसे खेती में इस्तेमाल, जल निकायों के पुनर्भरण के लिए इस्तेमाल, उद्यानों की सिंचाई और औद्योगिक एवं घरेलू इस्तेमाल।

7. औद्योगिक जल :
जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था का उद्योगीकरण हो रहा है, यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि उद्योग अपनी जल इस्तेमाल सक्षमता में सुधार के लिए सर्वोत्कृष्ट अन्तरराष्ट्रीय पद्धतियाँ अपनाए। इसमें मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जा सकते हैं :

(क) वैकल्पिक जल सक्षम प्रौद्योगिकियों अथवा विभिन्न विनिर्माण गतिविधियों में प्रक्रियाओं के जरिए ताजा जल की खपत में कमी लाना;
(ख) जल सघन गतिविधियों से उत्सर्जित जल का पुनः इस्तेमाल और री-साइकलिंग और पुनः प्राप्त किए गए जल को उद्योग के भीतर या बाहर गौण गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हेतु उपलब्ध कराना।

यह प्रस्ताव किया गया है कि कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य बनाया जाए कि वे हर वर्ष अपनी वार्षिक रिपोर्ट में वर्ष के लिए जल फुटप्रिण्ट का ब्यौरा शामिल करें। इसमें निम्नांकित बातें शामिल होंगी :

1. उनके द्वारा विभिन्न उत्पादन गतिविधियों में प्रयुक्त (गतिविधिवार) ताजे जल की मात्रा (स्रोतवार)
2. उनके द्वारा प्रयुक्त उस जल की मात्रा जो पुनः इस्तेमाल किया गया हो या री-साइकिल किया गया हो (गतिविधिवार)
3. इस बात की समयबद्ध प्रतिबद्धता कि कम्पनी अपने जल फुटप्रिण्ट में एक निर्धारित अवधि (निर्दिष्ट की जाए) के भीतर निश्चित मात्रा (निर्दिष्ट की जाए) में कमी लाएगी।

8. बाढ़ प्रबन्धन के लिए गैर-संरचनागत व्यवस्थाओं पर फिर से ध्यान केन्द्रित करना :
बाढ़ की समस्या के समाधान के लिए पिछले वर्षों में इंजीनियरी/संरचनागत समाधानों पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाता रहा है। बड़े बाँधों के निर्माण में व्यापक निवेश के अलावा भारत 35,000 कि.मी. तटबन्धों का निर्माण कर चुका है लेकिन, उनकी सीमा तेजी से समाप्त होती जा रही है। उदाहरण के लिए हाल में किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि ‘‘ज्यादातर प्रायद्वीपीय नदियों में डिजाइन किया गया वर्तमान भण्डारण ढाँचा 10 वर्षों में लगभग 9 वर्ष के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के सुचारू प्रवाह को अंजाम दे पाता है। इस प्रकार 10 वर्ष में 1 वर्ष बाढ़ आ सकती है, लेकिन उसके लिए व्यापक अतिरिक्त ढाँचा बनाने में निवेश करने का कोई आर्थिक औचित्य नहीं है। इसकी बजाय मौसम और बाढ़ के बारे में पूर्वानुमान प्रणाली को बेहतर बनाने की आवश्यकता है। साथ ही, बाढ़ बीमा और सम्भव हो तो बाढ़ वाले क्षेत्रों का निर्धारण किया जा सकता है, जहाँ किसानों से अस्थाई (मुआवजे की व्यवस्था के साथ) तटबन्ध बनाने को कहा जा सकता है ताकि बाढ़ के प्रवाह को समेटा जा सके।

