मुंगेर के तारापुर में किसान मजदूर सम्मेलन

Submitted by HindiWater on Sun, 01/11/2015 - 15:46
रासायनिक उर्वरकों का न करें इस्तेमाल धरती, पानी को जहरीला होने से रोकें - मुख्यमन्त्री

प्राकृतिक संसाधन दोहन के माध्यम बन रहे हैं। हिन्दुस्तान के आर्थिक जीवन का आधार खेती है। नीतियाँ तो इनके पक्ष में होना चाहिए। साथ ही किसानों को देशज तरीकों को अपनाना होगा। जल के अन्धाधुन्ध उपभोग के कारण भूगर्भ जल का स्तर निरन्तर नीचे जा रहा है रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशको के अन्धाधुन्ध उपयोग के कारण धरती और पानी दोनों को जहरीला बना रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्योता दिया जा रहा है। एक पुरानी कहावत है ‘उत्तम खेती मध्यम बाण करे चाकरी कुकर निदान।’ आज देश में खेती उत्तम नहीं है। यह घाटे का सौदा साबित हो रही है। लागत बढ़ रहा है और उत्पादन की कीमत नहीं बढ़ी है। मुंगेर के तारापुर के किसान मजदूर सम्मेलन में इस चिन्ता का इज़हार किया गया।

यह किसान मजदूर सम्मेलन हर साल शकुनी चौधरी के जन्मदिन पर बिहार के अलग-अलग हिस्से में आयोजित किया जाता है। इस वर्ष इस सम्मेलन का आयोजन मुंगेर तारापुर स्थित आर एस कॉलेज में किया गया। दरअसल में ऐसे सम्मेलन का मकसद किसानों की समस्या से वाकिफ होना है।

इस बार आयोजित सम्मेलन का उद्घाटन बिहार के मुख्यमन्त्री जीतनराम मांझी ने किया। अपने उद्घाटन सम्बोधन में मुख्यमन्त्री ने कहा कि मानवता और प्रकृति को बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। प्राकृतिक संसाधन दोहन के माध्यम बन रहे हैं। हिन्दुस्तान के आर्थिक जीवन का आधार खेती है। नीतियाँ तो इनके पक्ष में होना चाहिए। साथ ही किसानों को देशज तरीकों को अपनाना होगा।

जल के अन्धाधुन्ध उपभोग के कारण भूगर्भ जल का स्तर निरन्तर नीचे जा रहा है रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशको के अन्धाधुन्ध उपयोग के कारण धरती और पानी दोनों को जहरीला बना रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्योता दिया जा रहा है। मुख्यमन्त्री ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के इस्तेमाल से हम जहाँ धरती पानी को तो जहरीला बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उत्पादित अनाज का स्वाद भी बेस्वाद हो गया है।

बचपन की कहानी सुनाते हुए मुख्यमन्त्री ने कहा कि पहले बासी भात में पानी डाल देते थे और नमक देकर खा लेते थे। यह सिर्फ मेरा नहीं गरीब तबके के लोगों का आहार था। आज वह स्थिति नहीं है। एक बड़ी साजिश खेती को लीलने के लिये चल रही है। हमारे वन क्षेत्र का आकार निरन्तर घटता जा रहा है। बिहार में वन क्षेत्र मात्र 12.86 प्रतिशत है। इसका असर तो पर्यावरण पर पड़ेगा। यदि हम खेती में देशज तरीके को अपनायें तो घरती और पानी दोनों का संरक्षण कर पाएँगे।

राज्य सरकार ने कृषि का रोड मैप तैयार किया है। राज्य के 76 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। कृषि के क्षेत्र में विस्तार की असीम सम्भावनाएँ हैं और इसी के मद्देनजर सरकार ने कृषि रोडमैप तैयार किया है। कृषि से जुड़ा हर व्यक्ति चाहे वह भू-स्वामी हो या फिर खेतों में काम करने वाला मजदूर सभी किसान हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को केन्द्र में रखकर ही रोडमैप की परिकल्पना की गर्इ है क्योंकि जब किसान का जीवन खुशहाल होगा तो राज्य भी खुशहाल हो जाएगा।

मुख्यमन्त्री ने कहा कि किसानों के खुशहाल होने से राज्य के सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी में भी वृद्धि होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृषि और कृषि से जुड़े सभी कार्य देश एवं राज्य के विकास में खास महत्व रखते हैं। उन्होंने राज्य के रोडमैप को व्यापक और बहुआयामी बताया।

उन्होंने कहा कि भारत में स्वतन्त्रता का संघर्ष केवल स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिये नहीं बल्कि उपनिवेशवाद और पूँजीवादी साम्राज्य को वैश्विक स्तर पर खत्म करने के लिये था। आज के दौर में यह गम्भीर चुनौती है कि शोषण, असमानता और दोहन को कैसे रोकें। असमानता की खाई को पाटना होगा।