बाढ़ की समस्या के समाधान के लिए पिछले वर्षों में इंजीनियरी/संरचनागत समाधानों पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाता रहा है। बड़े बाँधों के निर्माण में व्यापक निवेश के अलावा भारत 35,000 कि.मी. तटबन्धों का निर्माण कर चुका है लेकिन, उनकी सीमा तेजी से समाप्त होती जा रही है। कुछ राज्य सरकारों (जैसे बिहार) ने बाढ़ से निपटने के लिए अपनी रणनीति को व्यापक बनाने का फैसला किया है। इसके अन्तर्गत परम्परागत, प्राकृतिक निकासी प्रणालियों के पुनर्वास पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है और इसके लिए मनरेगा के अन्तर्गत उपलब्ध धन (समाज प्रगति सहयोग और मेघ-पीएँ अभियान, 2012) का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें सामाजिक एकजुटता और सामाजिक इंजीनियरी की जटिल प्रक्रिया को देखते हुए सिविल संगठनों को राज्य सरकार के साथ मिल कर काम करना होता है। 12वीं पंचवर्षीय योजना की कार्यनीति बाढ़ प्रबन्धन में ऐसे नये दृष्टिकोण अपनाने की अनुमति देती है, जो अधिक से अधिक तटबन्ध बनाने से परे हों और 'नदी के लिए स्थान'2 देने की नीति पर आधारित हो।

9. नया संस्थागत फ्रेमवर्क राज्य स्तरीय विनियामक :
12वीं पंचवर्षीय योजना में एक ऐसे संस्थागत फ्रेमवर्क विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है जो कानूनी व्यवस्था से समर्थित हो, और जिसके अन्तर्गत ऐसे नियामक बनाने की सुविधा हो, जो जल विवादों का समाधान करने में सक्षम हो। नियामक द्वारा जल की गुणवत्ता, पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए तय किए गए मानकों को शुल्क के साथ जोड़ा जाएगा। शुल्क का अंतिम निर्धारण निश्चित रूप से राजनीतिक होगा, लेकिन नियामक शुल्क के निर्धारण के लिए उद्देश्य के आधार पर सरकार को सलाह देने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेंगे (ऐसे ही जैसे सीएसीपी कृषि मूल्यों के बारे में सलाह देता है)। इसमें पेयजल की बुनियादी आवश्यकता और पर्यावरण की जरूरतों को निर्धारित करने और पारदर्शितापूर्ण ढंग से सुनिश्चित करने के लिए एक ‘रिजर्व’ (जैसा कि उदाहरण के लिए इसे दक्षिण अफ्रीका में कहा जाता है)3 की आवश्यकता होती है। इस स्तर के निर्धारण के लिए एक स्वतंत्र नियामक की आवश्यकता पड़ती है, जो पारदर्शिता, जवाबदेही और भागीदारीपूर्ण तरीके से अपेक्षित प्रक्रियाओं और क्रियाविधियों को संचालित करता है।

10. नया कानूनी फ्रेमवर्क नया भूमिगत जल कानून :
जलवाही स्तर प्रबन्धन पर आधारित भूमिगत जल के स्थाई और समानतापूर्ण प्रबन्धन के लिए एक नये कानूनी फ्रेमवर्क की आवश्यकता है, जो इस दिशा में प्रयासों का समर्थन कर सके। 12वीं पंचवर्षीय योजना में भूमिगत जल के संरक्षण, संवर्धन, प्रबन्धन और विनियमन के लिए नया मॉडल विधेयक प्रस्तावित किया गया है। यह इस विचार पर आधारित है कि भूमिगत जल का संरक्षण इस संसाधन के दीर्घावधि प्रबन्धन के स्थायित्व की कुंजी है, अतः इसे एक फ्रेमवर्क में रख कर देखा जाना चाहिए, जिसमें जीविकाओं और पेयजल की बुनियादी आवश्यकताओं को प्रमुख महत्व दिया जाए।

राष्ट्रीय जल फ्रेमवर्क कानून


राष्ट्रीय जल फ्रेमवर्क कानून का मसौदा तैयार करने वाले 12वीं पंचवर्षीय योजना के उप समूह ने कहा है कि भारतीय संविधान के अन्तर्गत जल मुख्य रूप से राज्य का विषय है, लेकिन निम्नांकित सन्दर्भ में इसका राष्ट्रीय सरोकार बढ़ता जा रहा है :

(क) पानी का अधिकार जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है;
(ख) जल संकट के उभरने को देखते हुए;
(ग) पानी के अन्तर-राज्य इस्तेमाल और उससे उत्पन्न अन्तर-राज्य संघर्षों को देखते हुए, और जल-हिस्सेदारी सिद्धान्तों के बारे में एक राष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता और संघर्षों को कम करने और उनके शीघ्र समाधान के लिए व्यवस्थाओं को देखते हुए;
(घ) जल के विभिन्न इस्तेमालों से व्यापक उत्सर्जित जल और गम्भीर प्रदूषण एवं उससे उत्पन्न विषाक्तता के ख़तरे को देखते हुए;
(ङ) मानव उपयोग के लिए जल की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयासों की दीर्घावधि पर्यावरण, पारिस्थितिकी विषयक और सामाजिक जटिलताओं को देखते हुए;
(च) इस्तेमालों, इस्तेमालकर्ताओं, क्षेत्रों, राज्यों, देशों और पीढ़ियों के बीच जल के वितरण, उपयोग और नियन्त्रण की समानता सम्बन्धी जटिलताएँ;
(छ) कुछ भारतीय नदियों के अन्तरराष्ट्रीय आयामों को देखते हुए; और
(ज) जल पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बारे में उभरती चिन्ताओं और स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तरों पर उनके समाधान के लिए समुचित कार्रवाई की आवश्यकता को देखते हुए।

राष्ट्रीय जल फ्रेमवर्क कानून का मसौदा तैयार करने वाले 12वीं पंचवर्षीय योजना के उप समूह ने कहा है कि भारतीय संविधान के अन्तर्गत जल मुख्य रूप से राज्य का विषय हैपर्यावरण, वन, वन्य जीव, जैव विविधता जैसे विषयों पर यदि राष्ट्रीय कानून अनिवार्य समझा जाता है तो जल के बारे में राष्ट्रीय कानून बनाना और भी अनिवार्य है। जल उन विषयों के समान ही (अगर अधिक नहीं तो) बुनियादी मुद्दा है। अन्ततः राष्ट्रीय जल कानून का विचार कोई असामान्य या अभूतपूर्व नहीं है। विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रीय जल कानून या संहिताएँ हैं, और उनमें से कुछ (जैसे दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रीय जल अधिनियम, 1998) कानूनों को व्यापक रूप से सुविचारित समझा गया है। इसी प्रकार यूरोपीयन वाटर फ्रेमवर्क डायरेक्टिव, 2000 भी एक जल विधान है।

इस तरह राष्ट्रीय जल फ्रेमवर्क कानून का प्रारूप तैयार करने के लिए इस कानून के स्वरूप और क्षेत्र को स्पष्ट करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है :

1. जो कुछ प्रस्तावित किया जा रहा है वह केन्द्रीय जल प्रबन्धन कानून या कोई कमान एवं नियन्त्रण सम्बन्धी कानून नहीं है, बल्कि एक फ्रेमवर्क कानून है यानी केन्द्र, राज्यों और स्थानीय स्वशासी संस्थानों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले विधायी और/या कार्यकारी (या हस्तान्तरित) अधिकारों को शासित करने वाले सामान्य सिद्धान्तों का एक समूह है।

2. कानून इस अर्थ में युक्तिसंगत होना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा पारित कानून और प्रशासनिक कार्रवाइयाँ तथा पंचायती राज संस्थानों को हस्तान्तरित कार्य सामान्य सिद्धान्तों और फ्रेमवर्क कानून में निर्धारित की गई प्राथमिकताओं के अनुरूप होने चाहिए। इसमें यदि कोई विचलन हो तो उसे अदालत में चुनौती देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

3. ऐसे कानून में जल को सार्वजनिक न्यास सिद्धान्त के रूप में स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई सभी प्रमुख वैधानिक घोषणाओं को शामिल किया जाना चाहिए और उसमें जल को बुनियादी अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया हो और साथ ही पूरकता के सिद्धान्त का अनुपालन हो, जैसा कि 73वें और 74वें संविधान संशोधन में स्पष्ट किया गया है। इसमें निवारक और ऐहतियाती सिद्धान्तों, जिन्हें हाल ही में नेशनल हरित ट्राइब्यूनल अधिनियम, 2010 में कानूनी रूप में मान्यता दी गई है, और सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के पारदर्शिता सिद्धान्तों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

केन्द्र और राज्यों के बीच विधायी अधिकारों के विभाजन की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रीय जल फ्रेमवर्क कानून केवल संविधान के अनुच्छेद 252 (1) में निर्धारित प्रक्रिया का अनुपालन करके ही बनाया जा सकता है। अर्थात् यदि दो या अधिक राज्य विधान सभाएँ संसद द्वारा ऐसा कानून अधिनियमित करने के समर्थन में प्रस्ताव पारित करें तो संसद तदनुसार कानून बना सकती है।

निष्कर्षत:


12वीं पंचवर्षीय योजना में इस बहुआयामी बदलाव को मूर्त रूप देने में व्यापक प्रारम्भिक चुनौतियाँ हैं। कई मायनों में इस बदलाव की माँग लम्बे समय से की जा रही थी। इस नये दृष्टिकोण को कार्यरूप देना और भी कठिन है लेकिन इस तथ्य से उम्मीद बन्धती है कि परिवर्तन के बारे में समझौते की प्रक्रिया गहन रूप में समावेशी है और इसका प्रस्ताव महत्वपूर्ण संयोजकों, विशेष कर राज्य सरकारों की ओर से किया गया है। इस परिवर्तन को अमल में लाना केन्द्रीय योजना का हिस्सा है और इस आलेख में व्यक्त किए गए सर्वाधिक नवीन विचार राज्यों से मिले बेहतर शासन के उदाहरणों पर आधारित हैं।

यह भी एक तथ्य है कि उभरते जल संकट निचले स्तर से परिवर्तन की गति पर दबाव डाल रहे हैं। अनेक सम्बद्ध पक्ष परम्परागत तरीके से कार्य जारी रखने के इच्छुक नहीं हैं। फिर भी आगे का रास्ता लम्बा और कठिन है, जिसमें निहित स्वार्थों और हठ धर्मिता रखने वाले तत्वों से भी संघर्ष करना होगा। इसके लिए सिविल सोसायटी, शिक्षाविदों और सरकार को मिलकर काम करना होगा ताकि 12वीं पंचवर्षीय योजना के एजेण्डे को रूपान्तरित किया जा सके। यदि इस कार्य में सफलता प्राप्त करनी है तो इसके कार्यान्वयन में स्थानीय समुदायों की घनिष्ठ भागीदारी अनिवार्य होगी।

फुटनोट्स


1. पहली बार यह तर्क सी. शाह और अन्य (1998) द्वारा दिया गया, बाद में इसे गोल (2006) में अद्यतन किया गया।

2. रूम फॉर द रीवर, बाढ़ प्रबन्धन हालैण्ड की नयी नीति है, जो बाँध को मजबूत करने की बजाय नदी राहत पर निर्भर है (नीदरलैण्ड सरकार, 2007, क्लाइमेट वाइर, 2012)

3. दक्षिण अफ्रीका में ‘रिजर्व’ एक ऐसा प्रयास है, जिसके अन्तर्गत देश की नदियों में न्यूनतम प्रवाह की मात्रा निर्धारित करने का प्रयास पारिस्थितिकी कार्यों (जैसे मछली और पौधों के परिवास के लिए) के रख-रखाव के लिए कुर्की की व्यवस्था है। इस उपाय का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि दक्षिण अफ्रीका की आबादी को घरेलू उद्देश्यों के लिए हर रोज प्रति व्यक्ति 25 लीटर पानी मिल सके। रिजर्व यह तय करने का एक प्रयास है कि नुकसान का कितना स्तर स्वीकार्य है न कि यह तय करना कि ‘पर्यावरण’ की कितनी आवश्यकता है।

(लेखक योजना आयोग में सदस्य हैं और जल-संसाधन, ग्रामीण विकास तथा विकेन्द्रित शासन विभागों से सम्बद्ध हैं एवं राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के भी सदस्य हैं)
ई-मेल: mihir.shah@nic.in

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