राज्य के नगर विकास मन्त्री सम्राट चौधरी ने कहा कि बिहार की जनता कृषि और कृषि आधारित उद्योग से ही सम्पोषित होती रही है। कृषि ही जीवनयापन का एक मात्र आर्थिक आधार रही। कृषि के लिए यदि पानी की उपलब्धता और आवश्यकता में तालमेल नहीं हो तो कृषि की उत्पादकता प्रभावित होगी। स्वतन्त्रता के बाद विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश में जब विकास का दौर चला, तो पानी के संसाधन के क्षेत्र में बिहार को कोई खास लाभ नहीं मिला।

कोसी बाढ़ एवं सिंचाई योजना, गण्डक सिंचाई योजना तथा सोन नहर आधुनिकीकरण योजना के अलावा कोई महत्वपूर्ण जल संसाधन योजना कार्यान्वित नहीं हुई। उत्तर बिहार में बाढ़ प्रबन्धन के लिए अब तक कुल 3500 किलोमीटर तटबन्ध बनाए गए हैं। इन योजनाओं से एक तो बिहार को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका, दूसरी नई समस्याएँ भी उत्पन्न हो गईं।

अन्तरराज्यीय समस्याओं के चलते सोन नहर योजना अपनी क्षमता के अनुरूप सिंचाई करने में अक्षम रही है। कोसी और गण्डक सिंचाई योजनाएँ अपनी सृजित क्षमता का 40 फीसदी भी लाभ नहीं दे रही हैं। जहाँ तक बाढ़ प्रबन्धन का सवाल है, एकांगी रूप से तटबन्धों का आश्रय हमें अधिक-से-अधिक मिश्रित लाभ ही दे सका है।

उन्होंने कहा कि बिहार की कृषि अब भी बाढ़, सुखाड़ और जलजमाव की बुनियादी समस्याओं से ग्रसित है। जल संसाधन जनित समस्याओं से आज की कुण्ठित कृषि और जल संसाधन आधारित सम्भावनाओं के द्वारा उन्नत कृषि में वही फासला है, जो बिहार की गरीबी और समृद्धि में है।

यहाँ बाढ़, सुखाड़ और जलजमाव तीनों समस्याएँ बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में एक ही समय, या एक ही क्षेत्र में विभिन्न समयों में विद्यमान रहती हैं। फिर, बिहार की सभी नदियों का जलग्रहण क्षेत्र (बेसिन) या तो अन्तरराज्यीय या अन्तरराष्ट्रीय है। उन्होंने कहा कि मुख्यमन्त्री जीतनराम मांझी ने प्रधानमन्त्री को पत्र लिखा है। बावजूद इसके केन्द्र का रूख सकारात्मक नहीं है।

किसान मजदूर सम्मेलनशकुनी चौधरी ने किसानों की समस्या की ओर मुख्यमन्त्री का ध्यान आकृष्ट किया और कहा कि, अभी तक धान खरीद नहीं होने का सवाल भी उठाया। वहीं, सिंचाई विभाग के अभियन्ता पर भड़ास निकालते हुए कहा कि इन्हें ठीक करें। बदुआ जलाशय का पानी गेट ऑपरेशन ठीक नहीं होने के कारण पानी बर्बाद हो जा रहा है। जिस कारण किसानों को सिंचाई में समस्या आती है।

सम्मेलन को स्थानीय विधायक नीता चौधरी, अनन्त कुमार सत्यार्थी, विधान पार्षद संजय प्रसाद, विपिन मण्डल, बदरूज्जमा, रेखा सिंह चौहान ने भी सम्बोधित किया। सम्मेलन की अध्यक्षता पूर्व विधायक गणेश पासवान ने की।

जहाँ तक किसानों का सवाल है तो खस्ता हालत बयां करती हैं। यह बेहद दुखद है कि 10 किसान परिवारों में से प्रति एक परिवार को अक्सर भूखे पेट ही रहना पड़ता है। केवल 44 फीसदी परिवारों को ही तीनों वक्त का खाना मयस्सर हो पाता है, जबकि 39 फीसदी परिवार सामान्य तौर पर दोपहर और रात का भोजन कर पाते हैं लेकिन उन्हें सुबह का नाश्ता नहीं मिल पाता। लगभग 36 फीसदी किसान या तो झोपड़ियों में रहते हैं या कच्चे मकानों में और 44 फीसदी किसान कच्चे-पक्के मकानों में रहते हैं। केवल 18 फीसदी किसानों के पास ही पक्के मकान हैं।

किसानों के सवाल पर प्रगतिशील कृषक मंच के संयोजक किशोर जायसवाल एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष रामनिवास पाण्डेय का कहना है कि बिहार को जल संसाधन जनित जटिल समस्याओं से मुक्त होना है तो उसे अपने जल संसाधन का प्रबन्धन, विकास के लिए विज्ञान-सम्मत उपयुक्त तकनीक को अपनाना होगा। इसके लिए जो मौलिक बात है, वह है जल संसाधन से सम्बन्धित ज्ञान को विकसित और सुदृढ़ करना। बिहार अर्धज्ञान का बहुत दंश झेल चुका और अन्धेरे में बहुत तीर चला चुका है। समय की पुकार है कि ज्ञान के प्रकाश में सही ढूँढकर और उस पर विश्वास और लगन के साथ बढ़ा जाए।

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा